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जब राष्ट्रपति भवन में डिनर पर गए अमिताभ ने वहां का सालों पुराना नियम बदलवा दिया!

1983 में फिल्ममेकर टिनू आनंद ने अमिताभ बच्चन और डिंपल कपाड़िया को लेकर एक फिल्म बनाने की सोची. ये फिल्म बेसिकली डीसी कॉमिक्स के किरदार ‘सुपरमैन’ से प्रेरित थी. जिसमें एक ही आदमी के भीतर दो लोग रहते हैं. पहला शख्स है, डरा हुआ सा जर्नलिस्ट क्लार्क केंट और दूसरा, केपधारी सुपरमैन जो दुनिया को तमाम मुश्किलों से बचाता है.

ये वही फिल्म थी, जिसने पॉलिटिक्स के मारे अमिताभ बच्चन को फिल्मों में री-लॉन्च किया. जिस फिल्म को अमिताभ से खुन्नस खाई एक पॉलिटिकल पार्टी रिलीज़ नहीं होने देना चाहती, उस फिल्म को देखने के लिए सिनेमाघरों के बाहर हज़ारों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी. ये वो फिल्म थी, जिसकी शूटिंग से तीन दिन पहले अमिताभ को लगा कि शायद वो दोबारा कभी एक्टिंग नहीं कर पाएंगे. मगर इस एक फिल्म ने अमिताभ और उनके प्रति फिल्म इंडस्ट्री का रवैया हमेशा के लिए बदलकर रख दिया. जब लोगों को ये लगने लगा कि अमिताभ बच्चन ‘था’, तब इस फिल्म ने बताया कि अमिताभ बच्चन ‘है’. और शायद हमेशा रहेगा. हम बात कर रहे हैं अमिताभ बच्चन की कमबैक फिल्म ‘शहंशाह’ की. 1983 में प्लैन की गई ये फिल्म तमाम बाधाओं को पार कर 12 फरवरी, 1988 को रिलीज़ हुई. आज यानी कि ‘शहंशाह’ की रिलीज़ के 33 साल बाद हम इस फिल्म की मेकिंग पर चर्चा करेंगे.

# जब ‘शहंशाह’ की शूटिंग से तीन दिन पहले अमिताभ ने कहा- ‘शायद मैं दोबारा कभी एक्टिंग नहीं कर पाऊंगा’

फिल्म ‘शहंशाह’ में अमिताभ फिल्म ने एक करप्ट और डरपोक पुलिसवाले के रोल में थे, मगर रात को वो शहंशाह बनकर असामाजिक तत्वों से लड़ते थे. पुलिसवाला किरदार तो रेगुलर था, उसके लिए कुछ खास तैयारी नहीं करनी पड़ी. मगर ‘शहंशाह’ वाले हिस्से के लिए एक खास तरह का कॉस्ट्यूम डिज़ाइन किया जाना था. शुरुआत में टिनू ने ये प्लैन किया कि वो कॉस्ट्यूम पूरी तरह से ब्लैक लेदर का होगा. उसके साथ बच्चन का किरदार कंधे से एक रस्सी लटकाएगा. रस्सी इसलिए क्योंकि उसी से विजय या शहंशाह के पिता ने फांसी लगाकर अपनी जान दे दी थी. अब वो वही रस्सी क्रिमिनल्स को मारने के लिए इस्तेमाल करता है.

सब कुछ सेट था. तीन दिनों के बाद फिल्म की शूटिंग शुरू होने वाली थी. इस समय अमिताभ बच्चन अचानक से बीमार पड़ गए. अस्पताल ले जाने पर पता चला कि उन्हें मायसथेनिया ग्रेविस नाम की गंभीर बीमारी हो गई है. डॉक्टरों का कहना था कि अमिताभ शायद आगे कभी काम नहीं कर पाएंगे. अमिताभ ने टिनू को अस्पताल बुलाया और कहा-

”टिनू, मैं शायद दोबारा कभी एक्टिंग नहीं कर पाऊंगा. शायद मैं अपनी वो फिल्में पूरी करूं, जिनका काम बीच में रूका हुआ है. मगर मैं शहंशाह नहीं कर पाऊंगा. तुम प्लीज़ अपनी फिल्म में किसी और को ले लो.”

