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फिल्म रिव्यू: वीरे दी वेडिंग

जो हिन्दी में भाई होता है, वो ही पंजाबी में ‘वीरे’ हो जाता है. चार दोस्त हैं. इसमें से एक वीरे की शादी होने वाली है. इसी शादी में ये चारों स्कूल के बाद मिलती हैं और पूरी फिल्म आगे बढ़ती है. ये चार लड़कियां- कालिंदी (करीना कपूर), अवनी (सोनम कपूर), साक्षी (स्वरा भास्कर) और मीरा (शिखा तलसानिया). जैसे और लोगों की ज़िंदगी में दिक्कतें होती हैं, वैसे इन चारों की लाइफ में भी है. लेकिन ऐसी कोई प्रॉब्लम नहीं है, जिससे इस फिल्म को फेमिनिज़्म वाला अप्रोच मिले. ‘वीरे दी वेडिंग’ से उम्मीद लगाई जा रही थी कि एक महिला केंद्रित हार्ड हिटिंग फिल्म होगी. लेकिन होता यूं है कि ये बस एक महिलाओं को केंद्र में रखकर बनाई एक साधारण फिल्म बनकर रह जाती है.

पिछले दिनों ‘एंग्री इंडियन गॉडेसेज’, ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’, और ‘पार्च्ड’ जैसी कई वुमन सेंट्रिक फिल्में आ चुकी हैं. इन फिल्मों में महिलाओं की असली समस्याओं के बारे में बात की गई है. लेकिन ‘वीरे दी वेडिंग’ के किरदारों की सबसे बड़ी समस्या शादी है. एक को करनी नहीं है, दूसरी करना चाहती है, तीसरी की टूटने वाली है और चौथी के घरवाले शादी के चक्कर में नाराज़ हैं. कुछ किरदार हैं, जो महिला नहीं होने के बावजूद फिल्म के हाइलाइट रहे हैं. जैसे कालिंदी के चाचा एक गे हैं. वो अपने पार्टनर के साथ समाज में स्वीकार्यता की लड़ाई लड़ रहा है. ये कैरेक्टर इसलिए जरूरी है क्योंकि ये एक वर्ग विशेष का प्रतिनिधित्व करता है. इसकी हमें बड़ी सख्त जरूरत है.

करीना आखिरी बार फिल्म 'उड़ता पंजाब' में नज़र आई थीं. 'वीरे दी वेडिंग' में उनका किरदार एक ऐसी लड़की का है, जो प्यार में होने के बावजूद अपने पेरेंट्स की हालत देखते हुए शादी नहीं करना चाहती है.
 ‘वीरे दी वेडिंग’ में करीना का किरदार एक ऐसी लड़की का है, जो प्यार में होने के बावजूद अपने पेरेंट्स की हालत देखते हुए शादी नहीं करना चाहती.

फिल्म के राइटर और डायरेक्टर अपनी महिला किरदारों से इतने ऑब्सेस्ड लगते हैं कि किसी और चीज़ को गंभीरता से नहीं लेते हैं. जैसे कालिंदी और उसके पापा के संबंध कुछ ठीक नहीं है. क्यों ठीक नहीं है, इस चीज़ को बड़े हल्के में दिखाया गया है. फेमिनिज़्म को लेकर जो कंफ्यूज़न है, ये फिल्म उसमें कहीं घुसती ही नहीं है. महिलाओं के किरदार सशक्त दिखाने के लिए उन्हें मॉल के अंदर सिगरेट पीते और गाली देते दिखाया गया है, जो हम पहले भी देख चुके हैं. इससे न तो उन लड़कियों के जीवन में कोई बदलाव आता है न देखने वालों के. एक्चुअल का फेमिनिज़्म क्या है? महिलाओं को किस तरह की आज़ादी चाहिए? फिल्म में इन मसलों पर बात न के बराबर की गई है.

फिल्म में स्वरा का सिगरेट को लेकर एक डायलॉग है, इसे बहुत चालाकी से डिस्क्लेमर और सारकाज़्म दोनों ही सेंस में इस्तेमाल किया गया है. स्वरा से जब सोनम का कैरेक्टर सिगरेट मांगता है, तो वो कहती हैं:

सिगरेट स्वास्थ और चरित्र दोनों के लिए हानिकारक है

फिल्म में आगे आप ऐसे और भी डायलॉग एक्सपेक्ट करते हैं, लेकिन वो मिलता नहीं है. ‘वीरे दी वेडिंग’ के साथ सबसे अच्छी बात ये है कि वो नकली नहीं है. लड़कियां जो कुछ कर रही हैं, वो दिखावे के लिए नहीं कर रहीं, असल में वैसी ही हैं. शिखा तलसानिया मां बनी हैं जिनका दो साल का एक बच्चा है. वो जो कुछ भी करती हैं, अपने बच्चे का भला सोच कर करती हैं. एक सीन में वो शराब पीने के बाद उल्टी करती हैं और बच्चा उनकी नकल कर रहा होता है. इसे देखकर वो कहती हैं कि बड़े हो जाने के बाद इसे कहीं मेरे बारे में ये सब याद तो नहीं रहेगा. वो कॉन्शियस होती हैं. लेकिन थोड़ी ही देर बाद वो उसे घूमने भेज देती हैं. क्योंकि वो मां बन-बन के थक गई होती हैं. कुछ देर के लिए रही सही लेकिन वो लड़की बन जाना चाहती हैं, जिसकी अपनी भी कोई ज़िंदगी है.

शिखा इससे पहले 'वेक अप सिड' और 'दिल तो बच्चा है जी' जैसी फिल्मों में नज़र आ चुकी हैं
शिखा इससे पहले ‘वेक अप सिड’ और ‘दिल तो बच्चा है जी’ जैसी फिल्मों में नज़र आ चुकी हैं.

