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बिहार का वो मुख्यमंत्री जो कहता था, 'मुझे मारने के लिए मछली भेजी गई है'

साजिश का तौर तरीका जितना ऊटपटांग हो, उसके किंवदंतियों के टांड़ पर चढ़ने की गुंजाइश उतनी ही ज्यादा होती है.

ये आज़ाद भारत का मंज़र है. एक मुख्यमंत्री देश के प्रधानमंत्री से शिकायत कर रहा है.

हुजूर, मेरा कत्ल होने वाला था. दुश्मनों ने मुझे मारने के लिए हथियार के तौर पर मछली भेजी थी. मसालों से सनी. वो तो वक्त रहते खुफिया महकमे के लोगों को खबर लग गई. और मैं बच गया. मगर कब तक…

क्या ये सच था. ये खामखयाली.

बिहार के चुनावी सीजन में यह हमारी मुख्यमंत्री सीरीज है और इसमें आज बारी है बिहार के तीसरे मुख्यमंत्री विनोदानंद झा की. जो मछली कांड से मजबूत होकर उभरे मगर कुछ ही वक्त बाद कामराज्ड हो गए.

अंक 1

कांटा निकल गया

साल था 1963. पटना में अगमकुआं के पास एक होटल हुआ करता था. राज होटल. होटल के मालिक थे विश्वनाथ वर्मा. सूबे की सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर कृष्ण बल्लभ सहाय के करीबी आदमी. एक दिन खाने-पीने के शौक़ीन मुख्यमंत्री विनोदानंद झा के लिए इसी होटल से मछली बनाकर भेजी गई. लेकिन मुख्यमंत्री के हलक तक निवाला पहुंचता, उससे पहले सूबे का ख़ुफ़िया तंत्र हलकान हो चुका था. कहा गया कि बाजरिए मछली मुख्यमंत्री को जहर खिलाने की कोशिश की जा रही थी. आरोप लगा मंत्री केबी सहाय और उनके सहयोगी रामलखन सिंह यादव पर. बात प्रधानमंत्री नेहरु तक पहुंच गई. ख़ुफ़िया विभाग के दस्तावेजों के साथ. लेकिन अपने विरोधियों को निपटाने की यह कोशिश खुद मुख्यमंत्री पर भारी पड़ने वाली थी.

इस पूरे विवाद की शुरुआत हुई थी 1962 के बिहार विधानसभा चुनाव से. चुनाव से ठीक पहले बिहार कांग्रेस के तीन धड़ो के सींग आपस में फंसे हुए थे. पहला धड़ा था मुख्यमंत्री विनोदानंद झा का. दूसरा धड़ा उनके विरोधी केबी सहाय का. और इस दोनों के बीच संतुलन कायम करता हुआ तीसरा धड़ा था भूमिहारों का, जिसका नेतृत्व कर रहे थे महेश प्रसाद सिन्हा. 1962 के विधानसभा चुनाव में टिकट बंटवारे के लिए तीन सदस्यों वाली कमिटी बनी. विनोदानंद झा, केबी सहाय और बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष AQ अंसारी इसके सदस्य बने. लेकिन मामला सुलझने की बजाए उलझ गया. हर गुट दिल्ली तक दौड़ लगाकर अपने हिस्से का दबाव बना रहा था. फिर उसी राजधानी से नेहरू से तीन लोगों की टीम भेजी. टिकट का आखिरी फैसला करने को. इस कमेटी में थे सरदार स्वर्ण सिंह, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी.