ये सुनकर टिनू सन्नाटे में आ गए. अगले एक साल तक इस मामले में कोई डेवलपमेंट नहीं हुई. इसी सबके बीच जो कॉस्ट्यूम टिनू ने ‘शहंशाह’ वाले रोल में अमिताभ के लिए बनवाई थी, वो बनकर तैयार हो गई. अमिताभ के पिछले कई कॉस्ट्यूम बनाने वाले टेलर अकबर ने ही ये वाला कॉस्ट्यूम भी बनाया था. मगर ‘शहंशाह’ के अटके होने की वजह से अकबर ने वो कॉस्ट्यूम एक साउथ इंडियन फिल्ममेकर के. बपैया को दे दिया, जो जीतेंद्र के साथ फिल्म बना रहे थे. ‘आग और शोला’ नाम की फिल्म में अपने हाथों से डिज़ाइन किए ड्रेस को जीतेंद्र के बदन पर देखकर टिनू के तोते उड़ गए.

'आग और शोला' फिल्म के इस पोस्टर पर जो कॉस्ट्यूम जीतेंद्र पहने नज़र आ रहे हैं, वो एक्चुअली 'शहंशाह' में अमिताभ के पहनने के लिए डिज़ाइन की गई थी.
‘आग और शोला’ फिल्म के इस पोस्टर पर जो कॉस्ट्यूम जीतेंद्र पहने नज़र आ रहे हैं, वो एक्चुअली ‘शहंशाह’ में अमिताभ के पहनने के लिए डिज़ाइन की गई थी.

दूसरी तरफ अमिताभ की तबीयत में तेजी से सुधार आ रहा था. पूरी तरह चंगे होने के बाद अमिताभ टिनू से मिले और ‘शहंशाह’ पर काम शुरू करने की बात कही. साथ ही वो अपना कॉस्ट्यूम भी देखना चाहते थे, जो टिनू ने बनवाया था. अमिताभ को पूरी राम कहानी बताने के बाद दोनों किशोर बजाज नाम के एक डिज़ाइनर के यहां पहुंचे. बहुत सारे कैटलॉग वाली किताब छानने के बाद फाइनली उन्हें एक ऐसा कॉस्ट्यूम मिला, जो शहंशाह को पहनाया जा सकता था. मगर इस ड्रेस के साथ एक भारी-भरकम आर्म पीस यानी बाजुओं पर लगाने वाला एक पीस भी था. कुल मिलाकर इस कॉस्ट्यूम का वजन हो रहा था 14 किलो, जिसे अमिताभ को ‘शहंशाह’ के हर-एक फाइट सीक्वेंस में पहनना था. जब फिल्म की शूटिंग शुरू हुई, तब तक टिनू ने उस आर्मपीस की जगह अल्यूमिनियम से बना एक हल्का आर्म पीस बनवा लिया था. ताकि बीमारी से लौटे अमिताभ को शूटिंग में कोई तकलीफ न हो. जब अमिताभ से वो हल्का वाला आर्म पीस पहनने को कहा गया, तो उन्होंने मना कर दिया. उनका कहना था कि आर्म पीस का वजन कम होने से उनकी बॉडी लैंग्वेज बदल जाएगी, जो देखने में अजीब लगेगा.

फिल्म के एक फाइट सीक्वेंस में भारी-भरकम कॉस्ट्यूम के साथ ओरिजिनल आर्म पीस पहने अमिताभ बच्चन.
फिल्म के एक फाइट सीक्वेंस में भारी-भरकम कॉस्ट्यूम के साथ ओरिजिनल आर्म पीस पहने अमिताभ बच्चन.

# जब अपनी फिल्म से प्रेरित होकर, अमिताभ ने राष्ट्रपति भवन का ये नियम बदलवा दिया

‘शहंशाह’ की शूटिंग चालू होने के बाद फुल स्पीड में चल रही थी. मगर फिल्म के एक ज़रूरी सीन को लेकर टिनू आनंद और अमिताभ बच्चन में ठन गई. टिनू अपने एक इंटरव्यू में बताते हैं कि उन्होंने एक सीन विज़ुअलाइज़ किया. वो सीन कुछ ऐसा था कि पुलिस की वर्दी पहने अमिताभ का किरदार फिल्म के विलन जेके यानी अमरीश पुरी के चैंबर में जाता है. अमिताभ का कहना था कि वो इस सीन में पुलिस की वर्दी नहीं ब्लेज़र पहनेंगे. दोनों में से कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं था. मगर पंगा ये था कि ये अमरीश पुरी का सेट पर आखिरी दिन था. अगले दिन से वो किसी दूसरी फिल्म की शूटिंग के लिए आउटडोर यानी दूसरे शहर या देश जा रहे थे. अगर अमरीश अपना सीन शूट किए बगैर चले जाते, तो टिनू को बहुत नुकसान हो जाता. उन्हें अमरीश से दोबारा डेट्स लेने पड़ते. उनके बंबई आने का इंतज़ार करना पड़ता. कुल मिलाकर ये उनके लिए खर्चीला सौदा होने वाला था.