फिल्म के सारे किरदार रईस दिखाए गए हैं. लेकिन जब चेक बाउंस होने के चक्कर में मनोज पाहवा (फिल्म में सुमित के पापा) को जेल जाना पड़ता है, तो इस दिखावट की भी कलई खुल जाती है. स्वरा का कैरेक्टर अपनी शादी टूटने की दिक्कत में फंसा हुआ है. पहले वो अपने पति के पैसे पर राज करती थीं, अब वो अपने रईस पापा (जो पूरी फिल्म में टेबल पर बैठे ही नज़र आते हैं. पता नहीं उनके पास इतना पैसा कहां से आता है?) के पैसों पर मौज कर रही हैं. यहां फिल्म से फेमिनिज़्म नाम की चिड़िया फुर्र करके उड़ जाती हैं.

स्वरा इससे पहले 'निल बटे सन्नाटा' और 'अनारकली ऑफ आरा' जैसी पूरी तरह सशक्त किरदारों वाली महिला केंद्रित फिल्मों में काम कर चुकी हैं.
स्वरा का बैकग्राउंड सशक्त किरदारों वाली महिला केंद्रित फिल्मों में काम करने वाली एक्टर का रहा है.

एक्टिंग के मामले में करीना कपूर को देखकर नहीं लगता कि वो किसी गैप के बाद वापस लौटी हैं, वो नैचुरल लगती हैं. उन सीन्स को छोड़कर जिसमें वो परेशान दिखने के लिए अजीब-अजीब सी शक्ल बनाती हैं. सोनम कपूर को देखकर आप डरे रहते हैं कि ये कहीं कुछ गड़बड़ ना कर दें, लेकिन वो भी बच-बचाकर निकल जाती हैं. स्वरा भास्कर का रोल थोड़ा लाउड है लेकिन वो इसमें जंचती हैं. शिखा तलसानिया ‘वेक अप सिड’ के बाद लौटी हैं और उनका ही एक किरदार है, जो थोड़ा सशक्त है. वो अपनी शारिरीक बनावट को लेकर फिल्म में चिंता ज़ाहिर करती हैं. लेकिन उसे उन्होंने एक्सेप्ट किया है. फिल्म के चारों लीड कैरेक्टर एक-दूसरे से एकदम अलग हैं, बावजूद इसके उनकी तगड़ी बॉन्डिंग है. उनकी बॉन्डिंग ऐसी इसलिए है क्योंकि वो किसी को कस्टमाइज़ नहीं करती, जो जैसा है उसे एक्सेप्ट करने के आइडिया में विश्वास रखता है. ‘अंग्रेज़ी में कहते हैं…’ जैसी फिल्म के बाद एकावली खन्ना से बहुत काम लिया जा सकता था और क्वॉलिटी काम लिया जा सकता था, लेकिन उन्हें बुरी तरह से जाया किया गया है.

करीना की मां बनने और सोनम की शादी के बाद 'वीरे दी वेडिंग' दोनों की पहली फिल्म है.
करीना की मां बनने और सोनम की शादी के बाद ‘वीरे दी वेडिंग’ दोनों की पहली फिल्म है.

फिल्म का पहला हाफ इंट्रेस्टिंग रहता है, क्योंकि आपको किरदारों के बारे में जानकारियां मिल रही होती हैं. एक कहानी बिल्ड हो रही होती है. आप कैरेक्टर्स के साथ इंवॉल्व हो रहे होते हैं. इससे दिक्कत ये होती है कि सेकंड हाफ तक पहुंचते-पहुंचते फिल्म प्रेडिक्टेबल हो जाती है. आप समझ जाते हैं कि फिल्म खत्म होते-होते सबकी समस्या सुलझ जाएगी और फिल्म की हैप्पी एंडिंग हो जाएगी. म्यूज़िक का इस फिल्म में बहुत स्कोप था और उसे भुनाया भी गया है. इसके गाने पहले ही चार्टबस्टर हो रखे हैं. अगर लिरिक्स को थोड़ा साइडलाइन कर दें तो म्यूज़िक मजेदार है. शशांक घोष की पिछली फिल्म ‘खूबसूरत’ में एक गाना था ‘मां का फोन आया’ उसी तर्ज़ पर इसमें भी एक गाना है ‘पप्पी ले लूं’. फ्रेश लिरिक्स के साथ ‘भंगड़ा ता सजदा’ का एक नया रेंडिशन सुनने को मिलता है. टाइटल ट्रैक भी सुनने में अच्छा लगता है. (स्पॉयलर- ‘तारीफां’ सिर्फ प्रमोशनल सॉन्ग है फिल्म में नही दिखता). ‘तारीफां’ यहां सुनें:

फिल्म देखकर जब आप सिनेमा हॉल से बाहर निकलते हैं तो आपके हिस्से कुछ फनी वन लाइनर्स ही बचते हैं. अगर इस फिल्म को मनोरंजन, सामाजिक प्रासंगिकता और कुछ सीख देने वाली स्केल पर मापा जाए, तो यहां ये फेल होती है. फिल्म के पास ऐसा कुछ नहीं है जिससे समाज या किसी इंसान में बदलाव की कोई गुंजाइश हो. एक तरह से कह सकते हैं कि फिल्म के साथ दिक्कत या अच्छाई यही है कि वो आपको सिर्फ एंटरटेन करती है. हां, अगर वीकेंड में फ्री हैं तो फिल्म देखी जा सकती है. नहीं भी देखा तो बहुत कुछ मिस हो जाने जैसा कुछ नहीं है.


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