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प्रकाश चंद सेठी: एमपी का वो सीएम जो डाकुओं पर बम गिराना चाहता था

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चुनावी मौसम में दी लल्लनटॉप आपके लिए लेकर आया है पॉलिटिकल किस्सों की ख़ास सीरीज़- मुख्यमंत्री. आज आपको मध्यप्रदेश के उस मुख्यमंत्री के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसे खुद इंदिरा गांधी ने उस कुर्सी पर बिठाया था. वो मुख्यमंत्री, जब उसे मुख्यमंत्री बनाया गया तो किसी विधायक ने उसके नाम पर ताली तक नहीं बजाई. जो डकैतों पर बम गिराना चाहता था और जो राजीव गांधी के जमाने में सियासत से किनारे लगा दिया गया था. उस शख्स का नाम था प्रकाश चंद सेठी.


अंक 1: विधायक जी, पीएम मैडम का तार आया है

श्यामाचरण शुक्ल ने राष्ट्रपति चुनाव में इंदिरा गांधी के प्रत्याशी को वोट नहीं दिया था और तब से ही वो इंदिरा को खटक रहे थे.

1971. मध्यावधि लोकसभा चुनाव हुए. इंदिरा 352 सीटों के साथ सत्ता में लौटीं. अब बारी थी राज्यों पर कंट्रोल की. पहला नाम आया मध्यप्रदेश का. श्यामाचरण शुक्ल मुख्यमंत्री. वही शुक्ल जिन्होंने 1969 में इंदिरा के खिलाफ जाकर ओल्डगार्ड्स का साथ दिया था. राष्ट्रपति चुनाव में. सो वो इंदिरा को भयानक खटक रहे थे. उनके राजनीतिक सलाहकार डीपी मिश्र भी उनको शुक्ल को हटाने की सलाह दे रहे थे. 1971 के चुनाव में एमपी में कांग्रेस की सीटें भी कम आई थीं. 37 में 21. सो मौका भी था. मगर इन हालातों के बावजूद शुक्ल गद्दी पर बने हुए थे. वजह थी उन्नाव कनेक्शन. वही उन्नाव कनेक्शन जिसने डीपी मिश्र की कांग्रेस में वापसी करवाई थी. उमाशंकर दीक्षित. शीला दीक्षित के ससुर. इंदिरा गांधी के सबसे खास लोगों में से एक. वो ही शुक्ल की विदाई टाले जा रहे थे. पर फिर शुक्ल एक गलती कर बैठे. उनके ताबूत पर आखिरी कील साबित हुआ एक एडमिशन.

उमाशंकर दीक्षित की वजह से ही श्यामाचरण की कुर्सी बची थी. जब श्यामाचरण ने उमाशंकर दीक्षित का काम नहीं किया, तो इंदिरा ने उनकी कुर्सी छीन ली.
उमाशंकर दीक्षित की वजह से ही श्यामाचरण की कुर्सी बची थी. जब श्यामाचरण ने उमाशंकर दीक्षित का काम नहीं किया, तो इंदिरा ने उनकी कुर्सी छीन ली.

पत्रकार मायाराम सुरजन के अनुसार, दीक्षित ने शुक्ल को मेडिकल कॉलेज में किसी विद्यार्थी के एडमिशन की सिफारिश की थी. शुक्ल ने उस लड़के को भोपाल बुला लिया था. पर वो उससे मिले नहीं. उलटा जो मिला उसने 10 हजार रुपयों की मांग कर दी. बेचारा लड़का अपने पिता के साथ वापस घर लौटा. उत्तर प्रदेश. किसी तरह 5 हजार रुपयों का इंतजाम किया और दीक्षित के पास पहुंचा. दीक्षित बहुत नाराज हुए. कि शुक्ल उनकी इतनी छोटी सी बात भी नहीं रख सके. बस फिर क्या. शुक्ल इंदिरा के पास अपना आखिरी चांस भी गंवा बैठे.