फिल्म 'शहंशाह' के एक सीन में अपने चिर-परिचित अंदाज़ में मीनाक्षी पर बंदूक ताने अमरीश पुरी.
फिल्म ‘शहंशाह’ के एक सीन में अपने चिर-परिचित अंदाज़ में मीनाक्षी पर बंदूक ताने अमरीश पुरी.

टिनू की बात से नाराज़ होकर अमिताभ अपने कमरे में चले गए. वो बाहर आने को तैयार नहीं थे. दो घंटे बाद जब टिनू उनके कमरे में पहुंचे, तो देखा कि अमिताभ ने अब तक पुलिस की वर्दी नहीं पहनी है. टिनू ने उन्हें फिर से कहा कि वो शूट के लिए पुलिस की वर्दी पहनकर बाहर आ जाएं. मगर अमिताभ ने कहा कि वो टिनू के पिता इंदर राज आनंद से बात करना चाहते हैं. टिनू के पिता को फिल्म के सेट पर बुलाया गया. अमिताभ से बातचीत के बाद इंदर साहब ने उनकी बात का समर्थन किया. मगर टिनू के समझाने पर उन्हें उस पुलिस की वर्दी की अहमियत समझ आई. वो दोबारा अमिताभ के पास पहुंचे.

जहां इंदर साहब और अमिताभ खड़े थे, वहां एक डस्टबिन पड़ी थी. इंदर साहब ने उस कूड़ेदान की तरफ ईशारा करते हुए कहा-

”अमित तुम्हें ये डस्टबिन दिख रहा है? इसमें सफेद, केसरिया और हरे रंग के फटे-चिटे कपड़े गिरे हुए हैं. अगर इन कपड़ों को तुम एक साथ सिल दोगे, तो ये तिरंगा बन जाएगा. उस तिरंगे के लिए तुम अपनी जान दे भी सकते हो और किसी की जान ले भी सकते हो. ठीक उसी तरह एक वर्दी आपको आम इंसान से ऐसे इंसान के रूप में तब्दील करती है, जिसके पास देशहित में कुछ करने की अथॉरिटी है.”

अमिताभ, इंदर राज आनंद की बात समझे और ब्लेज़र की जगह पुलिस की वर्दी पहनकर वो सीन शूट किया.

फिल्म के एक सीन में मीनाक्षी और अमरीश पुरी के साथ अमिताभ. जिस सीन की चर्चा हमने ऊपर वाले पैरा में की, ये वो सीन है या नहीं, ये कन्फर्म नहीं है.
फिल्म के एक सीन में मीनाक्षी और अमरीश पुरी के साथ अमिताभ. जिस सीन की चर्चा हमने ऊपर वाले पैरा में की, ये वो सीन है या नहीं, ये कन्फर्म नहीं है.

अगली बार अमिताभ बच्चन और टिनू आनंद ‘मैं आज़ाद हूं’ नाम की फिल्म पर काम कर रहे थे. इसमें अमिताभ के अपोज़िट शबाना आज़मी नज़र आई थीं. तब अमिताभ को राजनीति की गलियों से लौटे ज़्यादा दिन नहीं हुए थे. एक दिन राजकोट में शूटिंग के दौरान बात-बात में शबाना ने अमिताभ से एक सवाल पूछ लिया. शबाना ने पूछा कि क्या MP रहते हुए उन्होंने कोई चीज़ बदली या कोई नया कानून लेकर आए?

इसका जवाब हां में देते हुए अमिताभ ने एक रोचक किस्सा सुनाया. अमिताभ ने बताया कि वो एक बार राष्ट्रपति भवन में डिनर करने गए थे. जब वो खाने की मेज पर बैठे, तो सामने लगी प्लेट पर उनकी नज़र गई. सब लोग जिस प्लेट में खाना खा रहे थे, उस प्लेट पर राष्ट्रीय प्रतीक यानी अशोक स्तंभ बना हुआ था. उन्हें वो चीज़ पसंद नहीं आई. उन्होंने संसद में अपनी बात रखते हुए कहा कि खाने की प्लेट पर राष्ट्रीय प्रतीक का होना, उसका अपमान है. बकौल अमिताभ, इसके कुछ ही दिन बाद एक कानून पारित हुआ, जिसमें ये कहा गया कि खाने की प्लेटों पर राष्ट्री प्रतीक नहीं होगा. साथ ही अमिताभ ने शबाना को ये भी बताया कि ‘शहंशाह’ के सेट पर इंदर राज आनंद के साथ हुई उस बातचीत की वजह से उन्हें राष्ट्रपति भवन में वो ख्याल आया था.

