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क्या 'सवर्ण' न होने के चलते सिर्फ 50,000 रुपए ही इनाम मिला हिमा दास को?

देशभर में ‘धींग एक्सप्रेस’ के नाम से मशहूर हो चुकी हिमा दास इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही हैं लेकिन इस बार किन्हीं दूसरी वजहों से. हिमा ने फिनलैंड के टेम्पेरे में वर्ल्ड अंडर – 20 एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में 400 मीटर दौड़ का फाइनल जीता और ऐसा करने वाली वो भारत की पहली महिला एथलीट बनीं. हिमा के जीतते ही उनके बारे में गूगल पर जो चीज़ सबसे पहले सर्च की गई, वह थी उनकी जाति. और फिर शुरू हुआ तरह-तरह की अफवाहें फैलाने का काम.

हिमा दास का नाम अब भी गूगल का पहला सजेशन उनकी जाति को लेकर ही है.
हिमा दास का नाम अब भी गूगल का पहला सजेशन उनकी जाति को लेकर ही है.

एक वायरल फोटो (जो आपको ऊपर दाईं तरफ नज़र आ रही है) में हिमा दास की तस्वीर के साथ ये लिखा हुआ था कि सवर्ण न होने के चलते उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है और सरकार उन्हें केवल 50,000 रूपए का नकद पुरस्कार ही दे रही है. जबकि अन्य खिलाडियों को कहीं ज़्यादा पैसे और शोहरत हासिल हो रही है. अगर आपने ये तस्वीर देखी हो और कहीं इस पर यकीन कर बैठे हों तो आप भी इस देश की ‘फेक न्यूज़ फैक्ट्री’ का शिकार हो चुके हैं. घबराइए नहीं, हम आपको इस आरोप की पूरी सच्चाई बताएंगे और साथ ही ये भी बताएंगे कि हिमा दास को अभी तक किसने और कितना कितना पुरस्कार दिया.

50 हज़ार का आंकड़ा सही है, लेकिन…

सबसे पहले तो बात उस 50,000 की जो भारत सरकार हिमा दास को देने वाली है. ये बात बिलकुल ठीक है. लेकिन ये पूरा सच नहीं है. दरअसल, भारत सरकार की एक स्कीम है जिसका नाम है TOPS (Target Olympics Podium Scheme). ओलंपिक्स में मेडल्स की संख्या बढ़ाने के लिए मिनिस्ट्री ऑफ़ यूथ अफेयर्स ने ये स्कीम शुरू की है जिसमें खिलाड़ी को सरकार की ओर से अंतरराष्ट्रीय स्तर की कोचिंग उपलब्ध कराई जाती है, साथ ही खेल से जुड़ा सामान खरीदने की सुविधा, पर्सनल ट्रेनर और अन्य सुविधाएं दी जाती है. इसी स्कीम के तहत हिमा दास को 50,000 रूपए प्रति महीना Out of Pocket Allowance (OPA) दिया जाना है.

दावा किया जा रहा है कि हिमा यदि सवर्ण होतीं तो उन्हें कहीं ज़्यादा ईनाम मिलता.
दावा किया जा रहा है कि हिमा यदि सवर्ण होतीं तो उन्हें कहीं ज़्यादा ईनाम मिलता.

लिखने वाले ने 50,000 तो ठीक लिखा लेकिन ‘प्रति महीना’ जोड़ना भूल गया शायद. सरकार से मिलने वाली यह राशि एकमुश्त नहीं है बल्कि हर महीने उन्हें दी जाएगी और एशियन गेम्स तक लगातार मिलती रहेगी. साथ ही उन्हें टोक्यो ओलंपिक्स तक ‘एंड टू एंड’ सपोर्ट दिया जाएगा जिसका मतलब है कि खेल से जुड़ी हर मदद उन्हें सरकार की ओर से मुफ़्त मुहैया करवाई जाएगी.

किसी भी सरकारी सुविधा की तरह इस सुविधा का भी खिलाड़ी के बैकग्राउंड से कोई संबंध नहीं होता है. उसका प्रदर्शन बढ़िया होना चाहिए बस. तो हिमा सवर्ण हों न हों, उन्हें सरकार से सुविधा मिलती रहेगी.

क्या-क्या मिला है हिमा को?

हिमा किसी ट्रैक एंड फील्ड स्पर्धा में गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय हैं. तो उनपर इनामों की बरसात हुई है, असम से लेकर कर्नाटक तक. उन्हें असम राज्य का स्पोर्ट्स ब्रांड एंबेसडर बनाया जाने वाला है और असम सरकार उन्हें 50 लाख रूपए भी देगी. केंद्र ने उन्हें ‘टॉप्स’ में शामिल किया है. फिर असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने अपने माता-पिता के नाम पर चलने वाले ट्रस्ट से 1 लाख रूपए देने की घोषणा की है और असम के पूर्व मंत्री गौतम रॉय ने भी 1 लाख रूपए देने का वादा किया है. असम एथलेटिक्स एसोसिएशन और असम ओलंपिक एसोसिएशन ने भी हिमा को 2-2 लाख रूपए का इनाम देने का ऐलान किया है. कर्नाटक के उप-मुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने भी 10 लाख रूपए का नकद पुरस्कार देने की घोषणा की है.

हिमा की जीत की ख़ुशी में फ़िनलैंड में रह रहे भारतीयों ने उन्हें सम्मानित करने के लिए क्राउड फंडिंग से एक लाख रूपए जुटाए.

मॉरल ऑफ द स्टोरी

हिमा खिलाड़ी हैं. इसलिए मुद्दा उनका खेल में प्रदर्शन ही है. न कि उनकी जाति. इसीलिए ‘दी लल्लनटॉप’ उनकी जाति पर बात नहीं करेगा. बस इतना जानिए कि उनकी सफलता का जश्न मनाने या उन्हें ईनाम देने में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं हुआ है.


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