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अजय देवगन की वो फिल्म, जिसकी शूटिंग में डायरेक्टर ने बाप के मरने पर भी रोने से मना कर दिया

गोविंद निहलानी नाम सुना होगा आप सबने. कई फिल्मों में सिनेमैटोग्राफर रहे और फिर खुद फिल्में बनानी शुरू कर दी. इंडिया में पैरलल सिनेमा के फाउंडिंग मेंबर्स में गिने जाते हैं. अलग दर्जे के फिल्मकार हैं और ये बात उनकी ‘आक्रोश’, ‘अर्धसत्य’, ‘द्रोहकाल’, ‘दृष्टि’, ‘संशोधन’ और ‘तमस’ जैसी फिल्में देखकर पता चलती है. उनकी फिल्में सीमित ऑडियंस के लिए होती हैं. इस चीज़ से सबसे ज़्यादा दिक्कत गोविंद के दोस्त और प्रोड्यूसर मनमोहन शेट्टी को थी (ऐडलैब्स मीडिया कंपनी शुरू करने वाले). वो चाहते थे कि गोविंद की फिल्में बड़े ऑडियंस तक पहुंचे. इसके लिए उन्हें बड़े स्टार के साथ पॉपुलर फिल्में बनानी चाहिए. लेकिन गोविंद अपने किए में संतुष्ट थे. साथ ही वो स्टार्स के नखरों और उनकी भागमभाग वाली वर्क स्टाइल से बचते थे. हालांकि  उनका पॉपुलर फिल्में बनाने का व्रत और स्टार्स के बारे में भ्रम जल्द ही टूट गया.

3 दिसंबर, 1999 को गोविंद निहलानी की एक फिल्म रिलीज़ हुई ‘तक्षक’. इसमें वो एक्टर्स के साथ नहीं स्टार्स के साथ काम कर रहे थे. अजय देवगन, तबू, अमरीश पुरी और राहुल बोस. कहा गया कि ये गोविंद का क्रॉसओवर है. पॉपुलर यानी मेनस्ट्रीम सिनेमा और पैरलल सिनेमा की गहराई को पाटने की कोशिश है. कमर्शियल होने की चाह में. रेडिफ को दिए एक इंटरव्यू में गोविंद ने माना कि उन्होंने अपनी शैली से इतर पहली फिल्म बनाई है. क्योंकि वो बनाना चाहते थे. उन्होंने स्टार्स या मेनस्ट्रीम सिनेमा के दबाव में आकर अपनी फिल्म या उसके कॉन्टेंट के साथ कोई कॉम्प्रोमाइज़ नहीं किया है.

अजय देवगन की वजह से निहलानी ने बनाई थी ‘तक्षक’

दरअसल ये फिल्म बनी अजय देवगन की एक डिमांड की वजह से. अजय अपने करियर में काफी सही जा रहे थे. उनकी ‘दिलजले’, ‘इश्क’, ‘होगी प्यार की जीत’ जैसी फिल्में चल रही थीं. बावजूद इसके उन्होंने मसाला से दूर हुए बिना कॉन्टेंट वाली फिल्में करना शुरू किया. इस कड़ी में उनकी पहली फिल्म थी महेश भट्ट के डायरेक्शन में बनी ‘जख्म’ (1998). इसके लिए उन्हें बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड मिला. इसके बाद उन्होंने गोविंद निहलानी को अप्रोच किया. उनके साथ काम करने की इच्छा जताई. निहलानी ने कहा उनके पास एक आइडिया है, जिसमें अजय देवगन फिट हो जाएंगे. लेकिन स्क्रिप्ट में कुछ काम बाकी थी. इसलिए गोविंद ने अजय से कहा कि वो स्क्रिप्ट पूरी होने के बाद उन्हें सुनाएंगे. अजय ने कहा कि उन्हें स्क्रिप्ट पढ़ने की कोई ज़रूरत नहीं है. जब स्क्रिप्ट पर गोविंद का  काम पूरा हो जाए, वो तब फिल्म की शूटिंग शुरू करने के लिए तैयार हैं.

अजय देवगन- द स्टार का ऐसा बिहेवियर देखकर निहलानी सकते में आ गए. मनमोहन शेट्टी का तो प्रेशर था ही. ऐसे में उन्होंने ‘तक्षक’ ये सोचकर बनाई कि ये फिल्म उनके अगले प्रोजेक्ट के लिए संसाधन जुटाने के काम आएगी. मतलब इस फिल्म से जो कमाई होगी, उससे वो अपनी अगली फिल्म बना लेंगे. ‘तक्षक’ का मतलब होता है सांप. ये फिल्म के हिसाब से ठीक लगने के साथ-साथ साउंड भी अच्छा कर रहा था. इसलिए निहालानी ने अपनी फिल्म का नाम रखा ‘तक्षक’.

