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जब सचिन ने कसम खाई थी कि ऑफ साइड में नहीं खेलूंगा और करके भी दिखाया

साल था 2003. क्रिकेट का महासमर यानी क्रिकेट विश्वकप. 1999 के बाद पहली बार 90 के दशक के बच्चे इस विश्वकप को बारीकियों के साथ देख और समझ रहे थे. सौरव गांगुली की कप्तानी वाली टीम ने वो कर दिया था. जो 1983 की कहानियों में सुना और पढ़ा था. टीम फाइनल में थी, मैच था दुनिया की सबसे ताकतवर क्रिकेट आर्मी यानी ऑस्ट्रेलिया के साथ. फाइनल से पहले क्रिकेट को घोंटकर पीने वाले हर्षा भोगले ने भविष्यवाणी की थी कि विश्वकप 2003 में ऑस्ट्रेलिया की जीत के बीच अगर कोई एक शख़्स खड़ा है तो वो सचिन तेंडुलकर हैं.

2003 विश्वकप में गोल्डन बैट से बल्लेबाज़ी करने वाले सचिन फाइनल की पांचवी गेंद पर कैच देकर आउट हो गए. भारत का सपना आधे मैच के बाद ही खत्म हो गया. लेकिन आज की कहानी उस मैच की नहीं है. और न ही ऊपर दिख रहा ये ग्राफ उस मैच का है.

Sachin Mcgrath
इंडिया-ऑस्ट्रेलिया मैच, विश्वकप 2003 की तस्वीर. फोटो: Getty Images

ये कहानी है उस वर्ल्डकप फाइनल के नौ महीने बाद की. 1 जनवरी, 2004, नया साल. टीम इंडिया ने शायद ही जश्न मनाया होगा. क्योंकि अगले दिन यानी 2 जनवरी से ऑस्ट्रेलिया के साथ सिडनी में बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी का चौथा टेस्ट शुरू होना था. सीरीज़ का पहला मैच ब्रिसबेन में ड्रॉ हो गया था. इसके बाद एडिलेड में मानो द्रविड़ और लक्ष्मण ने ईडन गार्डेन्स के कारनामे को दोहरा दिया था. टीम इंडिया सीरीज़ में 1-0 से आगे थी. तीसरा टेस्ट ऑस्ट्रेलिया ने जीतकर सीरीज़ बराबर कर ली थी.

चौथे टेस्ट पर अब सबकी नज़रें थीं. इतिहास में पहली बार लग रहा था कि भारत, ऑस्ट्रेलिया में ऑस्ट्रेलिया को हरा सकता है. मैच का टॉस हुआ. कप्तान गांगुली ने सिक्का उछलते ही उम्मीद बंधा दी थी. टीम इंडिया की पहले बल्लेबाज़ी.

आजकल हिंदी कॉमेंट्री बॉक्स में दिखने वाले आकाश चोपड़ा के साथ तब वीरेंद्र सहवाग पारी शुरू करते थे. दोनों बल्लेबाज़ों ने पहले विकेट के लिए 123 रन जोड़ दिए. टीम को मजबूत शुरुआत मिल चुकी थी. वन-डाउन खेलने वही बल्लबाज़ आया. जो आज भी किसी भी इंडियन प्लेइंग इलेवन में वन-डाउन का प्रबल दावेदार है. राहुल द्रविड़. लेकिन एक साथ भारत के दोनों ओपनर चले गए. 128 के स्कोर पर दो विकेट गिर चुके थे. अब ऑस्ट्रेलिया की मुसीबत और बड़ी होने वाली थी. क्योंकि क्रीज़ पर वो दोनों बल्लेबाज़ थे. जो तब लगभग 15000 से ज्यादा टेस्ट रन बना चुके थे. यानी द्रविड़ और सचिन.

Dravid Sachin
सचिन और द्रविड़ की जोड़ी भारत की सफलतम टेस्ट जोड़ियों में से एक है. फोटो: Getty Images

उस सीरीज़ में ऑस्ट्रेलिया को सचिन से ज्यादा डर राहुल द्रविड़ से था. क्योंकि पहले 2001 में कोलकाता और फिर 2003 में एडिलेड में उन्होंने अपने शांत मासूम चेहरे के साथ जो उथल-पुथल मचाई थी, उसे ऑस्ट्रेलियंस अब भी याद करते हैं.

सचिन के लिए वैसे भी टेस्ट में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा था. 30 अक्टूबर, 2002 को कोलकाता में वेस्टइंडीज़ के खिलाफ 176 रनों की पारी के बाद 14 महीने और 420 से ज्यादा दिनों तक उनके बल्ले से सिर्फ दो अर्धशतक निकले थे. ऑस्ट्रेलिया सीरीज़ खत्म होने वाली थी कि उनके बल्ले से तीन टेस्ट में सिर्फ 82 रन ही आए थे. सचिन परेशान थे. परेशान भी ऐसे वैसे नहीं. इतने कि उन्होंने एक बड़ी कसम खा ली. टेस्ट क्रिकेट में सबसे बड़ी चीज़ होती है बाहर जाती गेंदों को छोड़ना और किसी तपस्वी की तरह क्रीज़ पर घंटों अपनी तपस्या में लीन रहना. ये काम सुनील गावस्कर, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण बेमिसाल करते थे.

