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ये बैले: मूवी रिव्यू (नेटफ्लिक्स)

मुंबई के दही हांडी फेस्टिवल के दौरान एक लड़का सबसे ऊपर चढ़कर हांडी तोड़ देता है. लड़के के गले में पांच-पांच सौ के नोटों की माला है. ये सीन कट होता है एक थप्पड़ पर. थप्पड़ उसी लड़के को पड़ा है जो पिछले सीन में माला पहनकर नाच रहा था. थप्पड़ मारने वाला उसका चाचा है-

सच्चा मुसलमान दूसरे मज़हबों के तीज त्योहारों में हिस्सा नहीं लेता है.

ये सीन है ‘ये बैले’ मूवी का. इसी मूवी में एक और डायलॉग है-

एक तो तुम्हें चुपचाप इस देश में जीने दे रहे हैं. अब हमारे सिर पे मूतेगा तू…

ये और ऐसे ही कई सीन्स और डायलॉग्स हैं ‘ये बैले’ में, जिनसे पता चलता है कि सांप्रदायिकता और अपने धर्म को लेकर कट्टरता का पूरे भारत में क्या हाल है. लेकिन ये कट्टरता, ये सांप्रदायिकता, ‘ये बैले’ का मेन प्लॉट नहीं है. जैसा कि एक जगह अमेरिका से आया बैले टीचर सोल बताता है-

ये धार्मिक दंगे भाड़ में जाएं. सब जगह ऐसा ही है. इज़राइल में भी. इसलिए मैं वो देश छोड़कर अमेरिका चला गया. वहां भी ऐसा ही है. एकमात्र एस्केप है- डांस.

'ये बैले' है.
‘ये बैले’ है.

तो, इस मूवी का मेन प्लॉट बैले है. एक वेस्टर्न डांस फॉर्म. बहुत मुश्किल.

# 2017 में आई थी एक डॉक्यूमेंट्री-

मुंबई के दो बैले डांसर्स. एक का नाम मनीष चौहान और दूसरे का नाम अमिरुद्दीन शाह. मनीष एक कैब ड्राइवर का लड़का और अमिरुद्दीन भी गरीब मां-बाप की औलाद. दो साल पहले (2017 में) इनपर एक डॉक्यूमेंट्री आई थी. नाम था ‘ये बैले’.

इस डॉक्यूमेंट्री के बनने से तीन साल पहले (2014 में) दोनों एक इज़राइली-अमेरिकन बैले टीचर येहूदा माओर से मिले. इस मुलाकात ने उनकी ज़िंदगी बदल दी. दोनों को यूएस के विख्यात ‘जॉफ्री बैले स्कूल’ से स्कॉलरशिप मिली लेकिन ये लोग चाहकर भी वहां नहीं जा पाए. वीज़ा रिजेक्ट हो गया. लेकिन इस सब के बाद इनके और बैले के बीच के रिश्ते की हैपी एंडिंग हुई.

यही इस डॉक्यूमेंट्री में दिखाया गया था. डॉक्यूमेंट्री की विशेषता ये थी कि ये एक वीआर (वर्चुअल रियलिटी) डॉक्यूमेंट्री थी. मतलब 360 डिग्री पर शूट की गयी और देखने वाले भी इसमें हर सीन को पूरा 360 डिग्री घुमाकर देख सकते थे. थ्योरी में बात न समझ आई हो तो आप वो डॉक्यूमेंट्री ही देख लीजिए-

इस डॉक्यूमेंट्री को सूनी तारापोरेवाला ने डायरेक्ट किया था. सूनी ने मीरा नायर के साथ मिलकर ऑस्कर नॉमिनेटेड मूवी ‘सलाम बॉम्बे’ लिखी थी. मीरा ने उनके साथ मिलकर और भी कई क्रिटिकली एक्लेम्ड मूवीज़ बनाई हैं. जैसे ‘मिसिसिपी मसाला’, ‘दी नेमसेक’ वगैरह. इसके बाद सूनी तारापोरेवाला ने ‘लिटिल ज़िज़ु’ नाम की मूवी लिखी और डायरेक्ट की. 2008 में आई ‘लिटिल ज़िज़ु’ मुंबई के पारसी समुदाय पर बेस्ड एक कॉमिक-ड्रामा मूवी थी. न केवल इसे क्रिटिक्स ने सराहा बल्कि इसने नेशनल अवॉर्ड भी जीता. ‘परिवार कल्याण पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म’ कैटेगरी में रजत कमल.

