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जब धर्मेंद्र से शादी कर शूटिंग पर पहुंचीं हेमा को डायरेक्टर ने दिनभर सेट पर बिठाए रखा!

1976 में आई असित सेन की ‘बैराग’ में काम करने के बाद दिलीप कुमार ने फिल्मों से ब्रेक ले लिया था. उन्होंने अगले पांच साल किसी फिल्म में काम नहीं किया. कट टु 1947. एक 9 साल का बच्चा पहली बार सिनेमाहॉल में पिक्चर देखने जा रहा था. फिल्म थी दिलीप कुमार और नूर जहां स्टारर ‘जुगनू’. इस फिल्म को देखने के बाद उस बच्चे ने तय किया कि वो सिनेमा की फील्ड में जाएगा. और किसी दिन अपने आइडल दिलीप साहब के साथ काम करेगा. इस बच्चे का नाम था हरकिशन गिरी गोस्वामी. 1949 में दिलीप कुमार की फिल्म ‘शबनम’ रिलीज़ हुई. इसमें उनके काम से प्रभावित होकर इस बच्चे ने अपना नाम बदलकर मनोज रख लिया. क्योंकि ‘शबनम’ में दिलीप साहब के किरदार का नाम मनोज था.

साल 1968 में भीम सिंह के डायरेक्शन में बनी फिल्म ‘आदमी’ रिलीज़ हुई. इस फिल्म में मनोज नाम का वो लड़का अपने आइडल दिलीप कुमार के साथ काम कर रहा था. अब हम वहां चलते हैं, जहां से हमने ये पूरी कहानी शुरू की थी. 1980 में जब दिलीप कुमार ब्रेक पर थे, तो उन्हें मनोज का फोन आया. तब तक उस लड़के को दुनिया मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार के नाम से जानने लगी थी. मनोज कुमार ने दिलीप साहब को फोनकर अपनी एक फिल्म में काम ऑफर किया. मनोज कुमार ने फोन पर कहा-

”राजा साहब, एक बहुत बोगस कहानी है और एक बहुत बोगस रोल है. मगर मुझे पता है कि इस रोल के साथ सिर्फ आप ही न्याय कर सकते हैं. क्या आप ये फिल्म करेंगे?”

दिलीप कुमार ने इस विचित्र ऑफर को सुनने के बाद मनोज कुमार को अपने घर बुलाया. ताकि वो फिल्म की कहानी सुन सकें. मनोज कुमार तब तक दिलीप साहब के यहां नहीं गए, जब तक उनकी स्क्रिप्ट कंप्लीट नहीं हुई थी. स्क्रिप्ट पूरी करने के बाद वो दिलीप कुमार के घर पहुंचे. मगर इस वक्त दिलीप साहब उनकी तीन घंटे का नैरेशन सुनने के मूड में नहीं थे. क्योंकि उनके भाई अस्पताल में भर्ती थे. मनोज कुमार ने कहा कि वो अपनी पूरी कहानी दो मिनट के भीतर सुना देंगे. फिल्म का क्विक नैरेशन सुनने के बाद दिलीप साहब ने कहा-

”हम्मम, जमीन तो काफी उपजाऊ है.”

मनोज कुमार ने तपाक से कहा-

”साथ मिलकर इसकी जुताई करते हैं. फसल अच्छी होगी.”

इस बातचीत के साथ मनोज कुमार ने दिलीप कुमार का पांच साल लंबा ब्रेक तोड़ दिया था. जिस फिल्म का ज़िक्र यहां हो रहा है, वो है 1981 में रिलीज़ हुई ‘क्रांति’. दिलीप कुमार, मनोज कुमार, शशि कपूर, हेमा मालिनी, शत्रुघ्न सिन्हा और परवीन बाबी को लेकर बनी इस फिल्म ने अपनी रिलीज़ के 40 साल पूरे कर लिए हैं. इसलिए आज फ्लैशबैक में जाकर इस फिल्म के बनने की मज़ेदार कहानी आपको बताएंगे.

