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आनंद बख्शी की कहानी: जब आत्महत्या के लिए पटरी पर लेटा शख्स उनका गाना सुनकर घर लौटा

मैं अंधेरों को मिटा दूंगा चरागों की तरह

आग सीने में लगा लूंगा, मैं जल जाऊंगा

जादूगर. शब्दों की जादूगरी जिसका फ़न है. जिसके गीत नाव की तरह मन में तैरते हैं. जिसकी कलम से गानों का झरना फूटा करता था. जिसने एक बार इस झरने का पानी पिया, वो बार-बार, कई बार इसकी ओर लौटा. उसने अपनी कलम से ऐसी आग लगायी जो सिर्फ़ और सिर्फ़ उसी की कलम से बुझाई सकती है. जो कहता है:

जिस गली में तेरा घर न हो बालमा

उस गली से हमें तो गुज़रना नहीं

फ़िल्म इंडस्ट्री भी उसके बारे में बेशक़ यही राय रखती है. जहां आनंद बख्शी न हों वहां कैसे गीत! कैसा संगीत! कैसे सुपरस्टार! उन्होंने जिसको ज़मीन से उठाया सीधे आसमान पर बिठा दिया. पर ख़ुद हमेशा ज़मीन पर रहे.  जावेद अख्तर के शब्दों में कहें तो:

हिंदुस्तान को गीतों का मुल्क कहते हैं.  इसलिए कि यहाँ की अनगिनत ज़बानों में, हर मौक़े के लिए अनगिनत लोकगीत हैं. लेकिन मुझे कभी-कभी लगता है कि ये अनगिनत गीत न भी होते तो भी हिन्दुस्तान को गीतों का मुल्क कहने के लिए अकेले आनंद बख्शी साहब काफ़ी थे. 

ऐसे बख्शी साहब के कुछ चुनिन्दा किस्से आपके सामने पेश-ए-खिदमत हैं.

# रावलपिंडी से अपार प्रेम

24 फरवरी 1931: आनंद बख्शी अपने पिता के साथ लाहौर चिड़िया घर में क्रेडिट:pinterest
24 फरवरी 1931: आनंद बख्शी अपने पिता के साथ लाहौर चिड़िया घर में
क्रेडिट: Pinterest

1930 में रावलपिंडी में जन्मे आनंद बख्शी को पिंडी से बड़ा प्रेम था. उन्होंने जो कुछ भी लिखा उसका श्रेय सिर्फ़ और सिर्फ़ उन 17 सालों को देते थे, जो पाकिस्तान में गुज़रे. सातवीं पास बख्शी साहब ने भाषा, शब्दकोश और शब्द बरतने की कारीगरी वहीं सीखी. वही पूरे जीवन काम आई. उसी के सहारे 4 दशकों का लम्बा करियर और 4000 से ज़्यादा गाने बड़ी सहजता से लिख गये.  रावल पिंडी के लिए वो कहते हैं:

याद पिंडी की आती है अब किसलिए, मेरी मिट्टी थी झेलम में वो बह गयी

रास्ते में खड़ी हो गयीं सरहदें, सरहदों पर खड़ी बेबसी रह गयी

#मुंबई जाने के लिए नेवी जॉइन की

आनंद बख्शी जब नेवी में थे
आनंद बख्शी जब नेवी में थे

आज से लगभग 75 साल पहले कराची के साहिल पे खड़े बख्शी ने मुम्बई जाने का सपना देखा. उन्होंने नेवी सिर्फ़ इसलिए जॉइन की क्योंकि वो सोचते कि कराची के डॉक से एक दिन शिप निकलेगा और उन्हें मुम्बई के डॉक पर ला पटकेगा. बदकिस्मती से ये हो न सका. शिप कराची के डॉक पर ही बंधा रहा. देश का बंटवारा हो गया. परिवार भारत आ गया.