# मरते-मरते राइटर ने लिखा था फिल्म ‘शहंशाह’ का क्लाइमैक्स

फिल्म शहंशाह का आइडिया टिनू आनंद के दिमाग की उपज थी. इस फिल्म को लिखा था टिनू के पिता इंदर राज आनंद ने. उन्होंने राज कपूर के लिए ‘संगम’ समेत 4 फिल्में लिखी थीं. मगर क्रेडिट प्लेट पर स्टोरी का क्रेडिट जया बच्चन को दिया गया था. इंदर राज आनंद को स्क्रीनप्ले और डायलॉग राइटर का क्रेडिट मिला था. एक इंटरव्यू में टिनू से पूछा गया कि जया बच्चन की लिखी कहानी पर फिल्म बनाने का क्या प्रोसेस रहा. इसके जवाब में टिनू ने बताया कि वो कहानी जया ने नहीं उन्होंने अपने पिता के साथ मिलकर लिखी थी. मगर एक निजी कारण से फिल्म की राइटर का क्रेडिट जया बच्चन को दिया गया. हालांकि उन्होंने वो निजी कारण बताने से इन्कार कर दिया. बहरहाल, इंदर राज आनंद ‘शहंशाह’ के डायलॉग्स लिख रहे थे. मगर क्लाइमैक्स तक पहुंचने से पहले ही उनकी तबीयत बिगड़ गई. उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा.

इंदर राज आनंद की तस्वीरें बड़ी मुश्किल से मिल पाई हैं. इसलिए फोटो की बुरी क्वाॉलिटी के लिए माफी.
इंदर राज आनंद की तस्वीरें बड़ी मुश्किल से मिल पाई हैं. इसलिए फोटो की बुरी क्वाॉलिटी के लिए माफी.

एक बार टिनू अपने पिता से मिलने अस्पताल पहुंचे, पिता के साथ-साथ उन्हें अपनी फिल्म की भी बहुत चिंता थी. फिल्म का क्लाइमैक्स 23 पन्नों का था. उसमें ढेर सारे डायलॉग्स लिखे जाने थे, जो आखिरी कोर्ट सीन में अमिताभ बच्चन को बोलना था. सेट बन चुका था. टिनू परेशान थे कि अगर समय पर डायलॉग्स नहीं लिखे गए, तो उनकी फिल्म फिर से लटक जाएगी. इंदर साहब ने अस्पताल में टिनू को चिंतित देख अपने पास बुलाया और कहा-

”तुम फिक्र मत करो, मैं तुम्हारा क्लाइमैक्स लिखकर ही अपनी आखिरी सांस लूंगा.”

इसके बाद इंदर साहब ने टिनू के असिस्सेंट को अस्पताल बुलाया और डायलॉग बोल-बोलकर लिखवाने लगे. जैसे-तैसे करके उन्होंने 23 पन्ने की स्क्रीनप्ले का डायलॉग लिखवा दिया. डायलॉग्स लेकर टिनू अपनी फिल्म के सेट पर पहुंचे. जैसे ही अमिताभ बच्चन का गाड़ी लेकर कोर्ट में घुसने वाला सीन शूट हुआ, खबर आई कि इंदर राज आनंद नहीं रहे.

'शहंशाह' के एक सीक्वेंस की शूटिंग से पहले डायलॉग और सीन्स पर चर्चा करते अमिताभ और फिल्म के डायरेक्टर टिनू आनंद.
‘शहंशाह’ के एक सीक्वेंस की शूटिंग से पहले डायलॉग और सीन्स पर चर्चा करते अमिताभ और फिल्म के डायरेक्टर टिनू आनंद.

