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सुषमा स्वराज: दो मुख्यमंत्रियों की लड़ाई की वजह से मुख्यमंत्री बनने वाली नेता

जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर अपने दफ्तर में बैठे थे. अधमुंधी आंखों के साथ सुन रहे थे. उनके बगल में समाजवादी नेता मधु लिमये थे. सामने एक 25 साल की लड़की थी. पंजाब यूनिवर्सिटी की जानी मानी डिबेटर. सुषमा शर्मा. लेकिन अब वो स्टूडेंट नहीं थी. एक्टिविस्ट थी. वकील थी. विधायक थी. और मंत्री भी. हरियाणा की चौधरी देवीलाल सरकार में. और सहपाठी रहे स्वराज कौशल के साथ विवाह के बाद उनका नाम भी कुछ बदल गया था. वैसे उनकी शादी से 17 दिन पहले देश भी बदल गया था. इमरजेंसी के चलते. सुषमा के पति स्वराज जेपी और जॉर्ज के करीबी थे. वकील नवयुगल ने बड़ौदा डायनामाइट केस भी लड़ा. इंदिरा की चेतना लौटी तो चुनाव हुए. जेपी के कहने पर जॉर्ज का बिहार के मुजफ्फरपुर से पर्चा भरा पत्नी लैला कबीर ने. उनके साथ थीं सुषमा.

मुख्यमंत्री देवीलाल ने कहा, सुषमा कैबिनेट के लिहाज से अयोग्य 
मोरार जी की सरकार आई तो कांग्रेस शासित राज्यों की विधानसभा भंग हुई. अब तक 14 फरवरी 1952 को जन्मी सुषमा 25 वर्ष की हो चुकी थीं. यानी विधायिका का चुनाव लड़ने के योग्य. उन्हें अंबाला कैंट से टिकट मिला. वह जीतीं. चौधरी देवी लाल सीएम बने. जनता पार्टी के सब धड़ों ने बाकी बचे 9 उपलब्ध मंत्री पदों पर दावा ठोंक दिया. ऐसे में जब सुषमा स्वराज का नाम ताऊ देवीलाल के सामने आया तो उन्होंने सिरे से खारिज कर दिया. मगर फिर जेपी की इच्छा और चंद्रशेखर का दबाव, देवीलाल को सुषमा को अपनी टीम में शामिल करना पड़ा. उन्हें श्रम और रोजगार मंत्री बनाया गया.

कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ लेती हुईं 25 साल की सुषमा स्वराज
कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ लेती हुईं 25 साल की सुषमा स्वराज

मगर तीन महीनों के अंदर ही देवीलाल ने सुषमा को निकालने की तैयारी कर ली. ये बात युवा नेता को पता चली तो वह मधु लिमये के साथ अध्यक्ष जी से मिलने पहुंच गईं. सब बात कही. आखिरी में ये भी जोड़ा कि बर्खास्तगी से पहले ही वह इस्तीफा देना चाहती हैं. सब सुनने के बाद चंद्रशेखर ने आश्वस्त किया. ऐसा कुछ भी नहीं होगा. पार्टी नेतृत्व से बात किए बिना देवीलाल इतना बड़ा फैसला नहीं लेंगे. मीटिंग ख़त्म हुई. सुषमा और लिमये बाहर निकले. थोड़ी देर बाद चंद्रशेखर को समाचार एजेंसियों से खबर मिली कि फरीदाबाद में एक जनसभा को संबोधित करते हुए देवीलाल ने सुषमा से कैबिनेट मंत्री का पद छीन लिया. देवीलाल ने सभा में कहा, सुषमा अयोग्य हैं. चंद्रशेखर ने देवीलाल को समझाया. कहा कि सुषमा को वापिस लो. देवीलाल ने मना कर दिया. चंदशेखर ने कहा कि अगर सुषमा स्वराज कैबिनेट मंत्री नहीं रहती हैं, तो देवीलाल भी मुख्यमंत्री नहीं रह सकते हैं.

चंद्रशेखर ने कहा कि पार्टी का अध्यक्ष होने के नाते ये उनका अधिकार है कि देवीलाल को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से बर्ख़ास्त कर दिया जाए. देवीलाल इस कदम के लिए तैयार नहीं थे. देवीलाल भागे-भागे पहुंचे दिल्ली. मुलाक़ात की अपने राजनीतिक गुरु और देश के गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह से. चरण सिंह ने चंद्रशेखर से मामला जाना. चंद्रशेखर ने बताया कि पार्टी से बात किए बगैर देवीलाल ने जनसभा में सुषमा स्वराज को बर्ख़ास्त कर दिया. ये बात सुनते ही चरण सिंह ने आपा खो दिया. चंद्रशेखर से कहा कि देवीलाल को तुरंत बर्ख़ास्त करो. और सारा मामला यहीं सेटल हो गया. सुषमा स्वराज की कैबिनेट में वापसी हो गयी. और देवीलाल को मिली चंद्रशेखर की हिदायत. कहा कि सुषमा का अपनी बेटी की तरह ख़याल रखिये.

