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कृष्ण बल्लभ सहायः बिहार के वो मुख्यमंत्री जिनका पोता भी उनके खिलाफ नारे लगाता था

ये एक नेता की कहानी है, जिसे जमींदार अपना जानी दुश्मन समझते थे. नेता, जिसके लिए कांग्रेस में पैरवी के इल्जाम जेपी पर लगे. जो जेपी के मित्र नेहरू के एक प्लान के तहत शिखर पर पहुंचा. मगर कुछ ही बरसों में मामला पलट गया. गोली चली जिसने लाशों के साथ साथ उस नेता और कांग्रेस को भी गिरा दिया. गिरने उठने का ये खेल इस बार पटना नहीं, दिल्ली से बांचना शुरू करते हैं. जिसका सबसे ताकतवर बाशिंदा शहर से हजारों मील दूर था.

मुख्यमंत्री क्लब का खेल

11 जनवरी 1966 की रात तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का रूस के ताशकंद में निधन हो गया. एक बार फिर गुलजारी लाल नंदा को कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया गया. नया प्रधानमंत्री चुनने के लिए कांग्रेस संसदीय दल के नेता का चुनाव लाजिमी हो गया क्योंकि यही नेता अगला प्रधानमंत्री बनता. इसके लिए कांग्रेस के कोषाध्यक्ष अतुल्य घोष ने तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष के कामराज को ही प्रधानमंत्री बनाने की कवायद शुरू कर दी. तब बहुत से लोगों (जिनमें मध्यप्रदेश के उस वक्त के मुख्यमंत्री डी पी मिश्रा भी शामिल थे) का ऐसा मानना था कि अतुल्य घोष इसलिए कामराज को प्रधानमंत्री बनवाना चाह रहे हैं ताकि वे खुद कांग्रेस अध्यक्ष बन सकें. दूसरी तरफ मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बनने के लिए अलग ताल ठोक रहे थे. शास्त्री के वक्त उन्हें शुरुआती लामबंदी के बाद चुप होना पड़ा था, मगर इस बार वो मौका नहीं गंवाना चाहते थे. उधर वाई बी चव्हाण भी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पाले बैठे थे लेकिन उनके पक्ष में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री वसंतराव नाइक के सिवा कोई दूसरा बड़ा नेता नहीं खड़ा था.

कांग्रेस अध्यक्ष कामराज उहापोह में थे. उनकी दो परेशानियां थीं – पहली, हिन्दी और अंग्रेजी – दोनों भाषाओं में उनका हाथ तंग था. दूसरी, जो जमीनी हकीकत के ज्यादा करीब थी कि राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी मद्रास राज्य (आज का तमिलनाडु) के ही रहने वाले थे तो ऐसे में क्या उत्तर और पश्चिमी भारत के कांग्रेसी यह पचा पाएंगे कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री – दोनों पदों पर मद्रासी ही बैठे. इन्हीं दुविधाओं के बीच मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डी पी मिश्र की पहल पर 9 कांग्रेसी मुख्यमंत्री इकठ्ठा हुए और तत्कालीन सूचना-प्रसारण मंत्री इन्दिरा गांधी को अगला प्रधानमंत्री बनाने की इच्छा व्यक्त की. सबने यह तय किया कि सबसे पहले अतुल्य घोष को ‘मुख्यमंत्री क्लब’ के निर्णय की सूचना दी जाए लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री केबी सहाय ने एक कैविएट लगा दिया. उन्होंने कहा कि अभी इस खबर को आधिकारिक न किया जाए. लेकिन इसकी बिना पर माहौल बनने दिया जाए. ताकि जो सांसद अभी तक पाला तय नहीं किए हैं, वह भी इस तरफ आएं. इससे संगठन के कद्दावरों पर भी दबाव बनेगा. सहाय को अपने हालिया राजनीतिक गुरु लालबहादुर शास्त्री का सबक याद था. कभी सीधी दावेदारी मत करो. इसी जतन के सहारे शास्त्री ने मोरार जी को ध्वस्त किया था. बिहार के मुख्यमंत्री बोले, सभी गुटों से चर्चा करें, सर्वसम्मति की कोशिश करें, तभी प्लान आगे बढ़ाएं.

