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वो किस्सा, जब मोतीलाल वोरा सीएम बनवाने गए थे और खुद मुख्यमंत्री बनकर लौटे

कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रहे मोतीलाल वोरा का 21 दिसंबर को देहांत हो गया. एक पत्रकार, एक नेता, एक संगठनकर्ता, एक राज्य के संवैधानिक प्रमुख और कांग्रेस के कोषाध्यक्ष के तौर पर उनके कार्यकाल के कई ऐसे अध्याय रहे, जो बेहद रोचक हैं. कांग्रेस में चाहे राजीव गांधी का दौर हो, या नरसिंह राव, सीताराम केसरी और फिर सोनिया-राहुल का दौर, मोतीलाल वोरा हमेशा आलाकमान के विश्वस्त बने रहे. राजीव गांधी के दौर में वोरा एक ही विधानसभा में दो बार मुख्यमंत्री बने. नरसिंह राव ने उन्हें यूपी का राज्यपाल बनाया. वहीं, सीताराम केसरी ने उन्हें अपनी जगह दे दी यानी कांग्रेस का कोषाध्यक्ष बना दिया, जहां पर वो सोनिया गांधी और राहुल के दौर में भी बने रहे. सियासत में मोतीलाल वोरा हरदिलअजीज माने जाते रहे. आज हम ऐसे 4 किस्सों से रूबरू कराएंगे, जिनमें कभी-कभी वो अपने हरदिलअजीज व्यक्तित्व के उलट भी नजर आए :-

सोनिया गांधी और राहुल गांधी - दोनों से मोतीलाल वोरा की करीबी रही.
सोनिया गांधी और राहुल गांधी – दोनों से मोतीलाल वोरा की करीबी रही.

किस्सा नंबर 1 : जब वोरा पहली बार मुख्यमंत्री बने –

1985 का साल और मार्च का महीना. मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके थे. जनता ने एक बार फिर मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के कामकाज पर भरोसा जताया था. अर्जुन सिंह फिर से विधायक दल का नेता चुने गए, और 12 मार्च को मुख्यमंत्री बने. शपथ लेने के तुरंत बाद वह प्रधानमंत्री और इंका अध्यक्ष राजीव गांधी के बुलावे पर दिल्ली गए. साथ में मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष मोतीलाल वोरा भी थे. अर्जुन सिंह जब मिले, तो राजीव ने उनसे पंजाब का गवर्नर बनकर जाने को कहा, जहां के हालात बहुत खराब थे. राजीव और अर्जुन सिंह सोफे पर बैठकर बातचीत कर रहे थे, तब मोतीलाल वोरा और मध्य प्रदेश कांग्रेस के कुछ नेता वहीं थोड़ी दूरी बनाकर खड़े थे. जब अर्जुन सिंह चंडीगढ़ जाने के लिए मान गए, तब राजीव ने उनसे पूछा,

“अर्जुन जी, भोपाल में आपकी जगह किसे तैनात किया जाना चाहिए.” 

तब अर्जुन सिंह ने सामने खड़े कांग्रेसियों की तरफ इशारा किया और बोले,

“वोरा”.

उसके बाद अगले ही दिन यानी 13 मार्च को मोतीलाल वोरा मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बना दिए गए.

वैसे कई लोग यह भी कहते हैं कि अर्जुन सिंह ने सामने खड़े कांग्रेसियों की तरफ इशारा करते हुए ‘वो रहा’ कहा था, लेकिन राजीव गांधी ने ‘वो रहा‘ को ‘वोरा‘ समझ लिया.

खैर, राजीव गांधी ने जो भी समझा हो या अर्जुन सिंह ने जो भी कहा हो, लेकिन मोतीलाल वोरा मुख्यमंत्री तो बन ही गए थे.

कभी अर्जुन सिंह तो कभी सिंधिया की मदद से मोतीलाल वोरा मुख्यमंत्री बने
कभी अर्जुन सिंह तो कभी सिंधिया की मदद से मोतीलाल वोरा मुख्यमंत्री बने.

