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जॉर्ज ऑरवेल का लिखा क्लासिक 'एनिमल फार्म', जिसने कुछ साल पहले शिल्पा शेट्‌टी की दुर्गति कर दी थी

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आपको याद है जब कुछ साल पहले काउंसिल ऑफ स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशन (CISCE) ने और भी रोचक कहानियों, कॉमिक्स और नॉवेल को अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल करने का फैसला लिया था. तब शिल्पा शेट्टी का इस बारे में क्या कहना था? चलिए आपको रिकॉल करवाते हैं.

512EQc0+jFL._SX323_BO1,204,203,200_ (1)असल में उनसे पूछा गया कि ऐसी कहानियों को कोर्स में डालने का फैसला कैसा लगता है? तो उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि लॉर्ड ऑफ द रिंग्स और हैरी पॉटर जैसी किताबों को सिलेबस का हिस्सा बनाना बढ़िया कदम है क्योंकि इनसे बहुत कम उम्र में रचनात्मकता और कल्पनाशीलता आती है. मुझे लगता है कि लिटिल वुमन जैसी किताब भी कम उम्र से महिलाओं के प्रति सम्मान को प्रोत्साहित करेगी. यहां तक कि एनिमल फार्म जैसी किताब भी शामिल की जानी चाहिए. ये भी बच्चों को जानवरों ख़याल रखना और प्यार करना सिखाती है.”

इसके बाद सोशल मीडिया के चतुर सुजानों ने उनकी दुर्गति करनी शुरू कर दी. वैसी ही जैसी हाल ही में कैनेडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की हुई जब उन्होंने क्यूबा के शासक फिदेल कास्त्रो के गुजरने के बाद उन्हें श्रद्धांजलि दी, जबकि पश्चिमी मुल्कों के बाकी नेताओं ने संकीर्ण टिप्पणियां ही कीं क्योंकि कास्त्रो से पश्चिमी मुल्कों का रिश्ता खराब रहा था. जस्टिन जब से पीएम बने हैं उन्होंने प्रगतिशील बातें की हैं और ऐसे विचार रखे हैं जो पहले किसी वैश्विक नेता से सुनने को नहीं मिलते थे. वे LGBTQ परेड में शामिल होते हैं. खुश होते हैं. कैजुअल रहते हैं. पोलिटिकली करेक्ट होने के पीछे नहीं दौड़ते.

ट्विटर पर ट्रोल करने के चक्कर में लोग इतने आगे बढ़ गए कि कास्त्रो को जस्टिन का पिता तक बता दिया.

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#trudeaueulogy और #trudeaulogies के साथ लोगों ने दुनिया के ‘कुख्यात’ इंसानों को जस्टिन के अंदाज में श्रद्धांजलियां लिखीं.

ठीक इसी फॉर्मेट पर शिल्पा शेट्‌टी को ट्रोल किया गया. हरेक ने मजाक बनाया कि शिल्पा की किताबों को लेकर जानकारी कितनी कम है कि वे उनके कंटेंट का न जाने क्या अर्थ निकाल लेंगी. इसी पर कुछ ट्वीट्स यूं थे.

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ये ठीक है कि शिल्पा एनिमल फार्म का मर्म नहीं जानती थीं और उन्होंने बाद में स्वीकार भी किया कि वे हैरी पॉटर, द लॉर्ड ऑफ रिंग्स और एनिमल फार्म के लेखकों की सराहना करती हैं लेकिन उन्होंने ये किताबें नहीं पढ़ी हैं और ये उनके मिजाज की किताबें नहीं हैं. उन्होंने ये भी कहा कि ये स्वीकृति उन्हें और भी भोंदू दिखाएगी लेकिन यही सच है और उन्हें इससे कोई दिक्कत नहीं. लेकिन किसी भी ट्रोलर ने ये नहीं देखा कि पाठ्यक्रम में आर्ट स्पीगलमैन का ग्राफिक नॉवेल मॉस भी शामिल किया गया है जिसे कक्षा 3 से आठवीं तक के बच्चों को पढ़ाया जाएगा. जैसे ‘एनिमल फार्म’ ठोस राजनीतिक व्यंग्य थी वैसे ही स्पीगलमैन की किताब भी ठोस राजनीतिक है. ये दूसरे विश्व युद्ध और 1 करोड़ लोगों के नरसंहार की पृष्ठभूमि में सुनाई जाती है. इसमें जर्मन लोगों को बिल्ली, पोलिश लोगों को सूअर और यहूदियों को चूहे के तौर पर दिखाया गया है. ये कोई बच्चों के पढ़ने की मुलायम किताब नहीं है.

