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आज़म खान : यूपी का वो बड़बोला मंत्री जो 'मिक्की मियां का दीवाना' बोलने पर गुस्सा जाता है

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उर्दू के शाइर शहाब ज़ाफरी. उनका एक शेर है :

“तू इधर उधर की न बात कर ये बता कि क़ाफ़िला क्यूं लुटा
मुझे रहज़नों से गिला नहीं तिरी रहबरी का सवाल है”

मतलब ये कि मुझे राह के लोगों से कोई शिकायत नहीं है, बस तेरे साथ का सवाल है जो तो तू भी इधर-उधर की बात कर रहा है, न कि ये बता रहा कि क़ाफ़िला क्यूं लुटा? मतलब ये बरबादी क्यों हुई?

ये शेर आधा पढ़कर जब आज़म खान लोकसभा में पढ़कर सांसद रमा देवी से उलझने लगे और कहते-कहते ऐसी बातें कहने लगे, जिसके लिए उन्हें माफ़ी मांगनी पड़ी. उन्होंने तीन तलाक़ बिल पर बहस के लिए ये शेर चुना था और सरकार पर निशाना साध रहे थे. लेकिन ये बात रखने के लिए ये शेर चुनते हुए आज़म खान ये भूले कि रामपुर के नवाबों की ओर से यही शेर उन पर भी नाज़िल होता है.

हां. रामपुर और आज़म खान के संबंध में उतनी ही तल्खी है, जिसकी शिकायत इस शेर में की गयी है. और ये शिकायत शुरू होती है रामपुर के नवाबों के खानदान से. जहां के एक वारिस ने कांग्रेस के टिकट पर रामपुर की संसदीय सीट को सम्हाला. पांच बार. आज़म खान को राजनीति में जमने देने में पूरी मदद की. अब आज़म की रहबरी पर ही सवाल हैं.

नवाब और सांसद ज़ुल्फ़िकार अली खान उर्फ़ मिक्की मियां
नवाब और सांसद ज़ुल्फ़िकार अली खान उर्फ़ मिक्की मियां

इस कांग्रेस सांसद का नाम था ज़ुल्फ़ीकार अली खान. रामपुर के नवाब. लोग प्यार से मिक्की मियां कहते थे. मिक्की मियां नवाब तो थे ही, साथ ही रामपुर के सांसद भी थे. और उस समय की क़द्दावर कांग्रेस पार्टी से जुड़े थे. 70 का दशक था. आज़म खान कुछ ही महीनों पहले अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से लॉ की पढ़ाई करके रामपुर लौटे थे. लोग बताते हैं कि वकालत की दुकान बहुत अच्छी नहीं थी. धीरे-धीरे आज़म खान लोगों से मिलने लगे, उनका दायरा बढ़ा. और आज़म खान का झुकाव जनता पार्टी (सेकुलर) की ओर होना शुरू हुआ.

आज़म खान ने चुनाव हारकर और चुनाव हरवाकर] अपनी राजनीति की शुरुआत की थी/
आज़म खान ने चुनाव हारकर और चुनाव हरवाकर अपनी राजनीति की शुरुआत की थी

उस समय रामपुर में बीड़ी का क़ारोबार बहुत फलता-फूलता था. पास ही सटे उत्तराखंड से तेंदू पत्ते तो आते ही थे, सुदूर सोनभद्र और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों से भी तेंदू पत्ते आते थे. बीड़ी मजदूर रामपुर में बीड़ियां तैयार करके आगे भेज देते थे. उस समय बीड़ी मजदूरों के वेतन और सुविधाओं पर आंदोलन शुरू ही हुए थे. अब बीड़ी का कारोबार रामपुर से लगभग ख़त्म हो गया लेकिन आन्दोलन है जो लगायत तब से आज तक जारी है. रामपुर के सामजिक कार्यकर्ता फ़रमान क़ुरैशी बताते हैं,

“आज़म खान ने बीड़ी मजदूरों को इकठ्ठा किया और आंदोलन किया. तब वे राजनीति की नयी-नयी शुरुआत कर ही रहे थे. इस आंदोलन की वजह से उनके राजनीतिक करियर को धार मिली. लोगों को लगने लगा कि वे उनके साथ हैं.”

साल 1977. देश में इमरजेंसी ख़त्म हुई. ताज़ा लोकसभा चुनाव हुए. तो इसी समय उतर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए. आज़म खान के करियर का पहला चुनाव. वकालत छोड़कर नयी-नयी राजनीति में आए थे और जनता पार्टी (सेकुलर) से लड़ रहे थे. लेकिन इस चुनाव में आज़म खान रामपुर विधानसभा हार गए. जीते मंज़ूर अली खान उर्फ़ शन्नू खान. कांग्रेस पार्टी के टिकट पर. इस साल हुए लोकसभा चुनाव में मिक्की मियां हार गए थे. जीते थे पहली बार के प्रत्याशी राजेन्द्र कुमार शर्मा.