किस्सा नंबर 2 : जब दूसरी बार मुख्यमंत्री बने –

यह 1989 का साल था. जनवरी का महीना. उस दौर में राजीव गांधी धड़ाधड़ मुख्यमंत्रियों और कैबिनेट मंत्रियों को बदल रहे थे. इसी क्रम में तय हुआ कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह, जो पंजाब से वापस आकर मुख्यमंत्री पद पर काबिज थे, को दिल्ली लाया जाए. उन्हें इंका का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया गया था. अर्जुन सिंह की जगह रेल मंत्री माधव राव सिंधिया को भोपाल भेजने की तैयारी शुरू हुई. एक दिन दिल्ली से एक चार्टर्ड प्लेन से माधव राव सिंधिया और मोतीलाल वोरा ने भोपाल के लिए उड़ान भरी. भोपाल जाने को लेकर सिंधिया दुविधा में थे. उन्हें दिल्ली का अपना सर्कल ज्यादा प्यारा लग रहा था. खैर, सिंधिया और वोरा दोनों भोपाल पहुंचे. लेकिन भोपाल लैंड करने के बाद सिंधिया जैसे ही एयरपोर्ट से बाहर निकले, टेलीफोन बूथ ढूंढने लगे. वह जमाना मोबाइल फोन और व्हाट्सएप का नही था. थोड़ी दूर जाकर उन्हें एक टेलीफोन बूथ मिला. वहां से उन्होंने सीधे राजीव गांधी को फोन लगाया. मुख्यमंत्री बनने को लेकर अनिच्छा जता दी. राजीव को मनाने के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद के लिए मोतीलाल वोरा का नाम सुझाया. राजीव मान गए, और 25 जनवरी 1989 को मोतीलाल वोरा दोबारा मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए. एक ही विधानसभा (1985-90) में वह दो बार मुख्यमंत्री बने.

 लोग कहते हैं कि खुद को मुख्यमंत्री बनाने के लिए अर्जुन सिंह और माधव राव सिंधिया का उन्होंने हमेशा एहसान माना.

और उधर सिंधिया! चार साल बाद मुख्यमंत्री पद के लिए मचल गए. लेकिन तब तक नरसिंह राव का जमाना आ गया था, और इस दफा लाॅटरी लग गई राघोगढ़ रियासत के दिग्विजय सिंह उर्फ दिग्गी राजा की. बताते चलें कि राघोगढ़ रियासत और ग्वालियर एस्टेट के संबंध कभी अच्छे नही रहे. इस बार नागरिक उड्डयन मंत्री सिंधिया की चार्टर्ड फ्लाइट दिल्ली एयरपोर्ट पर उनका इंतजार ही करती रह गई, और दिग्गी राजा ने अपना गेम खेल दिया.

लब्बोलुआब यह कि जब सिंधिया को मौका मिला, तब अनिच्छा जताई और जब बनना चाहा, तब दूसरा बाजी मार ले गया.

किस्सा नंबर 3 : जब मोतीलाल वोरा ने मुलायम सिंह से पंगा लिया –

यह 1995 का साल था. उन दिनों उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की गठबंधन सरकार चल रही थी. मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे. लेकिन मई 1995 के आखिरी हफ्ते में बसपा सुप्रीमो कांशीराम ने अचानक उत्तर प्रदेश सरकार से समर्थन वापसी का एलान कर दिया. और इसके बाद उनकी पार्टी की उपाध्यक्ष मायावती ने राज्यपाल मोतीलाल वोरा के समक्ष भाजपा के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया. इस घटना के अगले ही दिन यानी 26 मई को राज्यपाल वोरा ने मुख्यमंत्री मुलायम सिंह से उनके इस्तीफे के बारे में पूछा, लेकिन मुलायम ने स्पष्ट मना कर दिया. इसके बाद भी वोरा मुलायम सिंह को इस्तीफा देने के लिए कहते रहे, लेकिन मुलायम सिंह मना करते रहे. नतीजतन वोरा ने मुलायम सिंह की सरकार को बर्खास्त कर दिया, और मायावती को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी.

