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जब श्रीलंका के सामने अज़हर और सिद्धू क्रीज़ पर खूंटा गाड़कर जम गए थे!

साल 1984 में शारजाह में पहली बार एशिया कप खेला गया था. तब से लेकर 1995 तक पांच बार ये टूर्नामेंट हुआ. भारत ने चार बार इसमें हिस्सा लिया और चारों ही बार चैम्पियन बना. 1986 में टीम इसमें हिस्सा नहीं ले पाई थी. 14 अप्रैल, 1995 के दिन ही इंडियन टीम ने चौथी बार एशिया कप अपने नाम किया था.

शुरुआती सालों में कुछ न कुछ ऐसा हो जाता कि सारी टीमें खेल ही नहीं पातीं. कभी भारत नहीं खेलेता, तो कभी पाकिस्तान रूठ जाता. दोनों मानते तो फिर श्रीलंका को मनाओ. लेकिन 1995 के शारजाह टूर्नामेंट में इंडिया, पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश चारों टीमें शामिल हुईं. इस टूर्नामेंट को राउंड रॉबिन फॉर्मेट में खेला गया.

इसमें सभी टीमों ने एक-दूसरे के खिलाफ एक-एक मैच खेला. इंडिया, श्रीलंका और पाकिस्तान तीनों टीमों ने दो-दो जीत दर्ज की. लेकिन नेट रनरेट की वजह से इंडिया पहले और श्रीलंका दूसरे स्थान पर रहे. इस वजह से पाकिस्तान और बांग्लादेश टूर्नामेंट से बाहर हो गए. फिर 14 अप्रैल, 1995 को खेला गया इंडिया और श्रीलंका का फाइनल.

इंडिया और श्रीलंका फाइनल की कहानी:

इंडिया के कप्तान मोहम्मद अज़हरुद्दीन ने टॉस जीतकर पहले बॉलिंग चुन ली. उस पूरे टूर्नामेंट में इंडियन टीम ने हर मैच में पहले बोलिंग ही चुनी. इसका फायदा भी हुआ. चेज़ करते हुए चार में से सिर्फ एक बार इंडिया को हार मिली थी.

फाइनल में अज़हर ने जयसूर्या, गुरुसिन्हा, अरविन्दा डी सिल्वा और अर्जुन रणातुंगा जैसे मजबूत बैटिंग लाइनअप वाली श्रीलंकाई टीम को पहले बैटिंग के लिए बुलाया. महानामा और जयासूर्या ने 10 ओवरों में 46 रन जोड़कर श्रीलंका को अच्छी शुरुआत दी. लेकिन कुंबले ने 10वें ओवर की आखिरी गेंद पर महानामा (15 रन) को बोल्ड करके इस जोड़ी को तोड़ दिया.

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एशिया कप में कुंबले. फोटो: Twitter.

इसके बाद गुरुसिन्हा आए और जम गए. लेकिन दूसरे छोर पर एक-एक करके विकेट गिरने लगे. जयासूर्या (22 रन), डी सिल्वा (13 रन) और रणातुंगा (3 रन) भी जल्दी-जल्दी चले गए. अंत में तिलेकारत्ने (22 रन) और कालूवितरना (18 रन) ने गुरुसिन्हा (85 रन) का साथ दिया. लेकिन श्रीलंकाई टीम फाइनल में 50 ओवर के खेल में 230 रन ही बना सकी.

अब बारी थी इंडियन टीम की. 22 साल के सचिन तेंडुलकर के साथ पारी शुरू करने उतरे मनोज प्रभाकर. दोनों ने पहले विकेट के लिए 48 रन जोड़े. मनोज प्रभाकर(9 रन), वास की गेंद पर विकेटकीपर कालूवितरना को कैच देकर चलते बने. उस टाइम के सुपर स्ट्राइकर सिद्धू वन-डाउन खेलने उतरे. लेकिन स्कोर अभी 10 रन आगे ही बढ़ा था कि सचिन(41 रन) लेग साइड पर शॉट खेलने की कोशिश में बाउंड्री पर कैच आउट हो गए. उन्हें रमानायके की गेंद पर जयासूर्या ने लपक लिया. 11.1 ओवर में सचिन जब आउट हुए तो टीम का स्कोर 58 रन था.

फाइनल वाले प्रेशर में इंडियन टीम दो विकेट गंवा चुकी थी. अब क्रीज़ पर सिद्धू का साथ देने आए कप्तान अज़हरुद्दीन. श्रीलंकन टीम को लगने लगा था कि अब यहां से मैच को अपने पाले में डाला जा सकता है. लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उस दिन सिद्धू और अज़हर एक ऐसी पारी खेलने वाले थे जो सालों-साल याद की जाएगी.

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नवजोत सिद्धू. फोटो: Twitter

11.1 ओवर में 58/2. टीम इंडिया को अब भी जीत के लिए 173 रनों की ज़रूरत थी. बस यहीं से सिद्धू और अज़हर ने सबकुछ अपने अनुभवी हाथों में संभाल लिया. दोनों ने रमानायके, जयासूर्या और वास को ऐसी मार लगाई कि किसी भी गेंदबाज़ का इकॉनोमी रेट साढ़े पांच से नीचे नहीं गया. जबकि जयसूर्या का तो छह से भी ऊपर रहा.

उस पारी में अज़हर तो मानो ये ठान कर उतरे थे कि किसी भी हाल में जीत उनके क्रीज़ पर रहते ही आनी है. मैच के अंत में हुआ भी बिल्कुल वैसा ही. इन दोनों बल्लेबाज़ों ने पहले 50, फिर 100, फिर 150 और आखिर में आते-आते 175 रन जोड़कर टीम को जिताकर ही दम लिया.

58 के स्कोर पर दूसरा विकेट झटकने के बाद श्रीलंकाई टीम को कोई और विकेट नहीं मिला.

उस पारी में अज़हर ने 89 गेंदों में नॉट-आउट 90 रन बनाए. पारी में पांच चौके और दो छक्के भी आए. जबकि सिद्धू ने 106 गेंदों पर पांच चौकों के साथ 84 रनों की पारी खेली.

उस पूरे टूर्नामेंट में सिद्धू कमाल थे. उन्हें प्लेयर ऑफ द सीरीज़ चुना गया. सचिन 205 रनों के साथ टॉप स्कोरर रहे. जबकि अनिल कुंबले ने सबसे ज्यादा सात विकेट लिए थे.

इस तरह से एशिया कप शुरू होने के 11 सालों तक इंडियन टीम अजेय रही. 1995 के इस फाइनल के बाद साल 1997 में श्रीलंका ने भारत को फाइनल में हराकर इस टूर्नामेंट पर कब्ज़ा कर लिया. लेकिन अब तक इस टूर्नामेंट को सबसे ज्यादा सात बार जीतकर भारत अब भी टॉप पर है.


1971 के मैच का किस्सा, जब नेट्स पर इंडियन युवा से बोले सोबर्स- जूतों का साइज क्या है? 

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