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रवींद्र जैन - जिनका गाना राज कपूर ने सवा रुपए में खरीदा था

उनके चार किस्सों के साथ सुनिए उनके 11 प्यारे गीत.

सूरदास. जन्म से दृष्टिहीन. लेकिन वो क्या था जिससे वो ‘अति बिचित्र हरिकी छबी’ देख लेते थे? पता नहीं. खैर, चलिए. अब ये पढ़िए-

ऊंचे महल के झरोखे से तुम, अंबर की शोभा निहारो ज़रा
रंगों से रंगों का ये मेल जो, आंखों से मन मे उतारो ज़रा
सुनयना, दूर आसमानों को तुम देखो, और मैं तुम्हें देखते हुए देखूं
मैं बस तुम्हें देखते हुए देखूं

ये लिखा है, रवींद्र जैन ने. जन्म से दृष्टिहीन.

सोचिए वो कौन सी दृष्टि थी, जिससे सूरदास या रवींद्र जैन, न सिर्फ इतनी खूबसूरत चीज़ें देख लेते थे, बल्कि उन्हें अपने गीतों, अपनी धुनों में सजा भी लेते थे? ऐसे कि उनके गीतों को पढ़ने वाले, उनकी धुनों को सुनने वाले भी ये सब जस का तस देख पाते थे. महसूस कर पाते थे.

रवींद्र जैन. 28 फरवरी, 1944 को अलीगढ़ में जन्मे. आंखें यूं बंद थीं कि चीरा लगाना पड़ा. आंखें तो दिखने लग गईं लेकिन आंखों से कुछ न दिखा. डॉक्टर बोले कि शायद बाद में दिखाई दे. उम्मीद है. रवींद्र जैन ने एक बार बताया था-

मैं ईश्वर का शुक्रगुज़ार हूं, उसने मेरी आंखों की बजाय मेरा दिमाग रौशन किया है.

पिता एक जैन पंडित थे. पण्डित इन्द्रमणि जैन. वैद्य थे. रवींद्र को एक छोटा हारमोनियम खरीद कर दिया. रवींद्र को अपने साथ मंदिर लेकर जाते. रवींद्र पहले तो ये भजन सीखते, फिर धीरे-धीरे गाने भी लगे. इन्द्रमणि एक रुपया देते. उस वक्त के हिसाब से बहुत बड़ी धनराशि.

जहां तक पढ़ाई की बात थी, उनके भाई डॉक्टर डीके जैन इनको कविता से लेकर साहित्य, इतिहास, धार्मिक ग्रन्थ सब पढ़कर सुनाते थे.

नाम में क्या रखा है कहने वाले चौंक जाएंगे अगर जानेंगे कि रवींद्र संगीत ने रवींद्र जैन के करियर को कैसे नई दिशा दी.

दरअसल रवींद्र जैन बचपन से ही रवींद्र संगीत सीखना चाहते थे. इसलिए अपने चाचा के साथ कलकत्ता (अब कोलकाता) आ गए. जेब में पिताजी ने 75 रुपए रख दिए थे. कलकत्ता में एक दशक पूरा गुज़ारा. वहां पहले सीखा फिर एक निर्माता, राधेश्याम झुनझुनवाला ने इन्हें म्यूज़िक सिखाने का ट्यूशन लगवा दिया. एक जगह की पहचान से दूसरी जगह पहचान हुई और ये लिंक्स बंगाल से होते-होते मुंबई तक पहुंच गए.

इस तरह छोटे-मोटे जॉब, इक्का दुक्का पंजाबी, हिंदी गीतों के रास्ते होते हुए ‘सौदागर’ तक पहुंच गए. ‘सौदागर’, राजश्री प्रोडक्शन की मूवी. वही राजश्री, जिसने ‘हम आपके हैं कौन’ बनाई. सूरज बड़जात्या वाला राजश्री. ‘सौदागर’ का गीत, ‘सजना है मुझे, सजना के लिए’ खूब हिट रहा. जितना तब रहा, उतना ही इसका रिमिक्स हिट हुआ. लेकिन 1973 में फिल्म चली नहीं. इससे डेब्यू करने वाले एक्टर अमिताभ बच्चन और म्यूज़िक डायरेक्टर रवींद्र जैन को हालांकि बुलंदियों का नया आकाश छूना था.

