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वीर-ज़ारा के क़िस्सेः जब शाहरुख ने कहा- 'मैंने ऐश के साथ गलत किया है'

‘दो पल रुका ख्वाबों का कारवां, और फिर चल दिए तुम कहां, हम कहां’

कुछ याद आया! मन के तार झंकृत हुए! झुरझुरी छूटी! एक समय का सुपरहिट गाना. इससे भी ज़्यादा सुपरहिट इसकी धुन. रिंगटोन, कॉलरट्यून हर जगह इसने राज किया. जैसे राज किया सिनेप्रेमियों के दिलों पर बॉलीवुड के राजा, किंग शाहरुख खान ने. ठीक ऐसे ही 2004 ने उनके करियर की कुंडली पर राज किया. चार में से तीन फिल्में सुपरहिट. तीनों के लिए फ़िल्मफेयर नॉमिनेशन. ‘मैं हूं ना’, ‘स्वदेस’ और ‘वीर-ज़ारा’. अगर लिमिटेशन न होती तो शायद एक ही साल में बेस्ट ऐक्टर के दो अवार्ड मिलते. इंडस्ट्री में जलवा तो काटा है गुरु शाहरुख खान (Shahrukh Khan) ने. जब वो बाहें फैलाता है तो पूरा देश उसमें समा जाता है. अब इत्ता फैलाफ़ैली हो गयी है मालिक, तो थोड़ा और फैल लेते हैं.

(1) दो सीन सुनकर यश चोपड़ा ने हां कर दी

'क्यों हवा' गाना खत्म होता है बुलेट चलने की आवाज आती है
‘क्यों हवा’ गाना खत्म होता है बुलेट चलने की आवाज आती है

लिए चलते हैं साल 1997 में. यश चोपड़ा ने शाहरुख के साथ फ़िल्म बनाई, ‘दिल तो पागल है’. फ़िल्म को नेशनल अवार्ड मिला. फिर सात साल तक वो डायरेक्टर की कुर्सी पर नहीं बैठे. सिर्फ़ इस खोज में कि कोई स्क्रिप्ट मिले जिसके साथ वो न्याय कर सकें और जो उनके साथ न्याय कर सके. स्क्रिप्ट मिली. फाइनल भी हो गई. प्री-प्रोडक्शन शुरू हो गया. कास्टिंग होने लगी. उसी समय फ्रेम में एंट्री होती है, उनके बेटे आदित्य चोपड़ा की, जो एक स्क्रिप्ट लिख रहे थे. अभी लिखे थे सिर्फ़ दो सीन. वो यश साहब से बोले:

मैंने दो सीन लिखे हैं, आपको अच्छे लगें तो आगे काम शुरू करूं.

आदित्य ने दोनों सीन नरेट किए. रोमैन्टिक सॉन्ग. बुलेट की आवाज़ और बूढ़े शाहरुख का क्लोज-अप. यश चोपड़ा मान गए. उनके फ़िल्म करने का एक प्रमुख कारण यह भी था कि वो शाहरुख को उम्रदराज रोल में देखना चाहते थे. दो सीन की लुकुरी लगाकर, आदित्य दस सीन लिखकर चोपड़ा के पास लौटे. दोबारा स्क्रिप्ट सुनाई. उन्हें स्क्रिप्ट इतनी भा गई कि पुराना प्रोजेक्ट छोड़कर सीधे नए प्रोजेक्ट में जंप कट. उन्होंने आदित्य से कहा होगा: बेटा तुम पीछे बैठो, अब गाड़ी तुम्हारा बाप चलाएगा. और निकल पड़े पंजाबी रंग-ढंग की फ़िल्म बनाने. फ़िल्म का नाम था ‘वीर-ज़ारा’. लाहौर से भारत आए चोपड़ा साहब कहते हैं:

यह फ़िल्म पंजाब में मेरे घर, और सरहद के दोनों तरफ़ की वननेस को एक हम्बल ट्रिब्यूट है.

चोपड़ा ने मूवी के लिए कई पाकिस्तानी शादियों के वीडियोज़ देखे. कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर से पाकिस्तानी कल्चर, कोर्ट और डाइलेक्ट पर सजेशन्स लिये. तब जाकर फ़िल्म शुरू की.