1965 Indira Gandhi & K. B. Sahay (2) (1)
1965 में इंदिरा गांधी के साथ केबी सहाय.

कमेटी ने मुख्यमंत्री विनोदानंद झा का भरपूर पक्ष लिया. केबी सहाय और दूसरे धड़ों के छह दर्जन से भी ज्यादा टिकट कट गए. कहा गया कि टिकट बंटवारे में मौजूदा मुख्यमंत्री को बढ़त देकर भविष्य के सत्ता संघर्ष से बचने की कोशिश की जा रही थी. टिकट के बाद आए नतीजे. 1962 के विधानसभा चुनाव में 318 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस को 185 सीट हासिल हुई. विनोदानंद अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने में कामयाब रहे. इस जीत के फौरन बाद विनोदानंद ने ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी के अधिवेशन की मेजबानी भी हासिल कर ली. पटना में हुए AICC के अधिवेशन के उन्होंने बेहतरीन इंतजाम करवाए. इससे उनकी साख केंद्रीय नेतृव की आंखों में और बेहतर हो गई.

अब विनोदानंद के पास मौका था कि वो अपने विरोधियों को पूरी तरह किनारे कर सकें. उसी समय मछली कांड सामने आ गया. विनोदानंद ने मौके को लपक लिया. ख़ुफ़िया विभाग से जांच करवाई और एक मोटी सी फाइल बनाकर प्रधानमंत्री नेहरु के दफ्तर भेज दी गई. केबी सहाय के करीबी माने जाने वाले रामलखन सिंह यादव को इस षड्यंत्र का मुख्य आरोपी बनाया गया.

इस घटना के 36 साल बाद  रामलखन सिंह यादव ने दैनिक आज के 31 दिसंबर 1998 के अंक में लिखा-

“श्रीबाबू के निधन के बाद हमलोगों ने विनोदानंद झा को मुख्यमंत्री बनाने में बहुत मेहनत की. लेकिन झा ने बिल्कुल 100 प्रतिशत झूठा षड्यंत्र रच कर पूरे कागज का पोथी बनाकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के हाथ में दे दिया कि मैं उन्हें मछली में विष देकर मारने का षड्यंत्र रचा हूँ. इस मामले में मुझ समेत 36 लोगों को मुजरिम बना दिया गया. पंडित नेहरू ने इंटेलिजेंस ब्यूरो के तत्कालीन निदेशक श्री मल्लिक द्वारा जाँच करवाई. डी.आई.जी. श्री शुक्ल जाँच अधिकारी बनाए गए. चार दिनों तक मुझसे पूछताछ की गई. प्रधानमंत्री जी को भी मैंने सारी बाते बताई. श्री मल्लिक की ही रिपोर्ट पर प्रधानमंत्री नेहरू ने विनोदानंद झा को मुख्यमंत्री पद से हटाया.”

मछली काण्ड सियासी गलियारों में कांग्रेस के लिए शर्मिंदगी की वजह बन रहा था. केंद्र विनोदानंद से फुरसत चाहता था. लेकिन उनको हटाना इनता आसान नहीं था. आखिर उनके नेतृत्व में ही तो कांग्रेस 1962 का विधानसभा चुनाव जीती थी. इस बीच नेहरु के हाथ में एक ऐसा हथियार आ गया था जिससे वो अपने नापसंदीदा लोगों की फाइल आसानी से निपटा सकते थे. हथियार का नाम था ‘कामराज प्लान’ तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रह चुके के. कामराज के दिमाग की उपज. प्लान था कि जो कांग्रेसी नेता 10 साल से सत्ता में हैं उन्हें सत्ता छोड़कर संगठन की तरफ लौटना चाहिए. मुख्यमंत्रियों के तख्ते उलटे जाने लगे. अख़बार के छापखानों में नया शब्द छपने लगा, ‘कामराज्ड’. विनोदानंद झा भी कामराज्ड हो गए. लोगों ने कहा कि मछली काण्ड की वजह से. 2 अक्टूबर 1963 को गांधी जयंती के दिन उनका कार्यकाल खत्म हुआ. उनके अलावा पांच और मुख्यमंत्रियों को भी कामराज प्लान के तहत इस्तीफे देने पड़े थे. सबको संगठन में में कुछ ना कुछ जिम्मेदारी दी गई. सिवाय विनोदानंद झा के.

