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सहवाग के उतरे कंधे की वजह से सालों साल खेल गया टीम इंडिया का ये बल्लेबाज़!

कई बार किस्मत आपका किस तरह साथ देती है ये इस खिलाड़ी को देखकर पता चलता है. एक बड़ा खिलाड़ी चोटिल हुआ और इस खिलाड़ी का करियर बन गया. नाम है दिनेश मोंगिया.

29 अक्टूबर, 2000. कोका कोला चैम्पियन्स ट्रॉफी. इंडिया और श्रीलंका के बीच फाइनल खेला गया. श्रीलंका ने 299 रन बनाए और भारत सिर्फ 54 रनों पर ढेर हो गया. इस हार के बाद जब दादा कोलकाता पहुंचे तो उन्हें रिसीव करने के लिए पत्रकारों और उनके पिता के अलावा कोई नहीं था. दादा ने बताया था कि युवाओं पर वो कितना भरोसा करते हैं. उस दौर में कई युवाओं की टीम में एंट्री हुई. जिनमें समीर धीगे, श्रीधरन श्रीराम, हेमंग बदानी, अमित भंडारी, विजय दहिया और दिनेश मोंगिया जैसे क्रिकेटर्स रहे. लेकिन कोई भी मोंगिया जितना लंबा नहीं चल सका.

साल 2001 में मोंगिया डॉमेस्टिक क्रिकेट में अलग तरह की फॉर्म में थे. दिलीप ट्रॉफी में डबल हन्ड्रेड फिर 308 रन. सलेक्टर्स ने मोंगिया को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मौका दे दिया. टीम में एंट्री तो मिली लेकिन शुरुआत बहुत खास नहीं रही. लेकिन फिर भी दादा का भरोसा इस खिलाड़ी पर बना रहा.

साल था 2002, ज़िम्बॉब्वे के खिलाफ टीम इंडिया को पांच मैचों की वनडे सीरीज़ खेलनी थी. उस सीरीज़ से पहले सौरव गांगुली के सामने एक बड़ी परेशानी आ गई. जिस वीरू को प्रमोट करके उन्होंने ओपनिंग की परेशानी दूर की थी. उन्हें इंजरी हो गई. ओपन करते हुए वीरू कमाल की फॉर्म में थे. न्यूज़ीलैंड के खिलाफ शतक और उसके बाद केन्या और इंग्लैंड के खिलाफ शानदार फॉर्म. लेकिन ज़िम्बॉब्वे से पहले ही उनका कंधा उतर गया.

# वीरू का कंधा उतरा और मोंगिया का काम बन गया:

वीरू को चोट लगने के बाद अब टीम मैनेजमेंट के सामने ओपनिंग की बड़ी परेशानी थी. सीरीज़ से पहले पूरी टीम बस में एक साथ जा रही थी. सौरव गांगुली बस में भी कप्तान ही रहते थे, हमेशा सबसे आगे की सीट पकड़कर बैठते थे. लेकिन उस दिन उन्होंने अपनी अगली सीट छोड़ी और पीछे एक ऐसे खिलाड़ी के पास जाकर बैठ गए. जिसका टीम में अभी कोई ठोर-ठिकाना नहीं था. यानी दिनेश मोंगिया. दादा ने मोंगिया से कहा,

”दिनेश वीरू का शोल्डर उतर गया है, तो अगली सीरीज़ के लिए वो खेल नहीं पाएगा. सुन तू भी तो पंजाब के लिए तीन नंबर खेलता है ना, क्या तू ओपन करेगा?”

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दिनेश मोंगिया. फोटो: Facebook

बस दिनेश को तो मानो वो मिल गया, जिसके लिए वो तरस रहे थे. पंजाब टीम के लिए ऊपर खेलने वाला खिलाड़ी टीम इंडिया में कभी नंबर छह, कभी चार, कभी तीन इधर-उधर हो रहा था. उन्होंने झट से कहा,

”ठीक है दादा कर लूंगा, उसमें क्या है.”

