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वो इंडियन क्रिकेटर जो इंग्लैंड में जीतने के बाद कप्तान की सारी शराब पी गया

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साल 1971. 47 साल पहले की बात है. भारतीय कप्तान की टोपी अजीत वाडेकर के सर पर जा बैठी थी. अचानक ही वाडेकर को कप्तान बनाया गया था. जो वाडेकर अपने कप्तान टाइगर पटौदी को ये कहते रहते थे कि टीम सेलेक्शन के दौरान उन्हें याद रखा जाए, उन्हीं वाडेकर को टाइगर की जगह कप्तानी सौंप दी गई थी. किसी को भी लगा नहीं था कि ऐसा होने को है. भारतीय क्रिकेट अचानक ही एक नवाब के हाथ से निकलकर बम्बई के एक पढ़ाकू के हाथ में आ गया था जो कभी सारा ध्यान इस बात पर केन्द्रित करता था कि उसे कैसे भी बम्बई के VJTI में पढ़ने को मिल जाए और वो इंजीनियर बन जाए. वेस्ट इंडीज़ में सीरीज़ जीत कर भारतीय टीम इंग्लैंड आई थी. ओवल में इंडिया ने मैच जीत लिया. किसी को भी नहीं लगता था कि ऐसा हो सकेगा. चन्द्रशेखर ने 6 विकेट चटकाए. इंग्लैंड की इनिंग्स में उन्होंने ऐसे सेंध लगाई जैसे इलाके के सबसे शातिर चोर उन्हीं के शागिर्द हों.

चंद्रशेखर ने 38 रन पर 6 विकेट लिए और इंग्लैंड 101 रनों पर आउट हो गई. जब आबिद अली विनिंग रन ले रहे थे और इंडिया इतिहास बना रही थी, उस टीम का कप्तान आर्मचेयर पे आराम से सो रहा था. ये अजीत वाडेकर ही थे जिन्हें जैसे ही ये अहसास हुआ कि टीम जीतेगी ही जीतेगी, बड़े इत्मीनान के साथ ड्रेसिंग रूम में बैठे और सो गए. जीत के जश्न का हल्ला भी मचा और लेकिन उनकी नींद नहीं टूटी. वो जागे तब जब इंग्लैंड की टीम के मैनेजर केन बैरिंगटन आए और बधाई देने के लिए उन्हें हिला-डुला कर जगाया.

एक तरफ़ मैच के बाद की औपचारिकताएं चल रही थीं और दूसरी ओर टीम इंडिया के जश्न का इंतज़ाम हो रहा था. कमरे में खाना लग रहा था, शैम्पेन की बोतलें दिखाई देने लगी थीं. कप्तान साहब को शैम्पेन से काफ़ी प्रेम था. उन्होंने नींद भरी आंखों से बोतलों को देखा और प्रेस कांफ्रेंस के लिए चल पड़े. उन्होंने जल्दी से कांफ्रेस ख़त्म की और ड्रेसिंग रूम में वापस आये. अजीत वाडेकर ने जब शैम्पेन की बोतलें उठानी शुरू कीं तो मालूम पड़ा कि वो ख़त्म हो चुकी है. कमरे में जितनी भी शैम्पेन थी, अब अस्तित्व में नहीं थी. उन्होंने पूछताछ की तो मालूम पड़ा कि फ़ारुख इंजीनियर ने मना किये जाने के बावजूद मन भर शैम्पेन पी और कप्तान साहब के लिए कुछ नहीं बचाया. इसके बाद अजीत वाडेकर को लागर बियर पीनी पड़ी जो कि उन्हें ख़ास पसंद नहीं थी.

25 फ़रवरी 1938 को पैदा हुए फ़ारुख इंजीनियर को ब्रिलक्रीम बॉय कहा जाता था. वो देश के पहले क्रिकेटर थे जिससे ब्रिलक्रीम ने कॉन्ट्रैक्ट किया था. फ़ारुख इंजीनियर से पहले सिर्फ़ इंग्लैंड के क्रिकेटर डेनिस कॉम्पटन को ये कॉन्ट्रैक्ट मिला था.

फ़ारुख इंजीनियर को देश का सबसे बेहतरीन विकेट कीपर कहा जाता था. उन्होंने इंडिया के लिए 46 टेस्ट मैच खेले जिसमें उन्होंने 31.08 के एवरेज से 2,611 रन बनाए. इस दौरान उन्होंने 16 स्टम्पिंग की और 66 कैच लिए.

फ़ारुख इंजीनियर को वेस्ट इंडीज़ के ख़िलाफ़ मद्रास में खेली गई इनिंग्स के लिए खूब याद किया जाता है. मैच में ओपनिंग करने के लिए उतरे इंजीनियर ने सेंचुरी मारी. ये सेंचुरी ख़ास इसलिए थी क्यूंकि उस वक़्त वेस्ट इंडीज़ की ओर से वेस हॉल और चार्ली ग्रिफ़िथ जैसे आग फेंकने वाले बॉलर आते थे.

फ़ारुख इंजीनियर ने अपना आख़िरी मैच भी वेस्ट इंडीज़ के ख़िलाफ़ ही 1975 में खेला. उस मैच की दोनों इनिंग्स में उन्होंने ज़ीरो बनाए. फ़ारुख इंजीनियर देश के लिए खेलने वाले आख़िरी पारसी क्रिकेटर थे.

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