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क्यों अमिताभ बच्चन की इस फिल्म को लेकर आपको भयानक एक्साइटेड होना चाहिए?

12 बातों में जाने इस फिल्म के बारे में सबकुछ.

#1: इस फिल्म का नाम ‘झुंड’ है. ये एक स्पोर्ट्स मूवी है. सोशल ड्रामा है. ये झुग्गी के कुछ बच्चों से शुरू होती है. वो एक ऐसे आदमी से मिलते हैं जो उनकी जिंदगी बदलकर रख देता है. वो उनके हाथ में फुटबॉल थमा देता है और उनकी बुरी आदतों, निराशा, दिशाहीनता को दूर कर देता है. ये कहानी एक असल रिटायर्ड स्पोर्ट्स टीचर विजय बारसे की जिंदगी पर आधारित है. 21 जनवरी, 2020 को फिल्म का पहला टीज़र रिलीज़ किया गया. इसमें अमिताभ बच्चन तो नहीं दिख रहे लेकिन जो दिख रहा है, उसे आप यहां देख सकते हैं:

#2: नागराज मंजुले इस फिल्म को डायरेक्ट कर रहे हैं. ये उनकी पहली हिंदी फिल्म होगी. इससे पहले उनकी मराठी फिल्मों – ‘सैराट’ (2016) और ‘फैंड्री’ (2013) को आलोचकों ने बहुत अधिक सराहा था. ‘सैराट’ ने कमाई भी ढेर सारी की. मराठी सिनेमा की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी. सिर्फ 4 करोड़ के बजट में बनी और बिना स्टार वाली इस फिल्म ने 110 करोड़ की कमाई की. ये फिल्म तमिल, तेलुगु और कन्नड़ में रीमेक की गई. हिंदी में भी इसकी रीमेक बन चुकी है. करण जौहर ने प्रोड्यूस किया है, फिल्म का नाम है ‘धड़क’ जिसके साथ श्रीदेवी की बेटी जान्हवी और शाहिद कपूर के भाई ईशान को कमर्शियल सिनेमा में लॉन्च किया गया था.

“फैंड्री” का अर्थ होता है सूअर. ये 'नीची जाति' के एक लड़के जब्या की कहानी है जो समाज के गैर-बराबरी वाली व्यवस्था और दमन से तंग आकर अंत में ये प्रतिक्रिया देता है. वो पत्थर मारता है.
“फैंड्री” का अर्थ होता है सूअर. ये ‘नीची जाति’ के एक लड़के जब्या की कहानी है जो समाज की गैर-बराबरी वाली व्यवस्था और दमन से तंग आकर अंत में ये प्रतिक्रिया देता है. वो पत्थर से उनका सिर फोड़ देता है.

#3: ‘सैराट’ का शूट खत्म होने के साथ ही उनके पास इस अगली फिल्म का कॉन्सेप्ट भी रेडी था. वे इसके लिए पहले से रिसर्च कर रहे थे. शुरू में मराठी में बनाना चाहते थे. लेकिन ‘सैराट’ की सफलता के बाद इसे हिंदी में बनाने का फैसला लिया. उन्होंने इसकी स्क्रिप्ट लिखने में दो साल लगाए. जनवरी 2017 में वे इस स्क्रिप्ट को लेकर अमिताभ बच्चन से मिले. बच्चन ने हां बोल दी.

#4: पहली बार मंजुले किसी स्टार के साथ फिल्म बनाने जा रहे हैं. उनका कहना है कि उनके मन में फिल्मस्टार लोगों के साथ काम करने की कोई इच्छा नहीं है, लेकिन अमिताभ अकेले हैं जिनके साथ वो खुद काम करना चाहते थे. स्क्रिप्ट लिखते समय उनके मन में लीड रोल में बच्चन ही थे. मंजुले कहते हैं कि अगर इस फिल्म की स्टोरी इतनी अच्छी न होती और अमिताभ बच्चन इसमें न होते तो वे शायद ‘झुंड’ डायरेक्ट ही नहीं करते. क्योंकि बचपन से वे बच्चन के फैन रहे हैं. बड़े होने के दौरान वो उनकी तरह कपड़े पहनते थे, उनकी तरह बोलने की कोशिश करते थे और हाव-भाव की नकल करते थे.

यश चोपड़ा की 'दीवार' में अमिताभ का विजय वर्मा का किरदार, जिसकी नकल जवान नागराज पोपटराव मंजुले किया करता था.
यश चोपड़ा की ‘दीवार’ में अमिताभ का विजय वर्मा का किरदार, जिसकी नकल जवान नागराज पोपटराव मंजुले किया करता था.