# जब ‘शहंशाह’ की रिलीज़ रोकने के लिए सिनेमाघर के बाहर फायरिंग चालू हो गई

अमिताभ बच्चन ने 1985 से 1987 के बीच कोई नई फिल्म नहीं साइन की थी. हालांकि इस बीच उनकी पुरानी शूट की हुई फिल्में रिलीज़ हो रही थीं. मगर 1987 वो साल था, जब उनकी एक भी फिल्म रिलीज़ नहीं हुई थी. ‘शहंशाह’ को उनकी कमबैक फिल्म के तौर पर देखा जा रहा था. फिल्म ट्रेड भी ‘शहंशाह’ और अमिताभ को लेकर बहुत श्योर नहीं था. पॉलिटिक्स से लौटने के बावजूद बोफोर्स घोटाला समेत कई विवाद उनके साथ जुड़े हुए थे. इसी बीच विनोद खन्ना के साथ एक एक्सीडेंट हो गया, जिसका ज़िम्मेदार अमिताभ को माना गया. हुआ ये था कि एक फिल्म की शूटिंग के दौरान अमिताभ को शीशे की गिलास फेंकनी थी. उस सीन की शूटिंग के दौरान वो गिलास विनोद खन्ना के चेहरे पर जा लगा. इससे विनोद खन्ना के चेहरे पर ठोडी से लेकर होंठ तक एक बड़ा कट आ गया. एक्टर्स के लिए उनका चेहरा बड़ा ज़रूरी होता है. ऐसे में ये कहा गया कि विनोद खन्ना इकलौते ऐसे एक्टर थे, जो अमिताभ के लेवल का स्टारडम छू सकते थे. इसलिए अमिताभ ने जो किया, वो जानबूझकर किया. हालांकि ये अपुष्ट-गॉसिप टाइप की खबरें हैं.

फिल्म 'हेरा फेरी' के एक फाइट सीन में अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना.
फिल्म ‘हेरा फेरी’ के एक फाइट सीन में अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना.

कहने का मतलब उस समय में परिस्थितियां अमिताभ के अनुकूल नहीं थीं. तिस पर अमिताभ के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शन और डिस्ट्रिब्यूटर्स के साथ पंगे की वजह से ‘शहंशाह’ की रिलीज़ डेट दो बार पोस्टपोन की जा चुकी थी. ‘शहंशाह’ पहले 6 अगस्त, 1987 को रिलीज़ होने वाली थी. बाद में फिल्म की रिलीज़ डेट आगे बढ़ाकर 27 नवंबर कर दी गई. फाइनली टिनू आनंद डायरेक्टेड ‘शहंशाह’ 12 फरवरी, 1988 को सिनेमाघरों रिलीज़ हो पाई. फिल्म की रिलीज़ से पहले देश के तमाम सिनेमाघर मालिकों को एक लेटर मिला. इसमें कहा गया था कि अगर उनके सिनेमाघरों में अमिताभ की ‘शहंशाह’ रिलीज़ हुई, तो उनके थिएटर्स को आग लगा दिया जाएगा. मगर इस धमकी पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. फिल्म की रिलीज़ वाले दिन एक फोन आया. इसमें दूसरी तरफ से ये कहा गया कि उनकी धमकी को गंभीरता से न लेने का खामियाज़ा भुगतने का समय आ गया है.

फिल्म 'शहंशाह' का ऑफिशियल पोस्टर. ये फिल्म रिलीज़ से पहले दो बार पोस्टपोन हो चुकी थी क्योंकि राजनीतिक हालात अमिताभ के अनुकूल नहीं थे.
फिल्म ‘शहंशाह’ का पोस्टर. ये फिल्म रिलीज़ से पहले दो बार पोस्टपोन हो चुकी थी क्योंकि राजनीतिक हालात अमिताभ के अनुकूल नहीं थे.

अपने एक इंटरव्यू में टिनू आनंद बताते हैं कि अमिताभ बच्चन लंबे समय बाद लौट रहे थे. देशभर के सिनेमा प्रेमी लोग एक्साइटेड थे. मगर कुछ लोग ऐसे भी थे, जो नहीं चाहते थे कि ‘शहंशाह’ रिलीज़ हो. बकौल टिनू वो बॉम्बे एक थिएटर में फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने के लिए पहुंचे थे. ताकि ये जान सकें कि फिल्म को लेकर दर्शकों का रिएक्शन क्या है. मगर वहां एक प्रोटेस्टर ने बंदूक निकालकर फायरिंग शुरू कर दी. जिससे वो शो डिस्टर्ब हो गया. डर के मारे लोग यहां-वहां भागने लगे. कुछ दिन बाद टिनू दिल्ली गए हुए थे. वहां उन्होंने देखा कि एक पेट्रोल पंप पर बहुत सारे लोग जमा हैं. उन्हें लगा कि कुछ पंगा हुआ होगा. पास जाकर पता चला कि पेट्रोल पंप के बगल में एक थिएटर है, जिसमेमं ‘शहंशाह’ चल रही है. हज़ारों लोगों की भीड़ वहां उनकी फिल्म ‘शहंशाह’ देखने के लिए जमा हुई थी.


वीडियो देखें: अमिताभ के हाथ पर बना टैटू कैसे फिल्म ‘दीवार’ का सबसे अहम हिस्सा बन गया?

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