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ये थानाध्यक्ष खुद तो दिवाली पर घर नहीं गया, लेकिन इन दो गरीब बच्चों की दिवाली हैपी कर दी

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जिन बच्चों को दिवाली जैसे त्योहार पर उछल कूद करनी चाहिए थी, वो ब़ाजार में बैठे थे. जिन्हें खुद के घर में रोशनी करनी चाहिए थी, वो दूसरों के घरों को रोशन करने के लिए दिए बेच रहे थे. वो बैठे थे इस उम्मीद में कि उनके दिए बिक जाएंगे, तो शायद रात को उनके घर भी रोशनी होगी. वो भी दिए जलाएंगे, कुछ अच्छे कपड़े पहन सकेंगे और मिठाइयां खा सकेंगे. लेकिन उनकी बेबसी ये कि दिए खरीदने वाला ही कोई नहीं था. लोग तो ब़ाजार आ रहे थे, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक लाइट्स खरीद रहे थे. रंग-बिरंगी चमकीली लाइटें. अपने मां-बाप के साथ जो बच्चे ब़ाजार आ भी रहे ते, उनका भी मन रंग-बिरंगी चमकीली लाइट्स पर ही फिसल रहा था. वहीं दो बच्चे दिवाली के दियों जैसे अरमान लेकर अपने दिए बेचने की कोशिश कर रहे थे.

मिट्टी के दिए अब कम होते जा रहे हैं. लोग चाइनीज लाइट्स पर पैसे खर्च करने को तैयार हैं.

ये बच्चे जहां बैठे थे, वो जगह थी पश्चिमी यूपी का अमरोहा जिला. यहां पर एक थाना पड़ता है सैद नगली. इसी सैद नगली में ये बच्चे अपनी दुकान लगाए हुए थे. इसी दौरान पुलिस का एक गश्ती दल पहुंचा. दुकानदारों में अफरा-तफरी जैसी हालत हो गई. पुलिसवाले आए और दुकानदारों से एक लाइन से दुकानें लगाने को कहा, ताकि लोगों को दिक्कत न हो और ट्रैफिक भी चलता रहे. दुकानदार अपनी दुकानें समेटकर किनारे लगा रहे थे. इन दोनों बच्चों ने भी पुलिसवालों की बात मानने की कोशिश की. इसी दौरान पुलिस का ये दस्ता उन बच्चों के पास भी पहुंच गया. उन बच्चों में मायूसी तो पहले से थी, पुलिस को देखकर रहा-सहा उत्साह भी जाता रहा. लेकिन फिर वो हुआ, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं.

थानाध्यक्ष नीरज कुमार और उनकी पूरी टीम ने बच्चों से दिए खरीदे.

जब दिए बेचने लगे पुलिसवाले

इस पुलिस दस्ते को लीड कर रहे थे सैद नगली के थानाध्यक्ष नीरज कुमार. नीरज कुमार बच्चों के पास पहुंचे और उनसे बच्चों के माता-पिता के बारे में पूछा. बच्चों ने बेहद मासूमियत से कहा कि हम दिए बेच रहे हैं, लेकिन कोई खरीद ही नहीं रहा है. जब दिए बिक जाएंगे, तो हट जाएंगे. बच्चों ने थानाध्यक्ष नीरज कुमार को अंकल कहा और बोले कि इतनी देर से दिए बेचने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन नहीं बिक रहे. हम गरीब हैं. अगर दिए नहीं बिके तो हम दिवाली कैसे मनाएंगे. नीरज कुमार ने बिना देर किए कहा कि मुझे दिए खरीदने हैं. इसके बाद नीरज कुमार ने बच्चों से दिए खरीदे. उनको दिए खरीदता देख साथ के और भी पुलिसवालों ने दिए खरीद लिए. लेकिन दिए ज्यादा थे और खरीदार कम. इसके बाद नीरज कुमार खरीदार की जगह दुकानदार बन गए और लोगों से दिए खरीदने की अपील करने लगे. एक वर्दीधारी की दिए खरीदने की अपील काम कर गई.

इसके बाद नीरज कुमार ने खुद इन बच्चों के दिए बेचे.

