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BSP छोड़ BJP में आए इस नेता से अमित शाह ने 4 साल पहले किया था वादा, अब निभाने जा रहे

उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की 12 सीटें खाली हो रही हैं. 30 जनवरी से पहले इन सीटों को भरा जाना है. 28 जनवरी को मतदान की घोषणा की गई थी. लेकिन इसकी नौबत नहीं आई, क्योंकि 12 सीटों पर 12 उम्मीदवार ही खड़े हुए. इनमें से 10 भारतीय जनता पार्टी और दो समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी हैं.

MLC के इस चुनाव में संख्याबल के हिसाब से बीजेपी 10 सीटों पर चुनाव जीत सकती थी. पार्टी ने 10 ही उम्मीदवारों को टिकट दिया. वहीं सपा एक सीट पर आसानी से चुनाव जीत सकती थी, लेकिन सपा ने दो उम्मीदवार उतारे. सपा को उम्मीद थी कि अगर चुनाव होता है तो कांग्रेस, बीएसपी और अन्य पार्टियों के विधायकों के दम पर वह अपने उम्मीदवार जीता लेगी.

कौन हैं वो 12 चेहरे, जो विधान परिषद पहुंच रहे हैं?

डॉ. दिनेश शर्मा

योगी सरकार में डिप्टी सीएम हैं. माध्यमिक शिक्षा विभाग और उच्च शिक्षा विभाग का जिम्मा है इन पर. नेता विधान परिषद हैं. कार्यकाल खत्म हो रहा था तो फिर से विधान परिषद भेजे जा रहे हैं. लखनऊ के रहने वाले हैं. इनका परिवार राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़ा रहा है. दिनेश शर्मा बीजेपी युवा मोर्चा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष रहे हैं. 2006 में पहली बार लखनऊ के मेयर चुने गए थे. दूसरी बार 2012 में मेयर बने. उन्हें नरेंद्र मोदी और अमित शाह, दोनों का बेहद विश्वस्त माना जाता है. 2014 के लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज करने के बाद मोदी और शाह ने उन्हें अपने गृह प्रदेश गुजरात का प्रभारी बनाया था.

Dinesh Sharma (1)
उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा. (फाइल फोटो)

स्वतंत्र देव सिंह

बीजेपी के यूपी प्रदेश अध्यक्ष हैं. मिर्जापुर के रहने वाले हैं. 1984 में बुंदेलखंड के उरई आ गए. पहला राजनीतिक ब्रेक मिला मंदिर आंदोलन के समय. उरई में स्थानीय अखबार स्वतंत्र भारत में काम करते थे. इसी अखबार में उन्होंने विनय कटियार का एक इंटरव्यू छापा. इस तरह कटियार के साथ करीबी बढ़ गई. कटियार के कहने पर 1992 में झांसी चले गए. तब तक इनका नाम कांग्रेस सिंह हुआ करता था. बाद में नाम बदल कर स्वतंत्र देव सिंह रख लिया. 2017 में जब यूपी में बीजेपी की सरकार बनी तो कैबिनेट में जगह मिली. परिवहन मंत्री बनाए गए. जुलाई 2019 में उन्हें बीजेपी ने प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी. अब विधान परिषद का कार्यकाल खत्म हो रहा था इसलिए रिपीट किया गया है.

स्वतंत्र देव सिंह.
स्वतंत्र देव सिंह.

