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अशोक गहलोत : राजस्थान का वो मुख्यमंत्री जो हारने के बाद केंद्र में आया और अब राहुल के बाद नंबर दो है

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चुनावी मौसम में दी लल्लनटॉप आपके लिए लेकर आया है पॉलिटिकल किस्सों की ख़ास सीरीज़- मुख्यमंत्री. पिछली कड़ी में आपने पढ़ा कि किस तरह बांग्लादेश शरणार्थियों के कैंप का दौरा करते वक़्त इंदिरा गांधी की नजर अशोक गहलोत पर पड़ती है. एनएसयूआई के रास्ते वो कांग्रेस में पहुंचते हैं. संजय गांधी से करीबी के चलते 1980 में लोकसभा का टिकट मिलता है. चुनाव जीतते हैं और महज 31 साल की उम्र में केंद्र सरकार में मंत्री बनते हैं. लेकिन यह तो कार्यकर्ता अशोक गहलोत की कहानी है. चतुर राजनेता अशोक गहलोत की असल कहानी शुरू होती है इसके पांच बरस बाद यानी 1985 से.

अंक-1 हवलदार के दम पर मुख्यमंत्री का काम तमाम

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सत्ता राजीव गांधी के हाथ में आई. अशोक गहलोत राजीव के मंत्रिमंडल में बने रहे. 1985 में राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस को 200 सीटें में से 113 पर जीत हासिल हुई. स्पष्ट बहुमत था. हरिदेव जोशी मुख्यमंत्री बनाए गए. 1980 से 1985 के बीच कांग्रेस में काफी उठा-पटक चली थी.राजीव गांधी सूबे की कांग्रेस पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते थे. लिहाजा अशोक गहलोत को केंद्र से जयपुर भेजा गया. प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाकर.

राजस्थान में कांग्रेस पर अपनी पकड़ मज़बूत करने के लिए राजीव गांधी ने अशोक गहलोत को राजस्थान की राजनीति में भेज दिया.

गहलोत को राजीव का निर्देश. सूबे में नौजवान लीडरशिप तैयार की जाए. राजीव को लगता था कि जोशी ओल्ड गार्ड थे. उनके नए तरीकों के हिसाब से संगठन और सत्ता चलाने के लिए दुरुस्त व्यक्ति नहीं. राजीव खुद भी नरसिम्हा राववेंकटरमण जैसे ओल्ड गार्ड को ढो रहे थे उनके करीबियों की मानें तो. गहलोत ने बॉस के कहे मुताबिक काम शुरू किया. राजेश पायलटबलराम जाखड़ और राम निवास मिर्धा जैसे कई युवा तुर्क गहलोत के साथ हो लिए. इन सबसे मुख्यमंत्री जोशी की असहजता बढ़ गई.

जनवरी 1988. अलवर के सरिस्का उद्यान में केंद्र की कैबिनेट मीटिंग रखी गई. राजस्थान में उस साल अकाल पड़ा था. ऐसे में सरिस्का में कैबिनेट मीटिंग की आलोचना शुरू हो गई. राजीव गांधी ने मीटिंग रद्द करने की बजाए सख्त आदेश दिए कि सभी मंत्री अपने निजी वाहन से सरिस्का पहुंचे. सरकारी अमले को मीटिंग के इंतजाम से दूर रखा जाए. राजीव खुद अपनी एसयूवी ड्राइव करके बिना किसी ताम-झाम के सरिस्का पहुंचने वाले थे.

राजीव गांधी कैबिनेट की मीटिंग के लिए सरिस्का पहुंचे थे.

जैसे ही राजीव सरिस्का से ठीक पहले पड़ने वाले चौराहे पर पहुंचे. ट्रैफिक हवलदार ने उन्हें बाएं मुड़ने का इशारा किया. राजीव बाएं मुड़े तो रास्ता एक मैदान पर खत्म हो गयाजहां सरकारी गाड़ियों का जमघट था. राजीव समझ गए कि उनसे छिपाकर सरकारी अमला तैनात कर दिया गया है. उन्होंमे मुख्यमंत्री जोशी को जमकर फटकारा. उनके द्वारा इंतजाम किए गए लंच तक को ग्रहण करने से इनकार कर दिया. महीने भर के भीतर जोशी की सत्ता को ग्रहण लग गया. उनका इस्तीफा हो गया.

