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शंकर महादेवन के तीन किस्से: तो क्या 'ब्रेथलेस' एक सांस में नहीं गाया गया था?

ये 30 लाखवीं बार है, जब मैं इस सवाल का उत्तर दे रहा हूं. ये गाना मैंने एक सांस में नहीं गाया था. ये सिर्फ एक आइडिया था, जिसपर मैंने और जावेद अख्तर ने काम किया. ये एक कॉन्सेप्ट था. एक कॉन्सेप्ट को एक असली गीत बनने में समय लगता है. आपको लिरिक्स पर काम करना होता है. आपको मेलोडी पर काम करना होता है. अरेंजमेंट पर काम करना होता है. बहुत सारी चीज़ों पर काम करना होता है. सब में समय लगता है. ये कोई ऐसी चीज़ नहीं थी जो अचानक हुई हो.

ये कहना था शंकर महादेवन का. ‘ब्रेथलेस’ को लेकर. एक इंटरव्यू के दौरान. जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्होंने ये गीत एक सांस में गाया था?

और इस इंटरव्यू को पढ़ने के बाद मुझे बचपन के वो दिन याद आए जब महीनों लगाकर इसके लिरिक्स रट लिए थे. पक्का यकीन था. मुझे ही नहीं मेरे सारे संगी-साथियों को भी कि ये गीत एक सांस में गाया है बंदे ने.

लेकिन ये यकीन हमारा था. शंकर महादेवन ने कभी कुछ नहीं कहा था. उन्होंने तो इन्फेक्ट तब से लेकर अब तक ‘तीस लाख’ बार खंडन कर डाला है इस बात का. तो नहीं, आज ये सवाल नहीं है कि शंकर ने ये गीत एक सांस में गाया था या नहीं, सवाल ये है कि इस कमाल के आर्टिस्ट से हमारी पहली पहचान कैसे हुई?

जिसका उत्तर ये है कि शंकर से एक 90s’ किड की मुलाकात ‘ब्रेथलेस’ के माध्यम से हुई. जैसे सुखविंदर सिंह से ‘छैयां- छैयां’ के माध्यम से, अदनान सामी की ‘थोड़ी सी तो लिफ्ट करा दे’ से.

वरना ऐसा नहीं है कि इन कलाकारों ने इससे पहले या इसके बाद कोई बेहतर काम नहीं किया हो. लेकिन हर कलाकार की एक कृति होती है जो उन्हें सीधे आम लोगों से जोड़ देती है. बस शंकर की ‘ब्रेथलेस’ वही कृति थी.

इस गीत को लिखा था जावेद अख्तर ने. और इसके म्यूज़िक वीडियो को डायरेक्ट किया था जोया और फरहान ने. यूं यहां से शुरू हुआ ये गठबंधन ‘दिल चाहता है’ की सफलता का कारण बना. ‘दिल चाहता है’ के म्यूज़िक की सफलता का कारण बना.

शंकर महादेवन. गायक, म्यूज़िक डायरेक्टर की तिकड़ी शंकर-एहसान-लॉय में से एक. भारत की पहली ऑनलाइन म्यूज़िक एकेडमी खोलने वाला शख्स. ये सही है कि इन्हें इंट्रोडक्शन की ज़रूरत नहीं है, लेकिन ये भी सही है कि इनकी कहानी इतनी छोटी और इतनी बोरिंग नहीं है कि बस इति. इसलिए चलिए इनकी कहानी थोड़ी और विस्तार से जानते हैं, जो हमने तीन किस्सों में पिरोई हैं –

# कैसे एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर बना म्यूज़िक इंजीनियर-

शंकर महादेवन मुंबई के चेंबूर में जन्मे. 3 मार्च, 1967 को. कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग की. कुछ समय के लिए ओरेकल कॉर्पोरेशन में सॉफ्टवेयर इंजीनियर रहे. लेकिन ये हम थोड़ा फ़ास्ट फॉरवर्ड हो गए. और इसमें म्यूज़िक भी कहीं नहीं आया. इसलिए थोड़ा पीछे चलते हैं. उनकी पांच साल की उम्र में. ये वो उम्र थी जब उन्होंने वीणा बजानी शुरू कर दी थी. 11 साल की उम्र में पहला सोलो परफॉर्मेंस दे दिया था. अपने संगीत गुरु टी. आर. बालामणि के बारे में वो दो अलग-अलग इंटरव्यूज़ में बताते हैं-

मैंने टीआर बालमणि से शास्त्रीय संगीत की फॉर्मल ट्रेनिंग ली और वीणा भी सीखी. लेकिन मुंबई जैसे शहर में होने के नाते मेरा संगीत के कई अन्य रूपों से साक्षात्कार हुआ. जिसे सीखने का अनुभव बहुत महत्वपूर्ण रहा. मेरी गुरु बहुत अनुशासन मानने वाली थीं और पारंपरिक संगीत की पक्षधर भी. लेकिन वो खुले दिमाग वाली थीं और अपने छात्रों को तरह-तरह का संगीत सुनने की अनुमति देती थीं.