और हो गई बच्चों की दिवाली हैपी

थोड़ी ही देर में दिए खरीदने वालों की भीड़ लग गई. जैसे-जैसे दिए बिकते जा रहे थे, मायूसी से भरे बच्चों की आंखों में चमक बढ़ती जा रही थी. कुछ ही देर में बच्चों के सारे दिए बिक गए और थानाध्यक्ष नीरज कुमार ने कुछ और पैसे मिलाकर उन बच्चों को दे दिए. पुलिसवालों ने उन बच्चों को दिवाली के तोहफे भी दिए और अपनी इस कोशिश से बच्चों की दिवाली हैपी कर दी. थानाध्यक्ष नीरज कुमार की इस छोटी सी कोशिश ने बच्चों के साथ ही आम लोगों के दिलों में भी पुलिस के लिए वो प्यार पैदा कर दिया, जिसे कायम करने में पुलिस अब तक नाकाम रही थी. और हमें चाहिए ही क्या पुलिस से. हमें ऐसी ही तो पुलिस चाहिए, जो हमारी दोस्त बने. जिससे हमें डर न लगे और जिसका साथ हौसला दे.

जब नीरज कुमार ने दिए बेचने शुरू किए, तो सारे दिए बिक गिए.

एक विज्ञापन ने कर दिया काम

नीरज कुमार इस कोशिश ने एक हौसला दिया है. एक भरोसा कायम किया है, लेकिन उन्हें ऐसा करने की प्रेरणा कहां से मिली. इस बारे में दि लल्लनटॉप ने नीरज कुमार से बात की. नीरज कुमार ने कहा कि कुछ दिन पहले उन्होंने एक विज्ञापन देखा था. उस विज्ञापन में एक बच्चा एक दिए बेचने वाली एक अम्मा से बड़े भरोसे के साथ कहता है कि अम्मा, चिंता मत करो, सारे दिए बिक जाएंगे. अम्मा को भरोसा नहीं होता है, लेकिन वो बच्चा अम्मा की फोटो दिए के साथ लगाकर पोस्टर बनाता है, जिसपर लिखा होता है अम्मा से दिए खरीदो, अम्मा की दिवाली हैपी बनाओ. विज्ञापन के अंत में अम्मा के दिए खत्म हो जाते हैं और विज्ञापन देखने वाला भी भावुक हो जाता है. नीरज कुमार ने बताया कि जब वर्चुअल दुनिया में चल रहा एक विज्ञापन लोगों को इतना हौसला दे सकता है, तो हम तो इंसान हैं. हमारी एक कोशिश लोगों में खुशियां भर सकती है और मैंने यही किया.

नीरज कुमार इस विज्ञापन से बेहद प्रभावित हुए थे.
नीरज कुमार इस विज्ञापन से बेहद प्रभावित हुए थे.

नीरज कुमार ने अमरोहा के लोगों की दिवाली तो हैपी कर दी, उन दो बच्चों की दिवाली हैपी कर दी, लेकिन उनकी दिवाली का क्या? नीरज ने बताया कि हम पुलिसवाले हैं, त्योहार पर छुट्टी नहीं मिली. घर में पत्नी है, दो बेटियां और एक बेटा है. वॉट्सऐप पर वीडियो कॉल के जरिए ही दिवाली मना ली. रही-सही कसर अमरोहा के लोगों ने पूरी कर दी. लोगों ने मिठाइयां खिलाईं, दिए जलाए और खुशियों में शरीक हुए. ये बात करते वक्त नीरज की बातों में एक संतोष झलक रहा था, जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है. संतोष इस बात का कि उनकी वजह से कुछ बच्चों की तो दिवाली हैपी हो गई, उनकी वजह से कम से कम दो बच्चे तो दिवाली के दिन उदास नहीं होंगे. और हम भी तो यही चाहते हैं. नीरज कुमार और उनकी पूरी टीम को इस काम के लिए शुक्रिया. शुक्रिया कि उन्होंने एक बार फिर से यूपी पुलिस का इकबाल कायम किया और दोस्त होने का यकीन भी.


(हमें ये स्टोरी हमारे पुराने साथी मोहम्मद असगर के माध्यम से पता चली थी. उन्होंने अपनी फेसबुक वॉल पर इसका ज़िक्र किया था. हमने पहले उनसे इज़ाज़त ली और फिर थानाध्यक्ष नीरज कुमार से बात की.)

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