उस समय सत्ता के गलियारों में यह चर्चा आम थी कि ट्रैफिक हवलदार को अशोक गहलोत ने कहा था कि वो राजीव की गाड़ी को बाएं मुड़ने का इशारा करे. तो क्या एक गलत सिग्नल भर से मुख्यमंत्री की कुर्सी चली गई. नहींये तो टॉपिंग ऑन द केक थी. जोशी असल में दिल्ली में हुई दरबारी तिकड़म के नए शिकार थे.

अंक 2 बूटा का खूंटा

तिकड़म खत्म हुई हवलदार के सिग्नल सेमगर शुरू हुई एक आईपीएस की बहाली के मसले से. आईपीएस राजस्थान में तैनात था. उस पर रेप के चार्ज लगे तो राज्य सरकार ने सस्पेंड कर दिया. आईपीएस पहुंचा राजीव सरकार में अपने राजनीतिक आका गृहमंत्री और राजस्थान के जालौर से सांसद बूटा सिंह के पास.

बूटा सिंह उस समय केंद्रीय गृह मंत्री थे. कहते हैं कि इन्होंने ही हर्ष वर्धन के सिर पर हाथ रखा हुआ था. ये रिश्ता एक-दूसरे को फायदा पहुंचाता था.
बूटा सिंह उस समय केंद्रीय गृह मंत्री थे.

बूटा ने बहाली के लिए फोन किया राजस्थान के गृह मंत्री गुलाब सिंह शक्तावत को. उन्होंने बूटा सिंह की बात मानने से इनकार कर दिया. बूटा समझ गए. ये गुलाब नहीं हरिदेव बोल रहे हैं. वही हरिदेव जिन्होंने उनके पंजाब का होने की बात कहकर राजस्थान से टिकट की बात का विरोध किया था. बूटा को दूसरी खुन्नस हुई दुलाराम के मसले पर. कभी गंगा नगर से कांग्रेस विधायक थे. मगर 1985 का चुनाव हार गए थे. बूटा चाहते थे कि सरकार उन्हें स्टेट कॉरपोरेशन का चैयरमेन बनाकर समायोजित करे. मगर जोशी यहां भी नहीं माने.

उधर अशोक गहलोत और जोशी के बीच का घर्षण बढ़ रहा था. सरकार के मंत्रियों ने प्रदेश कांग्रेस कमिटी की बैठकों में जाना छोड़ दिया. अशोक गहलोत ने एक और पूर्व मुख्यमंत्री शिव चरण माथुर को अपने खेमे में किया. माथुर 1985 तक मुख्यमंत्री थे. उन्हें लगा कि अगर जोशी का विकेट गिरा तो उनका नम्बर लग सकता है.

गहलोत ने शिवचरण माथुर को अपने खेमे में कर लिया. माथुर को भी लगा कि अगर जोशी का विकेट गिरता है, तो उनका नंबर लग सकता है.

इन सबके बीच दुलाराम ने बूटा और माथुर की एक मीटिंग करवाई. गहलोत के कहने पर. मीटिंग का एजेंडा. अखबार की एक 19 साल पुरानी कतरन. क्या था इसमें. 1969 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले नागौर के डीडवाना में कांग्रेस का सम्मलेन था. वो राजस्थान में मोहन लाल सुखाड़िया का दौर था. हरिदेव जोशी उनकी सरकार में मंत्री थे. मुख्यमंत्री और मंत्रीदोनों कांग्रेस की लड़ाई में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी नहींबल्कि संगठन के ओल्ड गार्ड के साथ थे. इसी साथ के ताव में जोशी ने इंदिरा गांधी को अपशब्द दकह दिए और ये बयान अखबार में छपा और दस्तावेज बन गया. और अब उसी दस्तावेज का इस्तेमाल करने की बारी थी. बूटा ने मीटिंग के बाद ये कतरन राजीव के दफ्तर पहुंचा दी. और इसके बाद जोशी की उलटी गिनती शुरू हो गई.