Remember Shakti Concert के दौरान परफॉरमेंस देते हुए शंकर. (इंडिया टुडे आर्काइव)
‘Remember Shakti Concert’ के दौरान परफॉरमेंस देते हुए शंकर. (इंडिया टुडे आर्काइव)

और जहां तक सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग वाली बात है, इसपर उन्होंने कहा-

क्या होता है कि स्कूल में आपके बहुत सारे दोस्त होते हैं. फिर आप इसके आधार पर बहुत सारे निर्णय लेते हैं कि आपके आसपास क्या हो रहा है. मान लीजिए, 10 दोस्तों का एक समूह है. उसमें से हर कोई इंजीनियरिंग के लिए जा रहा है…

और तब इंजीनियरिंग एक बहुत बड़ी चीज़ थी. इसलिए मैं भी इंजीनियरिंग करने के लिए चला गया. और इंजीनियरिंग में कंप्यूटर साइंस एक बहुत बड़ी चीज़ थी. इसलिए मैं कंप्यूटर साइंस करने लगा. फिर ये कोर्स कंप्लीट करने के बाद मैंने ओरेकल के लिए काम करना शुरू कर दिया.

लेकिन, एक समय ऐसा आता है जब आपको महसूस होता है कि आपको ज़िंदगी का निर्णय खुद लेना है. आप खुद से पूछते हो, ‘क्या तुम ज़िंदगी भर यही करना चाहते हो?’ यही सवाल मैंने खुद से पूछा. और मुझे जो उत्तर मिला वो यह था कि मैं एक गायक बनना चाहता हूं, और म्यूज़िक के फील्ड में होना चाहता हूं. मैंने बस अचानक फैसला किया और मैंने ओरेकल छोड़ दिया.

ऑरेकल में जॉब करने के दौरान भी उनके पास म्यूज़िक से जुड़े काफी प्रोजेक्ट्स थे. उनकी पत्नी, जो तब उनकी गर्लफ्रेंड थीं, बताती हैं-

संगीत उनका जुनून था और उनका जॉब इसमें बाधा बन रहा था. हालांकि जॉब छोड़ना एक जोखिम भरा निर्णय था, लेकिन मैं उनके साथ थी. वो संगीत को लेकर इतने इमोशनल थे कि स्पष्ट था कि उन्हें ट्रैक बदलने की ज़रूरत है.

'मिर्ज़िया' के म्यूज़िक लॉन्च के दौरान, एल्बम के गीतकार, गुलज़ार और संगीतकार शंकर महादेवन.
‘मिर्ज़िया’ के म्यूज़िक लॉन्च के दौरान, एल्बम के गीतकार, गुलज़ार और संगीतकार शंकर महादेवन.

ये ‘ट्रैक बदलना’ उस वक्त उनके लिए कितना मुश्किल रहा होगा, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि, तब उनका एक बढ़िया करियर था. उनके यूएस वीज़ा की प्रोसेसिंग और अमेरिका सैटल होने की प्रक्रिया चल रही थी. हालांकि अपनी ‘सॉफ्टवेयर इंजीयरिंग’ वाली एजुकेशन उन्होंने ज़ाया नहीं होने दी और मार्च, 2011 में एक ऑनलाइन म्यूज़िक एकेडमी खोल डाली. ‘शंकर महादेव एकेडेमी’. अपनी तरह की पहली ऑनलाइन एकेडमी जो क्लासिकल म्यूज़िक सिखाती है.

# कैसे बनी शंकर एहसान लॉय की तिकड़ी-

1977 में कोका कोला की इंडिया से विदाई हो गई थी. क्योंकि नियम था कि इंडिया में रहना है तो किसी भारतीय कंपनी के साथ जॉइंट वेंचर रखकर रहना होगा. जैसे हीरो होंडा, मारुती सुजुकी या टाटा एआईजी. लेकिन कोक को ये पसंद नहीं था. रूठ कर इंडिया से चल दी.