Sunil Gavaskar Walking 800
Out होकर पैवेलियन की तरफ जाते Sunil Gavaskar (गेटी, फाइल)

सचिन को भी एक बार फिर से पुराने रंग में आने के लिए ऐसी ही साधना की ज़रूरत थी. लेकिन ये भी तय है कि कोई भी तपस्या, कोई भी साधना किसी ना किसी कारण से होती है. सचिन के लिए वो कारण फॉर्म में आना तो था ही. साथ ही था एक ऐसा प्रण जैसा भीम ने पांचाली के केश दु:शासन के रक्त से धुलवाने का लिया था. सचिन ने ये प्रण दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति के खिलाफ लिया था. इस मैच से ठीक पहले सचिन ने अपने बड़े भाई का रुख किया. उनसे अपने आउट होने पर बात की. तब उनके भाई ने उन्हें बताया कि तुम्हारे आउट होने का कारण है तुम्हारा खराब शॉट सलेक्शन.

इसके बाद सचिन ने अपने भाई के साथ ये चैलेंज लिया कि ठीक है मैं इस टेस्ट में कोई भी खराब शॉट नहीं खेलूंगा और नॉट-आउट ही वापस आउंगा. 128 रन पर दूसरा विकेट गिरने के बाद जब सचिन इस मैच में बल्लेबाज़ी के लिए उतरे. तो ऑस्ट्रेलिया के धाकड़ गेंदबाज़ जेसन गिलेस्पी, ब्रेट ली, नैथन ब्रैकन और स्पिनर स्टुअर्ट मैक्गिल. सबने उन्हें ऑफ स्टम्प के बाहर गेंदे फेंकी. सचिन समझ गए कि ऑस्ट्रेलियंस उन्हें फंसाने के लिए ये चाल चल रहे हैं. लेकिन हठी सचिन ने वो पारी बिल्कुल उसी अंदाज़ में खेली. जैसा हिमालय की पहाड़ियों में सालों से बैठा एक साधू बिना किसी रुकावट के तपस्या करता है. सचिन ने बाहर जाती एक भी गेंद से छेड़खानी नहीं की. क्योंकि उन्हें उस पारी में हर उस गेंद पर अपना वो प्रण याद था.

Sachin Bat
सिडनी में स्टीव वॉ के आखिरी टेस्ट में ऐतिहासिक पारी खेलते सचिन तेंडुलकर. फोटो: Getty Images

उस मैच की अपनी 613 मिनट यानी 10 घंटे और 13 मिनट की पारी में सचिन ने एक भी कवर ड्राइव नहीं मारा. सचिन की इस पारी को देखकर ऐसा लग रहा था कि मानो ऑफ साइड के फील्डर्स की छुट्टी हो गई है. और उनका इस मैच में कोई काम ही नहीं है. सचिन की इस पारी की वजह से 16 साल बाद भी इस ग्राफ को देखने वाले ठहर जाते हैं. इतना ही नहीं सचिन की 613 मिनट की पारी के बाद जब भारत ने 703 रन बनाए तो गांगुली ने पारी घोषित की. तब जाकर ही सचिन अपनी जगह से हिले. वरना सिडनी के उस रण में किसी भी ऑस्ट्रेलियन के बस में ये नहीं था कि वो सचिन को अपने अनुसार वापस मैदान से बाहर भेज सकें.

इस सीरीज़ के सालों के बाद ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान स्टीव स्मिथ ने भी उस मैच में अपनी हार मानी थी. उन्होंने कहा था कि

”सचिन उस पारी में बेमिसाल थे, हमारे पास उनके लिए कोई भी जवाब नहीं था.”

सचिन इस मैच में तपस्या में इस तरह से लीन थे कि दूसरी पारी में भी ऑस्ट्रेलियंस उनके यज्ञ को भंग की करने की कोशिश में लगे रहे. लेकिन सफल नहीं हो सके. दूसरी पारी में सचिन 108 मिनट खेले और 60 रन बनाए. लेकिन ऑस्ट्रेलियंस उन्हें उनकी जगह से हिला नहीं सके. इस मैच में सचिन ने टेस्ट क्रिकेट की एक बेजोड़ पारी खेली थी. साथ ही 9000 टेस्ट रन भी पूरे किए थे.


सुनील गावस्कर के आखिरी टेस्ट में सामने पाकिस्तान टीम थी, कहानी बड़ी जाबड़ है 

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