‘सौदागर’ के बाद रवींद्र राजश्री कैंप का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए.  ‘चितचोर’, ‘गीत गाता चल’, ‘अंखियों के झरोंखे से’ जैसी फिल्मों के गीत सुनिएगा, कुछ और सुनने का मन न करेगा देर तक. ये सारे राजश्री और रवींद्र जैन के गठबंधन के सबूत हैं. संगीत और लिरिक्स से लेकर कई गीतों में तो आपको आवाज़ भी रवींद्र जैन की सुनने को मिल जाएगी.

येसुदास और हेमलता की आवाज़ अगर कहीं सुनने को मिल जाए तो आप ‘ब्लाइंड गेस’ कर सकते हैं कि म्यूज़िक और लिरिक्स रवींद्र जैन की होगे. और आप ज़्यादतर सही ही निकलेंगे. राजश्री के साथ जहां उनका बड़े परदे के लिए कोलैबरेशन यादगार रहा, वहीं छोटे पर्दे के लिए उन्होंने सागर आर्ट्स के साथ मिलकर धूम मचाई. ‘रामायण’, ‘श्री कृष्ण’, ‘अलिफ़ लैला’. अपने समय में इन धारावाहिकों ने ही नहीं, इनके गीतों ने भी अपार सफलता पाई.

अच्छा चलिए, अब ऐसा करते हैं, इनके बारे में बाकी बातें चार किस्सों से जानते हैं. और इन्हें पढ़ने के दौरान आप उनके कुछ प्यारे गीत भी सुन लीजिएगा. हमने चुन-चुन कर एंबेड किए हैं.

# 1) रवींद्र जैन की लव स्टोरी-

सौदागर की रिलीज़ पर रवींद्र जैन एक कविता सुना रहे थे-

श्रृंगार करो न करो, तुम यूं ही सुंदर हो.

ये कविता दर्शकों के बीच बैठी एक लड़की को बहुत पसंद आई. लड़की का नाम दिव्या. लड़की की मां ने कविता सुनने के बाद घर पहुंचकर तारीफ़ में कहा-

अगर मेरी लड़की बड़ी होती तो मैं उसकी इनसे शादी कर देती.

दिव्या दौड़कर दूसरे कमरे में गई और साड़ी पहनकर वापस आई. अपनी मां से कहा-

मम्मी, मैं बड़ी नहीं लगती?

मां, दिव्या के मन की बात समझ गई थीं. एक इंटरव्यू में रवींद्र जैन ने बताया कि दिव्या मेरी आंखों की रौशनी है.

# 2) जब अनचाही मिली भीख खर्च करने का टास्क मिल गया-

ये तो हमें पता ही है कि रवींद्र जैन बचपन में भजन गाते थे. और ये भजन वो सिर्फ मंदिरों में ही नहीं, अपने दोस्तों के साथ शहर में घूमते-फिरते भी गाते थे. ये उनके और उनके दोस्तों के लिए एक खेल सरीखा था. तो ऐसे ही एक दिन भजन गाते-गाते ये मंडली अलीगढ़ रेलवे स्टेशन पर पहुंच गई. वहां बैठकर गा रहे थे, तो लोगों के इनको पैसे देने शुरू कर दिए. इस चीज़ की इन्हें उम्मीद नहीं थी, और न ही ये पता था कि इस तरह से पैसे मिलना कितना ग़लत समझा जा सकता है. ये ख़ुशी-ख़ुशी पापा के पास गए और पूरी बात बता दी.

इनके पिता पण्डित इन्द्रमणि जैन ने वही किया जो ऐसी स्थिति में ज़्यादातर पिता करते हैं. कुटाई.

और साथ में ये भी कहा कि ये पैसे जिनके हैं उनको वापस कर आओ.

लो मज़ा! अब जिन लोगों ने पैसे दिए, कहां से खोजें उन्हें? भूस के ढेर में राई का दाना…

तो जो किया नहीं जा सकता, वो किया नहीं गया. मतलब बंदे ढूंढें नहीं गए. और जो किया जा सकता था, वो कर लिया गया. मतलब चाट-पकौड़े आदि के यज्ञ में इस धन की आहुति दे दी गई.

# 3.1) जब एक मज़ेदार के कन्फ्यूज़न के चलते एक रवींद्र को भूखा रहना पड़ा-

अपने बंगाल प्रवास के दौरान, ट्यूशन वगैरह तो देते ही थे. आवाज़ भी अच्छी ही थी. भजन वगैरह की प्रेक्टिस थी. तो कोलकाता में हिट होने लगे. एक दिन एक भद्रजन ने घर पर आने और भोजन का निमंत्रण दे दिया. रवींद्र जैन गए. मन में हलुवा पूड़ी की उम्मीद लिए. काफी देर तक गीत संगीत का दौर चला. भोजन बहरहाल नदारद था. आखिर अंत में पूछ ही डाला-

अब भोजन कर लिया जाए?