1987 में देवीलाल के मुख्यमंत्री पद के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान हेमवती नंदन बहुगुणा के साथ सुषमा स्वराज
1987 में देवीलाल के मुख्यमंत्री पद के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान हेमवती नंदन बहुगुणा के साथ सुषमा स्वराज

लोकसभा में लगातार तीन हार
मगर सियासत महज ख्याल से नहीं चलती. देवीलाल की सरकार गई, भजन लाल आए जो इंदिरा के सत्ता में आने के बाद उनके भक्ति भजन गाते हुए सरकार समेत कांग्रेस में चले गए. सुषमा 1979 में जनता पार्टी की प्रदेश अध्यक्ष बन गईं. 1980 में विधायक से सांसद बनने की हसरत लिए करनाल लोकसभा भी लड़ गईं. उनकी अपनी अंबाला सीट सुरक्षित थी, इसलिए करनाल सीट पर गईं. करनाल और अंबाला के बीच आता है कुरुक्षेत्र. और इसी कुरुक्षेत्र के सांसद रघबीर सिंह सुषमा और जीत के बीच आ गए. जिन चौधरी चरण सिंह ने देवीलाल को फटकारा था, वह अब जनता पार्टी से दूर छिटक जनता पार्टी सेकुलर बना चुके थे. रघबीर उनके कैंडिडेट थे. 1980 के लोकसभा चुनाव में वह रहे तो तीसरे नंबर पर. मगर सुषमा की हार सुनिश्चित कर. सुषमा कांग्रेस के चिरंजीलाल शर्मा से लगभग 22 हजार वोटों से चुनाव हार गईं. और हां, रघबीर को 1 लाख 17 हजार वोट मिले थे.

कांग्रेस के चिरंजी लाल शर्मा ने करनाल सीट पर लगातार तीन बार सुषमा स्वराज को शिकस्त दी.
कांग्रेस के चिरंजी लाल शर्मा ने करनाल सीट पर लगातार तीन बार सुषमा स्वराज को शिकस्त दी.

यहा करनाल, सुषमा और चिरंजीलाल शर्मा का अजब सिलसिला भी शुरू हुआ. चिरंजीलाल ने सुषमा को लगातार तीन लोकसभा चुनाव में हराया. 1980, 1984 और 1989. 89 का चुनाव बेहद करीबी था. 1987 में राज्य की सत्ता बदल चुकी थी. बंसीलाल सरकार को बेदखल कर अभूतपूर्व बहुमत के साथ चौधरी देवीलाल के नेतृत्व वाली लोकदल और भाजपा गठबंधन की सरकार सत्ता में आ चुकी थी. सुषमा भी अंबाला कैंट से विधायक और फिर मंत्री बन चुकी थीं. मगर 1989 के लोकसभा चुनाव में भी मंत्री सुषमा चिरंजीलाल से पार नहीं पा सकीं. लगभग साढ़े आठ हजार वोटों से हार गईं.
फिर भी वह संसद पहुंची. अगले बरस यानी 1990 में. लेकिन राज्यसभा के रास्ते. तब तक बीजेपी नेतृत्व, खासतौर पर लालकृष्ण आडवाणी दूसरी पांत की नर्सरी तैयार करने में जुट गए थे. सुषमा की संस्कृत, वाकपटुता, व्यवहार बीजेपी को संगठन की दृष्टि से मुफीद लगा. और सुषमा को भी ओम प्रकाश चौटाला सरकार का मंत्री बने रहने के बजाय केंद्र में जाना. सुषमा दिल्ली तो आ गईं. मगर दिल्ली फिर भी दूर थी. अगर समय में दूरी मापें तो कुल छह बरस.