# जब कुंबले ने सौरव से कहा, मोंगिया से ओपनिंग करवाओ:

मोंगिया से ओपनिंग करवाने के पीछे सबसे बड़ा हाथ जम्बो अनिल कुंबले का था. ज़िम्बॉब्वे के खिलाफ उस सीरीज़ से लगभग डेढ़ महीना पहले ही डॉमेस्टिक क्रिकेट में चैलेंजर्स ट्रॉफी खेली गई. कुंबले जिस टीम के कप्तान थे, उसमें दिनेश मोंगिया भी थे. लेकिन सलेक्टर्स माशाअल्लाह थे. टीम तो चुनी लेकिन ओपनर ही नहीं दिया. अब कुंबले के सामने बड़ी परेशानी आ गई कि किससे पारी शुरू करवाएं. तो आनन-फानन में मैच से पहले वाली शाम उन्होंने दिनेश से पूछा तुम ओपनिंग कर लोगे. दिनेश तैयार हो गए, तैयार भी हुए और सेंचुरी भी ठोक दी. उन्होंने उस मैच में 140 गेंदों पर 131 रन बनाए.

बस फिर क्या था जम्बो इम्प्रेस हो गए. जम्बो ने घूम-घूमकर ये बात बहुत से सारे लोगों को बता दी. विश्वनाथ हों, गावस्कर हों या फिर सौरव गांगुली. उन्होंने सबसे कहा कि

”यार ये लड़का निडर है, जो मैं बोलूं वो करने के लिए तैयार हो जाता है.”

वैसे तो खुद सौरव गांगुली ने चैलेंजर्स ट्रॉफी में मोंगिया को ओपन करते देख लिया था. लेकिन कुंबले ने भी सौरव के मन के डाउट को पूरी तरह से दूर कर दिया.

बस मोंगिया ने मौका का फायदा उठा लिया. सीरीज़ के पहले चार मैचों में उन्हें स्टार्ट मिलती थी. लेकिन वो बड़ा स्कोर नहीं कर पा रहे थे. पहले मैच में गांगुली के साथ उन्होंने 46 रन जोड़े. दूसरे मैच में दोनों ने पहले विकेट के लिए 109 रन जोड़ दिए. तीसरे और चौथे मैच में वो ज्यादा नहीं कर सके. मोंगिया परेशान थे कि आखिर ये हो क्या रहा है.

# इस लड़के की रेप्युटेशन 50 रन वाली नहीं 200-300 वाली है:

गुवाहाटी में खेले जाने वाले पांचवे वनडे से पहले शाम में जॉन राइट, संजय मांजरेकर और दिनेश मोंगिया साथ में बैठे थे. संजय ने उस बातचीत के दौरान जॉन राइट से कहा,

”ये जो लड़का है ना इसकी  रेप्युटेशन 50-50 रन बनाने की नहीं है, इसकी रेप्युटेश 200-300 रन बनाने की है.’

John Wright
जॉन राइट, टीम इंडिया के कोच. फोटो: Reuters

बस संजय मांजरेकर की इस बात ने मानो मोंगिया के लिए वो काम किया, जो सुग्रीव की सेना ने हनुमान को उनकी भूली हुई शक्ति याद दिलाने के लिए किया था.

मोंगिया भी अगले दिन कुछ सोचकर उतरे और उस मैच में पूरे 233 मिनट बल्लेबाज़ी की. 50 ओवर बाद भी ज़िम्बॉब्वे का कोई गेंदबाज़ उन्हें आउट नहीं कर पाया. मोंगिया नॉटआउट 159 रन बनाकर वापस लौटे. उनके करियर का सबसे बड़ा वनडे स्कोर.

19 मार्च, 2002 को खेला गया ये मैच मोंगिया के वनडे करियर का 15वां मैच थे. इस पारी की बदौलत मोंगिया पहले वेस्टइंडीज़ गए, फिर इंग्लैंड में नेटवेस्ट सीरीज़ भी खेले. कप्तान गांगुली का उनपर इतना ज़्यादा भरोसा था कि उन्हें 2003 विश्वकप में साउथ अफ्रीका भी लेकर गए. लेकिन फिर मोंगिया के बल्ले से वो बड़ा कमाल कभी नहीं दिखा.

मोंगिया ने अपने वनडे करियर में कुल 57 मैच खेले. जिसमें उन्होंने 28 के औसत से 1230 रन बनाए. चार अर्धशतक और एक शतक. मोंगिया के जिस एक शतक का ज़िक्र हमने किया उसके अलावा वो इंटरनेशनल क्रिकेट में कभी शतक नहीं लगा सके. गुवाहाटी वनडे के बाद मोंगिया ने कुल 42 वनडे खेले. लेकिन सिर्फ तीन अर्धशतक ही बना सके. विश्वकप 2003 के बाद बांग्लादेश में ट्रॉई सीरीज़ खेलने के बाद वो टीम से बाहर हो गए. फिर 2004 में एक मैच, 2005 में दो मैच, 2006 में चार मैच और 2007 आते-आते उनका करियर खत्म हो गया.


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