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'वीरे दी वेडिंग' का ट्रेलर: आसपास रेप हो रहे हैं यहां बहन की गाली से सशक्तिकरण हो रहा है!

रिया कपूर ने अपनी बहन सोनम को लीड रोल में लेकर 2014 में ‘खूबसूरत’ बनाई थी. डायरेक्टर थे शशांक घोष. ठीक-ठीक फिल्म थी. अगले साल इन्होंने ऐसी फिल्म बनाने की सोची जो चार लड़कियों की कहानी थी और लीड रोल में बॉलीवुड की जानी-मानी एक्ट्रेसेज़ ली जानी थी. फिर सोनम कपूर, करीना कपूर, स्वरा भास्कर और शिखा तलसानिया को कास्ट किया गया. नाम रखा गया – ‘वीरे दी वेडिंग’. वेडिंग मूवीज़ वैसे भी दर्शकों के लिए ज्यादातर मज़ेदार अनुभव होती हैं और ये रेयर इस मायने मेें भी थी कि इस फिल्म को कोई पुरुष स्टार नहीं लीड कर रहा था.

इसका पहला पोस्टर आया तब से हैशटैग चलाया गया कि ये कोई chick flick (लड़कियों की फिल्म) नहीं है. ये कोशिश इसलिए की गई ताकि तुलना हॉलीवुड में आ चुकी ऐसी ही चिक फिल्मों (ब्राइड्समेड्स) से न की जाए. ट्रेलर आने से दो दिन पहले सोनम-करीना के करण जौहर जैसे दोस्तों ने प्रशंसा भरे रिव्यू भी कर दिए – “शाबाश, कितना तेवर भरा और मज़ेदार ट्रेलर है!! इसमें लड़कियों ने कमाल कर दिया. ये कोई चिक फ्लिक नहीं है बल्कि ये उससे बहुत आगे जाती है, वो भी स्टाइल के साथ.”

बुधवार को ट्रेलर भी आ गया है. इस लिहाज से अच्छा है कि कहानी चार फीमेल कैरेक्टर्स पर खड़ी है. वे सशक्त प्रतीत होती हैं. सब तरह के मज़ाक करती हैं. सेक्स पर बातें करती हैं (करती पहले भी थीं, दिखाते नहीं थे फिल्मों में). वे शादियों और संयुक्त परिवारों की परंपराओं की आलोचना करती हैं. ये सब अच्छा है.

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लेकिन दो-तीन जगहों पर बुरा लगता है.

देश में अभी रेप की घटनाएं बहुत बढ़ी हुई हैं. विचलित करने वाले रेप-मर्डर के ब्यौरे सामने आ रहे हैं बच्चियों, महिलाओं के. गलियों, शहरों में स्त्रियों पर हमले जारी हैं. ऑनलाइन भी अगर वे खुलकर बोलती हैं तो उन्हें सबसे पहले रेप और मर्डर की धमकियां दी जाती हैं. ऐसी भाषा यूज़ की जाती है कि भय पैदा होता है.

कूल लगने के इरादे से ये फिल्म भी ऐसी ही भाषा यूज़ करती है.

एक जगह, शिखा तलसानिया का पात्र सोनम के पात्र से कहता है – “तेरी लेने के लिए अब डिग्री भी चाहिए.”

दूसरी जगह, सोनम का पात्र बोलता है – “कितना भी पढ़ लो. ग्रैजुएशन, पोस्ट-ग्रैजुएशन.. पर जब तक भैन*** मंगलसूत्र गले में नहीं लगता ना, तब तक लाइफ कंप्लीट नहीं होती.”

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चाहे पुरुष यूज़ करे या स्त्री, ये हिंसक भाषा है. ये बड़ी सीधी बात है कि स्क्रिप्ट लिखने वाले को अच्छे से पता होता है कि वो कहां, कौन सा शब्द, क्यों डाल रहा है? “किसी की ले लेना” घृणित एक्सप्रेशन है, जिसका इस्तेमाल करके लोग दूसरों पर बड़ी हिंसा करते हैं. वही आगे जाकर शारीरिक हिंसा में बदल जाती है.

और, भेन *** की क्रिया हमारे लिए इतनी सामान्य क्यों हो गई है? इस गाली का सीधा अर्थ निकलता है – बहन/स्त्री से रेप करना.

