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जब राजकुमार हीरानी और संजय दत्त को एक असली शादी में जाकर शूटिंग करनी पड़ी

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साल 2000 के बाद से संजय दत्त अपने प्रोफेशनल फ्रंट पर जूझ रहे थे. अच्छे डायरेक्टर्स के साथ काम करने के बावजूद फिल्में परफॉर्म नहीं कर रही थीं. एक मेनस्ट्रीम मसाला एक्टर की फिल्में कलेक्शन भी न करें, तो समस्या वाली बात थी. संजय को कभी बेहतरीन एक्टर या बॉलीवुड सुपरस्टार नहीं माना गया. इस दौरान संजय के हिस्से ‘कांटे’ को छोड़कर कोई ऐसी कोई फिल्म नहीं आई, जो लोगों के ध्यान में रहे. ऊपर से कोर्ट-कचहरी के चक्कर में इमेज को भारी नुकसान हो गया था. तभी संजय के करियर में वो फिल्म आई, जो न सिर्फ उनके फिल्मी करियर को लाइन पर लेकर आई, बल्कि धूमिल हुई इमेज को सुधारने में भी बहुत मददगार साबित हुई. फिल्म थी ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’. जब भी संजय दत्त के करियर की बात होगी, तो उसे ‘मुन्ना भाई’ से पहले और उसके बाद दो भागों में बांटकर ही देखा जाएगा. 19 दिसंबर, 2003 को ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ सिनेमाघरों में उतरी थी. इस लिहाज़ से इस साल फिल्म को 16 साल पूरे हो जाएंगे. जानिए इस फिल्म की मेकिंग की कहानी किस्सों की जुबानी.

फिल्म को बनाने का आइडिया कहां से आया था?

‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ को डायरेक्ट किया था राजकुमार हीरानी ने. हीरानी की बतौर डायरेक्टर ये पहली फिल्म थी. इसकी कहानी वो पिछले कुछ सालों से लिख रहे थे. राजू को ये आइडिया आया मेडिकल वाले दोस्तों के साथ रहकर. हुआ ये कि कॉलेज में राजू के दोस्तों ने मेडिकल ले लिया और राजू कॉमर्स की पढ़ाई करने लगे. जैसे ही कॉमर्स की क्लास खत्म होती, राजू अड्डेबाजी के लिए मेडिकल वालों के पास आ जाते. ऐसे में मेडिकल स्टूडेंट्स के साथ काफी समय बिताने को मिला, जिसे उन्होंने बहुत करीब से ऑब्जर्व किया. इसके बाद उनके किसी जानने वाले की तबीयत खराब हो गई और उनका पाला एक बार फिर डॉक्टरों से पड़ गया. इन दो घटनाओं ने उन्हें मेडिकल फील्ड की बढ़िया जानकारी मुहैया कराई. राजू अपने एक इंटरव्यू में बताते हैं कि छोटी-छोटी बातें, जो उन्हें दिलचस्प लगती थी, वो उन्हें कहीं नोट कर लेते थे. वो नाटक के बैकग्राउंड से आए थे, इसलिए डीटेलिंग पर खास नज़र रहती थी. बाद में इन चीज़ों को अपनी फिल्मों में इस्तेमाल करते हैं.

इस फिल्म में संजय ने पहली बार अपने पापा सुनील दत्त के साथ स्क्रीन स्पेस शेयर किया था.
इस फिल्म में संजय ने पहली बार अपने पापा सुनील दत्त के साथ स्क्रीन स्पेस शेयर किया था.

हुआ ये कि पहले राजकुमार हीरानी एक गुंडे की कहानी लिख रहे थे. जिसे एक बार सिरदर्द होता है. वो कई डॉक्टरों के चक्कर लगाता है.  पैसा भी काफी खर्चा करता है. अगले दिन वो सिरदर्द अपने आप ठीक हो जाता है क्योंकि उसे रात की पार्टी का हैंगोवर था. लेकिन राजू को ये कहानी कुछ जमी नहीं, जिसके बाद ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ की स्क्रिप्ट लिखने का काम चालू हुआ. इस दौरान उनका मेडिकल वाला एक्सपीरियंस भरपूर इस्तेमाल में आया.