श्यामाचरण पर दबाव बढ़ा. उन्होंने दिल्ली फोन लगाया. पर उन्हें इंदिरा गांधी ने मिलने का समय नहीं मिला. वो इशारा समझ गए. 27 जनवरी 1972. जगह श्यामला हिल्स स्थित मुख्यमंत्री आवास. सुबह का वक्त. श्यामाचरण शुक्ला दाढ़ी बना रहे हैं. अचानक उन्होंने अपने निजी सचिव को बुलाया. बोले- पेन कागज ले आओ. डिक्टेंशन चालू –

‘मैं श्यामाचरण शुक्ल, मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश…इस्तीफा देता हूं…’

श्यामाचरण शुक्ल ने अपने पीए को बुलाया और फिर उनसे इस्तीफा टाइप करवा दिया.
श्यामाचरण शुक्ल ने अपने पीए को बुलाया और फिर उनसे इस्तीफा टाइप करवा दिया.

जब श्यामाचरण ये लिखवा रहे थे. तब उनके विधायक कहां थे. सदन नहीं चल रहा था. इसलिए मध्य प्रदेश के दूर दराज के इलाकों में, अपनी विधानसभाओं में इत्मिनान से दौरे कर रहे थे. तभी उन्हें अचानक एक सूचना मिली. किसी को पुलिस के वायरलेस पर, तो किसी को तार के जरिए. 24 घंटे के अंदर दिल्ली पहुंचिए. एजेंडा- विधायक दल की इमरजेंसी बैठक.

मगर विधायकों की बैठक तो भोपाल में होती है. होती है, जब सामान्य मसला हो. यहां तो मुख्यमंत्री का इस्तीफा हो चुका था. और इंदिरा घायल श्यामाचरण को कोई दांव चलने का मौका भी नहीं देना चाहती थीं. इसलिए उन्होंने सब विधायकों को आनन फानन दिल्ली तलब कर लिया.

डीपी मिश्रा इंदिरा के रणनीतिकार कहे जाते थे. लेकिन जब सीएम चुनने की बारी आई तो इंदिरा ने खुद नाम प्रस्तावित किया और वो नाम था प्रकाश चंद सेठी का.
डीपी मिश्रा इंदिरा के रणनीतिकार कहे जाते थे. लेकिन जब सीएम चुनने की बारी आई तो इंदिरा ने खुद नाम प्रस्तावित किया और वो नाम था प्रकाश चंद सेठी का.

28 जनवरी 1972. प्रधानमंत्री आवास. 1 सफदरजंग रोड. मीटिंग का टाइम था 10.30. पर विधायकों की देरी के कारण मीटिंग शुरू हुई 1.30 बजे. इस मीटिंग के पीछे कार्ययोजना थी पूर्व मुख्यमंत्री औऱ उस समय इंदिरा के सबसे बड़े राजनीतिक सलाहकार डीपी मिश्र की. उन्होंने विधायकों को समझा दिया. कि बैठक में नरसिंहपुर के विधायक नीतिराज सिंह का नाम लेना है. अगले मुख्यमंत्री के लिए. विधायकों को लगा कि शब्द डीपी के हैं, मगर आवाज इंदिरा की. सो उन्होंने हामी भर दी.

मगर ये क्या. विधायक दल मीटिंग में तो खुद इंदिरा की आवाज गूंजी. और जो नाम उन्होंने लिया वो नीतिराज का नहीं था. वो नाम था. प्रकाशचंद सेठी. ये सब इतना अचानक हुआ कि सेठी का नाम सुनकर किसी ने ताली तक नहीं बजाई. सब मसनदों पर कुड़मुड़ा कर रह गए. उनकी अपनी चिंताएं थीं. सेठी दिल्ली ब्रैंड नेता थे. और विधायकों की दौड़ इलाके से भोपाल तक थी.

इंदिरा का आदेश हुआ और प्रकाश चंद सेठी मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए.
इंदिरा का आदेश हुआ और प्रकाश चंद सेठी मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए.

सेठी. पांच साल में एमपी का पांचवा मुख्यमंत्री. ये कतार चुनाव बाद डीपी के फिर सीएम बनने से शुरू हुई. कुछ ही महीनों में बगावत हुई और गोविंद नारायण सीएम बन गए. संविद सरकार के. फिर बारी आई 13 दिन के सीएम नरेश चंद्र सिंह की. इसके बाद श्यामाचरण का नंबर आया और अब सेठी. पर सेठी क्यों. क्योंकि इंदिरा को येस प्राइम मिनिस्टर कहने वाला शख्स चाहिए था. और सेठी तो इससे कहीं आगे के पालतू थे. कहते थे. अगर इंदिराजी को मेरी चमड़ी के जूतों की दरकार होगी तो मैं वह भी सहर्ष दे दूंगा.

