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क्या है 31 साल पुराना रूबिया सईद अपहरण केस, जिसमें यासीन मलिक पर अब आरोप तय हुए हैं?

यासीन मलिक. जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट यानी JKLF का मुखिया. फिलहाल जेल में है. 31 साल पहले के रूबिया सईद अपहरण कांड में विशेष टाडा अदालत ने यासीन के खिलाफ आरोप तय किए हैं. इसे लेकर यासीन के वकील राजा तुफैल सवाल उठा रहे हैं. उनका कहना है कि आज तक इस मामले में यासीन मलिक को न तो गिरफ्तार किया गया, और न ही कोई पूछताछ की गई. लेकिन अब इस मामले को क्यों उधेड़ा जा रहा है? उनका आरोप है कि सरकार यासीन मलिक के खिलाफ पुराने मामले खोलकर उनकी आजादी छीनना चाहती है. उन्हें जेल से बाहर नहीं आने देना चाहती. खैर, हमारी स्टोरी का पॉइंट ये नहीं है. हम आपको बताएंगे कि रूबिया सईद के अपहरण के उस मामले के बारे में जिसने उस वक्त पूरे देश में हलचल मचा दी थी. इसके साथ ही ये भी बताएंगे कि इसके बाद और कौन से अपहरण के मामले हुए थे, जिनमें आतंकवादियों को रिहा किया गया था.

यासीन मलिक
यासीन मलिक

गृह मंत्री की बेटी रूबिया का अपहरण

तारीख थी 8 दिसंबर 1989. केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार को सत्ता संभाले अभी हफ्ता भी नही बीता था. दोपहर करीब 3 बजे नए गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद कार्यभार संभालने के बाद नॉर्थ ब्लाॅक यानी गृह मंत्रालय में पहली बार मंत्रालय के अधिकारियों के साथ बैठक कर रहे थे. ठीक उसी वक्त उनकी बेटी रूबिया सईद जो एमबीबीएस का कोर्स पूरा करने के बाद श्रीनगर के इंटर्नशिप कर रही थीं, हॉस्पिटल से ड्यूटी पूरी करने के बाद घर के लिए निकलीं. वह लाल चौक से श्रीनगर के बाहरी इलाके नौगाम की तरफ जा रही एक ट्रांजिट वैन नंबर JFK 677 में सवार हो गईं. वैन जैसे ही चानपूरा चौक के पास पहुंची, उसमें सवार तीन लोगों ने बंदूक की दम पर वैन को रुकवा लिया. मेडिकल इंटर्न रूबिया सईद को उतारकर किनारे खड़ी नीले रंग की मारुति वैन में बिठा लिया. उसके बाद मारुति वैन वहां से निकल गई. कहां गई, किसी को पता नही.  इस अपहरण कांड का मास्टरमाइंड अशफाक वानी था. अशफाक वानी जेकेएलएफ के नेता था और 1990 में मारा गया. वह पहले एक एथलीट हुआ करता था, लेकिन बाद में रास्ता भटककर आतंकवादी बन गया. उसी ने गृहमंत्री की बेटी के अपहरण की योजना बनाई थी. अपहरण के पहले उसने मुफ्ती के घर और अस्पताल की रेकी भी की थी.

हैरानी इस बात पर भी हुई कि इस घटना के बाद ना तो बस के ड्राइवर ने और ना ही किसी और ने इसके बारे में पुलिस को कुछ बताया. करीब दो घंटे बाद जेकेएलएफ के जावेद मीर ने एक लोकल अखबार को फोन करके गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रूबिया सईद के अपहरण की जानकारी दी.