फिल्म के लीड रोल के लिए संजय दत्त का नाम कहीं था ही नहीं

स्क्रिप्टिंग का काम पूरा करते ही राजू विधु विनोद चोपड़ा के पास पहुंचे. फिल्म की कास्टिंग के लिए. राजू ने ये कहानी अनिल कपूर को ध्यान में रखकर लिखी थी. विनोद चोपड़ा अनिल कपूर के साथ काम कर चुके थे, इसलिए अनिल कपूर से मीटिंग फिक्स कराने के लिए राजू वहां पहुंचे थे. लेकिन विनोद का कहना था कि जब उन्हें ये पता नहीं होगा कि फिल्म किस बारे में है, वो कैसे अनिल कपूर को अप्रोच करेंगे. इसके बाद उन्होंने वो पूरी स्क्रिप्ट पढ़ी और राजू हीरानी से काफी डिस्कशन किया. अब विनोद खुद उस फिल्म को प्रोड्यूस करना चाहते थे और इसके लीड रोल के लिए उन्होंने  शाहरुख खान का नाम सजेस्ट किया. शाहरुख के साथ मीटिंग फिक्स हुई. ‘देवदास’ के सेट पर राजू की शाहरुख से पहली मुलाकात हुई. थोड़ी-बहुत कहानी सुनकर शाहरुख ने कहा वो खुद स्क्रिप्ट पढ़कर राजू को फोन करेंगे. अगली सुबह शाहरुख ने राजू को फोन किया और उन्हें अगले हफ्ते मिलने के लिए बुलाया. शाहरुख को कहानी पसंद आ गई थी.

'देवदास' में शाहरुख को संजय लीला भंसाली ने डायरेक्ट किया था. फिल्म शाहरुख के साथ ऐश्वर्या राय और माधुरी दीक्षित भी थीं.
‘देवदास’ में शाहरुख को संजय लीला भंसाली ने डायरेक्ट किया था. फिल्म में शाहरुख के साथ ऐश्वर्या राय और माधुरी दीक्षित भी थीं.

सब कुछ ठीक चल रहा था. फिर अचानक से चीज़ें बदलने लगीं. शाहरुख को इंजरी हो गई, जिसके चलते उन्होंने ये फिल्म छोड़ दी. काम फिर से अटक गया. फिल्म ‘कंपनी’ के कुछ हिस्सों को देखकर विवेक ओबेरॉय को कंसिडर किया जाने लगा. फिर सीन में जिमी शेरगिल आए और संजय दत्त को एक गेस्ट रोल में कास्ट किया गया. लेकिन फिल्म तो थी संजय दत्त की किस्मत में. होते-होते कुछ ऐसा हुआ कि जिमी और संजय दत्त के रोल आपस में एक्सचेंज कर दिए गए. अब संजय लीड हो गए और जिमी को मिला ज़हीर का किरदार. जब फिल्म में शाहरुख थे, तब एक समय को देवदास में उनके साथ काम कर रहीं ऐश्वर्या राय का नाम फीमेल लीड के लिए सामने आया लेकिन फाइनली वो रोल गया ग्रेसी सिंह के खाते में.

शाहरुख नहीं, तो उनका सिनेमैटोग्रफर ही सही

बिनोद प्रधान. टैलेंट और एक्सपीरियंस का अद्भुत संगम. पेशे से सिनेमैटोग्रफर थे लेकिन पीछे लंबा सिनेमाई अनुभव के चलते फिल्म से जुड़ी हर छोटी-बड़ी चीज़ में उनकी रायशुमारी होती थी. राजकुमार हीरानी पहली फिल्म डायरेक्ट कर रहे थे, हालांकि इससे पहले वो कई सारी ऐड फिल्में डायरेक्ट कर चुके थे. लेकिन सिनेमा तो सिनेमा होता है. बिनोद पीछे ‘1942 अ लव स्टोरी’, ‘जाने भी दो यारों’ और ‘परिंदा’ जैसी फिल्मों को अपने कैमरे में कैद कर चुके थे. उनकी ‘देवदास’ रिलीज़ होने वाली थी और अब वो ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ कर रहे थे. बिनोद ‘देवदास’ की शूटिंग खत्म करने के फौरन बाद राजू की फिल्म के सेट पर पहुंचे थे. राजू नए थे इसलिए उन्होंने बिनोद से कहा कि दिन भर में 20 शॉट लेंगे. ये सुनकर बिनोद चौंक गए. उन्होंने कहा ‘देवदास’ के इतने ही सीन शूट करने में महीनों लगे हैं. राजू भी बैकफुट पर चले गए. लेकिन दिन भर में वो सारे सीन शूट कर लिए गए, जो प्लान किए गए थे. बीसों.

फिल्म के एक सीन में अरशद वारसी और संजय दत्त. दूसरी तस्वीर में फिल्म के सिनेमैटोग्रफर बिनोद प्रधान.
फिल्म के एक सीन में अरशद वारसी और संजय दत्त. दूसरी तस्वीर में फिल्म के सिनेमैटोग्रफर बिनोद प्रधान.

