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पाताल लोक की वो 12 बातें जिसके चलते इस सीरीज़ को देखे बिन नहीं रह पाएंगे

पाताल लोक. अब तक तो आप इसके बारे बहुत कुछ देख-सुन चुके होंगे. हो सकता है कि आपने ये सीरीज़ भी पूरी देख डाली हो. और अगर नहीं देखी, तो हम आपको बताते हैं वो 12 चीज़ें जो इस सीरीज़ के एपेटाईज़र के रूप में कार्य करेंगी. अगर सीरीज़ देख भी ली हो तो भी आपको इन बातों को पढ़ने में अद्भुत आनंद आने वाला है. क्यूंकि तब शायद आप और अच्छे से रिलेट कर पाएंगे.

आपको इन 12 बातों में, एक्टर्स की परफ़ॉर्मेंसेज़ और कहानी के बारे में जानने को नहीं मिलेगा, क्यूंकि उसकी बात हम अलग से एक स्टोरी में कर चुके हैं. तो आइए, बाक़ी बातों के बारे में भी जान लेते हैं.

#1) सीरीज़ के कई सीन ऐसे बन पड़े हैं कि अचानक मुंह से निकलता है ‘वाह’. एक सीन है, सीरीज़ की शुरुआत में जब मशहूर पत्रकार संजीव मेहरा को पत्रकार घेर लेते हैं. बाइक से ‘पपराजी फ़्लैश अटैक’ होता है तो साथी पत्रकार पूछता है-

कौन हैं ये लोग, कहां से आ जाते हैं?

इसके जवाब में संजीव मेहरा जो जवाब देता है वो इस पूरे सीन को पोएटिक बना देता है. संजीव कहता है-

दे आर अस.

#2) ’सत्या’ मूवी में एक सीन है जहां पर एक अश्लील चुटकुले के समाप्त होते-होते गोलियां चलना शुरू हो जाती हैं. ये सीन इसलिए मास्टरपीस है क्यूंकि इसमें इमोशन बहुत तेज़ी से या लगभग अचानक बदलते हैं. आपने स्टैंड अप कॉमेडी देखते हुए भी गौर किया होगा कि अंत में अगर हल्की सी इमोशनल बात भी आ जाए तो हमारी आंखें भर आती हैं. जबकि वैसी या उससे ज़्यादा भावनात्मक बातें हम अन्यथा आसानी से पचा जाते. जैसे आंखें अंधेरे के बाद उजाले या उजाले के बाद अंधेरे में तुरंत एडजस्ट नहीं कर पातीं, वैसे ही अचानक से इमोशंस के गियर चेंज होने पर हमें शॉक लगना अवश्यंभावी है. यही होता है ‘पाताल लोक’ में जब तीन बच्चे नॉन-वेज चुटकुला सुन/सुना रहे होते हैं. ये पूरा सिक्वेंस और भी शॉकिंग इसलिए हो जाता है, क्यूंकि दो एपिसोड बीत चुकते हैं तब जाकर सीरीज़ का पहला वीभत्स सीन आता है. मानो झकझोर के उठा दिया गया हो दर्शकों को.

'सत्या' मूवी में भी उसी शॉक वैल्यू का उपयोग किया गया था जिसका एक सीन में 'पाताल-लोक' में किया गया है.
‘सत्या’ मूवी में भी उसी शॉक वैल्यू का उपयोग किया गया था जिसका एक सीन में ‘पाताल-लोक’ में किया गया है.

#3) कुछ दिनों पहले ‘दी न्यूज़रूम’ देखी थी. उसमें किसी न्यूज़ रूम के अंदर के सीन और वहां का पूरा काम बड़े प्रभावी ढंग से दिखाया गया था. आख़िर वो सीरीज़ थी भी ‘न्यूज़ रूम’ पर बेस्ड. ‘पाताल-लोक’ में न्यूज़ रूम और स्टूडियो के सीन देखते हुए उस सीरीज़ की याद आना, इस सीरीज़ के लिए कॉम्प्लिमेंट है.

#4) सीरीज़ में धार्मिक और जातिगत पूर्वाग्रहों को भी बहुत सटल तरीक़ों से दिखाया गया है. जैसे पंजाब वाले सीक्वेन्स में मंज़ारो का ऊंचीं जातियों द्वारा उत्पीड़न और फिर उसके जवाब में मंज़ारो का हिंसक रिवॉल्ट.