मोतीलाल वोरा ने मुलायम सिंह की सरकार को बहुमत परीक्षण का मौका दिए बिना बर्खास्त कर दिया था.
मोतीलाल वोरा ने मुलायम सिंह की सरकार को बहुमत परीक्षण का मौका दिए बिना बर्खास्त कर दिया था.

राजनीतिक हलकों में और संविधान विशेषज्ञों द्वारा वोरा के इस फैसले की काफी आलोचना हुई. इन सबका तर्क था, चूंकि एस. आर. बोम्मई बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने स्पष्ट कर दिया था कि बहुमत का फैसला विधानसभा में ही होना चाहिए, इसलिए मुलायम सिंह से फ्लोर टेस्ट के लिए कहा जाना चाहिए था. लेकिन वोरा तो फैसला ले चुके थे. और मुलायम सिंह ने भी विधानसभा के गणित को देखते हुए एस.आर. बोम्मई की तरह इस मामले को तूल देना उचित नही समझा.

यह मसला संवैधानिक और कानूनी विशेषज्ञों की आलोचना से आगे इसलिए भी नही बढ़ पाया क्योंकि इसी दरम्यान हुआ लखनऊ गेस्ट हाउस कांड (जिसमें मायावती पर कथित हमला हुआ था) सारी सुर्खियां बटोर ले गया, और वोरा का मामला दब गया.

किस्सा नंबर 4 : बंगला विवाद –

2014 में एक खबर सामने आई कि कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा के नाम लुटियंस दिल्ली में 9 बंगले आवंटित हैं. वोरा उस समय राज्यसभा सांसद थे. इस हैसियत से वह एक ही बंगले के हकदार थे. वो मुख्यमंत्री भी रहे थे. कोई मुख्यमंत्री, राज्यपाल या राजदूत रहा व्यक्ति जब संसद के किसी सदन का सदस्य होता है तो उसे टाइप 6 बंगला अलाॅट किया जाता है. इस हैसियत से वोरा को 33 लोदी इस्टेट का टाइप 6 बंगला अलाॅट भी हुआ था, जिसमें वह खुद रहते थे.

2014 में मोतीलाल वोरा बंगला विवाद की जद में भी आए.
2014 में मोतीलाल वोरा बंगला विवाद की जद में भी आए.

लेकिन अगस्त 2014 में अखबारों में खबर छपी कि 33 लोदी एस्टेट के अलावा 8 अन्य बंगले भी मोतीलाल वोरा के नाम अलाॅट हैं. खबर के मुताबिक, मोतीलाल वोरा के नाम नॉर्थ एवेन्यू में 49, 63, 78 और 112 नंबर बंगला, साउथ एवेन्यू में 49 और 139 नंबर बंगला, वीपी हाउस में 124 और 507 नंबर फ्लैट भी अलाॅट थे. इनमें से ज्यादातर में वोरा के ‘गेस्ट’ रहा करते थे.

  • लुटियंस में ऐसे मामलों में गेस्ट का मतलब होता है, चुनाव हारे हुए सत्तारूढ़ दल के वे लोग, जिनका ठीक-ठाक जुगाड़ होता है. और वे किसी और के नाम आवास अलाॅट कराकर उसमें रहते हैं. ऐसा सभी पार्टियों के दौर में होता रहा है.

लेकिन तब तक कांग्रेस सत्ता से बेदखल हो चुकी थी. इस खबर के सामने आने के बाद 33 लोदी इस्टेट को छोड़कर वोरा के नाम पर अलाॅट सभी आवासों का आवंटन रद्द कर दिया गया था.


 

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