जब संजय दत्त को एक रियल शादी में जाकर शूटिंग करनी पड़ी

जब ये फिल्म बन रही थी, तो इसका बजट काफी सीमित रखा गया था. लेकिन कलात्मक छूट पूरी थी. ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ के आखिर में एक सीन आता है, जहां मुन्ना की शादी हो रही है. इस सीन को फिल्माने के लिए राजू प्रॉपर सेट और गेट अप वगैरह चाहते थे लेकिन हाथ तंग था. जहां फिल्म की शूटिंग हो रही थी, वहां से दस मिनट की दूरी पर एक मैरेज हॉल था, जिसमें हर दिन किसी न किसी की शादी हो रही थी. राजू ने ये चीज़ नोटिस कर ली थी. इस खर्चे से बचने के लिए उन्होंने अपने एक असिस्टेंट को मैरेज हॉल भेजा और सिर्फ दस मिनट के लिए स्टेज मांगा. हॉल वाला मान गया और कहा कि यहां की शादियां दस बजे तक खत्म हो जाती हैं. जैसे ही यहां से ये लोग निकलेंगे वो राजू की टीम को फोन कर देंगे. संजय और ग्रेसी सिंह के लिए शादी वाले सीन के लिए कपड़े किराए पर मंगवाए गए थे.

फिल्म का क्लासरूम सीन बहुत पसंद किया गया था. इसलिए इसे संजय दत्त के ऊपर बनी बायोपिक में भी रखा गया था.
फिल्म का क्लासरूम वाला सीन बहुत पसंद किया गया था. इसलिए इसे संजय दत्त की बायोपिक ‘संजू’ में भी जगह दी गई थी.

रात आठ बजे सेट पर पैकअप हो गया. सब लोग रिलैक्स करने लगे कि अब दस बजे शूट करना है. संजय दत्त भी अपने वैन में जाकर ड्रिंक्स पर बैठ गए. दस बजा, फिर साढ़े दस हो गया. लेकिन हॉल वाले की कोई खोज-खबर नहीं. फिर राजू की टीम ने उनके यहां पर फोन किया कि भाई क्या माहौल है? हॉल वाले ने कहा कि ये लोग अभी यहीं हैं, जैसे ही निकलेंगे वो फोन कर देंगे. ग्यारह बजे बैंक्वेट हॉल से फोन आया कि उनका मामला निपट गया है, अब आकर शूट कर लो. हीरानी अपने एक इंटरव्यू में बताते हैं कि जैसे वो लोग हॉल में घुसे, तो ओरिजनल वाले दुल्हा-दुल्हन बस स्टेज से उतर ही रहे थे. वो उतरे और ये चढ़े. सब लोग शॉक में ये देख रहे थे कि संजय दत्त यहां क्या कर रहे हैं. ये वहां पहुंचे और नॉर्मल कैमरों से तस्वीरें खींची और वहां निकल गए. इसके बाद उन तस्वीरों को अच्छी क्वालिटी वाले कैमरों से शूट कर फिल्म में दिखाया गया.

जितना प्यार फिल्म में दिखाया गया था, उससे ज़्यादा जनता ने फिल्म को दिया

जब ये फिल्म रिलीज़ हुई, तब लोगों को कुछ नया देखने को मिला. जनता को फिल्म देखकर कैसा लग रहा है, ये जानने के लिए राजकुमार हीरानी और बोमन इरानी समेत कुछ लोग बॉम्बे के कुछ सिनेमाघरों में पहुंचे. जब ये लोग पहुंचे तब कैरम वाला सीन चल रहा था, जहां रुस्तम के पप्पा मुन्ना, सर्किट और ज़हीर के साथ कैरम खेल रहे होते हैं. ये सीन के पूरा होने पर पब्लिक ने खूब तालियां बजाईं. मतलब साफ था जनता फिल्म एंजॉय कर रही थी. लोगों का ऐसा रिएक्शन देखकर बोमन इरानी इतने इमोशनल हो गए कि हॉल में ही खड़े-खड़े रोने लगे. जनता और समीक्षक दोनों ने ही इस फिल्म को पसंद किया. इसका नतीजा ये हुआ कि फिल्म बड़ी हिट हुई. बॉक्स ऑफिस पर 25 हफ्ते तक चलने यानी सिल्वर जुबली सेलेब्रेट करने का गौरव भी इसे मिला. मसला यहीं खत्म नहीं होता. अवॉर्ड शोज़ में भी फिल्म का परफॉर्मेंस तगड़ा रहा. फिल्मफेयर से लेकर आईफा सब आया. लेकिन असली मौज तब आई, जब फिल्म को नेशनल अवॉर्ड से नवाजा गया. ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ को बेस्ट पॉपुलर फिल्म कैटेगरी में नेशनल अवॉर्ड मिला था. जाते-जाते वो कैरम वाला सीन देखते जाइए:


वीडियो देखें: मणिकर्णिका जब किसी और ने डायरेक्ट की, तो डायरेक्टर के खाने में कंगना का नाम क्यों?

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