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बीजेपी का 2014 और 2019 का घोषणापत्र पढ़ा, ये सच्चाई सामने आई

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8 अप्रैल को भाजपा का घोषणापत्र आया. 75 पार के नेताओं से कन्नी काटने वाली पार्टी ने आज़ादी के 75 साल होने के एवज में 75 वादे कर डाले. भाजपा की तरफ से इसे संकल्पित भारत का मेनिफेस्टो करार दिया गया. कांग्रेस की तरफ से इसे झांसा पत्र बताया गया. सच इस ब्लैक एंड व्हाईट के परे है . सच आंकड़ों पर टिका है. बीजेपी ने जो वादे 2014 में किये, उनमें से कितने दोहराए, कितने पूरे किये, कितनों पर चुप्पी मार ली, किन वादों पर झूठ बोल गए और किन वादों का नाम तक नहीं लिया. एक आम समझ के आम आदमी ने यही जानने को दोनों मेनिफेस्टो अगल-बगल खोले और बांचना शुरू किया ये निकला.

2014 VS 2019


 

1. रोजगार पर खुद ही कन्फ्यूज है बीजेपी

2014 के मेनिफेस्टो में रोजगार को खूब जगह मिली. आंकडों के हिसाब से 42 बार रोज़गार शब्द आया. 2019 में रोजगार शब्द घटकर 17 बार हो गए.

शेष वो बात तो याद ही रखिये, जिसका इल्ज़ाम विपक्ष बार-बार लगाता है. NSSO एक रिपोर्ट लीक हुई, पता लगा बेरोजगारी 45 साल के पीक पर है.

पढ़ें – हम पकौड़ों में रोज़गार तलाश रहे थे, बेरोजगारी 45 साल के टॉप पर पहुंच गई

पांच साल पहले बीजेपी उद्यमिता और ऋण की मदद से स्वरोजगार को बढ़ावा देने की बात कहती थी. सिर्फ पर्यटन से लाखों रोजगार के सपने दिखाए गए थे. अब बात कही गई कि 22 चैम्पियन सेक्टर्स की पहचान की जाएगी. जहां से ढेरों रोज़गार आएंगे. इस ‘चैम्पियन सेक्टर’ जैसे शब्द को सुन अभिभूत होने से पहले इसकी सच्चाई जान लीजिए.

2018 की जनवरी में इकोनॉमिक सर्वे आया, कहा गया. अब मेक इन इंडिया में 10 चैंपियन सेक्टर्स पर फोकस किया जाएगा. इसमें बायोटेक्नोलॉजी, ESD, फ़ूड प्रोसेसिंग और शिपिंग जैसे सेक्टर थे.

मई 2018 में खबर आई कि अब चैपियन सेक्टर्स 12 हैं, जिनकी मदद से सरकार इकॉनोमी को बूस्ट देने का काम करेगी. घोषणापत्र में 22 चैंपियन सेक्टर्स हो गए हैं.

सवाल ये नहीं है कि ये चैंपियन सेक्टर क्या हैं, कैसे रोज़गार पैदा करेंगे. सवाल ये भी नहीं कि कौन तय करता है कि कौन से सेक्टर्स ज़्यादा नौकरियां देंगे या किस पर ज्यादा ध्यान दिया जाए. इन सबका सरकार के पास रटा-रटाया जवाब होगा. सवाल सीधा सा कि अब तक बढ़ती  बेरोजगारी को कैसे नहीं रोक सके? नज़र ये आता है कि किसी चुनावी जुमले की तरह ’22 चैंपियन सेक्टर’ जैसा एक शब्द उछाल दिया गया. अगर चैंपियन सेक्टर्स ही इलाज हैं. तो दवाई असर क्यों नहीं कर रही?

रही मुद्रा योजना से रोजगार सृजन की बात तो हमने कल ही बताया था कि कैसे इसी मेनिफेस्टो में एक जगह मुद्रा योजना से 14 करोड़ लोगों का फायदा बताया गया था. तो दूसरी जगह 17 करोड़.

नीचे की दो तस्वीरों में अंतर पहचानने वाला खेल खेलिए. 

14 करोड़ मिला मितरों?
14 करोड़ मिला मितरों?

तस्वीर नंबर 2 देखिए. मुद्रा योजना रिटर्न्स.