लक्ष्मण आचार्य

बीजेपी का दलित चेहरा हैं. मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से आते हैं. संघ से जुड़े स्कूल सरस्वती शिशु मंदिर में टीचर रह चुके हैं. इलाके में इनकी छवि बौद्धिक प्रचारक की है. एक नेता के तौर पर इनके व्यवहार की विपक्षी भी तारीफ करते हैं. काशी क्षेत्र के अध्यक्ष भी रहे हैं. पिछले दो टर्म से प्रदेश बीजेपी के उपाध्यक्ष हैं. कल्याण सिंह के करीबी माने जाते हैं. उनके कार्यकाल में लक्ष्मण आचार्य को मत्स्य निगम का चेयरमैन बनाया गया था. मोदी और अमित शाह से व्यक्तिगत परिचय है. विधान परिषद के सदस्य रहते हुए लक्ष्मण आचार्य ने अपनी विधायक निधि का पैसा ऐतिहासिक धरोहरों से जुड़ी चीजों के साथ बेसिक सुविधाओं पर खर्च किया. उनके ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए उन्हें फिर से एमएलसी बनाया जा रहा है.

Laxman Acharya
लक्ष्मण आचार्य बीजेपी के दलित चेहरा माने जाते हैं.

पूर्व IAS अरविंद कुमार शर्मा

अरविंद शर्मा 1988 बैच के गुजरात काडर के IAS हैं. रिटायरमेंट से दो साल पहले हाल ही में ही उन्होंने VRS लिया. फिर तुरंत ही बीजेपी में शामिल कर लिए गए. यूपी के मऊ के रहने वाले हैं. इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन और पोस्ट-ग्रेजुएशन करने के बाद पीएचडी की थी. फिर सिविल सेवा की तैयारी शुरू की. चुन लिए गए. कहा जाता है कि नरेंद्र मोदी ने अरविंद शर्मा को अपनी आंख के तारे की तरह रखा. मोदी जहां-जहां गए, अरविंद को साथ ले गए. चर्चा है कि अब अरविंद शर्मा को यूपी भेजकर नरेंद्र मोदी ने लखनऊ में अपनी इंद्रियां बुलंद की हैं. कहा तो ये भी जा रहा है कि यूपी की ताक़तवर नौकरशाह लॉबी में नरेंद्र मोदी इनके जरिए अपना सिक्का बुलंद करेंगे.

Arvind Sharma Signing Joining Papers
बीजेपी जॉइन करने से ऐन पहले अरविंद कुमार शर्मा ने समयपूर्व रिटायरमेंट ले लिया था. साथ में हैं स्वतंत्र देव सिंह

गोविंद नारायण शुक्ला

अमेठी के रहने वाले हैं. जिस समय सुल्तानपुर भाजपा का संगठनात्मक जिला हुआ करता था, उस समय गोविंद नारायण शुक्ला जिला मंत्री, जिला महामंत्री और जिला अध्यक्ष रहे. बाद में प्रदेश मंत्री और प्रदेश महामंत्री भी बने. 20 सालों से बीजेपी संगठन में काम कर रहे हैं. उन्हें  सुनील बंसल और स्वतंत्रदेव सिंह का करीबी माना जाता है. सितंबर 2020 में राज्यसभा उपचुनाव में भाजपा ने गोविंद नारायण शुक्ला को मैदान में डमी कैंडिडेट के तौर पर उतारा था. हालांकि संगठन ने तब शुक्ला का नाम वापस ले लिया था. राज्यसभा जफर इस्लाम पहुंचे. कहा जा रहा है कि अब जातिगत समीकरण साधने के लिए भी गोविंद नारायण शुक्ला को विधान परिषद भेजा जा रहा है.

Govind Narayan Shukla (1)
गोविंद नाराणय शुक्ला. नामांकन दाखिल करते हुए.

कुंवर मानवेंद्र सिंह

झांसी के हैं. पार्टी के बहुत पुराने नेता हैं. कुंवर मानवेंद्र सिंह को बुंदेलखंड में बीजेपी की जड़ कह सकते हैं. 1980 में झांसी के जिला अध्यक्ष बने. 1985 में बीजेपी के विधायक बन गए. भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं. दो टर्म एमलएसी रहे हैं. विधान परिषद के कार्यवाहक सभापति के पद पर भी रहे हैं. यूपी में बीजेपी के वनवास के दौरान 20 साल मानवेंद्र सिंह ने भी वनवास काटा. बुंदेलखंड विकास बोर्ड के चेयरमैन हैं. यह कैबिनेट मिनिस्टर का दर्जा वाला पद है. ये पद हमेशा सीएम के पास रहा है, लेकिन स्पेशल पावर के तहत योगी आदित्यनाथ ने इन्हें कमान सौंपी थी. योगी की गुड लिस्ट में हैं. उन्होंने ही एमएलसी बनाया है.