आतंकवादियों की रिहाई की मांग

रूबिया के अपहरण से देश में कोहराम मच गया. दुनिया की सबसे बड़ी जम्हूरियत के लाॅ एंड ऑर्डर की जिम्मेदारी उठाने वाला व्यक्ति अपनी बेटी की सुरक्षा करने में नाकाम रहा था. दिल्ली से श्रीनगर तक, पुलिस से intelligence तक बैठकों का दौर शुरू हो गया. सरकार की तरफ से अंदरखाने रूबिया सईद की रिहाई के बदले कुछ आतंकवादियों को रिहा करने या मिलिट्री एक्शन लेने, दोनों तरह की बातें हवा में तैरने लगी. हालांकि मध्यस्थता पर ज्यादा जोर दिया जा रहा था. मध्यस्थता के लिए कश्मीर घाटी के नामचीन लोग जैसे श्रीनगर के जाने-माने डाक्टर डॉ ए.ए. गुरु को लगाया गया. वहीं एक दूसरे चैनल के माध्यम से पत्रकार जफर मिराज, अब्दुल गनी लोन की बेटी शबनम लोन और अब्बास अंसारी को भी लगाया गया. एक तीसरा चैनल भी खोला गया. इसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस मोतीलाल भट और एडवोकेट मियां कयूम को जोड़ा गया. शुरू में जेकेएलएफ की तरफ से रूबिया सईद की रिहाई के बदले 20 आतंकवादियों की रिहाई की मांग की गई. लेकिन बाद में जेकेएलएफ ने अपनी माँग को घटाकर 7 आतंकवादियों की रिहाई तक सीमित कर दिया. सरकार दोनों तरह की कार्रवाई मिलिट्री एक्शन और बातचीत, पर मंथन में लगी थी. क्या किया जाए? कैसे सुरक्षित रिहाई हो? सारी कवायद इसी पर चल रही थी. और इस कवायद में भी अब 5 दिन बीत चुके थे. 8 दिसंबर से शुरू हुआ बैठकों का दौर 13 दिसंबर तक पहुंच चुका था.

झुकना पड़ा वीपी सिंह सरकार को

इसी दिन सियालकोट में भारत और पाकिस्तान के बीच सियालकोट में चौथा और अंतिम क्रिकेट टैस्ट मैच चल रहा था. पहले के तीनों टैस्ट मैच ड्रा पर खत्म हुए थे. चौथे टैस्ट के चौथे दिन यानी 13 दिसंबर को भारतीय टीम की हालत पतली थी. हार का खतरा मंडराने रहा था लेकिन उसे टालने की कोशिश में नवजोत सिंह सिद्धू के साथ एक 16 साल का नौजवान (सचिन तेंदुलकर) लगा था. दोनों पूरा दिन निकाल ले गए. मैच को पाँचवें दिन की ओर धकेल दिया. क्रिकेट की दुनिया पहली बार सचिन तेंदुलकर के जीवट से रूबरू हो रही थी. दूसरी तरफ भारत में वीपी सिंह सरकार के जीवट की परीक्षा हो रही थी क्योंकि अब तक रूबिया सईद अपहरणकर्ताओं के चंगुल में थी. 13 दिसंबर 1989 की सुबह दिल्ली से 2 केंद्रीय मंत्री, विदेश मंत्री इंद्र कुमार गुजराल और नागरिक उड्डयन मंत्री आरिफ मोहम्मद खान को दिल्ली से श्रीनगर भेजा गया. एक दिन पहले ही जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री फारूक़ अब्दुल्ला लंदन से श्रीनगर लौटे थे. 13 दिसंबर की सुबह ही मुख्यमंत्री अब्दुल्ला की मुलाक़ात दोनों केंद्रीय मंत्रियों से हुई. इस बैठक में रूबिया सईद को रिहा कराने के लिए आतंकवादियों को छोड़ने पर बातें शुरू हुई. फारूक़ अब्दुल्ला ने आतंकवादियों को छोड़ने पर अपनी असहमति जताई लेकिन अंततः उन्हें दिल्ली के दबाव में झुकना पड़ा.

दोपहर होते-होते सरकार और अपहरणकर्ताओं के बीच समझौता हो गया. समझौते के तहत 5 आतंकवादियों को रिहा किया गया. कुछ ही घंटे बाद यानी 13 दिसंबर की शाम लगभग 5 बजे अपहरणकर्ताओं ने रूबिया सईद को सोनवर स्थित जस्टिस मोतीलाल भट्ट के घर पर शाम के साढ़े सात बजे का वक्त सुरक्षित पहुँचा दिया था. रूबिया की अपहरण के 122 घंटे बाद रिहाई हुई थी. इस मामले में वीपी सिंह सरकार को आतंकवादियों के सामने झुकना पड़ा था. हालांकि कई लोग यह भी दावा करते हैं कि अपहरण के बाद रूबिया सईद को कहां रखा गया था, इसकी जानकारी मुफ्ती परिवार को थी.

