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फरहान अख्तर क्यों बनना चाहते हैं मुजाहिदीन?

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चौंक गए सुनील बाबू. कि अच्छा खासा लौंडा जावेद अख्तर का. फिलिम बना रहा था. एक्टिंग कर रहा था. गाना भी बर्दाश्त कर लिया देश की इनटॉलरेंट जनता ने. तो अब ये सब बातें फिदायीन की. दरअसल आप चौंकिए. मगर फरहान पर नहीं. अपनी स्टीरियोटाइप सोच पर. कि फिदायीन और मुजाहिदीन सुना तो तुरंत टेरर वाली टुन टुन बजने लगी दिमाग में.

पर गलती सिर्फ आपकी भी नहीं. मीडिया की भी है. जो ऐसी ही हेडिंग और डिस्क्रिप्शन दिखा आपका ध्यान खींचती है. और आप खिंच जाते हैं. गलती उन गधों की तो शर्तिया है,  जो गन उठाए हगने चले आते हैं इस तरफ. और नाम धर लेते हैं हिजबुल मुजाहिदीन, इंडियन मुजाहिदीन. चोमू. मुहाजिदीन हो तो इंडियन भी तो हो.

खैर, बेवकूफी की बात नहीं करेंगे. सीधे सीधे बताएं. फरहान और बच्चन अमिताभ की एक पिक्चर आई थी- ‘वजीर’. उसी का एक गाना है.  उसमें कवि कहता है कि ‘इश्क में तेरे मुजाहिदीन बन जाऊं मैं’. कवि का नाम है ए एम तुराज. यूपी के मुजफ्फरनगर के रहने वाले हैं. मुजफ्फरनगर याद है न गुरु. वैसे तुराज इससे पहले भंसाली की गुजारिश के लिए भी लिख चुके हैं.

पढ़िए मुजाहिदीन कविता. बाकी बातें उसके बाद.

“तेरे लिए मेरा करीम
फना हो जिस्म की जमीन
यही है मेरा यकीन
बनू तेरा मुजाहिदीन

दीन-ए-हक़ है तेरा दीन
जानशीन जानशीन
तेरा दीन तेरा दीन
तू हसीन से हसीन
मैं हकीर से हकीर

तेरे लिए मेरे करीम
फना हो जिस्म की जमीन
यही है मेरा यकीन
बनू तेरा मुजाहिदीन

तेरे लिए ऐ मेरे यार
ये ज़िन्दगी कौन निसार
ये दोस्ती का कर्ज है
यही तो मेरा फर्ज है

खुद को मैं फना करूं
तो हक तेरा अदा करूं
खुद को मैं फना करूं
फना करूं

ये सबसे अलादीन है
ये मेरा यकीन है
दिल इश्क-ए-फिदायीन है

तेरे लिए मेरे करीम
फना हो जिस्म की जमीन
यही है मेरा यकीन
बनू तेरा मुजाहिदीन”

~ ए. एम. तुराज, मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश 

वैसे आप चौंके भी क्यों? ‘मुजाहिदीन’ पर ? भला सा तो शब्द है. मुजाहिद का बहुवचन है. मुजाहिद वही जो जिहाद करते हैं. अब जिहाद के नाम पर न चौंकिएगा. जिहाद का मतलब सीधा सा हुआ करता था. सेवा और संघर्ष. माने जो अपनी कमाई का एक हिस्सा गरीब को दे डाले वो भी मुजाहिदीन है. और जो प्यासे को पानी पिलाकर उसका भला कर दे वो भी मुजाहिदीन है.

वजीर का गाना है. पानी में चुचुआते खड़े हैं फरहान. इधर गाना बज रहा है.

तो भैया ये बात लिख लो, नोट कल्लो, दिमाग में बइठा लो. असली जिहादी, मुजाहिदीन और फिदायीन बंदूक लेकर नहीं, इश्क में हुआ जाता है. इसी का तराना है फरहान का ये गाना. :-)

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