लाइन बदलते ही करोड़ों बढ़ जाने को शास्त्रों में विकास कहा गया होगा?
लाइन बदलते ही करोड़ों बढ़ जाने को शास्त्रों में विकास कहा गया होगा?

अब बीजेपी का वादा है कि भविष्य में वो मुद्रा योजना से 30 करोड़ लोगों को रोजगार देगी. इन आंकड़ों पर भरोसा करने का जी बहुत करता है लेकिन खुद बीजेपी इन आंकड़ों को लेकर इतनी अनिश्चित है कि अपने विज्ञापनों में 15 करोड़ का आंकडा चला रही है. यानी एक जगह 14, एक जगह 15, एक जगह 17. भिया लोगन के लिए करोड़- 3 करोड़ तो मायने इच नहीं रखते. 

Note- वीडियो को 24 सेकेंड के पर देखना है. HD में देखने पर ज़्यादा अच्छा दिखेगा. 

अब मुद्रा योजना से जुड़ी 5 दिन पुरानी ख़बर सुन लीजिए. द टेलीग्राफ’ में एक खबर छपी. 1 फरवरी 2019 तक मुद्रा योजना के तहत करीब 15 करोड़ 73 लाख कर्ज बांटे गए. ये रकम लगभग साढ़े 7 लाख करोड़ के आसपास है. इससे लगभग 1 करोड़ 12 लाख नई नौकरियां पैदा होने का अनुमान है. अब एक्सपर्ट्स ने बताया कि जितना खर्च हुआ है. उस हिसाब से ये आंकड़ा बहुत कम है. क़र्ज़ तो ले लिए गए लेकिन रोज़गार के उतने अवसर पैदा नहीं हुए. अब सरकार डेटा को रीवैलिडेट कराएगी कि गड़बड़ कहां हो गई.


 

2. हेल्थ सेक्टर में पुराना माल टिका दिया

5 साल पहले भाजपा ने हर प्रदेश में एम्स बनाने की बात कही थी. फिर पता लगा वो एम्स और एम्स जैसे संस्थान थे. जनता ने कहा चलो रीबॉक नहीं रीबुक ही सही. एम्स जैसे संस्थान भी छोटी बात नहीं होते. सच्चाई ये थी कि जून 2018 में जब इंडिया टुडे ने आरटीआई के जरिए 13 नए स्वीकृत एम्स के बारे में पता किया तो अलग ही बात पता चली. किसी के पूरा होने की मियाद मार्च 2020 थी, किसी के 2021 तो कहीं-कहीं काम ही शुरू नहीं हुआ था.

पढ़ें – मोदी सरकार के 13 नए एम्स कब बनकर तैयार होने वाले हैं?

एम्स बनवाने वाले शायद ऐप्स ही बनाते रह गए. इसलिए इस बार नया वादा आया है. 2022 तक 75 नए मेडिकल कॉलेज. नए घोषणापत्र में ज्यादा जोर आयुष्मान भारत योजना और हेल्थसेंटर्स पर है. 75 वादों में स्वास्थ्य वाले हिस्से में सबसे ऊपर ज़िक्र ही आयुष्मान भारत के स्वास्थ्य केंद्र और वेलनेस केंद्र का आता है.

सच्चाई ये है कि ये वही सरकार डेढ़ लाख से ज्यादा हेल्थ और वेलनेस सेंटर हैं, जो आयुष्मान भारत योजना के साथ खुलने थे. जहां जरूरी दवाएं और जांच सेवाएं मिलनी थी. मतलब ये बात तो आप आयुष्मान योजना में बता ही चुके हैं. मेनिफेस्टो में दोबारा बता कर आंकड़े बढ़ा रहे हैं?


 

3. काला धन, गायब है! मेनिफेस्टो से

2014 के घोषणापत्र में कहा गया. भ्रष्टाचार न्यूनतम होगा, कालाधन पैदा ही न हो ये सुनिश्चित करेंगे. सबसे ज्यादा जोर समुद्रपार के कालेधन पर था.

इस बार कालेधन का ज़िक्र ही नहीं है. चाहे तो मानिए कि ये मुद्दा ही नहीं रह गया. ज़्यादा सहूलियत देनी है तो ये मान लीजिये कि शायद सरकार सारा कालाधन लौटा लाई है और किसी को पता ही नहीं चला.