#सबसे पहले सिंगर बनने गये मुंबई

जब आनंद बख्शी इंडियन आर्मी थे
जब आनंद बख्शी इंडियन आर्मी थे

भारत आकर आर्मी जॉइन की.  पर मुंबई जाने का सपना अब भी मन में था. नौकरी छोड़ दी. एक दिन मुंबई के लिए निकल पड़े. घर वालों ने धमकी दी. अच्छी खासी नौकरी छोड़कर जा तो रहे हो, फेल हुए तो लौटकर मत आना. बख्शी साहब भी ज़िद्दी. घर वालों की एक न सुनी. सिंगर बनने मुम्बई पहुंच गये. सही सुना आपने. लिरिसिस्ट नहीं सिंगर बनने. पहले वो रफ़ी और मुकेश से इंस्पायर होकर सिंगर बनना चाहते थे. कुछ दिन मुम्बई में हाथ-पांव मारे. काम नहीं मिला. सारे पैसे खत्म हो गये. फिर मोटर मकैनिक का काम किया. पर गैराज के मालिक ने काम न आने के कारण भगा दिया. हौसले पस्त हो गये. ज़िद टूट गयी. घर वापसी हुई. घर वालों ने दोबारा आर्मी जॉइन करवा दी. उसके बाद 6-7 साल तक आर्मी की नौकरी की.

#लिरिसिस्ट बनने का किस्सा

आर्मी में रहने के दौरान ख़ूब फ़िल्में देखीं. सिंगर बनने का सपना देख रहे आनंद के अंदर अब एक गीतकार पनपने लगा. वो सोचते कि इस फ़िल्म का गाना मैं लिखता तो क्या लिखता. ऐसा करते-करते उन्होंने 60-65 कविताएं लिख डालीं. वो एक इंटरव्यू में कहते हैं:

रात को हमारे फील्ड एरिये में दूर-दूर तक लाउडस्पीकर लगे होते थे. मैं उनके नीचे खड़ा हो जाता था. जब लाउडस्पीकर पर किसी गीतकार का गीत बजता था, तो बोलते थे अब सुनें फलां गीतकार की रचना. मेरे दिल में एक हूक सी उठती. क्या कभी ऐसा भी दिन आएगा कि किसी स्पीकर से मेरा नाम भी लिया जाएगा कि अब सुनिए आनंद बख़्शी की रचना.

दोस्तों ने हौसला बढ़ाया और दोबारा नौकरी छोड़कर मुंबई पहुंच गये. फिर तो जो हुआ, उससे आप भलीभांति परिचित हैं.

#फ़िल्म की पूरी कहानी सुनकर ही लिखते गाने

प्यारेलाल और सुभाष घई के साथ आनंद बख्शी
प्यारेलाल और सुभाष घई के साथ आनंद बख्शी

इधर से कहानी डालो उधर से गाने निकलते. बख्शी साहब की कहानी, किरदार और सिचुएशन पर बहुत अच्छी पकड़ थी. यह सब आर्मी में बिताये उनके दिनों की देन है. वो फ़िल्म देखकर आर्मी बैरक वापस आते, तो उसके सारे गाने फ़िल्म की कहानी और परिस्थिति के अकॉर्डिंग अपने लफ्ज़ों में लिखते. फिल्मों में गाने लिखने के दौरान भी वो सिर्फ़ सिचुएशन नहीं, पूरी कहानी सुनते. तब जा के गाने लिखते. कुछ डायरेक्टर्स के साथ ज़्यादा सफल होने पर वो कहते थे:

इन डायरेक्टर्स ने मुझे अच्छी कहानी दी. मुझे इंस्पायर किया. एक लिरिक्स राइटर के पास कवि की तरह सोचने के लिए स्वतंत्रता नहीं होती. उसे एक्सप्रेशन की ज़रूरत होती है. जो उसे देते हैं डायरेक्टर और स्क्रीनराइटर.

उनको यह नॉलेज था कि स्टोरी में ही गाना है. स्टोरी में ही लिरिक्स हैं. उनके बेटे राकेश बख्शी कहते हैं:

मुझे सुभाष घई साहब बोलते थे कि मैं जब भी बख्शी साहब को फ़िल्म की कहानी सुनाने आता था, 6-7 गाने लिखने के लिए 6-7 महीने लग जाते हैं. एक शूटिंग. फिर दूसरी शूटिंग का शेड्यूल. तो वो हमेशा हर एक गाने के लिए पूरी कहानी नरेट करवाते थे.

एक बार महेश भट्ट ने बख्शी साहब को अपनी फ़िल्म जख्म की कहानी नरेट की. जो उनकी मां की कहानी है. और एक सिचुएशन पर उन्हें गाना लिखने को कहा. तो बख्शी साहब ने पूछा:

तुम्हारे पिता, मां से कितने दिनों में मिलने आते थे.

तो महेश भट्ट ने इंग्लिश में कहा:

वंस इन अ ब्लू मून. 

