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मां होना असल में क्या होता है, श्रीदेवी हमें बताती हैं

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एक मां होना मुश्किल है. पैदा करने से लेकर पालने तक. खासकर भारतीय मांओं के लिए, जिन्हें बच्चों को अच्छे संस्कारों और नैतिक शिक्षा के साथ बड़ा करना होता है. अगर मां नौकरीपेशा हो तो ये और कठिन हो जाता है. मांएं अपनी बड़ी होती बेटियों के ‘चरित्र’ की जिम्मेदार कहलाती हैं. मान और पिता के बीच कितनी भी बराबरी हो, अंत में बच्चों के लिए जिम्मेदार मां को ही ठहराया जाता है. और जब श्रीदेवी मां का किरदार करती हैं, वो ये दिखा देती हैं कि वो एक कमज़ोर मां नहीं हैं.

मां के दो रूप

इंग्लिश विंग्लिश की शशि और ‘मॉम’ की देवकी इस मामले में एक जैसी हैं. हालांकि एक मुंबई में रहती हैं और दूसरी दिल्ली में, श्रीदेवी दोनों फिल्मों में मां हैं. एक में ‘सगी’ मां हैं और ‘मॉम’ फिल्म में दो बेटियों की मां हैं, सौतेली. दोनों ही फिल्मों में मां का सफ़र अपनी बेटी की आंखों में इज्जत पाने का है. इंग्लिश विंग्लिश में ये ‘मॉम’ के मुकाबले आसान था. मगर ‘मॉम’ में श्रीदेवी की सौतेली बेटी टीनएज में है. एक ऐसी उम्र में जब बच्चे न तो बच्चे होते हैं, न व्यस्क. ऐसी बच्ची की सौतेली मां होना मुश्किल होता है. देवकी अपने पति की दूसरी पत्नी हैं. एक स्कूल टीचर हैं. उस स्कूल में पढ़ाती हैं जिसमें उसकी 18 साल की बेटी खुद पढ़ती है. कहना जरूरी नहीं कि देवकी का जीवन कठिन है, बहुत कठिन.

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चाहे वो फिल्म में एक एक्टर के तौर पर श्रीदेवी हों, या एक चरित्र के तौर पर देवकी, दोनों ही अपना एक-एक कदम चुपचाप उठाती हैं. उनमें कोई ड्रामा नहीं है. वे दृढ़ हैं, अपने लक्ष्य पर केंद्रित हैं. मैं उनके किरदार के लिए ‘प्रैक्टिकल’ शब्द का इस्तेमाल करना चाहूंगी. हर एक कदम, हर फैसला सोचा समझा. टीवी हो या फ़िल्में, मांएं दो तरह की होती हैं. एक वो जो बेबस होकर रोती है, इंतजार करती है कि उसका बेटा आकर उसका बदला ले. और दूसरी वो जो रोती भी है, मगर उठकर खड़े होने और फिल्म के प्लॉट में मुख्य भूमिका लेकर खुद को परेशान कर रही हर चीज़ को तहस नहस कर देती है. दोनों ही फिल्मों में श्रीदेवी दूसरी वाली मां हैं. मुझे यहां ये कहना जरूरी नहीं कि वो कितनी शानदार एक्टर हैं. ये तथ्य तो आज से कई साल पहले स्वीकार किया जा चुका है. जो मैं कहूंगी, वो ये कि मां का किरदार निभाने में वो कोई कसर नहीं छोड़तीं.

‘मां’ शब्द सुनते ही हमारे दिमाग में कई तरह की तस्वीरें उभर आती हैं. खासकर दुर्गा या काली की, अपनी बड़ी आंखें निकाले हुए राक्षस की छाती पर चढ़ी, बुरे का विनाश करते हुए. विद्या बालन भी ‘कहानी’ में कुछ ऐसा ही करती हैं. और हां, दूसरी तस्वीर आती है क्लासिक ‘मदर इंडिया’ की.

ये दोनों तस्वीरें ‘क्लासिक’ हैं, मगर प्रैक्टिकल नहीं. मैं श्रीदेवी के चरित्र को देखती हूं तो मुझे लगता है ये असल मां का चरित्र है. वो जो अपने परिवार से बहुत प्यार करती है, मगर अपने लिए जीना भी नहीं छोड़ती. अपनी खुशियों का खयाल भी है उसे. साथ साथ परिवार का भला करने के पहले एक बार भी नहीं सोचती.

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बोतलें भरती, कपड़े प्रेस करती मां

यही शायद नई मां है. हमारी, आपकी मां है. बोतलें भरती, कपड़े प्रेस करती, बिना शिकायत सारा काम करती मगर अपनी बात को लेकर कभी पीछे न हटने वाली. ये जताती कि तुम्हारे लिए घर का काम करना मैंने चुना है, इसका ये मतलब नहीं कि मुझसे कुछ भी कह सकते हो. तुम मुझसे पंगा न लो, यही तुम्हारे लिए बेहतर है.

‘इंग्लिश विंग्लिश’ में मां एक नई भाषा सीखना चाहती है ताकि उसका खुद का परिवार उसे एक ‘बिजनेसवुमन’ माने, उसकी इज्जत करे. खासकर उसकी बेटी, जिसे लगता है कि अपनी मां को किसी से मिलवाना शर्मिंदगी लेकर आएगा. ‘मॉम’ में एक सौतेली बेटी है जो उसे ‘मैम’ कहती है. बेटी ने अपने चारों ओर एक दीवार खड़ी कर ली है और अपनी सौतेली मां को उसमें घुसने नहीं देना चाहती. मां तो सिर्फ हारकर बच्चों की बात मान सकती है. मगर उस प्रेम को पाने के लिए निरंतर लगी रहती है जो उसके बच्चे उसे नहीं दे रहे हैं.

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‘मॉम’ में एक मां अपनी बेटी का बदला लेना चाहती है, एक ऐसी बेटी का, जो उसे मां मानती तक नहीं है. फिल्म देखकर मालूम पड़ता है कि मां होने का अर्थ केवल बच्चा पैदा करना नहीं होता. ये एक स्वभाव होता है. जीने का एक तरीका होता है. ममता उमड़ने के लिए अगले बच्चे को आपका सगा बच्चा होने की जरूरत नहीं. मां होना आप चुनती हैं, शारीरिक ही नहीं, मानसिक तौर पर. यही आपको मां बनाता है. पूरी फिल्म कहीं भी आपको ये महसूस नहीं होने देती कि मां और बेटी के बीच का रिश्ता खून का नहीं है.

लेकिन जो मांएं सिखाती हैं, वो ये है कि कोई भी स्ट्रगल छोटा नहीं होता. चाहे हो नई भाषा सीखना ही क्यों न हो. एक मां का, हमारे भारतीय समाज में अपनी इच्छाओं के लिए जीना ही उसे बागी बना देता है. फिर ‘मॉम’ में तो मां न्याय के लिए लड़ रही है, वो जो उसकी बेटी को मिला नहीं. बहुत शक्ति लगती है, खुद की कमियां स्वीकारते हुए अपनी कमियों को अपनी ताकत बनाने में. श्रीदेवी एक अभिनेत्री के तौर पर तो ऐसा करती ही हैं, उनके चरित्र भी ऐसा ही कर रहे हैं. मैं खुश हूं कि अपने कमबैक में श्रीदेवी पूरी तरह से फोकस्ड दिख रही हैं. कोई जल्दी नहीं मचा रही हैं. यही उनके किरदार भी कर रहे हैं. समय और जगह ले रहें हैं, मगर सटीक और सूक्ष्म हैं.


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