लोकसभा में एंट्री और मंत्री पद

भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता. और हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में साउथ दिल्ली की लोकसभा से निर्वाचित. उन्होंने कांग्रेस कैंडिडेट कपिल सिब्बल को 1 लाख वोटों के बड़े अंतर से हराया. सुषमा लंबे अर्से से लोकप्रिय सदन में आना चाहती थीं. पहले प्रयास के 16 बरस बाद सफल रहीं. चुनाव जीतने के कुछ ही दिनों के अंदर मंत्री पद की शपथ भी ले ली. सूचना प्रसारण मंत्री. ये जो हम आप लोकसभा की कार्यवाही का सीधा प्रसारण देखते हैं, ये सुषमा का बतौर मंत्री लिया गया शुरुआती फैसला था. और इसका असर भी कुछ दिनों में ही समय़ आ गया. अटल की 13 दिन की सरकार गिरने से पहले लोकसभा में ऐतिहासिक भाषण हुए. सुषमा स्वराज भी बोलीं और जमकर बोलीं.

यहीं से चालू शब्दावली में कहें तो वह स्टार प्रचारक की सूची में शामिल हो गईं. तत्सम शब्दावली, धारा प्रवाह शैली, तर्क, हास्य. और ये सब जिस महिला के मुख से निकल रहे थे, वह भारतीय नारी की छवियों को भी पुष्ट करती थीं. करीने से बंधी साड़ी, बिंदी, मांग में सिंदूर. 47 लोधी स्टेट अब भाजपाइयों के बीच एक लोकप्रिय पता हो चुका था. 1998 के लोकसभा चुनाव में सुषमा ने दिल्ली के बाहर भी प्रचार किया. साउथ दिल्ली की सीट पर वह बिना किसी मशक्कत के लगातार दूसरी बार जीत गईं. इस दफा उन्होंने अजय माकन को हराया. आ गई बारी अटल बिहारी का नारा इस बार मुकम्मल लग रहा था संख्या बल के लिहाज से. अटल के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार बनी. जो बार कुछ दिनों की मेहमान नहीं लग रही थी. इसके हिस्से 13 महीने आए. मगर सुषमा के साथ ऐसा नहीं हुआ. पार्टी महासचिव और दिल्ली राज्य के प्रभारी वैकेया नायडू के दो फोन कॉल उनका करियर बदलने वाले थे.

1996 में केंद्र की सरकार में आने के बाद भाजपा अपने दूसरी पांत के नेताओं को आगे करने लगी थी.
1996 में केंद्र की सरकार में आने के बाद भाजपा अपने दूसरी पांत के नेताओं को आगे करने लगी थी.

 ”सुषमा जी, आपको प्रधानमंत्री के दफ्तर आना है”
10 अक्टूबर 1998. राजधानी में उस दिन दिल्ली के मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के इस्तीफे की खबरें तैर रही थीं. सुबह के वक्त पंत मार्ग स्थित दिल्ली बीजेपी दफ्तर में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शशिकांत कुशाभाऊ ठाकरे लगातार बैठकें ले रहे थे. वह बाहर निकले तो साहिब समर्थकों को आश्वस्त किया. कुछ भी नहीं बदलेगा. मगर दिल्ली में बीजेपी की स्थिति लगातार बदल रही थी. दो महीने के अंदर चुनाव थे. प्याज लगातार महंगा था. खुराना गुट का लगातार दबाव था. इन सबके मद्देनजर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के आवास पर मीटिंग शुरू हुई. इसमें मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा को तलब किया गया. कमरे में प्रधानमंत्री के अलावा, गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी, पार्टी अध्यक्ष ठाकरे, राष्ट्रीय महासचिव वैंकेया नायडू और प्रमोद महाजन मौजूद थे. तीन घंटे तक चर्चा चली.

साहिब सिंह वर्मा और मदन लाल खुराना के गुटबाजी को चुनाव तक शांत करने के लिए सुषमा स्वराज को दिल्ली प्रदेश की राजनीति में लाया गया.
साहिब सिंह वर्मा और मदन लाल खुराना के गुटबाजी को चुनाव तक शांत करने के लिए सुषमा स्वराज को दिल्ली प्रदेश की राजनीति में लाया गया.

आखिरी में दो निष्कर्ष निकले-
1 साहिब सिंह वर्मा को जाना होगा. अटल उन्हें अपनी कैबिनेट में समायोजित कर लेंगे.
2 शीला दीक्षित का मुकाबला करने के लिए भाजपा को भी महिला चेहरा सामने रखना चाहिए और सूचना प्रसारण मंत्री, साउथ दिल्ली की सांसद सुषमा स्वराज हमारे सामने उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ विकल्प हैं.
इस दूसरे विकल्प के पीछे सियासत का तगड़ा खेल था. साहिब सिंह ने साफ कर दिया. मैं जाऊंगा, मगर मदनलाल खुराना नहीं आ सकते. उनके समर्थकों ने हम पर लगातार इल्जाम लगाए, विधायकों ने दबाव बनाया. उधर सुषमा की तरह ही वकील और पार्टी प्रवक्ता अरुण जेटली ने प्रमोद महाजन के सामने सुषमा का नाम पिच किया.