उसी रात करीब 12 बजे एक विशेष विमान से रूबिया सईद को दिल्ली लाया गया. हवाई अड्डे पर तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कहा कि एक पिता के रूप में मै खुश हूं लेकिन एक राजनेता के रूप में मैं समझता हूं कि ऐसा नहीं होना चाहिए था. किडनैपिंग नहीं होनी चाहिए थी. इस सवाल पर कि अगर होम मिनिस्टर की बेटी की जगह कोई और लड़की होती तो भी क्या सरकार इसी तरह से बर्ताव करती? सईद ने कहा, मैं नहीं जानता… क्योंकि मैं भी इंसान हूं. लड़की तो लड़की होती है. उनकी आवाज भर्राई हुई थी. बेबसी साफ झलक रही थी.

लेकिन श्रीनगर में काफी गहमा-गहमी थी. लोग सड़कों पर उतर आए थे. यह खुशी रूबिया सईद की रिहाई के लिए नहीं थी बल्कि रिहा किये गये आतंकवादियों के लिए थी. पूरी घाटी में अलगावाद के नारे गूँजने लगे. ‘हम क्या चाहते! आजादी’ और ‘जो करे खुदा का खौफ, वो उठा ले क्लाश्निकोव’ जैसे नारे उस दिन श्रीनगर की सड़कों पर सरेआम लगाए जा रहे थे.

रिहाई के बाद पिता के साथ रुबिया सईद
रिहाई के बाद पिता के साथ रूबिया सईद

इस घटना पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और उस समय नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (NSG) के महानिदेशक रहे वेद मारवाह ने भी अपनी किताब Uncivil Wars: The Pathology of Terrorism in India में विस्तार से रोशनी डाली है. वेद मारवाह के मुताबिक़,

‘इस मामले पर मुफ्ती मोहम्मद सईद कुछ ज्यादा बोल नही रहे थे. वाणिज्य मंत्री अरूण नेहरू पूरे ऑपरेशन को देख रहे थे. मामले से निबटने में सरकार का एप्रोच भी सही नही था. अपहरणकर्ताओं से बातचीत के एक से ज्यादा चैनल खोल दिए गए थे. सभी चैनल सिर्फ इस कोशिश में लगे थे कि रूबिया सईद की रिहाई उनके चैनल से हो. इसी का फायदा अपहरणकर्ताओं ने उठाया और 5 आतंकवादियों को रिहा कराने में कामयाब रहे.’

रूबिया सईद के अपहरण का केस टाडा के सेक्शन 3 के अंतर्गत श्रीनगर के सदर पुलिस थाने में 8 दिसंबर 1989 को दर्ज किया गया, जो बाद में सीबीआई को सौंप दिया गया. जम्मू के विशेष टाडा कोर्ट में 13 लोगों को अभियुक्त बनाया गया, जिनमें जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के सीनियर नेता अशफाक वानी, यासीन मलिक, जावेद मीर, मोहम्मद सलीम, याकूब पंडित, अमानुल्लाह खान शामिल थे.

तीन दशक बाद 26 फरवरी 2020 को श्रीनगर की विशेष टाडा अदालत में इस मामले की सुनवाई शुरू हुई. अब इसमें JKLF के नेता यासीन मलिक पर आरोप तय किया गया है.

अपहरण के और किन मामलों में आतंकवादी छोड़े गए?

ऐसा नहीं था कि कश्मीर के प्रभावशाली लोगों के नाते-रिश्तेदारों के अपहरण का यह अंतिम मामला था. इसके बाद भी इस तरह की कई घटनाएं हुईं.