बस फिर क्या बख्शी साहब ने गाना लिख दिया: ‘तुम आये तो आया, मुझे याद गली में आज चांद निकला’

# ज़ोरदार बारिश में पहुंच गये डायरेक्टर के घर

सन 58-59 के क़रीब उनके पास फिल्में नहीं थीं. वो आर्मी छोड़कर आये थे. उनकी सेविंग्स खत्म हो रही थीं. एक बार वह म्यूजिक डायरेक्टर रोशन को फिल्मिस्तान स्टूडियो में मिले. उनसे अपने गीत सुनने का आग्रह किया. बहुत मान-मनौवल के बाद रोशन साहब माने और उन्हें दूसरे दिन 10 बजे अपने घर सांताक्रूज बुलाया. बख्शी साहब घर चले गये. वो उस समय एक टिकट कलेक्टर के साथ बोरीवली में रहते थे. उस रात मुम्बई में इतनी बरसात हुई कि शहर डूब गया. बसें बंद. ट्रेन बंद. टैक्सी बंद. पूरा मुंबई पानी-पानी. तो उन्होंने अंदाज़ा लगाया कि अगर मैं अभी (यानी सुबह के 6 बजे) यहां से चलना शुरू करूं, तो 10 बजे तक रौशन साहब के घर पहुंच जाऊंगा. अपनी गीतों वाली नोटबुक ली. छतरी उठाई और पैदल चलकर ठीक 10 बजे रोशन साहब के घर पहुंच गये. बेल बजाई.

रोशन साहब ने दरवाज़ा खोलते ही पूछा:

तुम इतनी बरसात में यहां क्या कर रहे हो?

बख्शी ने जवाब दिया:

आपने ही तो बुलाया था. गीत सुनने के लिये.

रोशन बोले:

तो इतनी बरसात में आना ज़रूरी नहीं था.

उन्होंने कहा:

सर, आपके लिए ज़रूरी नहीं था. पर मेरे लिए बहुत ज़रूरी था.

#‘8 मिनट में लिख देते थे गाना’

लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ आनंद बख्शी
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ आनंद बख्शी

आनंद बख्शी के गानों में रहस्यवाद से ज़्यादा जीवन की सरलता है. वो आम आदमी के गीतकार हैं. उनकी ख़ासियत थी, वो कुछ देखते और उसका गीत बना देते. उन्हें श्रोताओं के दिल में उतरना आता था. साधारण परिस्थितियों से वो गीत निकाल लाते थे. एक बार उन्होंने सिकन्दर और पोरस का नाटक देखा और एक गीत बना डाला. सिकंदर को पोरस के सामने बंधा देख उन्होंने लिखा: ‘मार दिया जाए या छोड़ दिया जाए, बोल तेरे साथ क्या सुलूक किया जाए.’ संगीतकार उनकी रफ़्तार का लोहा मानते थे. उनकी गीत लिखने की स्पीड इतनी तेज़ थी कि एक बार लक्ष्मीकांत ने कहा था:

जहां दूसरे गीतकार गीत लिखने के लिए सात-आठ दिन लेते हैं, वहीं आनंद बख्शी आठ मिनट में गाना लिख देते हैं. 

सुभाष घई उनके डिसीप्लिन और पंक्चुएलिटी के कायल थे. वो दो सप्ताह कहते तो दिन में गाना लिखकर दे देते और दो दिन कहते तो दो घंटे में. घई आनंद बख्शी के बारे में कहते हैं:

मैंने इतनी फिल्में बनायीं. कभी-कभी मेरी फ़िल्म का शूट धूप की वज़ह से डिले हुआ, कभी बरसात की वज़ह से, तो कभी एक्टर्स की डेट न मिलने के कारण. पर बख्शी साहब ने आज तक कभी भी एक गाना लेट नहीं दिया. 