कई लोगों ने मतलब निकाला कि दूसरी पांत के दावेदारों ने संभावित चैलेंजर्स को ठिकाने लगाना शुरू कर दिया. दिल्ली हारी हुई बाजी लग रही थी. मगर लगने और होने में अभी कुछ फासला था. कुछ घटों के अंतराल पर पीएम के घर पर फिर मीटिंग शुरू हुई. सभी पुराने चेहरे. प्लस दो एडिशन. दोनों अटल सरकार के कैबिनेट मंत्री. दिल्ली सदर के सांसद मदन लाल खुराना और साउथ दिल्ली सांसद सुषमा. अटल-आडवाणी के जोर देने पर सुषमा इनकार नहीं कर पाईं.
मीटिंग खत्म हुई तो वैंकेया नायडू ने इंतजार कर रही प्रेस के सामने ऐलान कर दिया.
“हमने निर्णय लिया है कि हम सुषमा जी के नेतृत्व में दिल्ली का चुनाव लड़ेंगे. ये निर्णय सभी की सहमति से लिया गया है, जिसमें साहिब सिंह वर्मा भी शामिल हैं.”

12 अक्टूबर 1998. सुषमा स्वराज ने दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.
12 अक्टूबर 1998. सुषमा स्वराज ने दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.

12 अक्टूबर को एक अपेक्षाकृत सादे समारोह में दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर विजय कपूर ने सुषमा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई. पद संभालने के फौरन बाद सुषमा ने मुख्यमंत्री दफ्तर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की. इसमें उनके बगल में बैठे थे साहिब सिंह वर्मा. यहां हुए दो सवाल जवाब से आपको सुषमा की वाकपटुता का पता चल जाएगा.
पत्रकारों ने सवाल उछाला-  ‘वर्मा जी को तो मना लिया उनके समर्थकों को कैसे मनाएंगी?’

सुषमा का जवाब आया, ‘समर्थकों को वर्मा जी मनाएंगे.’

इशारा साफ था. केंद्रीय नेतृत्व के कहने पर कैबिनेट मंत्री का पद छोड़कर आई हूं. मेरे बाद जिसे दिल्ली पर दावेदारी रखनी हो, वह काम करता नजर आए. फिर पूछा गया कि क्या शीला दीक्षित की काट के तौर पर आपको पेश किया गया है. शीला जी ने इल्जाम लगाया है कि …
सुषमा ने सवाल बीच में ही रोक दिया और कहा, ‘शीला दीक्षित जी का जवाब, मांगेराम गर्ग दिया करेंगे.’
मांगेराम गर्ग उस समय दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष हुआ करते थे.

1998 में चुनाव प्रचार के दौरान साहिब सिंह वर्मा और अटल बिहारी वाजपेयी के साथ सुषमा स्वराज.
1998 में चुनाव प्रचार के दौरान साहिब सिंह वर्मा और अटल बिहारी वाजपेयी के साथ सुषमा स्वराज.

मैच का आखिरी ओवर
बतौर दिल्ली मुख्यमंत्री, सुषमा स्वराज के पास समय और रास्ते दोनों कम थे. आचार संहिता लगने में कुछ हफ्ते बाकी थे. सबसे पहले मुख्यमंत्री ने प्याज की समस्या को सुलझाने का बीड़ा उठाया. गोदामों पर छापे मारे. वैन से सप्लाई शुरू की. फिर उन्होंने लॉ एंड ऑर्डर के मुद्दे पर आलोचना झेलती सरकार की छवि सुधारने के लिए रात में पुलिस थानों और चौकियों का औचक निरीक्षण शुरू किया. मौके पर अधिकारी गायब मिलते तो उनके भी अधिकारियों को झिड़की मिलती. मगर सुषमा यहां इससे ज्यादा नहीं कर सकती थीं. दिल्ली पुलिस होम मिनिस्टर आडवाणी को रिपोर्ट करती थी. छापेमारियों के दौरान मीडिया भी साथ होती. सुषमा का तब एक बयान खासा मकबूल हुआ था.
“मैं जाग रही हूं. दिल्ली की जनता को डरने की ज़रूरत नहीं है. मैं न सोऊंगी, न ही किसी पुलिस अधिकारी को सोने दूंगी.”
सोने की गुंजाइश भी नहीं थी. चुनाव का ऐलान हो चुका था. बीजेपी का गुटबाजी के चलते बुरा हाल था. पंजाबी वोटर नाराज था क्योंकि खुराना नहीं आए. जाट वोटर नाराज थे क्योंकि साहिब सिंह गए. मगर सुषमा जुट गईं. उन्होंने खुद अपनी लोकसभा की हौजखास विधानसभा से पर्चा भरा. शीला दीक्षित ने उनके सामने अपनी दोस्त किरण वालिया को मैदान में उतारा.  चुनाव प्रचार के दौरान किसी ने सुषमा से पूछा कि कैसा लग रहा है?