और, जब अंसारी सिविल सर्विसेज़ का एक प्रेक्टिस इंटरव्यू दे रहा होता है तो एक सह प्रतियोगी बोलता है-

चिंता मत कर भाई, हो जाएगा तेरा. उनको भी तो रेप्रेज़ेंटेशंन दिखाना होता है.

और, जब कबीर नाम का एक कैरेक्टर अपनी धार्मिक पहचान छुपाने के लिए सर्जरी सर्टिफ़िकेट बनाता है. या अपने धर्म को छुपाने के लिए वो अपने लास्ट नेम का सिर्फ़ एक अक्षर, ‘एम’ का इस्तेमाल करता है. या जब उसका पिता बोलता है-

जिस लड़के को मैंने मुसलमान नहीं बनने दिया, आप लोगों ने जिहादी बना दिया.

'दी न्यूज़रूम'. टेलिविज़न मीडिया पर बनी एक बेहतरीन वेब सीरीज़ (या सीरियल).
‘दी न्यूज़रूम’. टेलिविज़न मीडिया पर बनी एक बेहतरीन वेब सीरीज़ (या सीरियल).

#5)

Recent Mob lynchings
US Iran Tensions
Marathwada droughts
Farmers suicide
New cast equations for the UP elections
FAKE NEWS!

न्यूज़ रूम की मीटिंग के दौरान ये सारी चीज़ें आपको एक वाइट बोर्ड में लिखी हुई देखने को मिलती हैं. वाइट बोर्ड जिसमें खबरों के लिए आइडिया नोट किए जा रहे हैं. हालांकि ये वाइट बोर्ड ज़्यादा देर तक स्क्रीन पर नहीं दिखता, लेकिन हमने इसे पॉज़ करके देखा तो इसमें लिखी हुई चीज़ों को पढ़कर ख़ुशी हुई कि डिटेलिंग का किस कदर ख़्याल रखा गया है.

एक लंबी अवधि के ऑडियो विज़ुअल कंटेंट में बनाने वाले या तो अंत तक आते-आते या बीच-बीच में थोड़ी ढीले पड़ जाते हैं. ‘निपटा दो’ जैसे तैसे. ‘पाताल-लोक’ में आपको ये आलस ढूंढ़ने से भी न मिलेगा. दिल्ली और यमुना पार के लोकेशंस. चित्रकूट, यूपी (मध्य प्रदेश बॉर्डर) के लोकेशंस. पंजाब के लोकेशंस. गरीब, मध्यमवर्ग और हायर क्लास के घरों के इंडोर लोकेशंस. जेल का माहौल. इससे पहले इतने क़रीब से जेल का माहौल ‘क्रिमिनल जस्टिस’ में देखने को मिला था.

लोगों की बातचीत में हल्का सा स्थानीय भाषा का प्रभाव. इस सब चीज़ों को लाने के लिए ‘जामताड़ा’ या ‘एक्सट्रेक्शन’ की तरह सिर्फ़ कलर टेंपलेट बदल कर नहीं काम चला लिया गया है. बाक़ायदा अंदर तक घुसा गया है. डीप.

फ़ेक न्यूज़. बोल्ड में लिखा हुआ है, कैपिटल लेटर्स में.
फ़ेक न्यूज़. बोल्ड में लिखा हुआ है, कैपिटल लेटर्स में.

पंजाब के गांव की पगडंडियां, यमुना पार और दिल्ली के बाहरी इलाक़ों के रेतीले मैदान, कूड़े के ढेर. एक तरफ़ रिनोवेट हो रहा चित्रकूट का पुलिस थाना, जो धूल और ग़ुबार से भरा है, दूसरी तरफ़ दिल्ली पुलिस का हेडक्वॉर्टर जिसमें हर चीज़ सरकारी होते हुए भी चाक चौबंद है. मीडिया ऑफ़िस. आनंद विहार बस स्टेंड. यूपी रोडवेज़ की बेइंतहा खटारा बस. और भी हज़ारों ऐसी चीज़ें जिसे देखकर आपको सब कुछ सामान्य लगता है. अधिक या कम नहीं सामान्य. इस सबकी तुलना ज़रा ‘कभी ख़ुशी कभी ग़म’ के चांदनी चौक वाले सेट से करके देखिएगा. प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे.

