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सीरीज़ रिव्यू: मेड

ये रिव्यू संध्या ने लिखा है. वो दी लल्लनटॉप के साथ इंटर्नशिप कर रही हैं. संध्या ने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से हिंदी लिटरेचर में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. संध्या को लिखने, पढ़ने, पेंटिंग और फोटोग्राफी का शौक है.


एक पच्चीस साल की बिनब्याही मां. गोद में दो साल की बच्ची. और घर में एक अब्यूजिव बॉयफ्रेंड. एक दिन ये मां तय करती है कि अब और प्रताड़ना बर्दाश्त नहीं करेगी. जो भी थोड़े बहुत पैसे हाथ में होते हैं. उन्हें लेकर आधी रात भाग जाती है.

हम बात कर रहे हैं नेटफ्लिक्स की सीरीज़ ‘मेड’ की, जो 1 अक्टूबर 2021 को हिन्दी और इंग्लिश में नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हुई है. और इस वक़्त नेटफ्लिक्स के टॉप 10 स्ट्रीमिंग वेब सीरीज़ की लिस्ट में शामिल है. कहानी के केंद्र में पच्चीस साल की लड़की एलेक्स है, जो आधी रात को अपनी दो साल की बच्ची, कुछ सामान और जेब में सिर्फ़ अट्ठारह डॉलर लेकर अपने शराबी बॉयफ्रेंड का घर छोड़ देती है. फिर आगे की पूरी सीरीज़ एक सिंगल मदर के फाइनेंशियल और इमोशनल स्ट्रगल पर आधारित है.

आप सोच रहे होंगे कि क्या ये एक वेब सीरीज़ का रिव्यू है? नहीं. सीरीज़ में एलेक्स की कहानी दरअसल एक वास्तविक कहानी से प्रेरित है. ये कहानी है अमेरिकन ऑथर स्टेफनी लैंड की जो उन्होंने अपनी किताब ‘मेड : हार्ड वर्क, लो पे एण्ड अ मदर्स विल टू सर्वाइव’ में सुनाई है. स्टेफनी का जन्म यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका के एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ. उनके लिए जीवन कभी आसान नहीं रहा. लंबे समय तक वे एक अब्यूजिव रिलेशनशीप में रहीं. और अपने लेट ट्वेंटीज़ में अपनी बच्ची को लेकर अपने बॉयफ्रेंड से अलग हो गईं. इसके बाद सर्वाइवल का सवाल जीवन का नासूर बन गया.

स्टेफनी के पास तब न ही कोई डिग्री थी, न ही कोई जॉब और न ही रहने की कोई जगह. ऐसे में उन्होनें छह साल तक मेड की नौकरी की. वो टॉयलेट्स और घर साफ करती थीं ताकि अपनी बेटी को पाल सकें. फिर किसी तरह लोन्स और स्टूडेंट सब्सिडी की मदद से यूनिवर्सिटी में क्रिएटिव राइटिंग के कोर्स में एडमिशन लिया. इसी दौरान उनके ब्लॉग पोस्ट्स छपने लगे. 2015 में ‘वोक्स’ नाम की वेबसाइट पर प्रकाशित उनका एक लेख वायरल हो गया, जिसे अब तक कुल 13 लाख बार पढ़ा जा चुका है. 2019 में उनकी पहली किताब न्यूयॉर्क टाइम्स की बेस्ट सेलर बनी. और ऐसे एक लड़की जो अभी ग्रेजुएट भी नहीं है, बेस्ट सेलिंग राइटर बन जाती है.

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मेड सीरीज़ में एक अब्यूज़िव रिलेशनशिप्स के बीच मां-बेटी की बॉन्डिंग को बेहद खूबसूरती से दिखाया गया है.

सुनने में ये कहानी बॉलीवुड के किसी मेलोड्रमैटिक बायोपिक के लिए आइडल प्लॉट है, जहां एक माँ के स्ट्रगल की दुखभरी दास्तान उसे महान साबित कर देगी. पर ये सीरीज़ मदरहुड यानी मातृत्व को बेवजह महान नहीं बताती है. सीरीज़ के केंद्र में सिंगल मदर के स्ट्रगल्स ज़रूर हैं लेकिन कहानी मेल डॉमिनेटिंग कल्चर में औरतों की स्थिति को कई एंगल्स से दर्शाती है.