एक मौके पर दिलीप कुमार के साथ मनोज कुमार. दिलीप कुमार को पांच साल लंबे ब्रेक से वापस लाने का काम मनोज कुमार ने किया था.
फिल्म ‘आदमी’ के एक सीन में दिलीप कुमार के साथ मनोज कुमार. दिलीप कुमार को पांच साल लंबे ब्रेक से वापस लाने का काम मनोज कुमार ने किया था.

# जब मनोज कुमार ने हेमा मालिनी को दिन भर सेट पर बिठाए रखा, मगर उनके साथ शूटिंग नहीं की

‘क्रांति’ अपने दौर की सबसे महंगी और कास्टिंग के लिहाज़ से सबसे बड़ी फिल्म थी. मनोज कुमार इसमें एक्टिंग करने के साथ-साथ फिल्म को डायरेक्ट भी कर रहे थे. कहा जाता है कि इस फिल्म को बनाने के लिए मनोज कुमार ने अपनी सारी संपत्ति गिरवी रख दी थी. खैर, एक दिन हेमा मालिनी सेट पर पहुंचीं और मनोज कुमार से कहा कि आज की शूटिंग जल्दी निपटा लें. हेमा उस दिन की शूटिंग इसलिए जल्दी खत्म करना चाहती थीं, ताकि वो अपनी दूसरी फिल्म ‘रज़िया सुल्तान’ के कुछ हिस्से शूट कर सकें. हेमा ‘रज़िया सुल्तान’ को अपने करियर की सबसे ज़रूरी फिल्म मानकर शूट कर रही थीं. क्योंकि ये वुमन सेंट्रिक फिल्म थी और इसमें उनका किरदार बेहद मजबूत था. बहरहाल, हेमा की इस डिमांड का मनोज कुमार ने कोई जवाब नहीं दिया. मगर इस बात से वो इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने हेमा का एक भी सीन शूट नहीं किया. उस दिन हेमा को बिना कोई सीन शूट किए सेट से लौटकर जाना पड़ा.

जब ‘रज़िया सुल्तान’ के डायरेक्टर कमाल अमरोही को ये बात पता चली, तो उन्होंने गुस्से में मनोज कुमार को फोन मिला दिया. मनोज कुमार ने कमाल साहब को कहा कि हेमा ने उनकी फिल्म की शूटिंग के लिए डेट्स दिए थे. ऐसे में उनकी प्रायोरिटी ‘क्रांति’ की शूटिंग होनी चाहिए. इस दौरान उन्हें किसी और फिल्म की शूटिंग नहीं करनी चाहिए. अगर किसी वजह से वो ‘क्रांति’ के अलावा कोई और फिल्म शूट कर रही हैं, तो उस फिल्म के डायरेक्टर को बात करके परमिशन लेनी चाहिए थी. कमाल अमरोही भले ही नाराज थे, मगर वो मनोज कुमार की बात से पूरी तरह सहमत थे. इसलिए उन्होंने बिना कुछ कहे फोन काट दिया.

फिल्म 'क्रांति' के एक गाने में हेमा मालिनी. हेमा, धर्मेंद्र के साथ शादी के फौरन बाद 'क्रांति' फिल्म के सेट पर पहुंची थीं.
फिल्म ‘क्रांति’ के एक गाने में हेमा मालिनी. हेमा, धर्मेंद्र के साथ शादी के फौरन बाद ‘क्रांति’ फिल्म के सेट पर पहुंची थीं.

इस किस्से का एक दूसरा वर्ज़न भी खूब चलता है. कहा ये जाता है कि हेमा मालिनी ने अपनी मर्ज़ी से उस दिन ‘क्रांति’ की शूटिंग नहीं की थी. वो किस्सा कुछ यूं चलता है कि जिस दिन धर्मेंद्र और हेमा की शादी हुई, उस दिन दोनों ही एक्टर्स अपनी फिल्मों की शूटिंग में व्यस्त थे. हेमा तब मनोज कुमार की ‘क्रांति’ शूट कर रही थीं. अपनी शादी वाले दिन उन्हें सफेद साड़ी पहने विधवा वाला हिस्सा शूट करना था. वो अपनी शादी वाले दिन सफेद साड़ी नहीं पहनना चाहती थीं. इसलिए उन्होंने उस दिन कोई शूटिंग नहीं की.