सरकार ने इतने जोर-शोर से नोटबंदी का प्रचार किया. ऐतिहासिक कदम से शुरू होकर जितने भी विशेषण दिए जा सकते हों, नोटबंदी को हर विशेषण से नवाजा गया. लेकिन इतनी इज्जत इस मेनिफेस्टो में नहीं मिल सकी. ‘नोटबंदी’ शब्द सिर्फ एक बार आया. सौभाग्य योजना और जीएसटी के बीच. बीजेपी इससे ये कहकर बच सकती है कि नोटबंदी तो की जा चुकी है. फिर उसका ज़िक्र क्यों ही किया जाए.

नोटबंदी बेवफा है!
नोटबंदी बेवफा है!

 

4. खेती के वादे 2.0 माइनस भूमि अधिग्रहण

2014 में खेती पर पूरा एक चैप्टर था. कृषि- उत्पादकता, विज्ञान और पारितोषक नाम से. कहा गया था, खेती में निवेश बढ़ेगा. इस बार एक आंकड़ा दे दिया गया है. 25 लाख करोड़ का निवेश.

तब एग्रो फ़ूड प्रोसेसिंग जैसे अच्छे शब्द सुनाई पड़े. लागत का 50% लाभ देने की बात हुई थी. वही बात अब आय दोगुनी करने के नाम पर बार-बार दोहराई गई. डेडलाइन मिली 2022 की. 2014 में जितना जोर कृषि बीमा योजना पर दिया गया था, अब उतना ही जोर किसान सम्मान निधि योजना पर दिया जा रहा है.

60 साल से ऊपर के किसानों के लिए कल्याणकारी योजनाओं का जिक्र तब भी था. अब पेंशन का वादा है. 2014 में किसानों से जुड़े एक और मुद्दे को जगह मिली थी, भूमि अधिग्रहण. नेशनल लैंड यूज पॉलिसी को स्वीकारने का वादा भी था. इस बार के घोषणापत्र से भूमि अधिग्रहण शब्द गायब है और किसान कल्याण नीति के 7 बिन्दुओं में भी इसे कहीं जगह नहीं मिली.

KISAN KALYAN NITI


 

5. छपाई के अलावा और क्या बदला 5 साल के घोषणापत्र में?

5 साल पहले ‘ई-ग्राम, विश्‍व ग्राम’ योजना से सरकारी दफ्तर दुनिया से जुड़ने थे, शब्द बदले अब सारी सरकारी प्रोसेस इंटरनेट से होगी.

ऐसे ही तब महंगाई घटाने, राष्ट्रीय कृषि बाज़ार बनाने का वादा था. अब एक शब्द मिल गया है. “ईज ऑफ़ डूइंग बिजनेस”

अभी जोर निर्यात बढ़ाने और छोटे उद्योगों को एकल खिड़की विंडो पर सब समाधान देने पर है.

शिक्षा के क्षेत्र में सेन्ट्रल एजुकेशन इंस्टीट्यूट्स में 50% सीटें बढाने के और ऑनलाइन कोर्सेज को बढ़ावा देने की बातें हैं. जबकि पांच साल पहले ई-लाइब्रेरी बढ़ाने और बेसिक एजुकेशन में बेहतरी के वादे थे.

बाकी 370, 35-A और राम मंदिर पर आप कल से विद्वानों की बातें और तर्क-कुतर्क सुन ही रहे हैं. गाड़ी जहां रुकी थी, वहीं रुकी है और शायद अगले मेनिफेस्टो तक रुकी ही रहे. गाड़ी बढ़नी चाहिए या रुकी रहनी चाहिए, इसका फैसला आप अपनी पॉलिटिक्स के हिसाब से तय कर ही चुके होंगे.

कुल जमा ये मेनिफेस्टो वैसा ही है, जैसा एक चुनावी घोषणापत्र होता है. वादे हैं, कन्फ्यूजन हैं. आंकड़े ऐसे हैं, जिन पर आप एक तरफ से भरोसा करते हैं तो दूसरी तरफ नया आंकड़ा नज़र आ जाता है. पार्टियों ने एक अच्छी और एक बुरी बात सीखी है, अब वो करोड़ों में बातें कम करती हैं. हजार या लाख की बातें करनी लगी हैं. बुरी बात ये कि पहले उन्होंने जो करोड़ों की बातें की थीं. उनका ज़िक्र ही नहीं करतीं.

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What is the difference between the 2014 and 2019 manifestoes of the Bhartiya Janata Party

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