पुरुष इसका यूज़ दूसरे पुरुषों पर करते हैं क्योंकि घर की औरतें उनकी जागीर है और उनकी इज्ज़त जाना मरने से भी बुरा है.

फिल्म में डायलॉग राइटर, जब सोनम के पात्र से ये बहन के रेप की गाली बुलवा रहा है तो वो कहीं से भी इन लड़कियों को सशक्त/empower नहीं कर रहा है.

महिला पात्रों से गाली बुलवाकर, उन्हें स्विम सूट पहनाकर, उनके हाथ में सिगरेट और शराब पकड़वाकर फिल्म मेकर लोग ये भ्रम पैदा करते हैं कि उनके महिला पात्र  बोल्ड और उन्नत हैं. जबकि सच ये है कि उन्हें इन चीजों की ज्यादा समझ ही नहीं है.

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अमेरिका में बीसवीं सदी के शुरू में जब महिलाओं की स्वतंत्रता और बराबरी की कुछ लहरें उठने लगीं तब बड़ी ‘अमेरिकन टोबेको कंपनी’ ने उनमें बाज़ार देखा. उसने देखा कि महिलाएं अमेरिका की आधी आबादी हैं. कंपनी ने 1928 में एडवर्ड बार्नेज़ को हायर किया जो आधुनिक पीआर, प्रोपोगैंडा युद्ध और spinning के जनक माने गए. उनका काम था ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को सिगरेट पीने के लिए लुभाना. एडवर्ड ने बहुत कुछ किया. एक बार अपनी सेक्रेटरी और कुछ महिलाओं को 1929 की ईस्टर परेड में भेजा और वहां उनसे सबके सामने सिगरेट जलाकर पीने को कहा ताकि दूसरी महिलाओं को लगे कि ये महिलाएं कितनी आज़ाद हैं. अपनी सिगरेटों के लिए उन्होंने एक मुहावरा गढ़ा – “Torches of Freedom” मतलब – आज़ादी की मशालें. सिगरेट और आज़ादी की मशालें?? एडवर्ड के इस कुप्रचार से तंबाकू कंपनी ने भयंकर पैसा कमाया.

‘वीरे दी वेडिंग’ में उसी प्रकार की औरतों की आज़ादी का भ्रम है.

अरुणा राजे ने ‘रिहाई’ 1988 में बना दी थी जिसमें ख़ुद को आज़ाद दिखाने के लिए किसी महिला पात्र को औरतों के ही रेप की गाली नहीं देनी पड़ती थी, जबकि वो फिल्म ही एक गांव की महिलाओं के बारे में थी जिनके पति बंबई व अन्य शहरों में नौकरी करने गए हैं और पीछे से उन्हें सेक्स की इच्छा होती है तो वे गांव में आए एक आदमी के साथ शारीरिक संबंध बनाती हैं. तीस साल हो गए, बॉलीवुड की मेनस्ट्रीम फिल्में आज तक ‘रिहाई’ की समझदारी के दस परसेंट करीब भी नहीं आ पाई हैं.

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ख़ैर, ‘वीरे की वेडिंग’ के ट्रेलर के अंत में भी एक चीज़ बुरी लगती है. जब शिखा का पात्र कहता है – “बताओ हिंदी में ऑर्गेज़्म को क्या कहते हैं?” “चरम सुख बेबी, चरम सुख़.”

इसे जैसे चित्रित किया गया है – उसमें ऑर्गेज़्म सुनते हुए वे सामान्य होती हैं लेकिन हिंदी भाषा को सुनते हुए हंसती हैं. क्या हिंदी या क्षेत्रीय भाषाओं में ऑर्गेज़्म (जो बोल्ड होने का दावा करती सब फिल्मों में सर्टिफिकेट की तरह प्रयोग किया जाता है) के लिए जो भी शब्द प्रयोग होता है, वो खिल्ली उड़ाने लायक हैं? जिन्हें सेक्स करते हुए चरम सुख होता है वो हंसी के काबिल हैं, जिन्हें ऑर्गेज़्म होता है वो मॉडर्न हैं?

फिल्म 1 जून को रिलीज हो रही है. कहानी ट्रेलर में देखें:

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