लीड कैरेक्टर एलेक्स पहले ये समझ नहीं पाती कि उनके साथ घरेलू हिंसा हुई भी है या नहीं, क्योंकि बॉयफ्रेंड शॉन ने कभी सीधे उस पर हाथ नहीं उठाया. वो उसके आस-पास की चीजें बेरहमी से तोड़ देता और बुरा बर्ताव करता. ये बात उसे डोमेस्टिक वायलेन्स शेल्टर में समझ आई कि इमोशनल टॉर्चर भी डोमेस्टिक वायलेन्स ही है. लेकिन आज भी समाज में मेंटल हरैसमेंट और इमोशनल टॉर्चर को फिज़िकल वायलेन्स से कम अहमियत मिलती है, या फिर उसे प्रताड़ना माना ही नहीं जाता.

एक इंटरव्यू में स्टेफनी लैंड कहती हैं,

“मुझे लगता है कि भावनात्मक शोषण को हिंसा के रूप में पहचाना जाना चाहिए. यह घरेलू हिंसा है और यह घातक भी है. भावनात्मक शोषण जब एक बार ज़ोर पकड़ लेता है, तो आप लगभग हर तरह से नियंत्रित हो जाते हैं. अब्यूज़र अक्सर आपको, आपके परिवार और दोस्तों के खिलाफ कर आइसोलेट कर देते हैं. वे आपका सेल्फ वर्थ छीन लेते हैं और आपको आर्थिक रूप से नियंत्रित करते हैं. और तब शारीरिक शोषण भी शुरू होने लगता है. अक्सर इस पॉइंट तक भी आप यह नहीं मानते हैं कि आप एक अब्यूजिव रिलेशनशिप में हैं क्योंकि उन्होंने आपके ऊपर हाथ नहीं उठाया है. फिर वे आपके आसपास की चीजों को नष्ट करना शुरू करते हैं. पर ये तब तक घरेलू हिंसा नहीं समझा जाता क्योंकि आपको चोट नहीं लगी.”

स्टेफनी आगे बताती हैं कि कैसे अदालत ने उन्हें बुरा और उनके बॉयफ्रेंड को एक बेहतर पेरेंट समझा क्योंकि बॉयफ्रेंड के पास स्थायी नौकरी और घर था, जबकि स्टेफनी बेघर थीं. पूरी सीरीज़ में एलेक्स नौकरी कर पाई-पाई जोड़ती है ताकि सरकारी सब्सिडी पर घर पा सके. चाइल्ड डे केयर का खर्चा उठा सके. बावजूद इसके, उसे ढेरों फॉर्म्स भरने होते हैं, गवाह इकठ्ठे करने होते हैं, सिर्फ यह साबित करने के लिए कि वो बच्ची के लिए एक बेहतर पेरेंट है.

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सीरीज़ में बच्ची की कस्टडी की लड़ाई भी दिखाई गई है. इसमें ‘मेड’ के बॉयफ्रेंड को बच्ची की कस्टडी इस आधार पर दे दी जाती है कि उसके पास एक परमानेंट जॉब है.

एलेक्स के अलावा दो और किरदार हैं जिनके द्वारा दो डिफरेंट एज ग्रुप और फाइनैन्शियल स्टेटस की औरतों के जीवन में मेल डॉमिनेंस दिखाई गई है. एलेक्स की माँ पॉला भी घरेलू हिंसा की विक्टिम हैं और तलाक के बाद कई रिलेशनशिप्स में रहती हैं. वो आदमियों पर हर बार इमोशनली भरोसा करती हैं लेकिन लगभग हर आदमी उनका इस्तेमाल ही करता है. वो एक टैलेंटेड पेंटर हैं, लेकिन बाइपोलर डिसऑर्डर की मरीज़ हैं. कहानी में दिखाया गया है कि किस तरह एक अब्यूजिव रिलेशन में रहने के कारण उनका टैलेंट कभी बाहर नहीं आ पाया. और यही उनके मेंटल डिसऑर्डर का कारण है.