Manvendra Singh Bjp
पर्चा दाखिल करते कुंवर मानवेंद्र सिंह

सलिल विश्नोई

सलिल विश्नोई को पार्टी ने पहली बार 2002 में विधानसभा का टिकट दिया था. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. 2007 और 2012 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के टिकट पर जीत हासिल की. इस तरह लगातार तीन बार भाजपा के विधायक रहे. हालांकि 2017 का विधानसभा चुनाव हार गए थे. केशव मौर्य के समय प्रदेश महामंत्री रहे. स्वतंत्रदेव सिंह की टीम में उपाध्यक्ष हैं. राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के संचालक हैं. कहा जा रहा है कि विश्नोई को कैबिनेट विस्तार में मंत्री बनाया जा सकता है. उनके पास संगठन का अनुभव है. जिस समुदाय से वह आते हैं, उसका सरकार में प्रतिनिधित्व कम है.

Salil Bisnoi
सीएम योगी के साथ सलिल विश्नोई.

अश्विनी त्यागी

मेरठ के रहने वाले हैं. परिवार खेती किसानी से जुड़ा रहा है. पॉलिटिकल बैकग्राउंड कोई नहीं था. कॉलेज के दौरान अखिल भारतीय विद्याथी परिषद से जुड़े. फिर युवा मोर्चा में आ गए. बीजेपी पश्चिम क्षेत्र के अध्यक्ष और प्रदेश महामंत्री रहे. लक्ष्मीकांत वाजपेयी जब प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष थे, तब उनकी टीम में प्रदेश उपाध्यक्ष थे. अब प्रदेश महामंत्री हैं. कहा जाता है कि लक्ष्मीकांत वाजयेपी की तुलना में सुनील बंसल इन्हें खड़ा कर रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश महामंत्री (संगठन) सुनील बंसल और स्वतंत्रदेव सिंह दोनों के काफी खास माने जाते हैं. कहा जाता है कि 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान इन्होंने काफी अच्छा काम किया था. इसे ही देखते हुए पार्टी ने विधान परिषद भेजने का फैसला किया है.

Ashwini Tyagi
अश्विनी त्यागी नामांकन दाखिल करते हुए.

धर्मवीर प्रजापति

आगरा के रहने वाले हैं. सामान्य परिवार के धर्मवीर ने आरएसएस के स्वयंसेवक के रूप में समाज सेवा करते थे. इसके बाद भाजपा से राजनीतिक जीवन की शुरुआत की. वर्ष 2002 मे पहली बार उन्हें प्रदेश बीजेपी में दायित्व मिला. तत्कालीन पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ में प्रदेश महामंत्री बने. इसके बाद दो बार प्रदेश संगठन में मंत्री का दायित्व संभाला. जनवरी 2019 में उन्हें माटी कला बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया. जातीय और सामाजिक समीकरण में फिट बैठते हैं. टिकट मिलने के पीछे जाति फैक्टर भी बताया जा रहा है.

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धर्मवीर प्रजापति की फाइल फोटो

सुरेंद्र चौधरी

इलाहाबाद के रहने वाले हैं. छात्र राजनीति से राजनीतिक करियर की शुरुआत हो गई थी. डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के करीबी माने जाते हैं. मौर्य जब यूपी बीजेपी के अध्यक्ष बने, तब सुरेंद्र बीजेपी में शामिल हुए, बसपा को छोड़कर. सुरेंद्र चौधरी को 2017 के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी ने प्रयागराज की सोरांव सीट से उम्मीदवार घोषित किया था. सिंबल एलॉट होने के बाद, अपना दल से समझौता होने की वजह से उन्हें बैठना पड़ा था. उस समय अमित शाह ने ऐलान किया था कि सुरेंद्र चौधरी के साथ अन्याय नहीं होगा. तकरीबन 4 साल का वक्त बीतने के बाद बीजेपी ने अब उन्हें विधान परिषद में भेजने का फैसला किया है.