अंक 3 आंख के बदले आंख

बूटा सिंह और गहलोत की मदद से शिवचरण माथुर फिर से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थे.
बूटा सिंह और गहलोत की मदद से शिवचरण माथुर फिर से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थे.

बूटा और गहलोत की मदद से शिवचरण माथुर फिर से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थे. लेकिन पार्टी में अब भी जोशी खेमे के लिए लोगों का असर था. तभी हुए जोधपुर में जिला परिषद प्रमुख के चुनाव. प्रदेश अध्यक्ष गहलोत का गृह जिला. उन्होंने अपना उम्मीदवार उतरा. सामने आया जोशी खेमे का बागी उम्मीदवार. गहलोत का आदमी चुनाव हार गया.

जिस समय जोशी का तख्तापलट किया गया थाउनके पास कांग्रेस विधायक दल के 110 से 63 विधायक थे. ये लोग बगावत के लिए मौके का इंतजार ही कर रहे थे. अशोक गहलोत के उम्मीदवार का चुनाव हारना वही मौका था. जयपुर में कांग्रेस कार्यकर्ता अपनी ही सरकार के खिलाफ प्रदर्शन पर उतर गए. यह अप्रैल 1989 की बात है. दिल्ली से केंद्रीय मंत्री और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह को जयपुर भेजा गया. जोशी और नवल किशोर शर्मा खेमे के लोगों ने उनके होटल के बाहर प्रदर्शन किया. पुलिस ने लाठियां भांजी. तस्वीरें अखबारों में छपी. मामला किसी तरह शांत हुआ.

दो लोग इस इस किसी तरह शांति स्थिति को देख मुस्कुरा रहे थे. पहलेभैरो सिंह शेखावत. विपक्ष के नेता. उन्होंने पत्रकारों से कहा, “राजस्थान में स्थिर सरकार हैबस हर साल मुख्यमंत्री बदल दिया जाता है. दूसरे हरिदेव जोशी. जिन्हें जयपुर से निकाला मिला हुआ था. असम में बैठे थेमहामहिम राज्यपाल बनके.

कुछ महीनों बाद हुए लोकसभा चुनाव. राजीव ने सत्ता गंवाई. राजस्थान में कांग्रेस सारी 25 सीटें हार गई. खुद गहलोत को जोधपुर सीट पर बीजेपी के जसवंत सिंह के हाथों हार का सामना करना पड़ा. राजेश पायलटबलराम जाखड़बूटा सिंह जैसे दिग्गज भी निपट गए.

कांग्रेस के चुनाव हारने के बाद माथुर और गहलोत दोनों ने अपने-अपने पद से इस्तीफा दे दिया.
कांग्रेस के चुनाव हारने के बाद माथुर और गहलोत दोनों ने अपने-अपने पद से इस्तीफा दे दिया.

इस हार के बाद मुख्यमंत्री माथुर और अशोक गहलोत ने इस्तीफा दे दिया. हरिदेव जोशी को असम से राजस्थान लाया गया. तख्तापलट में माहिर गहलोत का तख्तापलट हो चुका था. आगे की कहानी आप पहले ऐपिसोड मे कुछ कुछ जान चुके हैं. 1991 के लोकसभा चुनाव में जोधपुर से गहलोत बीजेपी के राम नारायण बिश्नोई को हराकर दिल्ली पहुंचे. राजीव का कत्ल हो चुका था. नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार बनी थी. इसमें गहलोत को टेक्सटाइल मिनिस्टर बनाया गया. फिर चंद्रास्वामी से अदावत के चलते उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी. उसके बाद वह कांग्रेस अध्यक्ष बने और 1998 में मैडम की इच्छा से मुख्यमंत्री.

