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फिल्म रिव्यू: 'ट्रिस्ट विथ डेस्टिनी'

पिछले हफ्ते काफी बड़ी-बड़ी फ़िल्में रिलीज़ हुईं. ‘सूर्यवंशी’, ‘अन्नाते’, ‘इटर्नल्स’, ‘मीनाक्षी सुंदरेश्वर’ वगैरह-वगैरह. सबके रिव्यूज़ आप तक पहुंच ही गए होंगे. ना देखे हों, तो आप हमारी वेबसाइट और यूट्यूब चैनल पर देख सकते हैं. इन सबके साथ ही बीते शुक्रवार एक एन्थोलॉजी फिल्म भी रिलीज़ हुई है. नाम है ‘ट्रिस्ट विथ डेस्टिनी’. इसे आप सोनी लिव पर देख सकते हैं. उम्दा कलाकारों से खचाखच भरी इस फिल्म को हमने आपके देख लिया है. कैसी है, आइए जानते हैं.

सबसे पहले तो यही जान लीजिए कि इस फिल्म का नाम आया कहां से है. आपमें से कईयों को शर्तिया पता भी होगा. भारत को आज़ादी मिलने के बाद जब पहली बार पंडित जवाहरलाल नेहरु ने लाल किले से स्पीच दी थी, तो शुरुआत इसी फिकरे से की थी. पंडित नेहरु के उसी फिकरे को आज के परिदृश्य में एक्सप्लोर करती ये फिल्म, टॉप क्लास एक्टिंग का कोलाज है. उम्दा कलाकारों ने बहुत उम्दा काम किया है इसमें. एक-एक करके जानते हैं.

फिल्म में चार कहानियां हैं.

# चमड़ी का रंग

पहली कहानी है, ‘फेयर एंड फाइन’. जो इस बात को रेखांकित करती है कि हमारे समाज में आज भी स्किन कलर कितना मैटर करता है. गलावा मुदिराज नाम का एक उद्योगपति है. अथाह संपत्ति का मालिक. चाय बेचने से सफ़र शुरू किया और आज देश का टॉप इंडस्ट्रियलिस्ट है. जिसके नाम की खूब धूम है. एक दिन एक फाइव स्टार रिज़ोर्ट में उसके साथ एक हादसा हो जाता है. एक फंसे हुए पपी को बाहर निकालने के चक्कर में वो रिज़ोर्ट के पिछले दरवाज़े से बाहर निकलता है. पीछे ऑटोमैटिक दरवाज़ा बंद हो जाता है. अंदर वापस घुसने की कोशिश करते मुदिराज से सिक्योरिटी गार्ड्स बुरी तरह पेश आते हैं. उसे ‘कलुआ’, ‘काला जामुन’, ‘डामर’ कहकर उसकी बेइज्ज़ती करते हैं. उनका मानना होता है कि काले रंग का ये आदमी कोई बड़ा शख्स हो ही नहीं सकता. इस अपमान से मुदिराज हिल जाता है. उसे ये सवाल सताने लगता है कि इतनी बेतहाशा दौलत और शोहरत कमाकर भी क्या फायदा हुआ? स्किन कलर तो वो बदल नहीं सकता. इसी से खयाल से आंदोलित मुदिराज एक अनोखा कदम उठाता है. क्या ये फिल्म देखकर जानिएगा.

मुदिराज के रोल में आशीष विद्यार्थी न सिर्फ परफेक्ट कास्टिंग रहे हैं, बल्कि उन्होंने इस रोल को उतनी ही इंटेंसिटी से निभाया भी है. एक अरबपति का अहंकार, एक रिजेक्टेड व्यक्ति का फ्रस्ट्रेशन, एक अपमानित व्यक्ति का गुस्सा जैसे तमाम भाव उन्होंने परफेक्शन के साथ पकड़े हैं. ‘फेयर एंड फाइन’ आशीष विद्यार्थी के समर्थ अभिनेता होने की बात को एक बार फिर से एस्टैब्लिश करती है.

Ashish Vidyarthi
आशीष विद्यार्थी को एक्टिंग का स्कूल कहा जाए तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी.