और ये परफ़ेक्शन केवल लोकेशन और डायलोग के स्तर पर ही नहीं, ऑफ़िस पॉलिटिक्स, लाइफ़ स्टाइल, ड्रेसिंग सेंस और मेकअप के स्तर तक दिखाई देता है.

लिफ़्ट के अंदर घुसते हुए एक हाथ आगे कर देना, ताकि लिफ़्ट बंद न हो जाए. ये और इस जैसे कई सीन्स देखकर आप निश्चित नहीं कह सकते कि ये सब अपने-आप हुआ या सायास किया गया, लेकिन इसके चलते पूरी सीरीज़ रियल्टी के और क़रीब होती चली गई.

आउटर यमुना पार की इस आउटडोर लोकेशन और सेटअप को देखिए. बाक़ी लोकशंस भी ऐसी ही रियलस्टिक हैं.
आउटर यमुना पार की इस आउटडोर लोकेशन और सेटअप को देखिए. बाक़ी लोकशंस भी ऐसी ही रियलस्टिक हैं.

#6)

ये जो दुनिया है न, ये एक नहीं तीन दुनिया है. सबसे ऊपर स्वर्ग लोक. जिसमें देवता रहते हैं. बीच में धरती लोक. जिसमें आदमी रहते हैं. और सबसे नीचे पाताल लोक. जिसमें कीड़े रहते हैं. वैसे तो ये शास्त्रों में लिखा हुआ है लेकिन मैंने वट्सऐप पे पढ़ा था.

ये इस सीरीज़ का एक डायलॉग है. जो इस सीरीज़ के नाम को जस्टिफ़ाई करता है. और इस डायलॉग को जस्टिफ़ाई करती है सीरीज़ की लोकेशंस और तीन क्लासेस. स्वर्ग लोक में संजीव मेहरा और डीसीपी भगत रहते हैं तो धरती में हाथीराम और पाताल लोक में त्यागी.

#7) सब कुछ इतना परफ़ेक्ट है कि इस सीरीज़ को दर्शकों के साथ इमोशनली कनेक्ट करवाना मुश्किल नहीं होता. लेकिन शायद या तो मेकर्स की ये मंशा ही न रही हो या फिर ऐसा करने में वो हल्के से मार्जिन से चूक गए हों. मतलब इसे ऐसे समझिए कि आप ज़्यादातर सीन्स देखकर कहते हो, ‘हां ऐसा होता है. मैंने देखा है.’ या ‘ऐसा मेरे साथ भी हुआ है.’ लेकिन कभी भी आपको वो चीज़ देखकर इमोशनल तौर पर असहज नहीं महसूस होता. आप क्रमशः हंसते या रोते नहीं.

#8) एक बारगी आपको देखकर ये भी अजीब लगता है कि सीरीज़ में सब कुछ डालने की कोशिश कर दी गई है. मॉब लिंचिंग. जातिवाद. इस्लामोफोबिया. फ़ेक न्यूज़. डाकू. बाहुबली. चाइल्ड एब्यूज़. प्रेम. धोखा. बदला. थर्ड जेंडर.

इसमें से कई चीज़ें तो ख़ैर मेन प्लॉट का हिस्सा हैं लेकिन कई चीज़ें इतनी तेज़ी से आती हैं और इतनी शॉर्ट लिव्ड हैं कि सीरीज़ इन सब चीज़ों पर उंगली तो रख देती है, लेकिन कहीं से भी आपको झकझोरती नहीं. सोचने पर विवश नहीं करती. छूकर निकल जाने जैसा. कुछ नीयो-नुआर वेब सीरीज़ से इसकी तुलना की जाए तो बेशक इस सीरीज़ का इमोशन कोशेंट ‘सेक्रेड गेम्स’ या ‘मिर्ज़ापुर’ से कहीं ज़्यादा है, लेकिन फिर भी ये अपने पूरे पोटेंशियल तक नहीं पहुंच पाती.

कुछ क्लिशे चीज़ें हैं, जिससे 'पाताल-लोक' के मेकर्स भी अपना पीछा नहीं छुड़ा पाए हैं. इनमें से लीड कैरेक्टर की पारिवारिक दिक़्क़तें भी शामिल हैं.
कुछ क्लिशे चीज़ें हैं, जिससे ‘पाताल-लोक’ के मेकर्स भी अपना पीछा नहीं छुड़ा पाए हैं. इनमें से लीड कैरेक्टर की पारिवारिक दिक़्क़तें भी शामिल हैं.