#5: बच्चन को लेकर मंजुले ने अभिव्यक्त किया है – “जब ‘दीवार’ (1975) फिल्म देखी तब अपनी शर्ट को गांठ मारकर स्कूल जाता था. टीचर की मार खाकर भी वो गांठ बनी रहती थी. दोस्त के मिट्टी ढोनेवाले गधों को चोरी से भगाकर ‘शोले’ का खेल रचाता था. हालांकि जिसके गधे थे, वही अमिताभ बनता था. उस खेल में, मैं सांभा बन कर भी खुश था. लेकिन खेल में दिग्दर्शन (direction) मेरा होता था. ‘याराना’ देखकर ‘कच्चा-पापड़, पक्का-पापड़’ बुलवाकर मैंने अपने गलीवालों को परेशान कर रखा था. ‘डॉन’, ‘कुली’, सत्ते पे सत्ता’, ‘शहंशाह’, ‘लावारिस’, ‘कालिया’, ‘शराबी’ न जाने कितनी फिल्मों की कहानियां सुनाकर मैं दोस्तों का मनोरंजन किया करता था. बचपन से जो मेरे सबसे पसंदीदा अभिनेता है, जिनकी फिल्में देखकर मैं बड़ा हुआ, वही सदी के महानायक आज मेरी अगली हिंदी फ़िल्म के नायक है. इससे बड़ी और ख़ुशी की बात क्या हो सकती है!”

#6: ये फिल्म बनने की खबर फरवरी 2017 से आने लगी थी. अमिताभ बच्चन तब तीन-चार दूसरे प्रोजेक्ट्स में बिजी थे इसलिए मंजुले की फिल्म को अक्टूबर की डेट्स दे रखी थीं. उस महीने में पुणे की सावित्रीबाई फुले यूनिवर्सिटी के स्पोर्ट्स ग्राउंड में फिल्म का सेट लगाया जाने लगा. नागराज मंजुले खुद भी इसी यूनिवर्सिटी से पढ़े थे. लेकिन शूटिंग नहीं शुरू हो पाई. यहां और विदेश में करीब 40 दिन का शेड्यूल चलना था.

डायरेक्टर नागराज मंजुले सितंबर 2017 में अमिताभ बच्चन से हुई मुलाकात के दौरान. 'भूतनाथ-2' के प्रमोशन के दौरान बच्चन और भूषण कुमार.
डायरेक्टर नागराज मंजुले सितंबर 2017 में अमिताभ बच्चन से हुई मुलाकात के दौरान. ‘भूतनाथ-2’ के प्रमोशन के दौरान बच्चन और भूषण कुमार.

#7: इस बीच सुनने में आया कि अमिताभ बच्चन ने ये फिल्म छोड़ दी. क्योंकि देरी की वजह से उनके दूसरे प्रोजेक्ट खराब हो रहे थे. बताया जाता है कि कहानी के फिल्म राइट्स को लेकर या निर्माता के स्तर पर दूसरी दिक्कतों के कारण डिले हो रही थी. और अमिताभ ने अपना साइनिंग अमाउंट भी वापस लौटा दिया था.

#8: लेकिन फाइनली ये फिल्म बनी. पूरी गति से. अमिताभ बच्चन भी लौट आए हैं. इसके नए प्रोड्यूसर थे टी-सीरीज के भूषण कुमार. भूषण को इस फिल्म से जोड़ने वाली शायद सविता राज हीरामठ थीं जिन्होंने ‘खोसला का घोसला’ प्रोड्यूस की थी. वे बीते दो-तीन साल से पॉजिटिव कहानियों की तलाश में थीं, जिन पर फिल्म बनाई जा सके. इसी दौरान उन्हें विजय बारसे के काम के बारे में पता चला जो वो झुग्गी-झोंपड़ियों के बच्चों के लिए कर रहे हैं. नागराज मंजुले की स्क्रिप्ट लेकर सविता टी-सीरीज के मालिक के पास गईं. भूषण को नागराज की लिखी ये फिल्म एक्साइटिंग लगी और वे इसे करने को मान गए. सविता इस फिल्म में सह-निर्माता हैं.

एक कार्यक्रम में ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट शूटर अभिनव बिंद्रा और स्लम सॉकर के संस्थापक विजय बारसे (दाएं).
एक कार्यक्रम में ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट शूटर अभिनव बिंद्रा और स्लम सॉकर के संस्थापक विजय बारसे (दाएं).

#9: भूषण ने इस प्रोजेक्ट में पैसा लगाने का निर्णय लेने के बाद अमिताभ बच्चन से बात की और बच्चन फिर से फिल्म में आ गए. दोनों पहले भी साथ काम कर चुके हैं. भूषण के प्रोडक्शन वाली ‘भूतनाथ’ सीरीज़ में अमिताभ ने लीड रोल किया था.