1963 K. B. Sahay (2)
1963 में एक सभा को संबोधित करते हुए केबी सहाय.

ये प्लान काम कर गया. कुछ ही दिनों में इंदिरा को सपोर्ट देने वाले इस मुख्यमंत्री क्लब के मेंबर 14 हो गए. कामराज भी समझ गए कि हवा किस पक्ष में है, मोरार जी नहीं समझे. चुनाव हुए और उनकी हार हुई. इंदिरा प्रधानमंत्री बनीं. उन्होंने सीएम क्लब का सपोर्ट याद रखा और इसलिए केबी सहाय को हटाने के लिए पड़े सब दबाव किनारे रखे.

मगर सहाय को हटाना कौन चाहता था और क्यों. और फिर ऐसा क्या हुआ कि जनता ने उन्हें खुद ही हटा दिया. वो भी दो दो जगह से. और जिसने हटाया, उसी के सिर बड़ा ताज भी धरा गया.

बिहार के चुनावी सीजन में हम आपको रूबरू बिहार के मुख्यमंत्री पद पर रह चुके नेताओं के रोचक किस्सों से रूबरू करा रहे हैं और इन पलिटिकल किस्सों की खास सीरीज मुख्यमंत्री में आज बारी है कृष्ण बल्लभ सहाय उर्फ केबी सहाय की.

1964 Jai Prakash Narayan & K. B. Sahay (1)
एक समारोह में सुशीलाजी और जय प्रकाश नारायण के साथ केबी सहाय.

जमींदारों का जानी दुश्मन कौन?

केबी सहाय का जन्म पटना में हुआ. फतुहा इलाके में. वो यहां लौटे भी. दशकों बाद पॉलिटिक्स के चलते. मगर फिलहाल तो बात शुरुआत की. उनका परिवार हजारीबाग में बस गया. पिता अंग्रेजी राज में पुलिस दरोगा. और बेटा अंग्रेजी राज के खिलाफ कांग्रेस का सिपाही. असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो समेत सभी बड़े आंदोलनों में हिस्सा लिया. जेल गए. और यहीं मिले उन्हें किसान सभा वाले कद्दावर कांग्रेसी नेता श्रीकृष्ण सिंह.

1937 में जब श्रीकृष्ण सिंह ने बिहार में पहली कांग्रेस सरकार बनाई तो लेजिस्लेटिव काउंसिल के मेंबर केबी सहाय उनके सचिव बने. आजादी के वक्त की अंतरिम प्रांतीय सभा में भी ये साथ रहा. इस दफा श्री बाबू ने केबी को रेवेन्यू महकमा दिया. राजस्व के बहाने केबी सहाय ने जमींदारी प्रथा के उन्मूलन की तैयारी की. ये तैयारी आजादी के आंदोलन के वक्त ही शुरू हो गई थी. उन दिनों डॉ. राजेंद्र प्रसाद और जेबी कृपलानी जैसे नेता भी इस काम पर बहुत जोर दे रहे थे. केबी सहाय के ड्राफ्ट पर श्रीकृष्ण सिंह कैबिनेट ने मंजूरी दी और देश से भी पहले बिहार में ये प्रथा खत्म कर दी गई. वो बात और है कि बाद में ये एक्ट पटना हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में ध्वस्त हो गया. और दूसरे कानूनों के लिए रास्ता बना. इन सबके फेर में एक बात तय हो गई. जमींदारों की केबी सहाय से रार. सहाय के होम डिस्ट्रिक्ट हजारीबाग की एक रिसायत रामगढ़ के राजा कामाख्या नारायण सिंह और दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह इस जुट्ट को लीड कर रहे थे.

1964 4 May Nehru At Bhaisalotanotan (1)
जवाहर लाल नेहरू के साथ केबी सहाय. ये तस्वीर मई 1964 की है.