आज़म खान
आज़म खान

इस चुनाव के बारे में किस्से हैं कि आज़म खान ने अपनी राजनीतिक फील्डिंग बिछाई थी. रामपुर के कई पत्रकार बताते हैं कि आज़म खान के सामने लक्ष्य था कि किसी भी तरह से ज़ुल्फ़ीक़ार अली खान उर्फ़ मिक्की मियां को हरवाना, और इसके लिए उन्होंने भारतीय लोकदल के प्रत्याशी राजेन्द्र कुमार शर्मा को समर्थन दे दिया. जिस वजह से राजेन्द्र कुमार शर्मा हार गए.

मिक्की मियां के करीबी रहे और रामपुर के स्थानीय नागरिक ज़फर हुसैन खान बताते हैं,

“विधानसभा चुनाव जीतने के बाद मंज़ूर अली खान उर्फ़ शन्नू खान का कद बढ़ गया. इतना कि कांग्रेस के कार्यकर्ता सीधे तौर पर शन्नू खान से जुड़ने लगे. रामपुर में कुछ ही दिनों के भीतर उनकी हैसियत बढ़ गयी. इससे मिक्की मियां को डर सताने लगा कि अगर शन्नू खान का कद यूं ही बढ़ता रहा तो आगे आने वाले समय में कांग्रेस पार्टी सांसदी का टिकट शन्नू खान को दे सकती है. इसलिए उन्होंने आज़म खान को सपोर्ट करना शुरू किया.”

हां. आज रामपुर के नवाबों का परिवार और आज़म खान एक दूसरे से अदावत रखते हैं, लेकिन समय था जब नवाब मिक्की मियां ने आज़म खान को सपोर्ट किया था, और उन्हें नाम दिया था “दीवाना”. “दीवाना” क्यों? इसके पीछे दो कारण बताए जाते हैं. एक कारण सुनने में ये आता है कि आज़म खान की राजनीति को लेकर दीवानगी और दूसरा कारण सुनने में आता है आज़म खान का अड़भंगी बर्ताव, जिसमें वे किसी चीज़-इज्ज़त की कोई फ़िक्र नहीं करते हैं.

1992 में दुर्घटना के बाद मिक्की मियां की पत्नी नूर बानो राजनीति में आयीं. और सांसद चुनी गयीं.
1992 में दुर्घटना के बाद मिक्की मियां की पत्नी नूर बानो राजनीति में आयीं. और सांसद चुनी गयीं.

बहरहाल. साल आया 1980. लोकसभा चुनाव होने थे तो विधानसभा चुनाव भी होने थे. रामपुर में प्रचार शुरू हुआ. नवाब साहब उर्फ़ मिक्की मियां के हवाले से ये भी बातें चलीं कि “बड़ा वोट दो मिक्की मियां को, छोटा वोट दो दीवाने को.”

कहने का मतलब था कि सांसदी का वोट ज़ुल्फ़ीक़ार अली खान को दिया जाए और विधानसभा चुनाव के तहत वोट दिया जाए आज़म खान को. ज़फर हुसैन खान बताते हैं कि मिक्की मियां सीधे-सीधे आज़म खान का समर्थन नहीं कर सकते थे, इसलिए ये प्रचार शुरू हुआ. ताकि शन्नू खान को रोका जा सके.

आज़म खान चुनाव जीत गए. मिक्की मियां भी जीत गए. मिक्की मियां को शन्नू खान से होने वाला ख़तरा भी कम हो गया. धीरे-धीरे आज़म खान का कद बढ़ना शुरू हुआ. देश में जब हर जगह इंदिरा गांधी जनता पार्टी की सरकारों को धराशायी करने पर आमादा थीं, आज़म खान का बतौर जनता पार्टी प्रत्याशी चुनाव जीतना एक बड़ा डेवलपमेंट था.

अपने दांव पेच से ही आज़म खान ने अपना कद ऊंचा किया.
अपने दांव पेच से ही आज़म खान ने अपना कद ऊंचा किया.

रामपुर में चुनाव जीतकर आज़म और मशहूर तो हुए लेकिन उनके पीछे मिक्की मियां का दिया नाम ‘दीवाना’ चलता रहा. और लोग बताते हैं कि इस नाम से आज़म खान को चिढ़ हो गयी. मिक्की मियां से उनकी अदावत तो थी ही और लोग तंज़ कसने के लिए आज़म खान को “मिक्की मियां का दीवाना” कहने लगे थे, और आज़म इस बात से ख़ार खाने लगे थे.