अब इन्हीं डायरेक्टर की एक फुल लेंथ मूवी आई है. नाम है ‘ये बैले’. जी, वही नाम जो इनकी 2017 में आई डॉक्यूमेंट्री का था. नाम ही नहीं इन दोनों का कंटेट भी सेम है. बस 21 फरवरी को रिलीज़ हुई मूवी में थोड़ी बहुत, या बहुत ज़्यादा सिनेमेटिक लिबर्टी ली गई है. क्यूंकि आफ्टरऑल ये एक फुल लेंथ मूवी है. इसे सिनेमाघरों पर नहीं ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म, ‘नेटफ्लिक्स’ पर रिलीज़ किया गया है. अब ये सब बेसिक जानकारी के बाद आ जाते हैं, इस मूवी के रिव्यू पर.

'सूनी तारापोरेवाला' की वो फ़िल्में जिनका ज़िक्र इस स्टोरी में है.
‘सूनी तारापोरेवाला’ की वो फ़िल्में जिनका ज़िक्र इस स्टोरी में है.

# क्या स्टोरी है ‘ये बैले’ की-

हमने आपको डॉक्यूमेंट्री की कहानी बताई. ऐसा ही कुछ मूवी में भी होता है. निशु एक कैब ड्राईवर का लड़का है. घर में पैसे की कमी है लेकिन पिता लड़के की पढ़ाई में कमी नहीं आने देना चाहता. उधर निशु छुपकर डांस में अपना करियर बनाने में लगा हुआ है. अपने पिता से किताबों के लिए मिले पैसे से भी वो एक डांस एकेडमी जॉइन कर लेता है. निशु की मां भी सिलाई वगैरह करके पैसे कमा रही है और उसे भी निशु के डांस करने से दिक्कत है. निशु की बहन उसे डांस में सपोर्ट करती है. जब तक निशु छुपकर डांसिंग वगैरह में लगा हुआ था, तब तक तो ठीक था लेकिन जैसे ही उसके पिता को पता चलता है वो उसे घर से निकाल देते हैं.

उधर दूसरी तरफ झुग्गी में रहने वाला आसिफ़ बी-बोइंग करता है. बी-बोइंग एक डांस फॉर्मेट है, जिसके कई वीडियोज़ यू ट्यूब पर हैं देखकर समझ जाइएगा. बस ये समझ लीजिए, जैसा संगीत में रैप है वैसा ही डांस में बी-बोइंग.

तो आसिफ़ का चाचा बहुत कट्टर है, उसे नाचने-गाने या हिंदू त्योहारों में आसिफ़ के जाने से दिक्कत है. वो थप्पड़ वाला सीन जो शुरू में बताया था, वो आसिफ़ और उसके चाचा के बीच ही था. अब चूंकि ये चाचा, घर का इकलौता कमाऊ बंदा है इसलिए इसकी घर में बहुत चलती है और आसिफ़ का पिता भी इससे दबकर रहता है. आसिफ़ का भी उसी डांस एकेडमी में एडमिशन हो जाता है, जिसमें निशु है. फ्री में. स्कॉलरशिप में. क्यूंकि आसिफ़ एक अच्छा डांसर है.

तीसरा मेन कैरेक्टर है सोल. अमेरिका से आया तुनकमिजाज इज़राइली बैले डांसर. ये कैरेक्टर आपको कभी-कभी ‘जागृति’ (1954) का प्यारा टीचर शेखर और कभी ‘व्हिपलेश’ के गालीबाज़ टीचर शैफर कंजरवेटरी की याद दिलाता है. सोल के बारे में जब निशु कहता है-

आप नारियल की तरह हो, बाहर से सख्त अंदर से सॉफ्ट

ये मनीष चौहान हैं. इनके ऊपर ही 'ये बैले' का किरदार निशु बेस्ड है. और 'ये बैले' में निशु का किरदार इन्होंने ही निभाया भी है.
ये मनीष चौहान हैं. इनके ऊपर ही ‘ये बैले’ का किरदार निशु बेस्ड है. और ‘ये बैले’ में निशु का किरदार इन्होंने ही निभाया भी है.