(2) पहले वीर-ज़ारा नहीं था फ़िल्म का नाम 

सबसे पहले यश चोपड़ा फ़िल्म का नाम शहीद-ए-इश्क़ रखना चाहते थे
सबसे पहले यश चोपड़ा फ़िल्म का नाम शहीद-ए-इश्क़ रखना चाहते थे

फ़िल्म के नाम पर भी बहुत माथपच्ची हुई. नाम रखा गया, शहीद-ए-इश्क़. पर चोपड़ा को जमा नहीं. नाम बदल दिया. अब नाम रखा, ‘ये कहां आ गये हम’. जो 1981 में आई उनकी फ़िल्म सिलसिले के गाने से लिया गया. फ़िल्म बनकर तैयार होने को थी. नाम में अब भी मज़ा नहीं आ रहा था. अंततोगत्वा फ़िल्म का नाम फाइनल हुआ ‘वीर-ज़ारा’ (Veer-Zaara). बाद में ‘ये कहां आ गये हम’ को इसी फ़िल्म के एक गाने में ट्विस्ट करके जावेद अख्तर ने इस्तेमाल किया, ‘लहराती हुई राहें खोले हुए हैं बाहें, ये हम आ गये हैं कहां’.

(3) शाहरुख के फैन हो गए थे यश चोपड़ा 

जब फ़िल्म का शूट हो रहा था तो यश को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि वो क्या बना रहे हैं! वो कहते हैं:

इस फ़िल्म के परफ़ॉर्मेंसेज में सबसे बड़ी बात यह है कि शूटिंग के दौरान मुझे ये आभास ही नहीं था कि इतना अच्छा काम हो रहा है.

फ़िल्म का शूट खत्म हुआ. अब मूवी एडिट टेबल पर पहुंची. चोपड़ा ने उस समय फ़िल्म में शाहरुख के सीन देखे और दंग रह गए. उन्होंने शाहरुख को तुरंत फोन घुमाया, जो कि उस समय अपने शोज के चलते वर्ल्ड टूर पर थे. यश ने फोन पर सिर्फ़ एक लाइन कही और उसके आगे कुछ नहीं कहा. और लाइन थी:

शाहरुख, यू आर दी बेस्ट 

वो शाहरुख के सीन्स देखते जाते और रोते जाते. करन जोहर को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था:

शाहरुख इसलिए बेस्ट है क्योंकि मैं जिसने वो फ़िल्म डायरेक्ट की है, पूरे शूट पर रहा था और फिर भी शाहरुख की परफ़ॉर्मेंस देखकर मेरे आंसू नहीं रुक रहे थे. 

एक इंट्रेस्टिंग फैक्ट बताते हैं. फ़िल्म में शाहरुख खान का कॉस्टयूम किसी प्रोफेशनल ने नहीं, बल्कि जिन करन जौहर ने यश चोपड़ा का इंटरव्यू लिया, उन्होंने डिजाइन किया था.

(4) शाहरुख-काजोल की जोड़ी बनते-बनते रह गयी

ज़ारा के रोल में प्रीति
ज़ारा के रोल में प्रीति

इस फ़िल्म के लिए कई कलाकार पहली पसंद नहीं थे. जैसे सबसे पहले ज़ारा के लिए यश साहब ने अप्रोच किया काजोल को. काजोल ने रोल करने से मना कर दिया. तब रोल पहुंचा प्रीति जिंटा के पास. प्रीति ने बिना सोचे समझे हां कर दी. करती भी क्यों ना, द यश चोपड़ा के साथ काम करने का मौक़ा जो मिल रहा था. इसके लिए उन्होंने उर्दू सीखी. पंजाबी डिक्शन पर काम किया. फिर भी आखिर तक वो रोल को लेकर आश्वस्त नहीं थीं. चोपड़ा ने अश्योरंस दी. तब जाकर बात बनी.

(5) ऐश्वर्या को छोड़नी पड़ी फ़िल्म

वीर-ज़ारा में रानी मुखर्जी और शाहरुख
वीर-ज़ारा में रानी मुखर्जी और शाहरुख

रानी मुखर्जी का निभाया रोल सामिया सिद्दीकी इंस्पायर था, पाकिस्तानी ऐक्टिविस्ट लॉयर आसमा जहांगीर से. यह रोल पहले ऐश्वर्या कर रही थीं. उसी दौरान उनका सलमान से ब्रेकअप हो गया. कहते हैं शाहरुख ने सलमान और ऐश्वर्या के बीच अपनी दोस्ती को चुना और ऐश्वर्या फ़िल्म से आउट हुई. इसी दौरान ऐश्वर्या को ‘चलते-चलते’ फ़िल्म भी छोड़नी पड़ी. वो तो कहती हैं उन्हें उस समय 5 फिल्मों से निकाला गया.