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एक विदेशी प्रतिनिधिमंडल के साथ बिनोदानंद झा.

देर से सही लेकिन उनके प्रतिद्वंदी केबी सहाय की योजना ठीक साबित हुई. योजना जिसके तहत विनोदानंद मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे थे. आखिर था क्या केबी सहाय का प्लान जिसके तहत विनोदानंद झा बलि का बकरा बनने जा रहे थे.

अंक-दो

कठपुतली की ताजपोशी

साल 1961 की फरवरी. तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की मौत के बाद बिहार कांग्रेस में सत्ता के लिए नए सिरे से संघर्ष शुरू हुआ. मुख्य तौर पर चार धड़े मैदान में थे. पहला धड़ था भूमिहारों का जिसका नेतृत्व महेश प्रसाद सिन्हा कर रहे थे. दूसरा धड़ा था केबी सहाय का. इसमें कायस्थों के अलावा पिछड़ी जाति के कई विधायक शामिल थे. तीसरा धड़ा था मैथिल ब्राह्मणों का जोकि विनोदानंद झा की अगुवाई में था. चौथा धड़ा था अनुग्रह नारायण सिंह के बेटे सत्येन्द्र नारायण सिंह का. श्रीकृष्ण सिंह खुद भूमिहार थे लेकिन उन्हें राजपूतों के एक धड़े का समर्थन हासिल था. उनके जाने के बाद इस धड़े ने अपनी वफ़ादारी बदल ली और सत्येन्द्र नारायण के खेमे में आ गए.

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अब तक सूबे की राजनीति में भूमिहारों का वर्चस्व था. इसे तोड़ने के लिए केबी सहाय, सत्येन्द्र नारायण और विनोदानंद झा ने लामबंदी शुरू कर दी. केबी सहाय जानते थे कि उनके नाम पर राजपूतों का धड़ा तैयार नहीं होगा. लिहाजा विनोदानंद झा का नाम आगे किया गया. केबी सहाय की योजना था कि भूमिहार लॉबी को गिराने के लिए विनोदानंद को आगे करेंगे और सही समय आने पर उन्हें कुर्सी से हटाकर खुद मुख्यमंत्री बन जाएंगे.

इस पूरे गुणा-गणित में विनोदानंद झा को मुख्यमंत्री के चुनाव में उतार दिया गया. अलग-थलग पड़े भूमिहार गुट की तरफ से महेश प्रसाद सिन्हा ने चुनौती पेश की लेकिन वो नाकाफी साबित हुई. विनोदानंद झा सूबे के तीसरे मुख्यमंत्री बने. असल में तो दूसरे, मगर लिस्ट में कार्यवाहक के तौर पर दीप नारायण सिंह का नाम भी जुड़ा, इसलिए तीसरे.

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विनोदानंद झा चुनाव में चुनाव में उतरे, तो किसी ने नहीं सोचा था कि वो क्या कर जाएंगे.

इसके एक साल बाद सूबे में विधानसभा चुनाव हुए. कांग्रेस की सीटों की संख्या 210 से घटकर 185 पर आ गई. लेकिन यह आंकड़ा बहुमत के लिए पर्याप्त था. केबी सहाय को अब अपने हाथों से सब फिसलता हुआ दिख रहा था. टिकट बंटवारे में उनके पर पहले ही कतरे जा चुके थे. अब उनके सामने एक ही रास्ता बचा था. भूमिहार गुट से गठबंधन. उन्होंने किया भी. लेकिन विनोदानंद केबी सहाय की उम्मीद से ज्यादा चालाक निकले. उन्होंने सत्येन्द्र नारायण सिंह को उपमुख्यमंत्री की कुर्सी देने के वायदे के साथ राजपूत गुट को अपने पाले में कर लिया. केबी सहाय के हाथ में मलाल के अलावा कुछ ना लगा. विनोदानंद अपनी कुर्सी बचाने में कामयाब रहे. केबी सहाय को अपनी योजना असफल होती दिख रही थी. तभी आया कामराज प्लान जिसने पूरी बाजी केबी सहाय के पक्ष में पलट दी.