 अंक 4– ठंडी क्रूरता वाया एक वोट 

गहलोत ने पांच साल सरकार चलाई. मगर 2003 में वसुंधरा राजे के नेतृत्व में बीजेपी ने उन्हें बुरी तरह हराया. सोनिया ने गहलोत को दिल्ली बुला लिया. पार्टी महासचिव बनाकर. मध्य प्रदेश में सत्ता गंवा चुके सीएम दिग्विजय सिंह के साथ भी यही किया गया.

सोनिया गांधी ने अशोक गहलोत को दिल्ली बुलाकर संगठन में शामिल कर लिया और उन्हें महासचिव बना दिया गया.

अब दिल्ली की संगठन पॉलिटिक्स शुरू हुई. उस दौर में सोनिया दरबार में सबसे ताकतवर खेमा था अहमद पटेल का. सोनिया के राजनीतिक सचिव. उनके बरअक्स एक खेमा तैयार हो रहा था. सदारत कर रहे थे कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा. उन्हीं की छतरी तले गहलोत, दिग्विजय, अंबिका सोनी जैसे नेता ऑपरेट करने लगे.

इसमें से आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि दो ही जमीनी नेता थे. एक दिग्गीदस साल सीएम रहेमगर उसके बाद से आजतक राजनीतिक कलंक ढो रहे. एमपी में कांग्रेस खत्म करने का. दूसरे गहलोत,जिन्होंने वापसी की. शायद इसीलिए कांग्रेस का इतिहास लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई कहते हैं-

‘कांग्रेस के स्ट्रक्चर में दो तरह के नेता हैं. एक जो दरबार पॉलिटिक्स में माहिर रहे. जैसे प्रणव मुखर्जी और अहमद पटेल. दूसरे जो अपने इलाके में रसूख रखते थे. यानी जमीनी नेता थे. मगर ये नेता दिल्ली की पॉलिटिक्स में आकर फेल हो जाते थे. अशोक गहलोत इसके अपवाद रहे. न जमीन कमजोर हुईन दिल्ली में पकड़.’

राहुल गांधी की कांग्रेस में फिलहाल राहुल के बाद सबसे ज्यादा ताकतवर अशोक गहलोत ही दिखते हैं.

किदवई की बात आज के संदर्भ में और मौजू लगती है. आज राहुल गांधी की कांग्रेस में उनके बाद सबसे ताकवर महासचिव गहलोत ही हैं. मगर उस पर बात आगे. फिलहाल तो बारी है 2008 के विधानसभा चुनाव की. इन पांच सालों में राजस्थान की सियासत बदली थी. गहलोत को दिल्ली भेज सोनिया ने राज्य सौंप दिया था सीपी जोशी को. कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर. अरसे बाद कांग्रेस में एक बार फिर से ब्राह्मण लॉबी की धमक सुनाई देने लगी. जोशी ने चार साल जमकर मेहनत की. संगठन में अपने लोगों को खड़ा किया. जब टिकट बंटा तो सबसे ज्यादा उनके ही लोगों को मिला. गहलोत खुद कार्यकर्ताओं से कहने लगे. इस बार सीएम बनना मुश्किल है. जोशी का चांस लग रहा है.

अशोक गहलोत कहते रहे कि इस बार सीएम सीपी जोशी बनेंगे, लेकिन जोशी एक वोट से चुनाव हार गए.
अशोक गहलोत कहते रहे कि इस बार सीएम सीपी जोशी बनेंगे, लेकिन जोशी एक वोट से चुनाव हार गए.

लेकिन वो जादूगर ही क्याजिसके करतब को नंगी आंख पकड़ ले. जोशी पूरे राज्य में कांग्रेस को जिताने की कोशिश करते रहे और गहलोत ने उनकी ही सीट पर खेल कर दिया. उदयपुर की नाथद्वारा सीट से सीपी जोशी विधायकी का चुनाव हार गए. सिर्फ एक वोट से. बीजेपी के कल्याण सिंह चौहान के हाथों. उधर कांग्रेस भी 200 सीटों वाली विधानसभा में 96 पर अटक गई. विकलांग जीत. अब सबकी नजर बसपा से जीतकर आए छह विधायकों पर थी. और ये विधायक कहां थे. अशोक गहलोत के साथ.