उस समय कुछ ऐसी फ़िल्मों की चर्चा थी जिनमें मैं और शाहरुख साथ काम करने वाले थे. फिर बिना किसी स्पष्टीकरण के मुझे फ़िल्म से हटा दिया गया. इसका जवाब नहीं मिला कि मुझे क्यों हटाया गया?

शाहरुख ने बाद में अपने फैसले पर खेद जताया. उन्होंने 2003 में इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में कहा था:

किसी के साथ एक प्रोजेक्ट शुरू करना और फिर बिना किसी ग़लती के उसे बदलना बहुत मुश्किल है. यह बहुत दुखद है क्योंकि ऐश एक अच्छी दोस्त है. पर्सनली मुझे लगता है, मैंने ग़लत किया. प्रोड्यूसर के तौर पर मुझे यह समझ में आया. मैंने ऐश से माफी मांगी.

खैर, गाड़ी आगे हांकते हैं. चौधरी समर सिंह का रोल धर्मेन्द्र को ध्यान में रखकर लिखा गया था. पर चोपड़ा और धर्मेन्द्र के तल्ख रिश्तों के चलते उन्होंने फ़िल्म मना कर दी. तब जा के अमिताभ बच्चन ने ये रोल किया. 22 साल बाद यश चोपड़ा ने अमिताभ के साथ कोई फ़िल्म की थी. हालांकि यश चोपड़ा इस बात से इनकार करते हैं. वो कहते हैं, मैंने जब ये रोल सुना तो बिना किसी लागलपेट के सबसे पहले अमिताभ बच्चन को कॉल किया. उन्होंने भी बिना किसी लागलपेट के हां कर दी. ज़ारा के मंगेतर का किरदार पहले अजय देवगन को ऑफर हुआ. उन्होंने इनकार किया तब मनोज बाजपेयी ने रज़ा की भूमिका निभायी. मनोज के अनुसार यश चोपड़ा ‘वीर-ज़ारा’ की रिलीज से पहले टेंशन में थे.  वो कहते हैं:

जब वीर-ज़ारा रिलीज़ होने वाली थी तब मैं यशजी के साथ था. वो फिल्म की परफ़ॉर्मेंस को लेकर चिंतित थे. मैंने कहा कि यह उनकी फिल्म है, इसे अच्छा करना ही होगा.

(6) सीन के दौरान तीन बार दीवार ढह गई

वीर-ज़ारा में दिव्या दत्ता
वीर-ज़ारा में दिव्या दत्ता

एक मारू किस्सा सुनाते हैं. फ़िल्म में एक सीन है जहां शाहरुख, दिव्या दत्ता से मिलने आते हैं. इसके लिए उन्हें बिस्तर से उठना था और शाहरुख से मिलना था. उनके पीछे एक आर्टिफिशियल दीवार थी. यश साहब ने ऐक्शन बोला. शाहरुख आए. दिव्या दीवार का सहारा लेकर उठीं. दीवार भरभरा कर गिर गयी. प्रोडक्शन वालों ने फिर से दीवार बनाई. दोबारा शॉट लगा. दिव्या ने फिर ज़ोर लगा दिया. दीवार फिर लुढ़क गयी. अब उन्हें इंस्ट्रक्ट किया गया कि आप बिना सहारे के उठें. दीवार पर फोर्स न लगायें. फिर से ऐक्शन बोला गया. अबकी बार दिव्या बिना सहारे के उठीं. पर दीवार फिर से गिर गयी. शाहरुख और दिव्या ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे. चोपड़ा साहब ने शूट रोक दिया. जब 20 मिनट बाद दोनों की हंसी रुकी तब जाकर सीन शूट हुआ. इसी तरह एक सीन है जहां शाहरुख रानी को बेटी कहकर पुकारते हैं. उन्होंने सिर्फ़ एक शब्द कहने में 10 रीटेक ले लिये. चोपड़ा ने पैकअप कर दिया. वो कहते थे:

यदि किसी सीन में कई टेक्स लगें, तो कलाकार की परफ़ॉर्मेंस मकैनिकल हो जाती है. अदाकारी में सहजता नहीं बचती.