अब तक आज़म खान जनता पार्टी (सेकुलर) से लगायत लोकदल, जनता दल और जनता पार्टी तक का सफ़र कर चुके थे. 1991 लोकसभा में फिर से आज़म खान की फील्डिंग ने काम किया और आज़म मिक्की मियां हार गए, राजेन्द्र शर्मा जीत गए. लेकिन अब तक नवाबों की राजनीति का मेयार ढलना शुरू हो चुका था. 1992 में मिक्की मियां की मौत हो गयी थी. 1993 में आज़म खान समाजवादी पार्टी में जा चुके थे. सपा के यादव परिवार से उनकी करीबी बढ़ चुकी थी और बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी में आए आज़म और तल्ख़ हो चुके थे.

आज़म खान ने जनता दल और जनता पार्टी से आगे समाजवादी पार्टी का हाथ पकड़ा.
आज़म खान ने जनता दल और जनता पार्टी से आगे समाजवादी पार्टी का हाथ पकड़ा.

सदी बीती. 21वीं सदी आई. आरोप लगते हैं कि मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव की सपा सरकारों ने आज़म को खुली छूट दी. और नवाब कहते हैं कि नवाबों से अदावत का बदला आज़म खान ने रामपुर का नक्शा बदलकर लिया. नवाबों के समय की कई इमारतें ज़मींदोज़ हुईं. रामपुर शहर के भीतर के कई गेट ढहा दिए गए. और आज़म खान ने लगवा दिया “बाब-ए-निज़ात” और “बाब-ए-हयात” नाम के दो गेट. नवाबों के घर वालों ने आरोप लगाया कि आज़म खान रियासत की चीज़ें नहीं, बल्कि संस्कृति से खिलवाड़ कर रहे हैं. लेकिन आज़म खान का जवाब आया कि नवाबों ने लोगों पर ज़ुल्म ढाए हैं.

मुलायम सिंह यादव के साथ आज़म खान
मुलायम सिंह यादव के साथ आज़म खान

ज़फर हुसैन खान कहते हैं,

“मिक्की मियां को क्या पता था कि जिसको पहली बार चुनाव जिताया, वो उनके साथ ही बुरा करेगा.”

अखिलेश यादव के साथ आज़म खान, जो अब मौके-बेमौके आज़म खान का हर बात में समर्थन करते रहते हैं.
अखिलेश यादव के साथ आज़म खान, जो अब मौके-बेमौके आज़म खान का हर बात में समर्थन करते रहते हैं.

और ऐसा देखते हुए आज़म खान अपनी ही रहबरी के सवाल में उलझ जाते होंगे, तब भी, जब वे जया प्रदा को लेकर राजनीति में आते हैं और उनके ही खिलाफ तल्ख़ हो जाते हैं.

और जब आज़म खान एक रूपए की मानहानि लायक ही समझे गए

रामपुर के शाइर दिवाकर राही ने अपनी किताब “आवाज़” में एक किस्से का ज़िक्र किया है, जिसमें उन्होंने बताया है कि आज़म के ख़िलाफ़ मानहानि का मुकदमा दर्ज किया था. 1990 में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस का ज़िक्र करते हुए दिवाकर राही ने लिखा है कि प्रेस कांफ्रेंस में आज़म खान ने उनके खिलाफ “समाज-दुश्मन” व “मुल्क-दुश्मन” शब्दों का प्रयोग किया था. इसके बारे में दिवाकर राही ने आज़म खान से स्पष्टीकरण मांगा. आज़म का जवाब नहीं आया तो राही ने मान लिया कि ये कहना सही है.

राही लिखते हैं कि 15 जनवरी 1991 को उन्होंने आज़म खान के खिलाफ हर्जे का दावा दायर किया था. अखबार ‘नवजीवन’ में उन्होंने ये खबर पढ़ी थी कि आज़म खान ने उन पर ये आरोप लगाए हैं. इसके लिए “नवजीवन” अखबार पर तो उन्होंने पचास हज़ार रुपयों का मानहानि का दावा किया था, लेकिन आज़म खान के खिलाफ महज़ 1 रूपए का. राही ने लिखा है कि वे आज़म खान को 1 रूपए का हर्ज़ा भरने योग्य या पात्र ही समझते हैं.

मामले की सुनवाई में आज़म खान कभी नहीं पहुंचे और मामले में फैसला एकतरफा दे दिया गया. लेकिन ये भी आज़म खान के व्यक्तित्व में एक तमगा ही है, कि उन्हें एक रूपए का हर्जाना भरने लायक समझा गया, लेकिन वे उसके लिए भी नहीं पहुंचे.


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