अंक 2: गुरु को ठिकाने लगाओ

सेठी जी सीएम हो गए हैं. मगर अभी उनकी कहानी के प्रस्थान बिंदु पर लौटने का वक्त है. उज्जैन कांग्रेस से करियर की शुरुआत. नगरपालिका अध्यक्षी से. फिर एक निधन हुआ और उनके भाग्य का जन्म हुआ.

उन दिनों उज्जैन के एक वरिष्ठ नेता हुआ करते थे त्रियंबक दामोदर पुस्तके. राज्यसभा सांसद. उपचुनाव की बात आई तो नाम आया विन्ध्यप्रदेश के ताकतवर नेता अवधेश प्रताप सिंह को चुनने का. मगर उन दिनों कांग्रेस किसी को बैक टु बैक दो बार से ज्यादा राज्यसभा नहीं भेजती थी. सो अवधेश का नाम कट गया. और लॉटरी लग गई प्रकाश चंद की. वह भी बैट टु बैक. दिल्ली पहुंचे और अगले ही साल नेहरू सरकार में उपमंत्री भी बन गए. कैसे. उन्हें डीपी मिश्रा की नजदीकी फल गई.

पीसी सेठी को डीपी की नज़दीकी काम आई और इसी के सहारे वो इंदिरा की नज़रों में आ गए.
पीसी सेठी को डीपी की नज़दीकी काम आई और इसी के सहारे वो इंदिरा की नज़रों में आ गए.

मगर शुरू से ऐसा नहीं था. सेठी स्थानीय राजनीति में डीपी विरोधी तखतमल-देशलेहरा ग्रुप के आदमी माने जाते थे. लेकिन जब देखा कि नेहरू भी अब बिटिया इंदु की वजह से डीपी की तरफदारी कर रहे हैं तो सेठी ने भी पाला बदल लिया. साल 1963 में डीपी कसडोल उपचुनाव जीत फिर विधायक बन गए. कामराज प्लान के तहत उस वक्त के एमपी सीएम मंडलोई का इस्तीफा हो गया. नेहरू ने डीपी के राज्याभिषेक की तैयारी कर ली. थाल थामने का जिम्मा दिया सेठी को. उन्हें भोपाल जाकर विधायक दल की बैठक में डीपी का चुनाव करवाने को कहा गया.

ये डीपी के लिए सबक पर अमल का मौका था. कि सुप्रीम नेता की इच्छा ही अपनी अभिलाषा होनी चाहिए. फिर चाहे शास्त्री आए हों या इंदिरा, सेठी पीएम के खास रहे. लेकिन सिर्फ पीएम के. उनके कथित राजनीतिक गुरुओं के नहीं. पीसी सेठी के सीएम बनने के कुछ ही महीनों बाद राज्य में विधानसभा चुनाव थे. डीपी मिश्रा ने उन्हें टिकट वितरण में निर्देश देने शुरू कर दिए. सेठी ने कुछ माने, कुछ नहीं. मिश्रा पुरानी ट्रिक पर उतर आए. भोपाल में अपने खास मंत्रियों और विधायकों से चुनाव से पहले सीएम पर छींटाकशी कराने लगे. सेठी ने जहाज पकड़ा और दिल्ली पहुंच गए.

जब दिल्ली में संजय गांधी का राज शुरू हुआ, तो उन्होंने डीपी को किनारे लगा दिया.

यहां देखा तो रंगत बदली मिली. अब प्रधानमंत्री के दफ्तर में बेटे संजय का दखल शुरू हो चुका था. डीपी मिश्रा किनारे लगाए जाने लगे थे. वहां सेठी कैंडिडेट्स की फाइल लेकर पहुंचे थे. इंदिरा ने उस पर दस्तखत कर दिए. साथ ही सेठी को एक और फाइल की याद दिला दी. गुलाबी चना कांड फाइल. इसी घोटाले का जिक्र कर 1967 में गोविंद नारायण सिंह ने डीपी मिश्रा की सरकार तोड़ी थी. और अब इसी फाइल को सेठी ने फिर खोल दिया. ये डीपी को इशारा था. हद में रहो, वर्ना हवालात में रहोगे. चुनाव हुए. कांग्रेस ने 296 में 220 सीटें जीतीं. अब सेठी निश्चिंत थे. नहीं थे. एक कांटा अभी बाकी थी.