Surendra Chaudhari
बीच में टोपी लगाए सुरेंद्र चौधरी

समाजवादी पार्टी से दो चेहरे जाएंगे

समाजवादी पार्टी की ओर से जो दो उम्मीदवार विधान परिषद पहुंच रहे हैं, वो ये हैं-

राजेंद्र चौधरी

पिछले करीब 40 साल से मुलायम सिंह यादव से जुड़े रहे हैं. चौधरी चरण सिंह ने उन्हें 1974 में गाजियाबाद से प्रत्याशी बनाया था, लेकिन चुनाव हार गए थे. 1977 में वो उसी सीट से जीत दर्ज करके विधानसभा पहुंचे. उस दौरान मुलायम सिंह यादव सहकारिता मंत्री थे. वहीं से दोनों नेता करीब आए. तब से लेकर राजेंद्र चौधरी और मुलायम सिंह यादव का रिश्ता अटूट रहा है. लोकदल का बंटवारा हुआ तो ज्यादातर जाट नेता अजित सिंह के साथ चले गए, लेकिन राजेंद्र चौधरी ने मुलायम का साथ नहीं छोड़ा. 2012 में जब अखिलेश यादव सीएम बने, तो भी राजेंद्र चौधरी उनके साथ साए की तरह दिखते रहे. लंबे वक्त तक राजेंद्र चौधरी ने सपा के प्रवक्ता के तौर पर काम किया.

Rajendra Chaudhary
सपा नेता राजेंद्र चौधरी.

अहमद हसन

सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव के करीबी माने जाते हैं. IPS की नौकरी से रिटायर होने के बाद राजनीति में कदम रखा. 1960 में लखनऊ के डीएसपी रह चुके हैं. 1989 में DIG रैंक पर प्रमोट हुए. 30 साल की पुलिस सेवा के बाद 1992 में रिटायर हुए. सपा में शामिल होने के बाद से ही विधान परिषद के सदस्य हैं. मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव की सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे हैं. बेसिक शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मंत्रालय संभाल चुके हैं. सपा में मुस्लिम समुदाय का OBC चेहरा माने जाते हैं. वर्तमान में विधानपरिषद में विपक्ष के नेता हैं. कार्यकाल खत्म हो रहा था. इसलिए फिर से विधान परिषद भेजा है.

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सपा नेता अहमद हसन.

सभापति रमेश चंद यादव की विदाई

विधान परिषद के जिन 12 सदस्यों का कार्यकाल 30 जनवरी को पूरा हो रहा है, उनमें सभापति रमेश चंद यादव भी शामिल हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनकी जगह विधान परिषद के सभापति पद के लिए समाजवादी पार्टी अहमद हसन की दावेदारी करेगी. रमेश चंद यादव को सपा ने फिर से टिकट नहीं दिया. कहा जा रहा है कि वह पार्टी के समीकरण में फिट नहीं बैठ रहे थे.

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रमेश चंद यादव की फाइल फोटो

एटा के रहने वाले रमेश चंद यादव को मुलायम का करीबी माना जाता है. पहली बार 1985 में विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. पहली बार 1990 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर विधान परिषद पहुंचे. विधान परिषद में यह उनकी चौथी पारी थी. 11 मार्च, 2016 को उत्‍तर प्रदेश विधान परिषद् के सभापति निर्वाचित हुए थे. 2018 में रमेश यादव के बेटे की घर में ही संदिग्ध हालात में मौत हो गई थी. हत्या का आरोप रमेश यादव की दूसरी पत्नी पर लगा था. पत्नी ने रमेश यादव पर अपने बेटे की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया था.


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