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वेब सीरीज़ रिव्यू- ये काली काली आंखें

नेटफ्लिक्स पर ‘ये काली काली आंखें’ नाम की सीरीज़ रिलीज़ हुई है. जिसका नाम ‘बाज़ीगर’ फिल्म के गाने से लिया गया है. ओवरऑल भी ये सीरीज़ शाहरुख खान की फिल्मों को ट्रिब्यूट देने वाले हिसाब से ही बनाई गई है. बस कैरेक्टर्स के जेंडर एक्सचेंज कर दिए गए हैं. इस सीरीज़ में आपको ‘डर’ से लेकर ‘अंजाम’ और ‘चाहत’ जैसी फिल्मों की झलक दिखेगी. और ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ के ‘पलट सीन’ की डिट्टो कॉपी. ‘ये काली काली आंखें’ में आपको बहुत सी ऐसी चीज़ें दिखेंगी, जो आप पहले देख चुके हैं. बस उन चीज़ों के मायने, यहां थोड़ा हटके हैं.

इस सीरीज़ की कहानी ओंकारा नाम के एक फिक्शनल शहर में घटती है. मगर आप कभी श्योर नहीं हो पाते कि ये टाउन UP में है कि MP में. या यूं कहें कि सीरीज़ नहीं चाहती कि आप किसी राज्य विशेष की इमेज में बंधकर इस कहानी देखें. बहरहाल, विक्रांत नाम का एक लड़का है. उसने अपनी इंजीनियरिंग पूरी कर ली है. अब अपने सपने पूरे करने चाहता है. उसका सपना बड़ा अन-एंबिशस है. वो एक छोटा सा घर चाहता है, जिसमें एक छोटा सा गार्डन हो. यहां वो अपनी गर्लफ्रेंड शिखा के साथ शांति से रहे. मगर एक पंगा है. वो ये कि इलाके के बाहुबली और विधायक अखिराज अवस्थी विद्रोही की इकलौती बिटिया पूर्वा को विक्रांत पर बचपन से क्रश है. वो विक्रांत से शादी करना चाहती है. ‘ये काली काली आंखें’ पॉलिटिकल बैकग्राउंड में घटने वाली बेसिक सी लव ट्रायंगल है.

अखिराज अवस्थी, अपनी बिटिया पूर्वा और अपने खास आदमी धर्मेश के साथ.
अखिराज अवस्थी, अपनी बिटिया पूर्वा और अपने खास आदमी धर्मेश के साथ.

इस सीरीज़ की खासियत ये है कि उसे पता है कि वो बहुत फार-फेच्ड ड्रामा क्रिएट करने जा रही है. जिसमें सोसाइटी से लेकर पॉलिटिक्स और लव का एंगल है. मगर वो कभी अपने बेसिक आइडिया से हटकर कुछ क्रांतिकारी करने की कोशिश नहीं करती. वो अपनी कहानी को लेकर उतनी ही पजेसिव है, जितना विक्रांत को लेकर पूर्वा. शाहरुख खान ने कई फिल्मों में ऑब्सेसिव लवर का रोल किया है. ये सीरीज़ वैसा ही एक कैरेक्टर बुनती है. मगर उसका जेंडर चेंज कर देती है. पूर्वा, विक्रांत को स्कूल के दिनों से चाहती है. मगर विक्रांत हमेशा उससे दूर भागता रहा. तब भी जब उसकी लाइफ में शिखा नहीं थी. जबकि पूर्वा उसके दूर भागने वाली अदा पर ही निसार बैठी थी. ये दो किरदारों के बीच पाया जाने वाला बड़ा कॉमप्लिकेटेड इक्वेशन है. मगर सीरीज़ देखते हुए आपको ये सब बड़ा सिंपल लगता है. यही इस सीरीज़ की यूएसपी है.

अपने क्रश विक्रांत के साथ पूर्वा.
अपने क्रश विक्रांत के साथ पूर्वा.

‘ये काली काली आंखें’ पॉपुलर इंडियन वेब सीरीज़ स्टार्टर पैक है. आप लीजिए एक मिडल क्लास फैमिली से आने वाला लड़का. उसमें एक बाहुबली फैमिली डालिए. फिर उनके पॉलिटिकल एंबिशंस को थोड़ी देर तक कहानी में घुमाइए. जब माहौल बनने लगे तो एक लव ट्रायंगल इंट्रोड्यूस कर दीजिए. बीच-बीच में थोड़ा खून-खराबा चलता रहे. और फिर स्वादानुसार गाली-गलौज डालकर ओटीटी प्लैटफॉर्म पर पटक दीजिए.

ये सब किसी सीरीज़ को देखकर, उसके बारे में ज्ञान झाड़ देने से कहीं ज़्यादा मुश्किल काम है. ‘ये काली काली आंखें’ इस मुश्किल काम को आसानी से कर ले जाती है. हम ये नहीं कह रहे कि edge of your seat thriller है. मगर ये कहीं भी अझेल या बोरिंग नहीं होती. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ये सीरीज़ हर डेढ़-दो एपिसोड के बाद अपना मिजाज़ बदल देती है. मगर अपने मुद्दे से नहीं भटकती. इसका फोकस हमेशा इसी बात पर रहता है कि पूर्वा हर हाल में विक्रांत को पाना चाहती है. मगर विक्रांत किसी भी हाल में शिखा के साथ होना चाहता.