उधर पेप्सी ने इंडिया में अपनी पैठ बनाने के लिए पंजाब एग्रो इंडस्ट्रियल कॉरपोरेशन (PAIC) और वोल्टास इंडिया लिमिटेड के साथ जॉइंट वेंचर किया हुआ था. इसलिए पूरी दुनिया में ‘पेप्सी’ के नाम से बिकने वाले प्रोडक्ट का इंडिया में ‘लहर पेप्सी’ नाम था. यूं मनमोहन और नरसिम्हा के ‘आर्थिक उदारीकरण’ से पहले इसकी मोनोपॉली थी. लेकिन फिर ‘पोस्ट इकनॉमिक लिबरलाइजेशन’, 1993 में दुनिया में सबसे ज़्यादा बिकने वाली कोल्ड ड्रिंक ‘कोका कोला’ इंडिया में दोबारा आ गई. और शुरू हुई गला काट प्रतियोगिता. बनने लगे महंगे-महंगे विज्ञापन.

इन विज्ञापनों का बजट भी बहुत बड़ा-बड़ा होता था. ज़रा, पेप्सी के तब के विज्ञापन ‘यही है राईट चॉइस बेबी’ को देखिए.

इसे डायरेक्ट किया था मुकुल एस. आनंद ने. ‘अग्निपथ’, ‘हम’ और ‘खुदा गवाह’ जैसी फिल्मों के डायरेक्टर. उस वक्त के सुपरहिट पॉप सिंगर रेमो फर्नांडिस, उस वक्त की सुपरस्टार जूही चावला, इससे जुड़ी हुई थीं. और जुड़े हुए थे, शंक,एहसान और लॉय. शंकर, एहसान, लॉय तीनों का काम मुकुल को बहुत पसंद आया. उन्होंने तीनों को एक जगह बुलाया और बोले मेरी फिल्म के लिए मिलकर म्यूज़िक दो. शंकर बताते हैं-

पहले हमें लगा कि मुकुल मज़ाक कर रहे हैं. लेकिन वो सीरियस थे. फिर हमने ‘दस’ के लिए गाने कंपोज़ करना शुरू कर दिया. यूं ‘दस’ हमारा (शंकर एहसान लॉय की तिकड़ी के तौर पर) पहला ब्रेक थी. इसके बाद हमने हमेशा एक साथ काम करने का निर्णय लिया. हम अच्छे दोस्त थे, और हम जो मिलकर रच रहे थे वो भी कमाल था.

इनकी तिकड़ी तो चल निकली, लेकिन ‘दस’ डब्बा बंद हो गई. सिर्फ 45 साल की उम्र में मुकुल एस. आनंद चल बसे. तब वो यूएस में ‘दस’ की शूटिंग की कर रहे थे.

शंकर मानते हैं कि जो पहचान उन्हें ‘मिशन कश्मीर’ से मिली वो उन्हें तीन साल पहले ही ‘दस’ से मिल जाती, अगर वो पूरी हो पाती-

बेशक फिल्म कभी रिलीज़ नहीं हुई, लेकिन उसका गीत ‘सबसे आगे होंगे हिंदुस्तानी’ भारत का दूसरा नेशनल एंथम बन गया था.

देर आयद दुरुस्त आयद. ‘मिशन कश्मीर’, ‘दिल चाहता है’, ‘कल हो न हो’, ‘बंटी और बबली’ से गुज़रते हुए ये तिकड़ी आज 23 साल बाद भी बेहतरीन म्यूज़िक दे रही है.

शंकर-एहसान-लॉय की तिकड़ी के बारे में शंकर की पत्नी, संगीता महादेवन बताती हैं-

तीनों एक दूसरे की निजी ज़िंदगी में दखल नहीं देते. तीनों स्टूडियो में ‘हैंग-आउट’ करते हैं. शाम एक साथ बिताते हैं. यही एक कारण है उनकी तिकड़ी इतनी अच्छी तरह से काम करती है. साथ ही तीनों की अलग-अलग विशेषज्ञता है जिससे हरेक को अपना पर्सनल स्पेस मिल पाता है.

शंकर एहसान और लॉय, 'म्यूज़िक स्टूडियो ऑफ़ मुम्बई' में. (इंडिया टुडे आर्काइव)
शंकर एहसान और लॉय, ‘म्यूज़िक स्टूडियो ऑफ़ मुम्बई’ में. (इंडिया टुडे आर्काइव)

# शंकर महादेवन की लव स्टोरी-

शंकर महादेवन की प्रफेशनल लाइफ के बाद आइए उनकी पर्सनल लाइफ के बारे में भी बात कर लेते हैं.

संगीता तब 14 साल की थीं. शंकर महादेवन 16 साल के. दोनों मुंबई के चेंबूर इलाके में रहते थे. पड़ोसी थे. बैडमिंटन के अलावा दोनों में कुछ कॉमन नहीं था.