गहलोत की दोबारा ताजपोशी हो गई. गहलोत ने बाद में इन छह के छह विधायकों को कांग्रेस में शामिल कर लिया. सीपी जोशी को केंद्र की यूपीए सरकार में समायोजित कर लिया गया. गहलोत राज 2 शुरू हो गया.

अंक 5 अशोक सरकार नहीं बचा पाता

‘अशोक काम तो अच्छा करता है लेकिन सरकार नहीं बचा पाता.’

अरुणा रॉय ने कहा था कि अशोक काम तो अच्छा करते हैं, लेकिन सरकार बचा नहीं पाते हैं.
अरुणा रॉय ने कहा था कि अशोक काम तो अच्छा करते हैं, लेकिन सरकार बचा नहीं पाते हैं.

ये कहना था अरुणा रॉय का. सूचना का अधिकार कानून के आंदोलन से जुड़ीं. सोनिया गांधी की बेहद खास. यूपीए राज में बनी सुपर कैबिनेट यानी राष्ट्रीय सलाहकार समिति की मेंबर. सोनिया इस समिति की अध्यक्ष थीं औऱ लोग इसे ही असली सरकार मानते थे. क्या अरुणा ने गलत कहा था. तथ्य उन्हें सही ठहराते हैं. गहलोत के पहले कार्यकाल के दौरान राजस्थान में आरटीआई लागू हुई. साल था 2003. और इसी मुद्दे पर चुनाव लड़े गहलोत इसी साल सत्ता गंवा बैठे.

दूसरे कार्यकाल में गहलोत ने मुफ्त दवा योजना शुरू की. सरकारी भर्तियां कीं. पेंशन दी. लेकिन 2013 के विधानसभा चुनाव में मोदी की आंधी में कांग्रेस को सबसे बुरी शिकस्त मिली. 200 सीटों में सिर्फ 21 पर जीत. तो सूबे में सबसे बड़ी जीत1998 के विधानसभा में 157 सीट और सबसे बड़ी हारदोनों गहलोत के खाते में जमा हो गईं. 

इस चुनाव में राजस्थान में कांग्रेस संगठन के मुखिया सचिन पायलट हैं.

इस हार के बाद गहलोत फिर दिल्ली आ गए. पिछली बार जोशी थेइस बार सचिन पायलट राज्य के संगठन मुखिया बनाकर भेजे गए. अब फिर चुनाव हैं. पायलट को जोशी वाला सबक याद है. इसलिए विधानसभा सीट को लेकर वह बहुत सतर्क हैं. उधर गहलोत हैं. जिनका गुजरात और कर्नाटक के बाद राहुल दरबार में सितारा बुलंद है. जो हमेशा की तरह चुप हैं. या कह रहे हैं कि इस बार मुश्किल है. मगर गहलोत के दरबार में लगी भीड़ को देखिए. आपको समझ आ जाएगा. ये गुलदस्ते से कबूतर निकलने के पहले की शांति है.

गहलोत के दरबार में इस बार भीड़ बढ़ती दिख रही है.

शांति. जो तसल्ली देती है. शांति जो निर्मम होती है. शांति जो किसी का क्रूर सियासी कत्ल कर सकती है. शांति जो आपको ताज दिला सकती है. शांतिजो एक सियासी रणनीति हो सकती है. अब इस एपिसोड की दास्तान पूरी. मुख्यमंत्री के अगले ऐपिसोड में पढ़िए राजस्थान की पहली और अब तक की इकलौती महिला मुख्यमंत्री की कहानी, जिसने 10 साल सूबे पर राज किया. और दोनों बार पार्टी के राष्ट्रीय आकाओं को नहीं सेंटा. पहले राजनाथ सिंह और अब अमित शाह.


 

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