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एनिमल फार्म के साथ भी ऐसा ही है. ये जानवरों के एक बाड़े की कहानी है. इसमें तरह-तरह के जानवर हैं और बाड़े के मालिक का परिवार है. कहानी बड़ी सिंपल है कि सूअरों के नेतृत्व में जानवर क्रांति करते हैं ताकि समानता पा सकें इंसानी गैर-बराबरी वाले समाज के विरुद्ध. एक बच्चा भी इसे पढ़कर वो जान सकता है जिसकी बात शिल्पा ने कही, चाहे अनजाने में ही सही. जानवरों के आकर्षण में बच्चे ऑरवेल के क्लासिक को अपनी बुनियाद बना सकते हैं और जब वे बड़े हो जाएं तो उसके पूरे निहितार्थ समझ सकते हैं.

पूरे तमाशे के बीच इस नॉवेल पर बात करते हैं. इसे लिखने वाले जॉर्ज ऑरवेल थे. उनके पिता ब्रिटिश अधिकारी थे. बिहार के मोतीहारी में तैनात थे और वहीं 1903 में ऑरवेल जन्मे. उनके परिवार का सामाजिक रुतबा तो था लेकिन ज्यादा पैसेवाले नहीं थे. ऑरवेल की विचारधारा लोकतांत्रिक समाजवाद की थी. जब वे आठ साल के थे तो परिवार इंग्लैंड लौट गया. स्कूल में उन्हें वर्गभेद दिखा. फिर कॉलेज जाने के बजाय वे ब्रिटिश इम्पीरियल पुलिस में शामिल होकर बर्मा चले गए. अपनी गरीबी और ब्रिटिश राजशाही की नीतियों से निराश होकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी. उन्होंने अपना काफी समय उत्तरी इंग्लैंड के बेरोजगार खदान मजदूरों और यूरोप के गरीब-पिछड़े लोगों के बीच रहकर देखा.

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ऑरवेल

उन्होंने 1933 में Down and Out in Paris and London लिखा. इसके साथ ही A Clergyman’s Daughter (1935) और The Road to Wigan Pier (1937) ऐसे थे जिनमें ऑरवेल की जिंदगी को भी पाया जा सकता है. इन नॉवेल में सामाजिक अन्याय, मध्यमवर्ग और निम्नवर्ग की गरीबी और उनके दोगलेपन पर कड़ी आलोचना की गई है. 1938 में आया Homage to Catalonia एक सैनिक के तौर पर उनके अनुभवों से पैदा हुआ था. 1945 में उनका सबसे चर्चित उपन्यास प्रकाशित हुआ. नाम था Animal Farm. 1949 में उन्होंने नॉवेल 1984 लिखा जो बहुत चर्चित हुआ. ये बहुत ही गंभीर तरीके से लिखा गया था. इसमें ऐसे भविष्य और ऐसे समाज की कल्पना की गई जहां प्यार करने वालों को सज़ा दी जाती है. जहां लोगों की निजता लूट ली गई है. जहां सच को तोड़ा जाता है.

आज पॉपुलर कल्चर में, फिल्मों और लेखनी में जो वाक्य Big Brother Is Watching You पाया जाता है वो इस नॉवेल में था. शिल्पा शेट्‌टी ने अंतरराष्ट्रीय रूप से जिस रिएलिटी शो बिग ब्रदर से पहली बार लोकप्रियता पाई थी वो भी ऑरवेल के नॉवेल से ही लिया गया है.

ऑरवेल का ‘एनिमल फार्म’ वैसे तो जानवरों के एक बाड़े की कहानी है लेकिन असल में इसका रेफरेंस उन घटनाओं की तरफ है जिनके नतीजे से 1917 की रूसी क्रांति हुई. वे सोवियत संघ के शासक जोसेफ स्टालिन की तानाशाही के बड़े आलोचक थे. ऑरवेल ने उस साम्यवाद की जो आलोचना की उसे इस किताब के एक वाक्य से समझा जा सकता है. उन्होंने लिखा था, All animals are equal, but some animals are more equal than others यानी सब जानवर बराबर होते हैं, लेकिन कुछ जानवर बाकी सबसे ज्यादा बराबर होते हैं.

अंग्रेजी में लिखे इस नॉवेल को हिंदी में पढ़ने के लिए यहां जा सकते हैं.

इस पर दो फिल्में भी बनी हैं.

ऑरवेल 1950 में गुजर गए जिसके चार साल बाद एक एनिमेटेड फिल्म रिलीज हुई. वैसे इसे अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी सीआईए की साम्यवादी दुश्मनों के खिलाफ प्रचार फिल्म भी माना जाता है.

एनिमल फार्म (1954) यहां देखें:

फिर 1999 में इस नॉवेल पर फीचर फिल्म बनी. इसमें एनिमेटेड नहीं बल्कि असली जानवर थे जो इंग्लिश बोलते हुए नजर आते थे. ऑरवेल के नॉवेल पर ये पूरी तरह खरी तो नहीं उतरती लेकिन देखने लायक है.

एनिमल फार्म (1999) यहां देखें:

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Watch two films on George Orwell’s classic Animal Farm, the novel which made Shilpa Shetty’s life hell

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