# नुसरत साहब को देखकर रो पड़े बख्शी

आनंद बख्शी और नुसरत साहब
आनंद बख्शी और नुसरत साहब

मिलन लुथरिया ने एक फ़िल्म बनायी, ‘कच्चे धागे’. फ़िल्म में म्यूजिक दिया नुसरत साहब ने. यह उनकी बॉलीवुड में आख़िरी फ़िल्म थी. गीत लिखे आनंद बख्शी ने. नुसरत साहब और आनंद बख्शी पहली बार एक साथ काम कर रहे थे. जब नुसरत साहब कच्चे धागे का म्यूजिक देने भारत आये, तो लगभग एक महीने के लिए होटल में रुके. उस वक्त उनका वज़न बहुत था. वो बहुत ज़्यादा कहीं आ जा नहीं सकते थे. उन्होंने बख्शी साहब को कहलवा भेजा कि वो होटल ही आ जाएं. बख्शी साहब को नुसरत इगोइस्टिक लगे. इधर बख्शी कुछ लिखकर भेजते, नुसरत उसे रिजेक्ट कर देते. उधर नुसरत कोई धुन बनाकर भेजते, तो बख्शी उसे रिजेक्ट कर देते. 15-20 दिनों तक यही होता रहा. एक दिन नुसरत साहब ने कहा, मुझे उठाकर बख्शी साहब के घर ले चलो. वो घर पहुंचे. तो आनंद बख्शी क्या देखते हैं कि 7-8 लोग नुसरत साहब को उठाये लिये चले आ रहे हैं. बख्शी रो पड़े और बोले मैंने तो कुछ और ही गलतफहमी पाल रखी थी. आप चलिए मैं आपके साथ होटल में ही रहूंगा. फिर क्या इस जुगलबंदी ने ‘इस शाने करम का क्या कहना’ जैसे गाने दिये.

# क्या था उनका सबसे बड़ा अवॉर्ड!

आनंद बख्शी को 40 फ़िल्म फेयर नॉमिनेशन्स मिले. पर अवॉर्ड सिर्फ़ चार. उनके बेटे राकेश बख्शी बताते हैं: ‘क्या उन्हें इसका मलाल है. यह पूछने पर अपने वो कहते: यह जो चार अवॉर्ड हैं, मेरे जाने के बाद इनसे तुम अपना घर सजाना. मुझे जो अवॉर्ड चाहिए था वो मिल गया है. और फिर एक किस्सा सुनाते. बहुत साल पहले मुझे एक शख्स ने चिट्ठी लिखी थी.

मैं अपनी ज़िन्दगी से तंग आ गया था. मेरे पास काम नहीं था. आमदनी नहीं थी. मुझे पता नहीं था कि घर वापस कैसे जाऊं. तो मैंने सोचा, रेलवे ट्रैक पर जाकर लेट जाऊं. मैं गया और रेल की पटरी पर लेट गया. ट्रेन का इंतजार करने लगा. ट्रेन आएगी. मैं इन सबसे मुक्त हो जाऊंगा. पर ऐसा हुआ कि उसी रेलवे ट्रैक के किनारे एक बस्ती थी. वहां से रेडियो की आवाज़ आयी और मेरे कानों में पड़ी: ‘गाड़ी का नाम न कर बदनाम, पटरी पे रख के सर को, हिम्मत न हार कर इंतज़ार आ लौट जाएं घर को’. और मैं घर लौट गया.

आनंद बख्शी कहते यह वो अवॉर्ड है, जो मैं अपने अगले जन्म में लेकर जाऊंगा और यह चार मैं तुम घर वालों के लिए छोड़कर जाऊंगा.

#’मेरी जान, मेरे गानों ने ली है’

आनंद बख्शी और राजेश खन्ना
आनंद बख्शी और राजेश खन्ना

आनंद बख्शी के गानों ने बहुत ऐक्टर्स को सुपरस्टार बनाया. पर राजेश खन्ना को तो सफलता के पर लगा दिए. ‘आराधना’ फ़िल्म के गानों के चलते ही उन्होंने अपना स्टारडम हासिल किया. जब बख्शी साहब की डेडबॉडी घर में पड़ी थी, तो उनसे किसी ने पूछा कि काका आप यहां क्या कर रहे हैं. आप तो किसी के फ्यूनरल पर नहीं जाते. उन्होंने कहा:

यह जो आदमी लेटा है ना, इसने मेरी ज़िन्दगी बना दी.

जब उन्हें दूसरी बार हार्ट अटैक आया, वो हॉस्पिटल में थे. डॉक्टर ने कहा पेसमेकर लगाना पड़ेगा और उन्हें सलाह दी कि सिगरेट, पान-तम्बाकू और शराब छोड़ दें.  जब डॉक्टर चला गया तो आनंद बख्शी ने कहा:

यह डॉक्टर उल्लू का पट्ठा है. बेवकूफ़ है. यह नहीं जानता मेरी जान मेरी सिगरेट, शराब या तम्बाकू ने नहीं ली है.  मेरी जान, मेरे गानों ने ली है.

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