 हैप्पी कपल विक्रांत और शिखा. मगर इनकी खुशी ज़्यादा समय तक टिक नहीं पाती.
हैप्पी कपल विक्रांत और शिखा. मगर इनकी खुशी ज़्यादा समय तक टिक नहीं पाती.

‘ये काली काली आंखें’ में विक्रांत का रोल किया है ताहिर राज भसीन ने. ताहिर का करियर काफी सही दिशा में बढ़ रहा है. अभी-अभी वो ’83’ में सुनील गावस्कर के रोल में दिखाई दिए हैं. फिर वूट सेलेक्ट पर आई सीरीज़ ‘रंज़िश ही सही’ में वो लीड रोल कर रहे हैं. इसी दौरान उनकी एक और सीरीज़ ‘ये काली काली आंखें’ रिलीज़ हो जाती है. अगले महीने वो तापसी पन्नू के साथ ‘लूप लपेटा’ में नज़र आने वाले हैं. खैर, इस सीरीज़ में ताहिर का रोल एक ऐसे लड़के का जिसकी लाइफ की स्टीयरिंग उसके हाथ में नहीं है. ये बड़ा वल्नरेबल कैरेक्टर है, जिसे वापस अपनी लाइफ का कंट्रोल चाहिए. पब्लिक उनके दुख के साथ रिलेट करती है. उनके कैरेक्टर का एक आर्क है, जिसे वो बड़े आराम से कैरी कर ले जाते हैं.

पूर्वा एक प्रॉपर साइकोपैथ कैरेक्टर है. साइकोपैथ कैरेक्टर होने की पहली शर्त होती है कि वो कैरेक्टर दिखने में साइकोपैथ न लगे. और आंचल बिल्कुल वैसी नहीं दिखती.
पूर्वा एक प्रॉपर साइकोपैथ कैरेक्टर है. साइकोपैथ कैरेक्टर होने की पहली शर्त होती है कि वो कैरेक्टर दिखने में साइकोपैथ न लगे. और आंचल बिल्कुल वैसी नहीं दिखती.

पूर्वा अवस्थी का रोल किया है आंचल सिंह ने. पूर्वा को देखकर ‘एक्शन जैक्सन’ में मनस्वी ममगई का निभाया कैरेक्टर याद आता है. यहां हम एक चीज़ पॉइंट आउट करना चाहते हैं कि जिन लोगों ने ‘एक्शन जैक्सन’ नहीं देखी है, वो बड़े लकी लोग हैं. क्योंकि आपने अपने जीवन के ढाई बेशकीमती घंटे बचा लिए. उन ढाई घंटों के साथ आप कुछ भी करेंगे, वो ‘एक्शन जैक्सन’ देखने से ज़्यादा प्रोडक्टिव और फन एक्टिविटी होगी. खैर, पूर्वा एक प्रॉपर साइकोपैथ कैरेक्टर है. साइकोपैथ कैरेक्टर होने की पहली शर्त होती है कि वो कैरेक्टर दिखने में साइकोपैथ न लगे. और आंचल बिल्कुल वैसी नहीं दिखती. अखिराज अवस्थी का रोल किया है सौरभ शुक्ला ने. सौरभ ने ऐसे रोल्स पहले भी कई बार निभाए हैं और इसमें उनके करने के लिए कुछ भी नया नहीं था. सूर्य शर्मा ने अखिराज के खास आदमी धर्मेश का रोल किया है. ‘अनदेखी’ में उनकी जो परफॉर्मेंस थी, उस लिहाज़ से इस सीरीज़ में उन्हें खूब अच्छे से वेस्ट किया गया है. गर्दा मचाया है बृजेंद्र काला ने. उन्होंने विक्रांत के पिता सूर्यकांत का रोल किया है. वो आदमी जिस सीन में है, उसे आप एंजॉय किए बिना नहीं रह सकते. फर्राटे के साथ गाली देने वाला बाप, जो अपने बेटे को कुछ नहीं समझता. ये अच्छे कैरेक्टर ट्रेट्स नहीं हैं. मगर परफॉरमेंस आला दर्जे की है.

सूर्यकांत के रोल में बृजेंद्र काला. सीरीज़ के एक सीन में अपने बेटे विक्रांत के साथ सूर्यकांत.
सूर्यकांत के रोल में बृजेंद्र काला. सीरीज़ के एक सीन में अपने बेटे विक्रांत के साथ सूर्यकांत.

‘ये काली काली आंखें’ देखने का ओवरऑल एक्सपीरियंस ये है कि ये सीरीज़ इतनी लंबी है कि इसे देखते-देखते आपको वाकई डार्क सर्कल्स आ सकते हैं. डार्क से याद आया, इस सीरीज़ के डायलॉग्स वरुण बडोला ने लिखे हैं, जो कतई ह्यूमरस और मज़ेदार हैं. इस सीरीज़ में कोई ऐसी चीज़ नहीं है, जो आपने पहले न देखी हो. मगर जो चीज़ पहले देख चुके हैं और पता है कि वो नुकसानदेह नहीं है. तो उसे देखा जा सकता है. ‘ये काली काली आंखें’ को डायरेक्ट किया है सिद्धार्थ सेनगुप्ता ने. 8 एपिसोड लंबी इस सीरीज़ को आप नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम कर सकते हैं.


वीडियो देखें: क्यूबिकल्स 2 वेब सीरीज़ रिव्यू-

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