वो ऐसे कि दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे. बस नज़दीक के पार्क में दोनों बैडमिंटन खेलने जाते थे. बैडमिंटन खेलते-खेलते दोस्ती और फिर ‘लव ऑल’ हो गया.

शादी से पहले दोनों दस साल तक एक दूसरे को डेट करते रहे. लेकिन ये सब इतना आसान न रहा. पहले कुछ सालों में ही संगीता के भाई को उनके रिश्ते के बारे में पता चल गया. भाई संगीता से 5 साल छोटा था. उसने दोनों के रिश्ते के बारे में सबको बता दिया. लेकिन संगीता और शंकर दोनों के ही परिवार वालों को इस लव-रिलेशन से कोई दिक्कत नहीं थी. लेकिन इनके खुले में मिलने और डेट पर जाने पर पाबंदी लग गई थी. वही ‘ऊंच नीच हो गई तो?’ वाले डर के चलते. लेकिन छुप-छुप के मिलने से मिलने का मज़ा तो आएगा. यूं दोनों मिलते रहे. पहले से कम फ्रीक्वेंट, पहले से ज़्यादा सचेत. लेकिन मिलते रहे. और जब दोनों के परिवार वालों के देखा कि प्रेम को एक दशक से ज़्यादा हुआ जाता है तो 1992 में इनकी शादी करवा दी.

तब तक शंकर महादेवन अपनी नौकरी छोड़कर फुल टाइम म्यूज़िक को देने लगे थे. 2001 में इनके दो बच्चे हो गए.

शंकर संगीता. आकाश अंबानी और श्लोका मेहता की शादी में. (इंडिया टुडे आर्काइव)
शंकर संगीता. आकाश अंबानी और श्लोका मेहता की शादी में. (इंडिया टुडे आर्काइव)

लेकिन तब तक भी शंकर अपनी पहचान बनाने के लिए जूझ ही रहे थे, इसलिए घर और बच्चों का ख्याल रखने का काम संगीता ने संभाल लिया था. 2013 में शंकर के बड़े लड़के सिद्धार्थ ने ‘भाग मिल्खा भाग’ के गीत ‘ज़िन्दा’ से अपना सिंगिंग करियर शुरू कर दिया था. संगीता बताती हैं-

जब आप युवा होते हैं तो आप भविष्य के बारे में ज़्यादा नहीं सोचते. हम दोनों ही मध्यमवर्गीय परिवारों से आते थे, और हमारे पास जो कुछ भी था उससे हम काफी खुश थे. हम चेंबूर वाले घर में ही रहते थे. मैंने शादी के तुरंत बाद अपनी नौकरी छोड़ दी थी, जब मैं प्रेगनेंट हुई. जब काम मिलना शुरू हुआ, तो शंकर लंबे समय तक दूर रहे. स्टूडियो में…

शुरू में मुझे लगा कि मेरे पति मुझे पर्याप्त समय नहीं दे रहे हैं. और वो भी शादी के इतने तुरंत बाद. लेकिन उस दौर में भी हम एक साथ थे. अब हमने काम की इस चिल्ल-पों से दूर रहना सीख लिया है. अब वो हमारे लिए समय निकाल लेते हैं. ये दर्शाता है कि वो अपने जीवन और प्राथमिकताओं को कैसे संतुलित करते हैं.

शंकर के बड़े लड़के सिद्धार्थ महादेवन अब 27 साल के हो चुके हैं. बीते कुछ सालों से म्यूज़िक और सिंगिंग से जुड़े हैं. सिद्धार्थ ने हाल ही में छपाक के गीत ‘नोक झोंक’ के लिए अपनी आवाज़ दी थी. हालांकि भाग मिल्खा भाग से कई साल पहले 2005 में भी उन्होंने बंटी और बबली के टाइटल सॉन्ग में अपनी आवाज़ दी थी. लेकिन उसे डेब्यू नहीं कहा जा सकता क्यूंकि तब वो सिर्फ 12 साल के थे और इस गीत के लिए उन्होंने सिर्फ एक दो शब्द ही बोले थे.

उनके छोटे बेटे म्यूज़िक सीख रहे हैं.

तो ये थे शंकर महादेवन की लाइफ के तीन किस्से. जाते-जाते सुनिए उनका आइकॉनिक गीत. गीत जिसे इंट्रोडक्शन की ज़रूरत नहीं है, लेकिन ये भी सही है कि इस गीत की कहानी इतनी छोटी और इतनी बोरिंग नहीं है कि बस इति. तो भी कभी और के लिए बचा के रखते हैं. दिल्ली के बल्लीमारां और दरीबा कलां के किस्से-


वीडियो देखें:

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