पता चला कि आमंत्रण ‘भजन’ का था. जो कहने वाले के बंगाली एक्सेंट के चलते ‘भोजोन’ और सुनने वाली की उम्मीद के चलते ‘भोजन’ हो गया था.

# 3.2) जब राजकपूर के प्रेम के चलते एक बार फिर भूखा रहना पड़ा-

राजकपूर, रवींद्र जैन के लिए काफी केयरिंग एटीट्यूड रखते थे. पूना में राजकपूर का फार्म हाउस था. उस दिन वो वहीं ठहरे थे. रवींद्र जैन को कॉल लगाकर भोजन का आमंत्रण दिया. हालांकि दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है, लेकिन फिर भी अबकी बार ‘गुगली’ होने की उम्मीद कम थी. उसके बाद जैसा रवींद्र जैन ने दूरदर्शन को दिए एक इंटरव्यू में बताया-

”देखा जाकर कि राजकपूर बैंगन का भर्ता बनाने में लगे हुए हैं. मार उसमें घी और मसाला. उन्होंने कहा कि तुमको खाना है ये. इतना बड़ा बैंगन, और हम लोगों की ट्रेजेडी ये है कि हम जैन, प्याज़ नहीं खाते. बैंगन हमारे यहां नहीं खाते. उन्होंने कसम देदी कि मेरे मरे पे, अगर तुम ये न खाओ तो. अब सा’ब जैसे ही मौका लगा मैंने वो ओमप्रकाश को दे दिया. किसी तरह मैनेज किया.”

# 4) मगर राजकपूर और रवींद्र जैन मिले कैसे-

राजकपूर की मुलाकात रवींद्र जैन से एक गीत संगीत के प्रोग्राम में हुई. रवींद्र जैन के परफॉरमेंस के दौरान राजकपूर उनकी पत्नी दिव्या को सवा रुपए देते हुए बोले-

ये गीत किसी को नहीं दिया है तो मेरा.

फिर शायद राजकपूर ये बात, ये प्रॉमिस भूल गए. मगर उन्हें रवींद्र जैन याद रहे. घर आना-जाना शुरू हो गया. इस वाकये के कुछ महीनों बाद रवींद्र, राजकपूर के घर में बैठे थे. बातों-बातों में राजकपूर थोड़ा टेंस हो गए. बोले-

 ” ‘राम तेरी गंगा मैली’ नाम की मूवी बना रहा हूं. दिक्कत ये है कि मैंने ही ‘जिस देश में गंगा बहती है’ बनाई है. मैं ही ‘राम तेरी गंगा मैली’ बना रहा हूं, लोग क्या सोचेंगे?”

रवींद्र जैन ने हारमोनियम उठाया और न जाने दिमाग में क्या आया, उन्होंने उसी वक्त एक लाइन दे दी-

राम तेरी गंगा मैली हो गई, पापियों के पाप धोते-धोते.

इसके बाद राजकपूर ने कहा-

” बस! अब मैं अपनी फिल्म का टाइटल जस्टिफाई कर सकता हूं.”

इस एक लाइन के चलते रवींद्र जैन, ‘राम तेरी गंगा मैली’ के लिए साइन कर लिए गए.


तो दोस्तों ये थे रवींद्र जैन के चार मज़ेदार किस्से. और इनसे पता चलता है कि वो कितने जीवंत थे. 09 अक्टूबर, 2015 को उनकी मृत्यु हो गई. उनकी पत्नी दिव्या ने बताया कि उनके अंगों ने एक-एक कर काम करना बंद कर दिया था.

मशहूर एंकर-प्रेज़ेंटर तबस्सुम ने उनकी शोक सभा में रोते हुए बताया –

”अक्सर वो कहा करते थे, ‘आदमी के साथ, उसका खत्म किस्सा हो गया. आग ठंडी हो गई, चर्चा भी ठंडा हो गया.’ लेकिन जहां तक हमारे दद्दू (रवींद्र जैन) का ताल्लुक है, उनका चर्चा कभी खत्म नहीं होगा. जब तक ये दुनिया रहेगी. जब तक उनके गीत रहेंगे. उनका संगीत रहेगा. उनकी आवाज़ हमारे कानों में गूंजती रहेगी. उनकी याद उनके चाहने वालों के दिलों में हमेशा अमर रहेगी.”


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