सुषमा ने जवाब दिया-
 ”भईया, मुझे तो मैच का आख़िरी ओवर खेलने के लिए दिया गया है. और मुझे तो हर एक बॉल पर छक्का मारना है.”
फिर सुषमा अपनी छापामार शैली की याद दिलाने के लिए रैलियों में एक राजा का जिक्र करतीं. जो रात में भेष बदलकर घूमता. ताकि प्रजा की तकलीफों का पता चलता रहे. प्रजा ने नियत दिन फैसला सुना दिया. सुषमा अपनी सीट पर बमुश्किल ढाई हजार वोटों से जीतीं. और भाजपा, 49 से घटकर 15 पर आ गई. शीला के नेतृत्व में कांग्रेस ने 70 में 38 सीटें जीतीं. सुषमा ने नेतृत्व का आदेश माना था. अब नेतृत्व को अपना निर्णय सुनाने का वक्त था. उन्होंने हौजखास सीट से इस्तीफा दे दिया और लोकसभा की सीट बचाकर रखी. उपचुनाव हुए तो वालिया विधायक बन गईं. और सुषमा. उनकी कहानी में अभी कई ट्विस्ट आने थे.

2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद सुषमा स्वराज विदेश मंत्री बनीं.
2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद सुषमा स्वराज विदेश मंत्री बनीं.

राजनीति की सुषमा

अटल कैबिनेट विस्तार करते तो सुषमा लौटतीं, मगर उसके पहले ही अप्रैल 1999 में एक वोट से सरकार चली गई. फिर कारगिल युद्ध शुरू हो गया. उसके बाद हुए चुनाव. सुषमा ने लोकसभा चुनाव के लिए अनिच्छा जताई थी. कइयों ने कहा, दिल्ली में पार्टी की कमजोर हालत देखते हुए सुषमा रिस्क नहीं लेना चाहती थीं. मगर आलाकमान कुछ और ही सोच रहा था. और तभी आई वेंकैया नायडू की 17-18 अगस्त की दरमियानी रात में दूसरी कॉल. उन्होंने सुषमा को नेतृत्व का फैसला सुनाया. इस बार आप साउथ दिल्ली से नहीं लड़ेंगी. सामान पैक करिए. आपको सुबह 6.15 की फ्लाइट से बेंगलुरू पहुंचना है और बेल्लारी से सोनिया गांधी के खिलाफ पर्चा भरना है. और इस तरह सुषमा का राज्य की राजनीति के लिहाज से दिल्ली से नाता टूटा.

6 अगस्त 2018. सुषमा स्वराज का आखिरी ट्वीट.
6 अगस्त 2018. सुषमा स्वराज का आखिरी ट्वीट.

बाकी किस्से कई हैं उनकी सियासत के. बेल्लारी का कड़ा मुकाबला. फिर उत्तराखंड से राज्यसभा. फिर अटल कैबिनेट में वापसी. फिर 2004 में सर मुंडवाने की धमकी. फिर विदिशा की सांसद का नेता प्रतिपक्ष बनना. स्वास्थ और संघ से अपेक्षाकृत कमजोर संबंधों के चलते राष्ट्रीय अध्यक्ष पद गंवाना. 2013 में सबसे इतर मोदी के बजाय आडवाणी के साथ खड़े रहना. मोदी कैबिनेट का हिस्सा बनना. और स्वास्थ के चलते ही 2019 का चुनाव न लड़ना. और वो आखिरी ट्वीट. 370 पर. और आखिरी सुर्खी 6 अगस्त 2019 की.

‘राजनीति की सुषमा नहीं रहीं.’


साहिब सिंह वर्मा: दिल्ली का वो मुख्यमंत्री जिसे प्याज की बढ़ती कीमतों की वजह से कुर्सी छोड़नी पड़ी

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