अंक 3: घायल दुश्मन होता अति घातक

पीसी सेठी ने डीपी मिश्रा को किनारे लगा दिया था, लेकिन श्यामाचरण अब भी उनके लिए खतरा थे.
पीसी सेठी ने डीपी मिश्रा को किनारे लगा दिया था, लेकिन श्यामाचरण अब भी उनके लिए खतरा थे.

डीपी ठिकाने लग गए थे. मगर एक पूर्व मुख्यमंत्री अभी सजग और सक्रिय था. श्यामाचरण. उसके छोटे भाई विद्याचरण इंदिरा सरकार में रक्षा उत्पादन राज्य मंत्री थे. वो हर महीने फौज के हेलिकॉप्टर पर सवार हो रायपुर आ जाते. फिर कुछ ही महीनों में रायपुर में सेठी सरकार से असंतुष्ट कांग्रेसियों का जमावड़ा लगने लगा. सेठी को खबर लगी. उन्होंने आगे कर दी. फिर खबर आई कि विद्या का विभाग बदल गया. हवाई उड़ान थम गई. मगर कुछ देर को ही. इसलिए उस पर कुछ देर से आएंगे. फिलहाल तो ये दो प्रसंग सुनें. पहला, सेठी की श्यामाचरण को लेकर सोच का. विद्या का विभाग बदलने के कुछ हफ्तों बाद रायपुर में एक रैली हुई. वहां मुख्यमंत्री सेठी बोले,

‘लोग श्यामाचरण को खूबसूरत और सुंदर बताते हैं. मैं भी क्या कम हूं. क्या मैं दिलीप कुमार की तरह नहीं दिखता.’

भीड़ हंसने लगी. दूसरा, जब हंसी हंसी में ही सेठी से पत्रकार मायाराम सुरजन ने पूछ लिया. क्या आपने विद्याचरण का विभाग बदलवा दिया.

सेठी का जवाब था.

‘मैडम तो उन्हें हटा ही रही थीं. लेकिन मैंने सोचा, मंत्रिपरिषद से हट जाने पर उन पर रहा-सहा अंकुश भी नहीं रहेगा. दोनों भाई ( विद्या और श्यामा) और उत्पात करेंगे. इसलिए सिर्फ विभाग बदलने की गुजारिश की.’

पीसी सेठी ने श्यामाचरण शुक्ला और विद्याचरण शुक्ला दोनो के विभाग बदलवा दिए थे.
पीसी सेठी ने श्यामाचरण शुक्ला और विद्याचरण शुक्ला दोनो के विभाग बदलवा दिए थे.

सेठी सही भी थे और गलत भी. विद्या कुछ बरस कमजोर रहे. श्यामा कुछ बरस चुप. फिर आई इमरजेंसी. और प्रेस, सिनेमा का गला घोंट संजय गांधी के गले का हार बन गए सूचना प्रसाद मंत्री विद्याचरण शुक्ल. और कुछ ही महीनों में उन्होंने संजय को ऐसा शीशे में उतारा कि दिसंबर 1975 को सेठी को दिल्ली का बुलावा आ गया. एक निर्देश देने के लिए. कि अब आप एमपी छोड़ दें. श्यामाचरणजी देखेंगे.

अंक 4: आज नाश्ते में क्या है वर्मा?

जब देश में इमरजेंसी लगी, उस वक्त सारे कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों का एक ही मकसद था कि किसी तरह से संजय गांधी खुश रहें.

इमरजेंसी में कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों के दो ही काम. नसबंदी के टारगेट पूरे करना, ताकि संजय खुश रहें. और विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार करना, ताकि संजय खुश रहें. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री टॉप बॉस को खुश करने की कला में 13 बरस से निष्णात थे. रोजाना सुबह वह अपने मुख्यसचिव सुशीलचंद्र वर्मा को बुलाते. और सबसे पहला सवाल होता –

‘नाश्ते में क्या परोसा जा रहा है?’

