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आप सांस की बीमारियों से नहीं मरे हैं, इस अफसर को शुक्रिया कहिए

नवंबर का महीना देश की राजधानी दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों के लिए खासा मुश्किल भरा होता है. पिछले चार-पांच सालों में ये मुश्किल और भी बढ़ गई है. वजह वही जानी-पहचानी है. धूल, पराली जलाने से निकला धुआं, फैक्ट्रियों और गाड़ियों से निकलने वाला जहरीला धुआं और ओस की बूंदों से मिलकर जो स्मॉग बनता है, वो पूरी दिल्ली और उसके पड़ोसी शहरों को परेशान कर देता है. सांस की बीमारी वाले मरीज इतनी तकलीफ में आ जाते हैं कि उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ता है. पूरी राजधानी में एक तरह से मेडिकल इमरजेंसी जैसे हालात बन जाते हैं. डॉक्टर कहते हैं कि सिगरेट न पीने वाला भी एक दिन में कम से कम 50 सिगरेट पी रहा है.

ऐसे ही वक्त में याद आती है बंगलुरु में अर्बन डिप्टी कंजरवेटर के पद पर तैनात दीपिका वाजपेयी की. भारतीय वन सेवा की इस अफसर ने बंगलुरु में हजारों पेड़ लगवार शहर की खूबसूरती तो बचाई ही है, वो माहौल भी तैयार किया है कि शहर के लोगों को साफ हवा मिलती रहे और किसी को सांस की बीमारी न झेलनी पड़े या फिर दिल्ली जैसा माहौल न बन जाए.

दीपिका वाजपेयी.
दीपिका वाजपेयी.

दीपिका वाजपेयी भारतीय वन सेवा (आईएफएस) की  2010 बैच की अफसर हैं. मूलत: रहने वाली हरियाणा की हैं. इनके पति भी आईएएस हैं और कर्नाटक पब्लिक सर्विस कमीशन में कंट्रोलर ऑफ एग्जामिनेशन हैं. जिन जमीनों पर लंबे समय तक लोगों का अवैध कब्जा था, दीपिका ने पुलिस और प्रशासन की मदद से उन जमीनों को खाली करवाया, उन्हें वन विभाग के कब्जे में लिया और फिर उनपर पेड़ लगवा दिए. जिन लोगों ने कब्जा कर रखा था, उन्होंने दीपिका के खिलाफ आवाज भी उठाई, लेकिन शहर के लोग खुश हैं. अब उन्हें अपने आस-पास हरियाली जो मिल रही है.

कई साल से था कीमती जमीनों पर कब्जा, अब वहां पेड़ लहराते हैं

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कई दिक्कतों के बावजूद दीपिका ने अतिक्रमण हटवाने में सफलता हासिल की है.

दीपिका बताती हैं कि जंगल की जमीनों पर लोगों ने कई साल से कब्जा जमा रखा है. वो उन जमीनों को कब्जे से छुड़ाती हैं और उनपर पेड़ लगवा देती हैं, जिससे जंगल भी बचे रहें और पर्यावरण भी सुरक्षित रहे. अतिक्रमण हटवाने में तो दिक्कतें भी आती होंगी, इस सवाल पर दीपिका कहती हैं-

“बंगलुरु में जमीन बेहद कीमती है. एक-एक एकड़ जमीन की कीमत करोड़ों रुपये है. अतिक्रमण हटवाने के दौरान पॉलिटिकल प्रेशर भी पड़ता है. हम सही वक्त का इंतजार करते हैं और जब प्रेशर थोड़ा कम हो जाता है तो जमीन को खाली करवा लेते हैं.”

200 करोड़ की जमीन खाली करवा दी, अब वहां हरियाली है

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पहले जमीन पर कब्जा था (बाएं), आज वहां हरियाली है.

बकौल दीपिका बंगलुरु की एक 17 एकड़ जमीन पर लंबे समय से विवाद चल रहा था और मामला कोर्ट में था. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में वन विभाग के हक में फैसला दिया था. फैसला आने के बाद भी जमीन को वन विभाग अपने कब्जे में नहीं ले पाया था.  इसके बाद दीपिका ने पुलिस और प्रशासन की देख-रेख में जमीन पर वापस कब्जा पाया. इस जमीन की कीमत 200 करोड़ रुपये बताई जा रही है. दीपिका वाजपेयी ने इस जमीन को विभाग के कब्जे में आने के बाद इसपर पेड़ लगवा दिए और अब यह बेहद ही खूबसूरत जगह हो गई है.