1. सैफुद्दीन सोज की बेटी नाहिदा का अपहरण

तारीख थी 27 फरवरी 1991. उस दिन जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स लिबरेशन फ्रंट यानी JKSLF के चरमपंथियों ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के बारामूला के सांसद सैफुद्दीन सोज की बेटी नाहिदा सोज का अपहरण कर लिया. बदले में जेल में बंद 5 चरमपंथियों की रिहाई की मांग करने लगे. रूबिया सईद कांड के 13 महीने बाद देश एक बार फिर सकते में आ गया. दोनों घटनाओं में फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार दिल्ली और श्रीनगर का निजाम बदल चुका था. प्रधानमंत्री पद पर वीपी सिंह की जगह चंद्रशेखर आ गए थे. आते ही उन्होंने जम्मू-कश्मीर के गवर्नर जगमोहन, जिन्हें वीपी सिंह ने अपॉइंट किया था, उनकी जगह जी.सी. सक्सेना को गवर्नर बना दिया था. लेकिन इसके बावजूद नाहिदा अपहरण कांड हो गया. लेकिन इस बार सुरक्षा बलों ने JKSLF का मनोबल तोड़ने के लिए एक बड़ा काम किया. सुरक्षा बलों ने अपहरणकर्ताओं में से एक मुख्तार उर्फ उमर काचरू के भाई को पकड़ लिया और नाहिदा को छोड़ने का दबाव बनाने लगे. इस तरह की तरकीब से चंद दिनों पहले ही सुरक्षा बलों ने कश्मीर के एक बड़े पुलिस अधिकारी के बेटे को JKSLF से छुड़ाया था. तब सुरक्षा बलों ने JKSLF के डिप्टी चीफ जावेद शल्ला के भाई को पकड़ लिया था. उसके बाद JKSLF को पुलिस अधिकारी के बेटे को छोड़ने पर राजी होना पड़ा था.

लेकिन नाहिदा सोज के मामले में मुख्तार उर्फ उमर काचरू अपने भाई के पकड़े जाने के बाद सैफुद्दीन सोज के घर पर फोन करके नाहिदा को जान से मारने की धमकी देने लगा. इससे सोज परिवार में खौफ पैदा हो गया. परिवार के लोग प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से बेटी को बचाने की सीधे गुहार लगाने लगे. इस बीच JKSLF ने अपने 5 सहयोगियों की रिहाई को घटाकर एक तक कर दिया. तब सरकार ने JKSLF के चरमपंथी मुश्ताक अहमद को रिहा किया. उसके बाद 4 मार्च 1991 को नाहिदा सोज की रिहाई हुई.

बाद में एक अपहरणकर्ता यासीन भट्ट को सुरक्षा बलों ने पकड़ लिया. उसे विशेष टाडा अदालत ने 6 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई.

सैफुद्दीन सोज नाम से कुछ याद आया? 

ये वही सैफुद्दीन सोज हैं, जिन्होंने 17 अप्रैल 1999 को अपनी पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस के व्हिप के खिलाफ जाकर लोकसभा में वाजपेयी सरकार के विश्वास मत प्रस्ताव का विरोध किया था. इन्हीं के कारण महज 1 वोट से वाजपेयी सरकार गिर गई थी. इसके बाद फारूक अब्दुल्ला ने सोज को पार्टी से निकाल दिया. फिर वह कांग्रेस में शामिल हो गए. इस मामले पर तब सैफुद्दीन सोज ने कहा था,

“लंदन में इलाज करा रहे पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने मुझे फोन करके कहा था कि आप ही से उम्मीद है कि आप देश के सेक्युलर चरित्र को बनाए रखने के लिए सरकार के विरोध में वोट डालेंगे. जिसके बाद मैंने विश्वास प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया.”

जून 1991 में एक बार फिर सरकार बदल गई. कांग्रेस नेता पीवी नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने. उनके 5 साल के कार्यकाल में इस प्रकार के कई अपहरण कांड हुए.

1991 में सैफुद्दीन सोज की बेटी का भी अपहरण हुआ था.
1991 में सैफुद्दीन सोज की बेटी का भी अपहरण हुआ था.