(7) आदित्य ने एक रात पहले तक नहीं लिखा था क्लाइमैक्स

क्लाइमैक्स के दौरान शाहरुख
क्लाइमैक्स के दौरान शाहरुख

10 टेक वाले सीन के उलट शाहरुख ने साढ़े तीन मिनट लंबा सीन सिर्फ़ एक टेक में निपटा दिया. कोर्ट का सीन जब वीर कैदी नंबर 786 वाली कविता सुनाता है. एक टेक में सीन फाइनल. इस सीन पर सिनेमैटोग्राफ़र अनिल मेहता कहते हैं:

मुझे वीर-ज़ारा में अदालत में उनके द्वारा पढ़ी गई कविता का दृश्य याद है. उन्होंने बस चंद मिनटों, शायद पाँच या दस मिनट के लिए उस कविता को पढ़ा. और फिर, जब वह सेट पर आए तो मानो पूरी कविता उनके दिमाग़ में छप चुकी थी. उन्होंने हमारे लिए एक से ज़्यादा बार इस सीन का कंटीन्यूअस टेक दिया, और सच कहूं तो एक बार भी उनके इमोशन में कोई कमी नहीं आई. किसी भी एक्टर के लिए इस लेवल का कंट्रोल और अपनी परफॉर्मेंस में इतनी बारीकी देखकर मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ था.

इस सीन की भी एक कहानी है. आदित्य चोपड़ा ने सबकुछ लिख लिया था, सिवाय क्लाइमैक्स के. यश चोपड़ा, आदित्य से पूछते: तुम आखिरी सीन कब लिख रहे हो? इसमें स्पीच होनी चाहिए. आदित्य कहते: लिख रहा हूं डैड. क्लाइमैक्स शूट होने से एक रात पहले आदित्य, यश साहब से आकर कहते हैं:

डैड मैं स्पीच नहीं लिख रहा. एक कविता लिख रहा हूं.

यही वो कविता थी जिसे शूट से एक रात पहले आदित्य ने लिखा था और शाहरुख ने एक टेक में निपटा दिया था. समय की कमी के कारण जेल वाले सारे सीन शाहरुख ने एक ही दिन में कर डाले थे. एक से दो टेक और सीन फाइनल. फ़िल्म के मेजर पार्ट को मुंबई में शूट किया गया. कुछ पार्ट पंजाब में शूट हुआ. और एक हिस्सा शूट हुआ पाकिस्तान में. कोर्ट वाले सारे सीन पाकिस्तानी लॉ कोर्ट में ही शूट किये थे. जब फ़िल्म बनकर तैयार हो गई. रिलीज़ भी हो गई. तब यश चोपड़ा ने कहा था:

इस फ़िल्म का कोई असली हीरो है, तो वो है आदित्य चोपड़ा.

(8) कई फ़िल्ममेकर्स ने इस्तेमाल की सिनेमैटोग्राफ़ी टेकनीक

यश चोपड़ा को पर्दे पर पुराने दिन, नॉस्टैलजिक मोमेंट्स क्रीएट करने थे. इसलिए डीओपी अनिल मेहता ने फ़िल्म को गोल्डन ओल्ड डेज़ और नॉस्टैलजिक फ़ील देने के लिए सेपिया टिंट का इस्तेमाल किया. ये वही अनिल मेहता हैं जिन्होंने ‘लगान’ और ‘अंग्रेजी मीडियम’ सरीखी फ़िल्मों में सिनेमैटोग्राफ़ी की. इस फ़िल्म के बाद बॉलीवुड की कई मूवीज में इनकी सिनेमैटोग्राफ़ी टेक्निक का इस्तेमाल किया गया. जहां भी नॉस्टैलजिक फ़ील देना होता या पुराने दिन दिखाने होते सेपिया टिंट का इस्तेमाल किया जाता. अनिल मेहता इस फ़िल्म के बारे में कहते हैं:

आप तो जानते ही हैं कि वीर-ज़ारा एक अव्वल दर्जे की क्लासिक लव-स्टोरी थी, जिसके लैंग्वेज और स्पीच की कोई तुलना नहीं है और यही बात इसे बेमिसाल फ़िल्म बनाती है. 