फिल्म 'तक्षक' की शूटिंग के दौरान सेट पर सोते अजय देवगन और दुल्हन की लिबास में बैठीं तबू.
फिल्म ‘तक्षक’ की शूटिंग के दौरान सेट पर सोते अजय देवगन और दुल्हन की लिबास में बैठीं तबू.

गोविंद निहलानी- द टफ टास्कमास्टर

अजय ने ‘तक्षक’ की शूटिंग कर दी. गोविंद भी खुश थे कि उनके सेट पर माहौल उनकी पिछली फिल्मों की ही तरह है. कुछ खास हो-हो, पो-पो वाली सिचुएशन नहीं थी. एक सीन शूट होना था. यहां अजय का सामना फिल्ममेकर गोविंद निहलानी से हुआ. अजय ने मिड-डे को दिए एक इंटरव्यू में शूटिंग का एक किस्सा बताया था. उन्होंने बताया कि एक सीन था, जहां उनके पिता की लाश उनकी आंखों के सामने पड़ी हुई है. गोविंद चाहते थे कि अजय बाप के मरने के भाव को पूरी तरह से महसूस करें. लेकिन बिना आंसू निकाले. उन्होंने अजय से कहा कि वो अपनी आंखों से एक्टिंग करें. वो दर्द आंसूओं के साथ निकलने की बजाय उनकी आंख में नज़र आना चाहिए. गोविंद निहलानी ने कहा कि उनकी फिल्म का हीरो नहीं रोएगा. आम तौर पर एक्टर्स आंख में ग्लिसरीन लगाकर आसानी से रोने वाले सीन्स शूट कर लेते हैं. लेकिन ये अजय के लिए नया एक्सपीरियंस था. फिल्म का वो सीन आप नीचे लगे वीडियो में 13वें मिनट से शुरू करके देख सकते हैं:

ये वो ट्रिविया टाइप किस्से हैं, जो कहीं से मुहैया हो जाएंगे. लेकिन किसी डिपार्टमेंट विशेष का रोल फिल्म में क्या होता है? ये बड़ा दिलचस्प सवाल है. हम जानेंगे, हम जानेंगे ‘तक्षक’ की म्यूज़िक मेकिंग के बारे में. उसी समय में आई कई फिल्में म्यूज़िकली ब्लॉकबस्टर रही हैं, वो क्यों नहीं? ‘तक्षक’ ही क्यों? इसलिए कि जो ब्लॉकबस्टर हो गईं, उनका बनना या होना सार्थक हो गया. लेकिन ‘तक्षक’ अपने समय की वो शानदार म्यूज़िकल फिल्म थी, जिसका म्यूज़िक फिल्म के कॉन्टेंट के नीचे दबकर अंडररेटेड वाली कैटेगरी में छिटक गया. इस फिल्म का म्यूज़िक ए.आर. रहमान ने किया था.

निहलानी ने रहमान का एक ही गाना 20 बार सुना और साइन कर लिया

गोविंद निहलानी वो पहले ओरिजिनल हिंदी भाषी फिल्ममेकर थे, जिन्होंने रहमान को अपनी फिल्म के लिए साइन किया था. इससे पहले मणिरत्नम, राम गोपाल वर्मा और प्रियदर्शन जैसे डायरेक्टर्स उनके साथ हिंदी फिल्मों में काम कर चुके थे, लेकिन वो मूलत: हिंदी लैंग्वेज के फिल्ममेकर नहीं थे. उनकी मदर टंग तमिल, तेलुगू या मलयालम थी. हम यहां किसी भी तरह का भाषाई भेद-भाव नहीं कर रहे, बस एक फन फैक्ट बता रहे हैं. खैर, गोविंद को उनके एक दोस्त ने ‘रोजा’ का म्यूज़िक कैसेट दिया. उन्होंने सुनना शुरू किया. वो  ‘चिन्न चिन्न आसई’ गाने पर अटक गए. उन्होंने उसे लगातार 20 बार सुना. इस एल्बम को सुनने के बाद वो सबसे पहले इन गानों को बनाने वाले के बारे में जानना चाहते थे. इसी समय उन्होंने तय किया कि वो रहमान के साथ कम से कम एक फिल्म में तो ज़रूर काम करेंगे. वही फिल्म बनी ‘तक्षक’. ‘चिन्न चिन्न आसई’ आप यहां सुन सकते हैं:

सुखविंदर और रहमान की जुगलबंदी

इन दोनों ने साथ में ‘छैंया छैंया’ (दिल से), ‘रुत आ गई’ (दीपा मेहता की अर्थ), ‘रमता जोगी’ (ताल), ‘मोहे रंग दे’ (तक्षक), ‘घनन घनन’ (लगान), ‘जय हो’ (स्लमडॉग मिलियनेयर) और ‘तोहे पिया मिलेंगे’ (रांझणा) जैसे शानदार गाने किए हैं. भले ही ‘छैंया छैंया’ से सुखविंदर पॉपुलर हुए लेकिन रहमान के फैन वो पहले से थे. दोनों की पहली मुलाकात 1997 में रिलीज़ हुई फिल्म नागार्जुन और सुष्मिता सेन स्टारर फिल्म ‘रक्षकन’ के सेट पर हुई थी. इस फिल्म में रहमान को थोड़ी देर स्क्रीन पर दिखना था. रहमान ने सुखविंदर को अप्रोच किया और कहा कि वो चाहते हैं कि स्क्रीन पर उनकी आवाज़ सुखविंदर बनें. यानी जब रहमान स्क्रीन पर गाते हुए दिखें, तो वो आवाज़ रहमान की न होकर सुखविंदर की हो. ये दोनों की पहली प्रोफेशनल बॉन्डिंग थी. इसके बाद सुखविंदर रहमान के साथ प्रॉपर तरीके से कोलैबरेट करना चाहते थे. उन्होंने रहमान को तब कॉन्टैक्ट किया, जब ‘तक्षक’ के म्यूज़िक पर काम चल रहा था. रहमान ने सुखविंदर को मिलने बुलाया. और काम भी ऑफर किया. लेकिन ये वो काम नहीं था, जिसके लिए सुखविंदर जाने जाते हैं. रहमान ने उन्हें गाना गाने का नहीं लिखने का काम दे दिया था. सुखविंदर ये मौका भी गंवाना नहीं चाहते थे. उन्होंने एक गाना लिखकर रहमान को दिया, जो फिल्म का सबसे हिट सॉन्ग बना. गाना था ‘मुझे रंग दे’. वो गाना आप नीचे देख सकते हैं:

रहमान के दो गाने हॉलीवुड गए और दोनों से सुखविंदर जुड़े थे. ये तब की बात है, जब ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ नहीं आई थी. हॉलीवुड के मशहूर फिल्ममेकर हैं स्पाइक ली. 2019 अकैडमी अवॉर्ड्स में उनकी फिल्म ‘ब्लैकक्लांसमैन’ को बेस्ट अडैप्टेड स्क्रीनप्ले के लिए ऑस्कर मिला था. 2006 में उन्होंने एक पिक्चर बनाई थी ‘इन्साइड मैन’. इस फिल्म के ओपनिंग क्रेडिट सीक्वेंस में रहमान के बनाए ‘छैंया छैंया’ का म्यूज़िक इस्तेमाल किया गया. इसके अलावा 2008 में आई फिल्म ‘द एक्सीडेंटल हस्बैंड’ में ‘तक्षक’ का गाना ‘मुझे रंग दे’ इस्तेमाल किया गया. ‘छैंया छैंया’ को जहां सुखविंदर ने गाया था, वहीं ‘मुझे रंग दे’ के बोल उन्होंने लिखे थे. ‘इन्साइड मैन’ का वो सीक्वेंस आप यहां देख सकते हैं:

जब रहमान ने अपना ही एक गाना रीमेक कर दिया

1999 में एक तमिल फिल्म आई थी अरविंद स्वामी और ईशा कोप्पिकर स्टारर ‘एन स्वास कात्रे’. के.एस रवि के डायरेक्शन में बनी इस फिल्म का म्यूज़िक भी रहमान ने किया था. फिल्म में एक गाना था ‘जुंबालका’. इसे रहमान ने ‘तक्षक’ में हिंदी लिरिक्स के साथ इस्तेमाल किया था. ओरिजिनल तमिल वर्ज़न के सिंगर रफी को हिंदी में शंकर महादेवन ने रिप्लेस किया और हिंदी फीमेल वोकलिस्ट थीं अलीशा चिनॉय. इस गाने के साथ एक इंट्रेस्टिंग किस्सा जुड़ा हुआ है. किस्सा  ये है कि दिया मिर्ज़ा से पहले उनका एक गाना बॉलीवुड में डेब्यू कर चुका था. हुआ ये था कि ‘जुंबालका’ के तमिल वर्ज़न में दिया एक बैकग्राउंड डांसर के तौर पर दिखाई दी थीं. ये फिल्म आई थी 1999 में और 2001 में रिलीज़ हुई ‘रहना है तेरे दिल में’ से दिया ने बतौर लीड हीरोइन बॉलीवुड में अपना डेब्यू किया. हम नीचे ‘जुंबालका’ गाना लगा रहे हैं, ज़रा चेक करिए दिया मिर्ज़ा कहां दिखाई देती हैं (हिंट- डोंट मिस द बिगनिंग):


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