# दर्द का म्यूटेड वर्जन

दूसरी कहानी है, ‘दी रिवर’. इस कहानी को आप दर्द का म्यूटेड वर्जन कह सकते हैं. यही बात इसकी USP भी है. किसी नामालूम से गांव में एक दलित परिवार है. पति-पत्नी और दो बच्चे. पति-पत्नी दोनों ही रोज़ाना ऊंची जाति वालों के हाथ प्रताड़ित हो रहे हैं. खामोशी से. और जब हम ‘खामोशी’ से कह रहे हैं, इसका मतलब एग्जैक्टली यही है. दोनों ही पूरी फिल्म में एक शब्द नहीं बोलते. महज़ उनके चेहरे के भाव हमें बता देते हैं कि वो किस पीड़ा से गुज़र रहे हैं. पति रोज़ाना गांव वालों से अपमानजनक बातें सुनता है. पत्नी गांव के दबंगों द्वारा रेगुलर बेसिस पर शारीरिक शोषण का दंश झेलती है. दोनों ही असहाय हैं. और शायद इसी असहायता के चलते लगभग गूंगे हो गए हैं. एक-दूसरे तक से बात नहीं कर पाते. फिर एक दिन दोनों ही आज़ाद होने की ठान लेते हैं. आगे क्या होता है ये फिल्म देखकर जान लें तो बेहतर.

विनीत कुमार और कानी कुसरुति का अभिनय अव्वल दर्जे का है. बिना संवादों की मदद लिए दर्द की अभिव्यक्ति कठिन काम था. जिसे दोनों ने ही बड़ी सहजता से कर दिखाया है. एकदम टॉप क्लास परफॉरमेंस है दोनों की.

# पतित होती नैतिकता

तीसरी कहानी का टाइटल है, ‘वन बीएचके’. एक पुलिस वाले की कहानी. जो एक महिला के प्रेम में नैतिकता की कई सीढ़ियां ऊपर से नीचे की तरफ लुढ़ककर रसातल में पहुंच जाता है. अपनी प्रेमिका के लिए उसे एक बीएचके फ़्लैट खरीदना है. कुबेर पुलिस डिपार्टमेंट में सिर्फ हवलदार है. ज़ाहिर है आमदनी सीमित ही है, जिसमें फ़्लैट खरीदना मुमकिन नहीं. अपने मिशन को पूरा करने के लिए वो किस स्तर तक चला जाता है और क्या उसका पतन उसके किसी काम भी आता है, यही आगे की कहानी है.

जयदीप अहलावत के काम को ‘पाताललोक’ के बाद एक नए सम्मान से देखा जा रहा है. वो यहां भी निराश नहीं करते. हालांकि उनके निभाए ‘कुबेर’ में हाथीराम चौधरी की कुछ-कुछ झलक दिखाई पड़ती है. बावजूद इसके उन्होंने एक डेस्परेट पुलिस वाले का किरदार उम्दा निभाया है. लक्ष्मी के किरदार में पालोमी घोष ने उनका अच्छे ढंग से साथ दिया है. रेस्टोरेंट वाले एक सीन में उन्होंने कमाल अदाकारी की है.

Jaydeep ahlawat
जयदीप अहलावत का ये रोल कुछ-कुछ ‘पाताललोक’ के हाथीराम चौधरी जैसा है.

# क्रूर कौन, जानवर या इंसान?

आखिरी कहानी आपको जंगल लेकर जाती है. कहानी का नाम है ‘अ बीस्ट विदिन’. एक गांव में एक आदमखोर शेर पकड़ा गया है. लेडी फ़ॉरेस्ट अफसर उसे गांव से सुरक्षित निकालने के लिए पहुंची है. लेकिन उसे गांव के एक ग्रुप के गुस्से का शिकार होना पड़ता है. ये लोग शेर की जान खुद लेना चाहते हैं. क्योंकि शेर ने उनके करीबियों को मार डाला था. अफसर को ड्यूटी करनी है और गांव वालों को बदला चाहिए. इस संघर्ष का नतीजा क्या निकलता है, ये फिल्म देखकर जानिएगा.

बदले की आग में जल रहे गांव वाले भाऊ के रोल में अमित सियाल बढ़िया काम कर गए हैं. किसी अपने को खोने से उपजा क्रोध उनकी पूरी देहबोली से झलकता है. अफसर के रोल में गीतांजलि थापा कन्विंसिंग हैं.

फिल्म की सिनेमेटोग्राफी का ज़िक्र स्पेशल तरीके से करना ज़रूरी है. अविनाश अरुण ने कुछ सीन्स तो इतने शानदार ढंग से कैप्चर किए हैं, उनके लिए ब्रेथटेकिंग ही सटीक विशेषण है. कुल मिलाकर ‘ट्रिस्ट विथ डेस्टिनी’ कमाल के एक्टर्स की असीमित रेंज का उम्दा प्रदर्शन है. हालांकि मैसेजिंग के फ्रंट पर फिल्म कहीं-कहीं कमज़ोर पड़ती दिखाई देती है. डायरेक्टर प्रशांत नायर कुछ-कुछ जगह अपनी बात ठीक से कन्वे करने में असफल से प्रतीत होते हैं. बावजूद इसके ये फिल्म लीड एक्टर्स के असाधारण काम की वजह से देखी जा सकती है.


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