तो सोल बोलता है-

मुझे नारियल से नफ़रत है.

इन तीनों की और इन तीनों के बैले से रिश्ते की कहानी है ‘ये बैले’. बैले, जो उस डांस फॉर्मेट से ठीक उल्टा है, जो निशु और आसिफ़ इस डांस एकेडमी में सीखकर आए हैं. जैसा कि निशु की दोस्त नीना बताती है-

बैले से ब्यूटीफुल डांस फॉर्म और कोई नहीं है. एंजल की तरह हवा में उड़ने जैसा है. जैसे किसी खूबसूरत ड्रीम में हो. पर रियलिटी में तो ये रुला देता है. इसको जिसने कर लिया, मानो एवरेस्ट की पीक पर खड़ा है.

बैले, जिसे निशु बैलेट बोलता है. नीना उसे टोकती है. फिर बताती है, कितनी खूबसूरत डांस फॉर्म है ये.
बैले, जिसे निशु बैलेट बोलता है. नीना उसे टोकती है. फिर बताती है, कितनी खूबसूरत डांस फॉर्म है ये.

# कैसी है ‘ये बैले’-

मूवी की सबसे अच्छी बात, इसका फील गुड फैक्टर है. देखकर आप ठहाके लगाकर हंसते नहीं हो, लेकिन मुस्कुराते कई जगह पर हो. इमोशनल भी कई जगह पर होते हो. रिलेट भी कई जगह कर पाते हो.

लेकिन ये ‘कई जगह पर’ ही इस मूवी का नेगेटिव भी है. क्यूंकि कई सीन अपने आप में बेशक बहुत दमदार हैं, लेकिन वो गुड डे बिस्किट में आने वाले काजू सरीखे हैं. पूरी मूवी में दूर-दूर छितरे हुए. अफ़सोस ये है कि इस मूवी में काजू कतली बनने की पूरी क्षमता थी.

रियल स्टोरी पर बेस्ड इस मूवी की स्टोरी लिखने में तो खैर क्रिएटिव लिबर्टी ली ही गई है, लेकिन स्क्रिप्ट में तो ये लिबर्टी कुछ ज़्यादा ही हो जाती है. इसलिए ही कई सीन्स बड़े क्लिशे लगते हैं. मज़े की बात यही सीन फिल्म में कुछ इमोशन्स भी लाते हैं. जैसे ड्राइवर पिता की वो प्रतिक्रिया, जब वो अपने बेटे निशु को हॉस्पिटल में डांस करते हुए देखते हैं. या आसिफ़ के चाचा की वो प्रतिक्रिया, जब वो अपने भतीजे के बारे में सुनते हैं कि वो डांसिंग के लिए अमेरिका जाएगा. या आसिफ़ के पिता के मौन का टूटना. या निशु का हर धर्मस्थल (मंदिर, मस्ज़िद, चर्च) पर हाथ जोड़ना. या वीज़ा पाने के दौरान सोल के एफर्ट्स.

'एक मुस्लिम, किसी हिंदू त्योहार में' टाइप क्लिशे आपको 'रंग दे बसंती' के असलम नाम के कैरेक्टर की याद दिलाता है.
‘एक मुस्लिम, किसी हिंदू त्योहार में’ टाइप क्लिशे आपको ‘रंग दे बसंती’ के असलम नाम के कैरेक्टर की याद दिलाता है.

कई चीज़ें अच्छे से डेवलप नहीं की गईं हैं. इसलिए हर सीन, हर फ्रेम और कुल मूवी भी अच्छी होते हुए भी कहीं कुछ मिसिंग लगता है. लगता है शायद थोड़ा ‘बैले’ और होना था, आखिर मूवी बैले पर बेस्ड है. शायद किरदारों की डेप्थ कम रह गई. जब वो ‘नारियल’ वाला डायलॉग कहा जाता है तब पता चलता है कि टीचर का कैरेक्टर लेयर्ड बनाने की कोशिश की गई है. देखिए, कभी गुस्से और कभी अपनत्व भर से अगर आप किसी कैरेक्टर की लेयर्स बना रहे हो तो ये एक दर्शक को ‘ऑन योर फेस’ लगता है.