(9) 30 साल बाद मदन मोहन ने दिया फ़िल्मों में संगीत

बायें हैं तेरे लिए गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान रूप कुमार राठौर और लता मंगेशकर. दायें हैं संगीतकार मदन मोहन
बायें हैं तेरे लिए गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान रूप कुमार राठौड़ और लता मंगेशकर. दायें हैं संगीतकार मदन मोहन

फ़िल्म का संगीत बहुत ज़्यादा पसंद किया गया. पसंद भी क्यों न किया जाता. फ़िल्म में संगीत था दी मदन मोहन का. अब आप कहेंगे उनका तो 1975 में निधन हो गया था. उन्होंने इस फ़िल्म में संगीत कैसे दे दिया! तो इसके पीछे है एक किस्सा. चोपड़ा साहब फ़िल्म के लिए म्यूजिक खोज रहे थे. वो चाहते थे, फ़िल्म का संगीत पुरानी रंगत लिए हो. यश चोपड़ा अब तक कई निर्देशकों से मिल चुके थे. कई धुनें सुन चुके थे. उन्हें कुछ पसंद नहीं आ रहा था. ऐसे में संगीतकार मदन मोहन के बेटे और यश फिल्म्स के पूर्व सीईओ संजीव कोहली ने उन्हें एक पेशकश की. उनके पास मदन मोहन की क़रीब 100 धुनें थीं. उन्होंने यश चोपड़ा को सुनाई. 35 धुनें सेलेक्ट हुईं. इनमें से 11 धुनों को फ़िल्म में इस्तेमाल किया गया और बेहतरीन गाने बनाये गये. जब फ़िल्म के गाने रिकॉर्ड करने के लिए लता मंगेशकर स्टूडियो आईं. उनकी आंखों में आंसू थे. उन्होंने यश चोपड़ा से कहा:

मदन मोहन मेरे भाई जैसे थे. आप भी मेरे भाई जैसे हैं. मुझे लग रहा है, मैं पुराने दिनों में लौट गई हूं.

वो मदन मोहन को याद करती हुई कहती हैं:

मदन भैया, हम सबने कोशिश की है कि आप जो धुनें छोड़ गए थे, उन्हें रिकॉर्ड करें और आपकी यादें ताज़ा करें.  इनमें से तो कई धुनें मैंने आपके सामने बैठके सुनी हैं, जो आज आपके जाने के तीस साल बाद गा रही हूं.

जब लता मंगेशकर को ‘तेरे लिए’ गाने की धुन सुनाई गई. वो रोने लगीं और लगातार एक घंटे तक रोती रहीं. यश ने रिकॉर्डिंग कैंसिल करके उनसे अगले दिन आने को कहा. लता जी ने मना कर दिया. उन्होंने कहा:

मैं आज ही गाउंगी क्योंकि कल गुरुवार है. मैं गुरुवार को खाना नहीं खाती और गाना भी नहीं गाती.

फिर उन्होंने जो गाया कमाल कर दिया: तेरे लिए हम हैं जिए, होठों को सिए, दिल में मगर जलते रहे चाहत के दिए…

इस फ़िल्म में काम करने को लेकर उदित नारायण ने कहा था:

मैं बहुत ही खुश हूं कि आज ऐसे लेजेंड कम्पोजर मदन मोहन साहब की धुनों पर मुझे गाने का मौक़ा मिला. मैं खुशी से फूले नहीं समा रहा हूं. 

यह उन चुनिंदा फिल्मों में से एक है जिसके बैकग्राउन्ड स्कोर और गानों की धुनों को अलग से रिलीज किया गया. इस प्रयोग को पसंद भी खूब किया गया. इसके गाने ‘मैं यहां हूं, यहां हूं, यहां’ का एक सेगमेंट ‘मेरा लॉन्ग गवाचा’ सॉन्ग से मेल खाता है. जिसे 1993 में बाली सागू ने अपने एलबम स्टार क्रेजी में रीमिक्स किया था. इसी तरह ‘ऐसा देश है मेरा’ सॉन्ग में ‘ये देश है वीर जवानों का’ जो नया दौर फ़िल्म का गाना है, उसके एक सेगमेंट को इस्तेमाल किया गया.

(10) फ़िल्म ने अमृतसर-लाहौर बस चला दी

अमृतसर-लाहौर बस सेवा
अमृतसर-लाहौर बस सेवा

वीर-ज़ारा ने पाक-भारत संबंधों में भी सकारात्मक भूमिका निभाई. फ़िल्म का असर सरहद के दोनों तरफ़ ऐसा हुआ कि सालों से चली आ रही अमृतसर-लाहौर बस सेवा की मांग मान ली गयी. मूवी रिलीज से एक साल बाद 2005 में बस ट्रायल शुरू हुआ और 2006 में बस सर्विस शुरू कर दी गयी.

तो इसी हैप्पी नोट पर एंड करते हैं. टाटा-बाय-बाय.

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