# कौन थे मंगेश देसाई, जिन्हें मनोज कुमार ने ‘क्रांति’ से जुड़े सबसे ज़रूरी काम के लिए जापान भेजा था?

मंगेश देसाई. ये नाम हमने कई जगहों पर सुना मगर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया. क्योंकि हमारा ध्यान परदे पर दिखने वाले एक्टर्स और उस फिल्म को बनाने वाले फिल्ममेकर तक सिमटकर रह जाता है. मंगेश देसाई इंडिया के सबसे मशहूर साउंड रिकॉर्डिस्ट और मिक्सर थे. अपनी फिल्म में साइन करने के लिए उनके पास डायरेक्टर्स और प्रोड्यूसर्स की भीड़ लगी रहती थी. मंगेश वहां सबकी फिल्में देखते और उन फिल्ममेकर्स को वहां से भगा देते, जिनकी फिल्म टेक्निकली दुरुस्त नहीं होती थी. 1975 में मंगेश ने 70 फिल्मों में साउंड रिकॉर्डिंग और मिक्सिंग का काम किया था. उन्हीं में से एक फिल्म थी ‘शोले’, जिसने इंडियन सिनेमा को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया.

फिल्म 'शोले' की साउंड रिकॉर्डिंग और मिक्सिंग सेशन के दौरान मंगेश देसाई के साथ अमिताभ बच्चन. इस तस्वीर के दाहिने कोने में सफेद कमीज पहने मंगेश देसाई नज़र आ रहे हैं.
फिल्म ‘शोले’ की साउंड रिकॉर्डिंग और मिक्सिंग सेशन के दौरान मंगेश देसाई के साथ अमिताभ बच्चन. इस तस्वीर के दाहिने कोने में सफेद कमीज पहने मंगेश देसाई नज़र आ रहे हैं.

‘शोले’ का साउंड मिक्सिंग लंदन के एक स्टूडियो में चल रहा था. वहीं के टेक्निशियन इस फिल्म पर काम कर रहे थे. तीन महीने बाद जब लंदन से ‘शोले’ इंडिया आई, तब भी मंगेश इस फिल्म पर अपना काम ज़ारी रखे हुए थे. साउंड मिक्सिंग के बाद उन्हें ये फिल्म देखते हुए कुछ खटक रहा था. मंगेश पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री में ‘शोले’ के डायरेक्टर रमेश सिप्पी बताते हैं कि उनकी फिल्म पर मंगेश ने एक बहुत ज़रूरी फीडबैक दिया. ‘शोले’ में ढेर सारे एक्शन सीन्स थे. इन सीन्स में गोलियों की आवाज़ कुछ ज़्यादा ही रियलिस्टिक रखी गई थी. मगर इंडियन ऑडियंस इस तरह की आवाज़ें सुनने की आदी नहीं थी. मंगेश ने कहा कि वो इस फिल्म में गोली चलने की आवाज़ को बदलना चाहते हैं. बाद में उन्होंने फिल्म के तमाम सीन्स में इस आवाज़ को बदला और ‘ढिश्कियाऊं’ वाला साउंड इफेक्ट डाल दिया. इतना ही नहीं ‘पाकीज़ा’ के गाने ‘चलते चलते’ के आखिर में ट्रेन की सीटी की आवाज़ भी मंगेश के कहने पर ही डाली गई. हालांकि इस बात से फिल्म के म्यूज़िक डायरेक्टर नौशाद बेहद खफा थे. मगर वो गाना बहुत बड़ा हिट साबित हुआ.