2. दुरईस्वामी अपहरण कांड

जुलाई 1991 में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर के दुरईस्वामी को श्रीनगर से अगवा कर लिया गया. इस मामले में इख्वान उल मुसलमीन नामक संगठन का नाम आया. करीब एक महीने बाद अगस्त 1991 में 6 चरमपंथियों की रिहाई के बदले दुरईस्वामी को छोड़ा गया. छोड़े गए 6 चरमपंथियों में JKSLF का डिप्टी चीफ जावेद शल्ला भी शामिल था.

3. मंत्री जीएम मीर के बेटे का अपहरण

1992 में जम्मू कश्मीर के मंत्री जीएम मीर के बेटे मीर नसर उल्लाह, वैज्ञानिक एके धर और टीके रैना का भी अपहरण हुआ. ये अपहरण श्रीनगर  से किए गए. इस बार भी इन सबको चरमपंथियों के चंगुल से रिहा कराने के बदले 7 आतंकवादियों को छोड़ा गया था.

4. गुलाम नबी आजाद के साले का अपहरण

गुलाम नबी आजाद नरसिंह राव सरकार में संसदीय कार्य मंत्री थे. उसी दौरान साल 1992 में उनके साले तसद्दुक देव को चरमपंथियों ने कश्मीर घाटी से अगवा कर लिया था. इस बार भी उन्हें रिहा कराने के बदले सरकार ने 3 चरमपंथियों को छोड़ा था.

1992 में गुलाम नबी आजाद के रिश्तेदार का अपहरण कर लिया गया था.
1992 में गुलाम नबी आजाद के रिश्तेदार का अपहरण कर लिया गया था.

5. IC 814 विमान अपहरण

24 दिसंबर 1999 को अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को भी इस तरह की समस्या से दो-चार होना पड़ा था, जब इंडियन एयरलाइंस की काठमांडू-दिल्ली फ्लाइट IC 814 को हाइजैक कर लिया गया. अपहृत विमान को तालिबान के कब्जे वाले अफगानिस्तान के कंधार शहर ले जाया गया. वहां से भारतीय जेलों में बंद चरमपंथियों को छुड़ाने के लिए ब्लैकमेलिंग की जाने लगी. अंततः 7 दिन चले ड्रामे के बाद 31 दिसंबर 1999 को यात्रियों को छुड़ाने के बदले मौलाना मसूद अज़हर समेत 3 चरमपंथियों को रिहा करना पड़ा था.

वो मौका, जब सरकार ने झुकने से मना कर दिया

यह 1984 का वाकया है. इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं. उस वक्त रविन्द्र म्हात्रे नाम के एक भारतीय डिप्लोमेट लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग में तैनात थे. फरवरी 1984 में बर्मिंघम में म्हात्रे का अपहरण ब्रिटेन में एक्टिव JKLF के सहयोगी संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन आर्मी के आतंकवादियों ने कर लिया. इन लोगों ने भी भारत की जेलों में बंद अपने चरमपंथियों सहयोगियों की रिहाई की मांग की. लेकिन इंदिरा गांधी की सरकार ने इनके सामने झुकने से इनकार कर दिया. उसके बाद म्हात्रे को मौत के घाट उतार दिया गया था.

फारूक और मुफ्ती की रस्साकशी

अब वापस लौटते हैं रूबिया सईद कांड पर, और इसके सहारे नजर डालते हैं 80 के दशक के जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक हालात और उसमें फारूक अब्दुल्ला और मुफ्ती मोहम्मद सईद की सियासी रस्साकशी पर. इस पहलू की चर्चा इसलिए भी लाजिमी है क्योंकि फारूक़ अब्दुल्ला ने मुफ्ती की बेटी रूबिया सईद को छुड़ाने के बदले चरमपंथियों की रिहाई का विरोध किया था.

यह 80 का दशक था. दशक की शुरुआत (1982) में ही नेशनल कॉन्फ्रेंस के संस्थापक और कश्मीर के सबसे बड़े नेता माने जाने वाले शेख अब्दुल्ला का निधन हो गया. इसके बाद जम्मू-कश्मीर की सियासत सबके लिए एक खुला मैदान बन गई. मुफ्ती मोहम्मद सईद, जो राज्य सरकार में मंत्री, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और विधानसभा में विपक्ष के नेता रह चुके थे, उनके अंदर मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा कुलांचे भरने लगी. स्वाभाविक थी उनकी दावेदारी क्योंकि वे मुख्यमंत्री के अलावा राज्य के तमाम बड़े पदों पर रह चुके थे. लेकिन 1983 के असेंबली चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष इंदिरा गांधी ने शेख अब्दुल्ला की विरासत संभाल रहे फारूक़ अब्दुल्ला से गठबंधन कर लिया, और मुफ्ती की महत्वाकांक्षा धरी की धरी रह गई.