इसी गोलबंदी के चलते 1952 में गिरडीह से आसानी से चुनाव जीते केबी सहाय 1957 में हार गए. उन्हें कामाख्या नारायण ने पटखनी दी. उधर पटना में सहाय के नेता अनुग्रह नारायण को श्रीबाबू विधायक दल के नेता के चुनाव में पटखनी दे चुके थे. ऐसे हालात में केबी सहाय संगठन की राजनीतिक तक सीमित रहे. मगर 5 साल बाद उन्होंने फिर ताल ठोंकी. इस बार कर्मभूमि के बजाय जन्मभूमि से. पटना की एक सीट से जीतकर केबी सहाय विधानसभा में पहुंचे. ये बदली विधानसभा थी. श्रीकृष्ण बाबू का निधन हो चुका था और विनोदानंद झा अपनी पकड़ मजबूत कर रहे थे. इसी दौर में मछली कांड भी हुआ था, जो हमने आपको विनोदानंद झा वाले प्रसंग में सुनाया था. एक प्रसंग और हुआ था. जेपी की श्रीबाबू को चिट्ठी और फिर श्रीकृष्ण सिंह का पलटवार, क्या आप अपने सजातीय केबी सहाय को मेरा उत्तराधिकारी घोषित करवाना चाहते हैं.

उस तंज़ के तथ्य में बदलने का समय आ गया था.

वीर गति

1963 में कामराज प्लान के तहत बिहार के मुख्यमंत्री विनोदानंद झा का इस्तीफा हो गया. इस संभावना की अटकलें असल घटना से कुछ हफ्ते पहले ही शुरू हो चुकी थीं. और शुरू हो चुकी थी जोड़ तोड़. किसी नाम पर सर्वसम्मति नहीं थी. विनोदानंद इस्तीफे के बाद भी कमान अपने हाथ रखना चाहते थे. उन्होंने इस वास्ते मुख्यमंत्री पद के लिए वीरचंद पटेल का नाम आगे बढ़ाया. वीरचंद पटेल पिछड़े वर्ग के कुर्मी समाज से आते थे. विनोदानंद को लगा कि वीरचंद के नाम पर सभी पिछडे़ वर्ग के लोग एकजुट हो जाएंगे. और फिर उनके साथ की ब्राह्मण लॉबी तो है ही. लेकिन लगने और होने का फर्क यहां भी था. विनोदानंद सरकार में डेप्युटी और राजपूत गुट के नेता सतेंद्र नारायण सिंह वीरचंद पटेल के नाम पर सहमत नहीं थे. उधर विनोदानंद से मुख्यमंत्री की रेस दो बरस पहले हारे भूमिहार लॉबी के महेश प्रसाद सिन्हा को भी बदले का मौका दिख रहा था. ये दोनों केबी सहाय के पक्ष में खड़े हो गए. सहाय ने अपने जिगरी यार रामलखन यादव के सहारे पिछड़ा वर्ग के विधायकों में भी माहौल बनवाना शुरू कर दिया. नतीजनत, वीरचंद पटेल की किस्मत का फैसला औपचारिक वोटिंग से पहले ही हो गया. झा और उनका मोहरा मात खा गए और 2 अक्टूबर 1963 को केबी सहाय मुख्यमंत्री बन गए. श्रीकृष्ण सिंह के नाम से जो लिस्ट शुरू होती थी, बिहार के मुख्यमंत्री की, उसमें ये चौथी एंट्री थी. सहाय पिछड़ा गोलबंदी रोकने में सफल रहे. हालांकि कुछ ही वक्त में उन्हें अपनी कुर्सी बचाने के लिए विनोदानंद की तरकीब ही अपनानी पड़ी.

एक बात पर और गौर करिए. कांग्रेस के उत्तर भारत में सत्यानाश की भूमिका भी यहीं से शुरू हुई. कांग्रेस ने पिछड़े वर्ग के नेताओं को सत्ता के शीर्ष पर खुलकर दावेदारी नहीं दी. जबकि लोहिया के नेतृत्व में सोशलिस्ट खेमा लगातार पिछड़ों के हक की बात कर रहा था. इसी टैक्टिकल भूल ने 90 के दशक से यूपी बिहार से कांग्रेस को हमेशा के लिए हाशिए पर पटक दिया.