#10: जिन विजय बारसे पर बच्चन स्टारर ‘झुंड’ आधारित है उन्होंने 17-18 साल में बहुत सारे बच्चों की जिंदगी बदल दी. इनकी प्रेरणादायक कहानी साल 2001 में शुरू होती है. हालांकि बारसे इसे साल 2002 बताते हैं और उनके एक साथी 1999. ख़ैर, ये जुलाई का महीना था. गुरुवार का दिन. बरसात हो रही थी. बारसे नागपुर के हिसलॉप कॉलेज में स्पोर्ट्स इंस्ट्रक्टर थे. कॉलेज जा रहे थे लेकिन बरसात से बचने के लिए एक पेड़ के नीचे खड़े हो गए. तभी उन्होंने आसपास से आ रही कुछ सुहावनी आवाजें सुनी. पीछे मुड़े तो मैदान था जिसमें कुछ बच्चे खेल रहे थे. खिलखिला रहे थे. तन पर पूरे कपड़े नहीं थे. मैदान में कीचड़ जमा हो रहा था. लेकिन पड़ोस की झुग्गी के ये बच्चे खेल रहे थे. एक टूटी हुई बाल्टी से. किक मार रहे थे और खुश थे. इसे देखकर विजय ने कुछ सोचा और अपने कॉलेज गए. वहां अपने डिपार्टमेंट से एक असली फुटबॉल लेकर आए. उन बच्चों को दी और पूछा कि क्या तुम लोग फुटबॉल मैच खेलना चाहोगे? बच्चों ने कुछ बातचीत के बाद हां कर दी. फिर वो दूसरे इलाके में गए और दूसरे बच्चों से पूछा.

स्लम सॉकर से जुड़े इवेंट में खेलते हुए सिद्धार्थ मल्होत्रा, WWE चैंपियन रेस्लर जॉन ब्रैडशॉ लेफील्ड और बच्चों के साथ फोटो खिंचवाते हुए रणवीर सिंह.
स्लम सॉकर से जुड़े इवेंट में खेलते हुए सिद्धार्थ मल्होत्रा, WWE चैंपियन रेस्लर जॉन ब्रैडशॉ लेफील्ड और बच्चों के साथ फोटो खिंचवाते हुए रणवीर सिंह.

#11: बारसे ने अपने कुछ परिचितों की मदद से स्लम सॉकर की स्थापना की. इसे प्यार से झोपड़पट्टी फुटबॉल कहकर पुकारा जाता था. इसका पहला मैच 2001 में हुआ. नागपुर की दो झोपड़पट्टियों के बीच – वसंतनाइक स्लम और धरमपेट गडगा स्लम के बीच. जब बारसे ने पहला सालाना स्लम सॉकर टूर्नामेंट करवाया तो उसमें बच्चों की 128 टीमों ने हिस्सा लिया. आज ‘स्लम सॉकर – क्रीड़ा विकास संस्था’ का कामकाज बहुत फैल गया है. सिर्फ महाराष्ट्र में ही बताया जाता है कि इसमें 2500 टीमें खेलती हैं. बताया जाता है कि बारसे की ये पहल, आज सीधे तौर पर 10 हजार से ज्यादा बच्चों की जिंदगी को प्रभावित करती है. भारत के कई राज्यों में. इनके इंटरैक्टिव प्रोग्रैम होते हैं जिसमें फुटबॉल के रास्ते बच्चों की लाइफ को बदलना शुरू किया जाता है. उनके अलग-अलग सब्जेक्ट्स को इम्प्रूव करने में भी मदद की जाती है. विदेशी स्कूली बच्चों और सेलेब्रिटीज़ को भी बुलाया जाता है और बच्चों से मिलवाया जाता है. इतने बरसों में स्लम सॉकर से जुड़कर बहुत सारे बच्चे निकले हैं जो आज सफल मुकाम तक पहुंचे हैं.

#12: मंजुले का कहना है कि इस कहानी में वो ये भी दिखाएंगे कि कैसे झुग्गियों में पले बच्चों को ड्रग्स की आदतें हैं और अपराध की तरफ झुकाव है. और कैसे खेल उनकी जिंदगियों को सुधार सकता है. विजय बारसे की कहानी होने के बावजूद ये पूरी तरह उनकी बायोपिक है कि नहीं, ये इससे समझा जा सकता है कि राइटर-डायरेक्टर मंजुले ने स्क्रिप्ट ऐसे लिखी है कि इसमें बच्चन का कैरेक्टर विजय बारसे के किरदार जैसा नहीं लगेगा. वो काफी अलग ही नजर आएगा. मंजुले ने कहा है कि उन्होंने इस किरदार को उसके मूल स्त्रोत से बहुत दूर स्थित किया है. बावजूद इसके कि वे नागपुर जाकर बहुत बार बारसे से मिले हैं और उनसे उनकी लाइफ और इन फुटबॉल खेलने वाले बच्चों की कहानियों के बारे में पूछा है. ख़ैर, ‘झुंड’ की शूटिंग वगैरह का काम तकरीबन निपट गया है. फिल्म 8 मई, 2020 को रिलीज़ हो रही है.

झुंड.
विजय बारसे के बच्चों का, एक झुंड.

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