इसका मतलब होता, पिछले 24 घंटे में हुई नसबंदियों और गिरफ्तारियों का ब्यौरा दो.

अंक 5: मेरे प्रदेश में बम गिरा दो

सीएम पीसी सेठी ने गृह मंत्रालय से मध्यप्रदेश में डाकुओं पर बम गिराने को कहा था. बाद में कई डाकुओं ने समर्पण कर दिया था.
सीएम पीसी सेठी ने गृह मंत्रालय से मध्यप्रदेश में डाकुओं पर बम गिराने को कहा था. बाद में कई डाकुओं ने समर्पण कर दिया था.

उन दिनों मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड वाले इलाके में डाकुओं का खूब आतंक था. जेपी के प्रयासों से समर्पण में अभी वक्त था. सेठी भी डकैतों की समस्या का समाधान चाहते थे. मगर गांधीवादी ढंग से नहीं. वह दिल्ली पहुंचे. गृह विभाग के आला अधिकारियों संग बैठे. और एक लाइन का प्रस्ताव रखा.

‘डकैतों के छिपने के इलाकों में, यानी बीहड़ में भारतीय वायु सेना बम गिरा दे. टंटा ही खत्म.’

नागरिक इलाकों में वायुसेना द्वारा बमवर्षा का प्रस्ताव सुन अधिकारी सन्नाटे में आ गए. मगर सेठी नहीं माने. नॉर्थ ब्लॉक से पहुंचे साउथ ब्लॉक. रक्षा मंत्री जगजीवन राम के दफ्तर. बाबू जी के कान में कुछ फुसफुसाया और परमिशन ले आए.

उस वक्त के रक्षा मंत्री जगजीवन राम ने डकैतों पर हमले के लिए एयर फोर्स को इज़ाज़त दे दी थी.
उस वक्त के रक्षा मंत्री जगजीवन राम ने डकैतों पर हमले के लिए एयर फोर्स को इज़ाज़त दे दी थी.

अगले दिन से एयरफोर्स मुख्यालय में ऑपरेशन की तैयारी शुरू हो गई. सेठी भी भोपाल लौट आए. मगर प्लान से कुछ रोज पहले, अखबार में ये खबर लीक हो गई. डकैतों तक भी सूचना पहुंची. उनमें से आधे तो घबराकर सरेंडर के लिए चल रही बातचीत को अतिरिक्त उत्सुक हो गए. बाकी आधों ने डकैती को मुल्तवी कर भागने में भलाई समझी.

सरकारी रेकॉर्ड में बस इतना दर्ज है कि उस साल गांधीवादी प्रयासों से चंबल में 450 बंदूकधारी मुख्यधारा में लौटे. ये कहीं नहीं लिखा कि प्रेस को बम की खबर सेठी के दफ्तर से ही लीक की गई थी. अब सियासत में सब कुछ लिखकर तो नहीं होता न.

अंक 6: मैडम के लिए रजिस्टर जुटा लूं जरा

जब कांग्रेस दो धड़ों में बंटी तो पीसी सेठी ने इंदिरा का साथ छोड़ दिया.
जब कांग्रेस दो धड़ों में बंटी तो पीसी सेठी ने इंदिरा का साथ छोड़ दिया. चार महीने बाद फिर से इंदिरा के साथ हो लिए.

1977 में कांग्रेस को परास्त कर जनता पार्टी सत्ता में आई. सेठी तब कांग्रेस के कोषाध्यक्ष थे. कुछ ही महीनों बाद कांग्रेस में टूट हुई. ब्रह्मानंद रेड्डी-स्वर्ण सिंह धड़े ने इंदिरा को ही पार्टी से बाहर कर दिया. बन गईं फिर दो पार्टियां. पहला दल कांग्रेस एस और इंदिरा वाली कांग्रेस आई. सबको लगा कि सेठी मैडम के साथ जाएंगे. मगर नहीं, वह तो रेड्डी के आगे पीछे यस सर करते पाए गए.