अपने ट्रीटमेंट में अगर ये आपको ये प्रोजेक्ट ‘गली बॉय’ का लो कॉस्ट प्रोडक्शन वर्ज़न लगता है तो इसके कई कारण हैं. एक तो ये मुंबई की झुग्गियों की और वहां के निम्न मध्यमवर्ग की कहानी है. दूसरा ये कीचड़ में कमल खिलने या कोयले की खान में हीरा पाए जाने की कहानी है. तीसरा कॉमन फैक्टर है, विजय मौर्या. जिन्होंने दोनों ही फिल्मों के डायलॉग्स लिखे हैं.

अगर आपको मूवी के कुछ सीन्स ‘सैराट’ की याद दिलाते हैं तो उसका कारण है दोनों ही फिल्मों के डायरेक्टर्स का अपनी-अपनी मूवी को रियलिटी के करीब रखने का आग्रह, लीड एक्टर्स का टीनएजर्स होना और महराष्ट्र का बैकड्रॉप. ‘ये बैले’ का एक गीत ‘घेऊन टाक’ भी अपने पिक्चराइजेशन में ‘झिंगाट’ के काफी करीब लगता है.

लेफ्ट में 'झिंगाट' राईट में 'घेऊन टाक'.
लेफ्ट में ‘झिंगाट’ राईट में ‘घेऊन टाक’.

एक्टिंग की बात की जाए तो मनीष चौहान ने खुद अपने से इंस्पायर्ड किरदार का रोल किया है. मतलब निशु का. डांस उनका फोर्टे है, एक्टिंग नहीं. इसलिए वहां पर बाज़ी आसिफ़ का रोल करने वाले अचिंत्य बोस मार ले जाते हैं. साथ में वो डांस वाले डिपार्टमेंट में भी उन्नीस नहीं ठहरते. एक्टिंग सोल का किरदार निभाने वाले जुलियन सेंड्स ने भी अच्छी की है.

डायरेक्शन अच्छा है. मुंबई अच्छी और सच्ची दिखती है. सिनेमैटोग्राफी, जो वैसे तो बेहतरीन है, लेकिन इसके साथ एक दिक्कत है. वो ये कि इसमें भारत को ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ या ‘सलाम बॉम्बे’ की तरह विदेशी चश्मे से देखने का प्रयास किया गया लगता है. गीत, जो दो तीन हैं, वो नहीं होते तो बेहतर था. खासतौर पर ‘घेऊन टाक’ वाला, जो ‘मानसून वेडिंग’ जैसी किसी इंडो-वेस्टर्न मूवी का री-विज़िट है. यानी यहां भी वही विदेशी चश्मे से देखने वाली बात.

एक सीन में सोल गुस्से में, दूसरे में केयरिंग और तीसरे में हेल्पिंग हो जाता है. क्यूं और कैसे के उत्तर भी बड़े पारंपरिक हैं.
एक सीन में सोल गुस्से में, दूसरे में केयरिंग और तीसरे में हेल्पिंग हो जाता है. क्यूं और कैसे के उत्तर भी बड़े पारंपरिक हैं.

 

# देखें या नहीं-

कुल मिलकर ‘ये बैले’ एक अच्छी मूवी है. ‘ये बैले’ की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि ये इससे कहीं बेहतर हो सकती थी. गोया बीज अच्छा था, खाद पानी की दिक्कत रह गई. आईडिया अच्छा था लेकिन एंड प्रोडक्ट उतना बेहतर नहीं बन पाया. फिर भी, ऑरिजनल स्क्रिप्ट वाली अच्छी हिंदी मूवीज़ भी कम ही देखने को मिलती हैं इसलिए ये देखी जा सकती है. ये मूवी इसलिए भी देखी जा सकती है कि आप जान सकें कि नेटफ्लिक्स में ‘ड्राइव’ और ‘हाउस अरेस्ट’ के पार, जहां और भी हैं.


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