#9) एक तो किसी जासूस, किसी पुलिसवाले, किसी वॉर हीरो को पारिवारिक उलझनों में दिखाना काफ़ी पुराना हो गया है. चाहे हॉलीवुड में ‘ट्रू लाइज़’ जैसी मूवीज़ हों या इस एक थीम पर बेस्ड इंडियन वेब सीरीज़ ‘फ़ैमिली मैन’. इससे स्क्रिप्ट का कॉन्फ़्लिक्ट बढ़ जाता है और कंटेंट का हीरो हम आम लोगों के और क़रीब आ जाता है. अब ये सब होना चाहिए या नहीं, नहीं कह सकते. लेकिन ये रिपिटेटिव और ऑव्यस तो ज़रूर लगता है.

#10) कुछ आइडिया बहुत फ़ार फ़ेच भी लगते हैं जिन्हें केवल बेनिफ़िट ऑफ़ डाउट और क्रिएटिव लिबर्टी के चलते पासिंग मार्क्स दिए जा सकेंगे. जैसे-

– ‘चीनी’ नाम का एक नॉर्थ-इस्टर्न कैरेक्टर बचपन से दिल्ली के निज़ामुद्दीन स्टेशन में रहा है. फिर भी हिंदी ढंग से नहीं बोल पाता, गोया सालों से नहीं, कुछ दिन पहले ही दिल्ली आया हो.

– एसयूवी गाड़ियों का पीछा खटारे ऑटो से किया जाना, और किसी को उसपर शक भी न होना.

#11) ‘अ वेंसडे’ का एक डायलॉग है-

जब तक आपको मालूम नहीं था मैं कौन हूं, आप मुझसे डर भी रहे थे, मुझे सीरियसली भी ले रहे थे. अब मैंने आपको बता दिया मैं एक आम आदमी हूं तो आपकी आवाज़ में अचानक एक कॉन्फ़िडेन्स आ गया है. शायद आप अब ये भी सोच रहे होंगे कि, ‘अच्छा! टेररिस्ट नहीं है. आम आदमी है. अब तो पकड़ लूंगा.’

किसी इंसान की सच्चाई पता चलने पर उसे मिलने वाले ट्रीटमेंट में परिवर्तन आ जाता है.
किसी इंसान की सच्चाई पता चलने पर उसे मिलने वाले ट्रीटमेंट में परिवर्तन आ जाता है.

सोचिए ये बात कितनी सच है. सामने कौन है, इस बात का आपके कॉन्फ़िडेंस पर भी काफ़ी बड़ा असर पड़ता है. ‘पाताल-लोक’ में हाथीराम एक जगह संजीव मेहरा से कहता है-

आपसे जब पहली बार मिला था ना, तो मुझे लगा कि कितने बड़े आदमी हो आप और मैं कितना छोटा. इस केस में मेरी चाहे कितनी भी वाट लगी हो, कम से कम ये ग़लतफ़हमी दूर हो गई.

#12) स्टीवन स्पीलबर्ग के सामने ‘जॉज़ (Jaws)’ बनाते हुए ये दिक्कत आई थी कि उनकी नक़ली (मैकेनिकल) शार्क ख़राब हो गई थी. उसे सही करवाने के बदले स्टीवन ने एक और धांसू निर्देशक ‘एल्फ़र्ड हिचकॉक’ के सिद्धांत का सहारा लिया-

अज्ञात का भय सबसे ख़तरनाक होता है.

मैकेनिकल शार्क के ख़राब हो जाने पर बहुत दिनों तक परेशान रहे थे 'जॉज़ (Jaws)' के मेकर्स.
मैकेनिकल शार्क के ख़राब हो जाने पर बहुत दिनों तक परेशान रहे थे ‘जॉज़ (Jaws)’ के मेकर्स.

और फिर इसके बाद स्पिलबर्ग ने नक़ली शार्क का बहुत कम इस्तेमाल किया. शार्क के मूवी में न होने से जो प्रभाव पड़ा उसने ‘जॉज़ (Jaws)’ को ब्लॉकबस्टर बना दिया. आज चालीस साल बाद भी फ़िल्ममेकर्स इस सिद्धांत का इस्तेमाल करते हैं. ‘पाताल-लोक’ भी दोनलिया नाम के डाकू से एक ‘अज्ञात का भय’ बनाने में काफ़ी हद तक कामयाब रहा है.

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