अंक 3.

मंडल प्लान फेल

मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद विनोदानंद झा राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक होने लगे. उनके पद छोड़ने के चार साल बाद 1967 के विधानसभा चुनाव में राज्य में कांग्रेस हार गई. तब तक दूसरे परिसीमन आयोग की रिपोर्ट आ गई थी. इसके तरह बिहार विधानसभा की सीटों को 331 से घटाकर 318 कर दिया गया. 318 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस को केवल 128 सीटें मिली थी. यहां तक कि मुख्यमंत्री के बी सहाय भी चुनाव हार गए थे. तब महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी लेकिन उसे कांग्रेस ने गिरा दिया और बाहर से समर्थन देकर पहले सतीश प्रसाद सिंह और बाद में बी पी मंडल की सरकार बनवाई.

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कांग्रेस के इस फैसले से कई कांग्रेसी विधायक नाराज थे जिसका परिणाम यह हुआ कि विनोदानंद झा के नेतृत्व में 17 कांग्रेसी विधायकों ने पार्टी से अलग होकर एक नया गुट बनाया जिसका नाम लोकतांत्रिक कांग्रेस रखा गया. उस वक्त तक कोई दल-बदल अधिनियम नहीं था जिसके तहत एक निश्चित संख्या में ही विधायकों और सांसदों की टूट को वैधानिक मान्यता मिलती है. इस गुट ने मंडल सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया जिसका परिणाम यह हुआ कि 22 मार्च 1968 को 47 दिन पुरानी बी पी मंडल सरकार गिर गई. विनोदानंद झा ने कांग्रेस के एजेंडे (सरकार को बाहर से समर्थन देकर टिकाये रखना) पर पानी फेर दिया था.

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विनोदानंद झा इंदिरा गांधी की कांग्रेस में शामिल हुए थे.

मंडल सरकार गिरने के बाद भोला पासवान शास्त्री के नेतृत्व में लोकतांत्रिक कांग्रेस ने सरकार बनाई और उसे संसोपा,  जन क्रांति दल, जनसंघ और निर्दलीय विधायकों ने भी समर्थन  दिया. उस दौर में केन्द्रीय स्तर पर भी कांग्रेस लुंज-पुंज हालत में थी. इंदिरा गांधी और सिंडीकेट का झगड़ा शीर्ष पर था. प्रदेश कांग्रेस समितियां बेलगाम हुई जा रहीं थी. जिसे जो मर्जी वही कर रहा था और अपनी मर्जी करने वालों में विनोदानंद झा भी एक थे. लेकिन विनोदानंद झा 1969 के विभाजन में ओल्ड गार्ड्स के साथ कांग्रेस (ओ) में नहीं गए. वे अपनी लोकतांत्रिक कांग्रेस के साथ इंदिरा गांधी की कांग्रेस (रिक्विजिशनिस्ट) यानि कांग्रेस (आर) में शामिल हो गए थे. 1971 के लोकसभा चुनाव में इन्दिरा गांधी ने उन्हें अपने इलाके देवघर से ढाई सौ किलोमीटर दूर मैथिल ब्राह्मणों का गढ़ माने जाने वाले दरभंगा लोकसभा सीट से कांग्रेस (आर) का उम्मीदवार बनाया. वे चुनाव जीतकर संसद भी पहुंचे लेकिन कुछ ही महीने बाद 1 अगस्त 1971 को घुटने के इलाज के लिए वेल्लौर जाते समय रास्ते में उनका निधन हो गया. बाद में उनकी विरासत को उनके बेटे कृष्णानंद झा ने आगे बढ़ाया और वे 1983 में चंद्रशेखर सिंह सरकार में मंत्री भी बने.


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