खैर, ‘पाकीज़ा’ और ‘शोले’ से लौटकर हम ‘क्रांति’ पर आते हैं. ‘क्रांति’ को भी उस दौर की तमाम फिल्मों की तरह 70 mm सिनेमास्कोप पर शूट किया गया था. ये एक खास किस्म की कैमरा लेंस होती है. मगर इस फिल्म की साउंड मास्टरिंग जापान में सोनी के ओरिजिनल स्टुडियो में की गई थी. मनोज कुमार चाहते थे कि उनकी फिल्मों के प्रिंट्स भी जापान से ही आएं. इसके लिए वो खुद जापान जाना चाहते थे. मगर उनके साथ एक दिक्कत थी. वो ये कि मनोज कुमार कभी फ्लाइट में ट्रैवल नहीं करते थे. और तब जापान के लिए पैसेंजर शिप नहीं चलती थी. ऐसे में मनोज कुमार ने अपने असिस्टेंट के साथ फिल्म के सारे नेगेटिव उठाए और ट्रेन से यात्रा शुरू कर दी. वो रास्ते में मंगेश देसाई को मिले और अपनी फिल्म के ओरिजिनल नेगेटिव उनके हवाले कर दिया. मंगेश हवाई रास्ते से जापान पहुंचे और वहां से फिल्म ‘क्रांति’ के प्रिंट्स लेकर इंडिया आए. ये बड़े भरोसे का काम था और सिर्फ उसे ही सौंपा जा सकता था, जिस पर आंख मूंदकर भरोसा किया जा सके. क्योंकि अगर उन नेगेटिव्स के साथ कुछ भी गड़बड़ होती, तो पूरी फिल्म खराब हो जाती है. और उसे दोबारा शूट करना पड़ता. मंगेश देसाई की कहानी हम डिटेल में किसी और दिन जानेंगे.

अपनी साउंड मिक्सिंग मशीनों के साथ साउंड जीनियस मंगेश देसाई.
अपनी साउंड मिक्सिंग मशीनों के साथ साउंड जीनियस मंगेश देसाई.

# जब मनोज कुमार ने मानसिक रूप से बीमार परवीन बाबी को मार दिया!

फिल्म ‘क्रांति’ में परवीन बाबी ने सुरीली का रोल किया था. फिल्म से उनका ‘मारा ठुमका’ नाम का गाना खूब चर्चित हुआ था. बताया जाता है कि इस फिल्म की शूटिंग के दौरान परवीन स्ट्रिक्ट डायट पर थीं. इस डायट के चक्कर में वो सेट पर बेहोश हो जाया करती थीं. ये वही दौर था, जब वो अपनी मानसिक बीमार से जूझ रही थीं. स्किट्ज़ोफ्रेनिया का तो नहीं पता मगर उनके बर्ताव में बदलाव तभी से दिखने लगे थे. 1983 में वो यू.जी.कृष्णमूर्ति के साथ एक स्पिरिचुअल जर्नी पर निकल गई थीं. इस दौरान वो विदेशों में रहीं और 1989 में वापस इंडिया आईं. कई राइट अप्स में बताया जाता है कि यू.जी. कृष्णमूर्ति ने परवनी को ये सलाह दी थी कि उन्हें फिल्मों से दूरी बना लेनी चाहिए. मगर इंडिया लौटने के बाद उन्होंने कई और फिल्में साइन कर लीं. हालांकि उन्होंने उन फिल्मों में काम नहीं किया. फिल्म ‘क्रांति’ से परवीन का चर्चित गाना ‘मारा ठुमका’ आप यहां सुन-देख सकते हैं-

खैर, हम ‘क्रांति’ की बात कर रहे थे. मनोज कुमार को फिल्म के सेट पर परवीन का बिहेवियर थोड़ा अजीब लग रहा था. इंडस्ट्री में परवीन बाबी से जुड़ी तमाम तरह की बातें हो रही थीं. प्रेस में भी बहुत कुछ छप रहा था. मनोज को लगा ये चीज़ उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है. हो सकता है, इससे उनकी फिल्म ‘क्रांति’ भी प्रभावित हो. इसलिए अच्छे-खासे रोल में साइन की गई इंडिया की टॉप हीरोइन परवीन बाबी को उन्होंने अपनी फिल्म से दूर करने का फैसला किया. उन्होंने गाने और कुछ सीन्स की शूटिंग के बाद फिल्म में परवीन के कैरेक्टर को मार दिया. इससे ये हुआ कि फिल्म से परवीन के किरदार सुरीली का ट्रैक खत्म हो गया. इसके बाद उन्हें ‘क्रांति’ के सेट पर आने की कोई ज़रूरत नहीं थी.


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