लेकिन असलियत कुछ और थी. सेठी जानते थे कि जनता पार्टी किसी भी तरह इंदिरा को घेरने को तत्पर है. गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह सिर्फ शाह कमीशन के भरोसे नहीं रहने वाले. कांग्रेस को मिलने वाले चंदे का हिसाब भी लिया जा सकता है. और हिसाब किसके पास था. सेठी के पास. सेठी ने सब उद्योगपतियों के हिसाब दुरुस्त कर कोड में बदले. सब कागज जुटाए. उनकी नकलें हटाईं. और जब ये सब हो गया. तो चार महीने बाद कांग्रेस आई में चले गए. जब तक आई में नहीं आए थे, लुटियंस दिल्ली में खबरें आती थीं. संजय गांधी ने कांग्रेस का बेहिसाब पैसा खर्चा. सेठी से लिया, मगर हिसाब नहीं दिया. इसलिए वह मैडम के साथ नहीं गए.

जब ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ, पीसी सेठी देश के गृह मंत्री थे. लेकिन उन्हें भी अंतिम वक्त में पता चला कि ऑपरेशन होने वाला है.
जब ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ, पीसी सेठी देश के गृह मंत्री थे. लेकिन उन्हें भी अंतिम वक्त में पता चला कि ऑपरेशन होने वाला है.

खैर, साथ जाने का इनाम मिला. इंदिरा 1980 में सत्ता में लौटीं तो सेठी को काबीना मंत्री बनाया. जब 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ तब सेठी ही देश के गृह मंत्री थे. वो बात और है कि ऑपरेशन इतना गोपनीय था कि मंत्री जी को भी आखिरी घंटे में ही पता चला.

अंक 9: इंटरव्यू वाला गुस्सा

इंदिरा के बेटे राजीव ने सेठी को कैबिनेट में नहीं लिया. वजह, अर्जुन सिंह. मध्य प्रदेश के सीएम और राजीव के खास. खुद सेठी के मुताबिक, अर्जुन ने पीएम से झूठ बोला कि मेरी सेहत ठीक नहीं. अब मुझे आराम की जरूरत है.

जब राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने, उन्होंने अपनी कैबिनेट में पीसी सेठी को जगह नहीं दी.
जब राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने, उन्होंने अपनी कैबिनेट में पीसी सेठी को जगह नहीं दी.

सेठी की अजीब स्थिति हो गई. राजीव मंत्रिमंडल में बदलाव की हर अफवाह के साथ उनकी उम्मीद हरी हो जाती. और फेरबदल के बाद फिर सूखा. फिर सब्र का पैमाना छलका. 15 अगस्त के एक कार्यक्रम में उन्हें वीआईपी लेन में सीट नहीं मिली. वो वहीं भड़क गए. राजीव सरकार के गृह मंत्री बूटा सिंह ने उन्हें अपनी सीट पर बैठाया, तब सेठी शांत हुए. मगर कुछ देर के लिए ही. शाम को राष्ट्रपति के एटहोम उन्होंने राजीव को भी खरी सुना दी. पर शायद पूरी नहीं सुना पाए.

1989 आते-आते राजीव गांधी ने कांग्रेस से बाहर गए प्रणब मुखर्जी और पीसी सेठी जैसे लोगों को वापस बुला लिया.
1989 आते-आते राजीव गांधी ने कांग्रेस से बाहर गए प्रणब मुखर्जी और पीसी सेठी जैसे लोगों को वापस बुला लिया.

इसलिए कुछ महीनों बाद मुंबई से छपने वाली चर्चित मैगजीन इलस्ट्रेटेड वीकली में एक लंबा इंटरव्यू दिया. राजीव और अर्जुन को जमकर कोसा. नतीजा. सेठी सस्पेंडेड. लेकिन 1989 आते आते राजीव ने ओल्ड गार्ड की कमी महसूसनी शुरू कर दी. प्रणव मुखर्जी और सेठी जैसे लोग पार्टी में वापस लाए गए. सेठी को 1989 की लोकसभा में इंदौर से टिकट भी मिला. मगर आज के वक्त की स्पीकर सुमित्रा महाजन के हाथों वह बुरी तरह खेत रहे. इसके बाद जीवन इत्यादि में बीता. 1996 में देहांत हो गया. मुख्यमंत्री के अगले ऐपिसोड में कहानी उस नेता की, जिसे राजनीति का संत कहा जाता है.


वीडियो- मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल, जिन्हें न इंदिरा ने पसंद किया, न संजय ने

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