राजीव गांधी के साथ फारूक़ अब्दुल्ला
राजीव गांधी के साथ फारूक़ अब्दुल्ला

लेकिन अक्टूबर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या हो गई. इसके बाद कांग्रेस और देश की कमान इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गांधी के हाथ आ गई. राजीव ने मुफ्ती मोहम्मद सईद को अपनी सरकार में पर्यटन मंत्री बनाया. वहीं दूसरी तरफ राजीव का अपने पूरे कार्यकाल के दौरान फारूक़ अब्दुल्ला से लव-हेट का रिश्ता चलता रहा. कभी फारूक़ राजीव के करीब होते तो कभी उनसे दूर हो जाते. लेकिन इस तरह की सियासत में जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस और मुफ्ती मोहम्मद सईद को कोई संभावना दिखाई नहीं दे रही थी.

इसी दरम्यान 1986 में फैजाबाद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के फैसले के बाद राजीव गांधी की सरकार ने अयोध्या में राम मंदिर का ताला खोलने और पूजा करने की इजाजत दे दी. न सिर्फ इजाजत दी बल्कि ताला खोलने की घटना का दूरदर्शन पर लाइव टेलीकास्ट भी कराया. इसके बाद देश के कई हिस्सों में सांप्रदायिक तनाव पैदा हो गया. कश्मीर घाटी के अनंतनाग में भी सांप्रदायिक दंगे होने लगे. वहां मंदिरों और एक समुदाय विशेष के लोगों के घरों को आग लगाई जाने लगी. राजनीतिक हलकों में अनंतनाग की घटना को उकसाने के लिए कथित तौर पर मुफ्ती मोहम्मद सईद को जिम्मेदार ठहराया जाने लगा.

इस बीच 1987 का जम्मू-कश्मीर असेंबली इलेक्शन आ गया. वही बहुचर्चित इलेक्शन, जिसमें चुनावी धांधली कर नतीजों को प्रभावित करने की थ्योरी पर आज भी बहुत से लोग भरोसा करते हैं. इस चुनाव में राजीव गांधी और फारूक़ अब्दुल्ला एक टेबल पर आ गए. यानी कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस का गठबंधन हो गया. यहां से मुफ्ती मोहम्मद सईद को कांग्रेस में अपना भविष्य धूमिल नजर आने लगा. इसके बाद वे केन्द्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर वीपी सिंह के साथ खड़े हो गए और ‘बोफ़ोर्स दलाली’ का राग अलापने लगे.

मुफ्ती मोहम्मद सईद को वीपी सिंह की सरकार में गृह मंत्री बनाया गया था.
मुफ्ती मोहम्मद सईद को वीपी सिंह की सरकार में गृह मंत्री बनाया गया था.

1989 आते-आते बोफ़ोर्स का मुद्दा इतना गरमा गया कि लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी की कांग्रेस सत्ता गंवा बैठी. वीपी सिंह प्रधानमंत्री बन गए. लेकिन सबको आश्चर्य तब हुआ, जब देवीलाल, जाॅर्ज फर्नांडीस, मधु दंडवते और इंद्र कुमार गुजराल जैसे दिग्गजों से भरी कैबिनेट में देश के लाॅ एंड ऑर्डर की जिम्मेदारी यानी गृह मंत्री का पद जम्मू-कश्मीर के नेता और यूपी के मुजफ्फरनगर से सांसद मुफ्ती मुहम्मद सईद को सौंप दिया गया. 5 दिसंबर को वीपी सिंह सरकार के मंत्रियों के बीच विभागों का बंटवारा हुआ जबकि उसके 3 दिन बाद ही उनकी बेटी का अपहरण हो गया.


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