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गांधी के दादा, जिन्होंने अंग्रेजों की पोल-पट्टी खोल दी थी

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1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद भारत में चारों ओर ठंडई छा गई थी. अंग्रेज भी सहमे थे. बता नहीं रहे थे किसी को. किसी तरह का सैनिक विद्रोह नहीं चाहते थे. और अब देश में पॉलिटिक्स लाना चाहते थे. पर देश में बहुत सारे लोग ब्रिटिश कानून से परिचित नहीं थे. बहुत ही कम लोग थे, जो उसकी बारीकियों को समझ पाते. पर ऐसे लोगों ने अपनी जिम्मेदारी को समझा. दादाभाई नौरोजी उन लोगों में से एक थे. उस ज़माने में ब्रिटिश पार्लियामेंट के सांसद थे. बेहद जानकार. बम्बई के एल्फिन्स्टन कॉलेज में प्रोफेसर थे. मैथ और नैचुरल फिलॉसफी पढ़ाते थे. मैथ उनका फेवरेट सब्जेक्ट था.

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आइए पढ़ते हैं इनके बारे में, क्योंकि….

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4 सितम्बर 1825 को बम्बई में जन्म हुआ था दादाभाई का. 4 बरस की उम्र में डैडी नहीं रहे. मां मानेकबाई ने उनको अकेले पाला. खुद पढ़ी-लिखी नहीं थीं, पर दादा भाई को पढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ा. दादाभाई को दादाभाई बनाने में मां का ही योगदान था.

2.


दादाभाई एल्फिन्स्टन इंस्टिट्यूट में साहित्य पढ़ने गए. मात्र 15 साल की उम्र में इनको तीसमार खान समझा जाने लगा. उसी समय इनको क्लेयर स्कॉलरशिप भी मिल गई. उस वक्त के रिवाज के हिसाब से दादाभाई नौरोजी की शादी 11 साल की उम्र में ही गुलबाई से हो गई थी.

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25 की उम्र में एल्फिन्स्टन इंस्टिट्यूट में ही प्रोफेसर बन गए. वहां उस वक्त तक सिर्फ ब्रिटिश प्रोफेसर ही हुआ करते थे. वहां के प्रोफेसर इनको The Promise of India कहा करते थे.

4.


लंदन की कामा एंड कंपनी में पार्टनर बन गए. ब्रिटेन में पहली भारतीय कंपनी. कुछ दिन काम किया. फिर कंपनी की मजबूरियों और गड़बड़ियों के चलते इस्तीफ़ा दे दिया. फिर खुद की कॉटन ट्रेडिंग कंपनी बनाई. और लोकल राजनीति में शामिल हो गए.

5.


ये उनको बहुत पहले समझ आ गया था कि ब्रिटिश लोग भारत का शोषण कर रहे हैं. इसलिए उन्होंने ज्ञान प्रसारक मंडली बनाई, ताकि इंडियन लोगों को ये बात समझाई जा सके. बहुत सारे आर्टिकल लिखे. भाषण दिए. धीरे-धीरे राजनीति में बहुत ज्यादा शामिल हो गए. यही चीज इंडिया के लिए फायदेमंद साबित हुई. इंडियन नेशनल कांग्रेस के बनने में दादाभाई नौरोजी का बड़ा योगदान था.

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शुरू में इन्होंने पारसी समाज के लिए बड़ा काम किया. रहनुमाई मजदान सभा बनाई जो आज भी चलती है. फिर रस्त गोफ्तार यानी सच बोलनेवाला नाम की पत्रिका भी निकाली.

7.


फिर दादाभाई नौरोजी ने अपनी फेमस ड्रेन थ्योरी दी. हुआ ये था कि ब्रिटिश हमेशा बातें करते थे इंडिया के भले की. कहते कि हम सब कुछ इंडिया के लिए ही कर रहे हैं. पर दादाभाई नौरोजी ने उनकी पोल-पट्टी खोल के रख दी. क्लिअर कर दिया कि बस इंडिया से कच्चा माल ले जा रहे हैं ब्रिटेन. वहां की फैक्ट्री में बना के इंडिया में ऊंचे दाम पर बेच रहे हैं. इसीलिए इंडिया में कोई फैक्ट्री नहीं लगने दे रहे.

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फिर 1867 में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन बनने में दादाभाई नौरोजी ने पूरा हाथ बंटाया. 1886 में इंडियन नेशनल कांग्रेस के प्रेसिडेंट बनाए गए दादाभाई नौरोजी. बाद में 1892 में लिबरल पार्टी से ब्रिटेन की पार्लियामेंट में सांसद बने.

9.


इरादा यही था कि ब्रिटिश सरकार की असलियत सामने लाएं. लिहाजा आगे के सालों में दादाभाई ने खूब आर्टिकल लिखे और भाषण दिए.

10.


1906 में कांग्रेस के कलकत्ता सेशन में दादाभाई नौरोजी ने स्वराज यानी इंडिया का राज को कांग्रेस का लक्ष्य घोषित कर दिया. उस समय अपने तरह की ये पहली घोषणा थी. दादाभाई नौरोजी को Grand Old Man of India कहा जाता था. इनको Father of ‘Indian Freedom Struggle भी कहा जाता है.

महात्मा गांधी ने उनके बारे में कहा था:
“The story of a life so noble and yet so simple needs no introduction from me or anybody else. May it be an inspiration to the readers even as Dadabhai living was to me. And so Dadabhai became real DADA to me.”

बम्बई में एक सड़क का नाम दादाभाई नौरोजी रोड रखा गया है. पाकिस्तान के कराची में भी एक रोड इनके नाम पर है. दिल्ली में नौरोजी नगर है. लंदन में नौरोजी स्ट्रीट है.

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