कहानी के अंत में एलेक्स का आत्मविश्वास लौट आता है और वो निडर होकर बॉयफ्रेंड शॉन के खिलाफ लड़ती है. वो अंत में अपनी बेटी की फुल कस्टडी लेकर यूनिवर्सिटी चली जाती हैं. वहीं एलेक्स की माँ पॉला अब्यूजिव संबंधों से खुद को निकाल नहीं पाती. और फिर एक बार प्यार और सम्मान की उम्मीद में कॉम्प्रोमाइज़ कर उन्हीं में रह जाती है. यहाँ पॉला एक उदाहरण हैं. उन औरतों का जो शोषण को समझकर भी उस से बाहर निकलने के लिए संघर्ष नहीं करतीं और ऐसे शोषित होना उनके लिए आदत सी बन जाती है. यहां एक दिलचस्प बात ये है कि ऑन स्क्रीन माँ – बेटी का किरदार निभाने वालीं एंडी मैकडोवेल और मारग्रेट क्वाली ऑफ स्क्रीन भी माँ – बेटी हैं.

मां-बेटी के अलावा तीसरा किरदार एलेक्स की पहली क्लाइंट ‘रेजिना’ का है. रेजिना एक सेल्फ डिपेन्डन्ट कॉर्पोरेट लॉयर है. वो एक अमीर आदमी ‘जेम्स’ से शादी करती हैं लेकिन नौकरी नहीं छोड़ती. वो जेम्स के एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स के साथ इमोशनल समझौते कर लेती है. बावजूद इसके उनके रिश्ते में दरार आ जाती है क्योंकि लगातार कई मिसकैरिजेस के बाद अब रेजिना प्रेग्नेंट नहीं हो सकती. रेजिना अपने संबंध और समाज में औरत होने की मुहर को कायम रखने के लिए सरोगेसी का सहारा लेती है. कहानी में साफ दिखाया गया है कि रेजिना एक बच्चे की जिम्मेदारी उठाने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है. ना ही वो सरोगेसी से खुश है क्योंकि ऐसे वह अपने मातृत्व को महसूस नहीं कर पाती. बावजूद इसके वो ये सब कर रही है. ये दिखाता है कि किस तरह एक औरत के लिए व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों ही स्तरों पर माँ बनने को मैन्डटरी बना दिया गया है. जैसे औरत अगर सबकुछ होने के बावजूद भी अगर माँ नहीं है तो कुछ भी नहीं है. इन तीन कैरेक्टर्स के अलावा कई ऐसे छोटे किरदार भी हैं जिनकी घरेलू हिंसा की अपनी कहानी है.

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मेड

दस एपिसोडस में बनी इस वेब सीरीज़ का हर एपिसोड 45 से 60 मिनट का है. कहानी बहुत धीमी गति से चलती है और दर्शक लगातार तनाव महसूस कर सकते हैं. जो कि एक सिंगल मदर के स्ट्रगल, अन्य किरदारों के साथ होने वाले शोषण और प्रशासन के लूपहोल्स को देखकर महसूस करना स्वाभाविक है. इस सीरीज़ से कई मिथ टूटते हैं. एक तो ये कि अमेरिका जैसी फ़ॉरेन कंट्रीज़ में औरतें स्वतंत्र और सुरक्षित हैं, जबकि सच तो ये है कि डोमेस्टिक वायलेन्स और मैरिटल रेप दुनियाभर में हो रहा है. पुरुष का वर्चस्व किस तरह से औरत के दिमाग पर हावी होता है और उसके क्या परिणाम होते हैं, इसकी बारीकियों को इस सीरीज़ में बहुत ही साइलेन्ट और सहज तरीके से दिखाया गया है.

इस सीरीज़ को देखने के बाद मेरे मन में ये सवाल आया कि क्या हो अगर भारत में कोई औरत आधी रात गए अपने पति का घर छोड़ दे? क्या उसके पास मायका, दोस्तों या रिश्तेदारों के घर को छोड़कर कोई डोमेस्टिक वायलेन्स शेल्टर होगा? किसी कंपनी के तहत मेड की नौकरी या बच्चे के लिए ‘डे केयर’ जैसा कोई संस्थान उपलब्ध होगा? ‘मियां–बीवी में तो झगड़े होते ही रहते हैं’- इस तर्क के खिलाफ़ अगर एक औरत दूसरा थप्पड़ खाकर, फिर से पति को माफ करने के पहले ही अदालत पहुंच जाए. अगर एक भारतीय औरत आधी रात गए घरेलू भावात्मक हिंसा के खिलाफ लड़ने की ठान ले. अपने बच्चे को ऐसे माहौल में पालने से इनकार कर दे. तो समाज कहाँ तक उसके फैसले स्वीकार करेगा और कहां तक उस औरत का साथ देगा?


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