1965 Indira Gandhi & K. B. Sahay (2) (1)
1965 में इंदिरा गांधी के साथ केबी सहाय.

लेकिन अभी तो कहानी हाशिए से केंद्र पर केबी सहाय की चल रही है. सहाय सीएम बन गए. लेकिन कुछ ही महीनों में उनके लिए चुनौतियां शुरू हो गईं. सतेंद्र नारायण और महेश प्रसाद सिन्हा खफा रहने लगे. यानी सवर्णों के दो मजबूत ब्लॉक खफा रहने लगे और तब केबी ने काउंटर किया पिछड़ों को कैबिनेट में जगह देकर. रामलखन सिंह यादव तो उनके प्रियपात्र थे ही, उनके अलावा देवशरण सिंह (यादव बिरादरी से आने वाले), सुमित्रा देवी (कुशवाहा बिरादरी से आनेवाली), अब्दुल कयुम अंसारी एवं कभी मुस्लिम लीग का हिस्सा रहे जफर इमाम जैसे लोगों को भी सहाय ने मंत्रिमंडल में ले लिया.

सुमित्रा देवी का नाम याद रखिए. कुशवाहा बिरादरी से आने वाली नेता. इन्हीं के बेटे मंजुल कुमार से बाबू जगजीवन राम की बेटी मीरा कुमार की शादी हुई थी. मीरा कुमार, जो लोकसभा की अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री रहीं. मीरा कुमार जिन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा, कांग्रेस की तरफ से बनाने की वकालत एक धड़ा कर रहा था.

जब पोते ने दादा की हार के नारे लगाए

बतौर मुख्यमंत्री केबी सहाय का कार्यकाल लगभग साढ़े तीन साल का रहा. इस दौरान दिल्ली ने भी तीन प्रधानमंत्री देख लिए. नेहरू और शास्त्री से होते हुए कमान अब इंदिरा के हाथ थी. सरकार और कामराज-निजलिंगप्पा के हाथों चल रहे संगठन तक लगातार सहाय की शिकायत जाती. उनके मंत्रियों मसलन, रामलखन सिंह यादव, महेश प्रसाद सिन्हा, राघवेन्द्र नारायण सिंह, सतेन्द्र नारायण सिंह और खुद के बी सहाय पर भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी को बढ़ावा देने का आरोप लगता. मगर चीजें बदली नहीं. तब. चीजें बदलीं. चुनाव के ठीक पहले, जब गोली चली. पटना में.

फीस और दूसरी मांगों को लेकर पटना यूनिवर्सिटी कैंपस में छात्रों का प्रदर्शन चल रहा था. ये हिंसक हुआ तो गोली चली. 5 जनवरी 1967 के रोज. इस गोलीकांड में कई छात्र मारे गए. और फिर पूरे बिहार में छात्र सरकार के खिलाफ उठ खड़े हुए. इसमें विपक्ष का भी भरपूर सहगोय रहा. छात्रों ने हजारीबाग में के बी सहाय के पैतृक घर पर और नवादा में खुद के बी सहाय पर हमला कर दिया. सहाय घिरते जा रहे थे. उन दिनों को याद करते हुए रामलखन सिंह यादव ने लिखा था,

“छात्रों से हिंसक झड़प के बाद एक दिन कांग्रेस अध्यक्ष के कामराज पटना पहुंचे. उन्होंने के बी सहाय से छात्र हिंसा की न्यायिक जांच करवाने को कहा. इस पर सहाय ने अपना इस्तीफा उनके सामने रख दिया और कहा कि ‘ये सब विपक्ष की साजिश है. विपक्ष के लोगों ने ही छात्रों को भड़काया है इसलिए मैं इसकी न्यायिक जाँच की अनुमति देकर प्रशासन को demoralise नहीं करूंगा.”

कामराज ने इस्तीफा डस्टबिन में डाल दिया. और कुछ ही महीनों बाद हुए चुनाव में जनता ने कांग्रेस को भी लगभग वहीं पहुंचा दिया. फौरी तौर पर. ये सहाय के लिए डबल हार थी. मुख्यमंत्री की कुर्सी तो गई ही, विधायकी भी गई. वो भी दो दो जगह से. फरवरी 1967 में हुए विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान तब बिहार में नारा लगता था.