जंगल की खूबसूरती बचाने में कारपोरेट्स ने भी की मदद

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पेड़ों को लगाने के लिए कई उद्योगपतियों ने भी मदद की है.

दीपिका वाजपेयी ने विभाग की मदद से खाली पड़ी जमीन को हरा-भरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी है. उन्होंने एक और अतिक्रमण वाली जमीन को खाली करवाया और उसमें 10 हजार पौधे लगवाए. इसके अलावा भी वो जंगल की खूबसूरती को कायम रखने की लगातार कोशिश कर रहीं हैं. दीपिका बताती हैं-

“बंगलुरु के लोग खुद ही अपने शहर को खूबसूरत करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें सही प्लेटफॉर्म नहीं मिल पा रहा था. हमने उन्हें सही प्लेटफॉर्म उपलब्ध करवाया और लोगों को जंगल से जोड़ने में कामयाबी पाई. हरियाली बढ़ाने के लिए मैंने कई जगहों पर वॉलिंटियर्स की भी मदद ली. इसके अलावा कई उद्योगपतियों ने भी हमारी मदद की. उन्होंने सीएसआर (कॉरपोरेट्स सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) के तहत जंगलों की खूबसूरती बचाने के लिए फंड दिया. इससे शहर में हरियाली बढ़ गई.”

जंगल में बनवाना चाहती हैं साइकल ट्रैक

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जंगल की खूबसूरती बचाए रखने के लिए दीपिका साइकल ट्रैक बनवाना चाहती हैं.

दीपिका बताती हैं कि उन्होंने बंगलुरु के पार्कों में पेड़ लगवाए हैं. और भी पेड़ लगवाने के लिए वो लगातार कोशिशें कर रहीं हैं. वो चाहती हैं कि जंगलों को लोगों के लिए खोल दिया जाए, जिससे कि लोग जंगलों से खुद का जुड़ाव महसूस कर सकें. दीपिका कहती हैं-

“जब जंगल लोगों के लिए खोल दिए जाएंगे, तो लोगों को खुद से ही समझ आएगा कि प्रकृति उनके लिए कितनी जरूरी है और इसे बचाने के लिए लोगों को खुद ही आगे आना होगा.”

इसके अलावा दीपिका की कोशिश है कि जंगल में आम लोगों के लिए साइकल ट्रैक भी बनाए जाएं, जिससे लोग खुद-ब-खुद जंगल से जुड़ाव महसूस करें.

ट्विटर पर भी दिखता है पेड़ों से प्रेम

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ये तस्वीर चिपको आंदोलन की है, जो दीपिका के ट्वीटर की कवर फोटो है.

दीपिका पेड़ों को लेकर कितनी जागरूक हैं, इसका अंदाजा उनके ट्वीटर हैंडल को देखकर लगता है. उन्होंने अपने ट्विटर हैंडल @dipika_bajpai का जो कवर फोटो लगाया है, वो चिपको आंदोलन के वक्त का है. 1973 में तब के उत्तर प्रदेश और आज के उत्तराखंड में पेड़ों को कटने से बचाने के लिए चिपको आंदोलन शुरू किया गया था. इसमें आदिवासी महिलाओं-पुरुषों ने पेड़ों को कटने से बचाने के लिए पेड़ों के ईर्द-गिर्द घेरा बना दिया था.

झीलों को बचाने की कवायद

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बदहाल रही पुट्टेनहाली झील (बाएं) अब बेहद खूबसूरत हो गई है.

दीपिका ने बंगलुरु के येलाहांका में बनी पुट्टेनहाली झील के जीर्णोद्धार और उसके विकास का प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेज दिया था, पुट्टेनहाली झील बंगलुरु का अकेला पक्षी विहार है. इस प्रस्ताव को शासन से मंजूरी मिल गई है, जिसपर काम शुरू हो गया है.

जहां कूड़ा था, आज वहां हरियाली है

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कूड़ा फेंकने वाली जगह पर भी दीपिका ने पेड़ लगवा दिए हैं.

दीपिका बताती हैं कि जंगल के किनारे का इलाका कूड़े से पटा हुआ था. उन्होंने अपने स्टाफ की मदद से लगातार कोशिश करके वहां पेड़ लगवाए. अब वो पेड़ बड़े हो गए हैं और जहां कूड़ा दिखता था, वहां अब हरियाली है.


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