“गली-गली में शोर है।
के बी सहाय चोर है।।”

नारा सिर्फ गलियों में नहीं सहाय के घर में भी लग रहा था. बिहार- Ruled & Misruled किताब में पत्रकार संतोष सिंह लिखते हैं कि ‘हद तो तब हो गई जब के बी सहाय के छज्जूबाग आवास पर एक दिन उनका पोता (जो तब बाल्यावस्था में था) भी उनके खिलाफ सड़क पर लगाया जाने वाले नारों को दोहराने लगा.’

1964 K . Sahay & Radhakrishna Jcc Jamshedpur (1)
राधाकृष्णन के साथ केबी सहाय.

मुख्यमंत्री के बी सहाय पटना पश्चिम और हजारीबाग, दो सीटों से लड़े. 10 बरस पहले सहाय को हराने वाला राजा रामगढ़ कामाख्या नारायण सिंह (जिनसे के बी सहाय की अदावत तबसे ही चल रही थी जब वे श्रीकृष्ण सिंह के मंत्रिमंडल में बतौर भूमि सुधार मंत्री जमींदारी उन्मूलन का बिल लेकर आए थे) की पार्टी जनक्रांति दल फिर मैदान में थी. पटना से दल ने टिकट दिया छात्रों के बीच अपार लोकप्रिय महामाया प्रसाद सिन्हा को. और हजारीबाग से जनक्रांति दल के उम्मीदवार थे आरके सिन्हा. दोनों ने मुख्यमंत्री को हरा दिया. मुख्यमंत्री को हराकर मुख्यमंत्री बने, इस तरह की हेडिंग अरविंद केजरीवाल की चुनावी जीत पर लगी थी. 2013 में. जब उन्होंने नई दिल्ली सीट से सिटिंग सीएम शीला दीक्षित को हराया था. लेकिन ये हेडिंग पहली दफा पटना में बनी. महामाया प्रसाद सिन्हा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री बने. और कांग्रेस विपक्ष में बैठी, क्योंकि उसे मिली थीं 318 सदस्यों वाली बिहार विधानसभा में सिर्फ 128 सीटें.

सहाय की मुसीबतें अभी खत्म नहीं हुई थीं. महामाया सरकार ने सहाय सरकार के भ्रष्टाचार की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस टी एल वेंकटराम अय्यर की अध्यक्षता में एक आयोग बैठाया. इस आयोग का वही हश्र हुआ जो अमूमन होता है. रिपोर्ट ठंडे बस्ते में.

सहाय भी कांग्रेस की राजनीति में ठंडे बस्ते में चले गए. 1969 में कांग्रेस बंटी तो वो इंदिरा के उलट ओल्ड गार्ड वाले खेमे में, यानी कांग्रेस ओ में रहे. लेकिन इस राजनीतिक दल का गार्ड डाउन ही रहा. सहाय जीते जी सुर्खियों में एक आखिरी दफा लौटे 1974 में, जब हजारीबाग से स्थानीय निकाय क्षेत्र से विधान परिषद के लिए चुने गए. इस जीत के कुछ ही महीनों बाद 5 मई 1974 को पटना से हजारीबाग जाने के रास्ते में एक सड़क दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई.

और ये कहानी खत्म हो गई.

जाते जाते एक वाकया और. ये हमें सुनाया, वरिष्ठ पत्रकार एस एन विनोद ने.

केबी सहाय पर करप्शन के इल्जाम लगे. मगर उन्होंने निजी तौर पर कोई करप्शन नहीं किया था. औरों के काम करते थे, मगर जबान और प्रशासन के सख्त थे. एक दफा हम लोग विधानसभा की पत्रकार दीर्घा में बैठे थे. तब तक सहाय भूतपूर्व हो गए थे. वो टहलते हुए वहां आ गए और बातचीत के दरमियां बोले,

‘राजनीति करने के लिए Head (दिमाग), Hand (ताकत) और tongue (मीठी जुबान) होना जरूरी है. मेरे पास Head & Hand तो है लेकिन tounge नहीं है. तुम लोग बताओ, आजकल कितने नेताओं के पास इन तीनों में से एक भी चीज है?’


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