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इन 15 किस्मों के लोग और कुछ देख लें, 'पिंक' देखने न जाएं

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mayank saxenaपिंक मूवी आई है. हर तरफ इसके चर्चे हैं. लिबरल सोच के लोग इसकी खुल के तारीफ कर रहे हैं. लेकिन बड़ा तबका ऐसा है जो है हमारे आस पास, और दही जमाए बैठा है. भले वो फिल्म की तारीफ कर दे. लेकिन उसके अपने अंदर वही गलाजत भरी है जैसी फिल्म में दिखाई गई. उसी पर उंगली उठाकर मयंक सक्सेना बता रहे हैं 15 वजहें, कि फिल्म क्यों न देखी जाए. मयंक एक्टिविस्ट हैं और पेशे से पत्रकार.

पिछले कई सालों में यह पहली बार था, जब सिनेमाहॉल में अजीब सा माहौल था. कई बार कुछ लोग तालियां पीटते और मेरे बगल में बैठे अंकल तो लगभग स्तब्ध थे. फिल्म खत्म हुई तो सारे दर्शक खड़े हो कर तालियां बजा रहे थे. पहली बार ये भी हुआ कि मुंबई के किसी मल्टीप्लेक्स का एक भी दर्शक लगभग प्रवचनात्मक हो गई फिल्म के अंत का गीत और एंड क्रेडिट्स छोड़ कर बाहर नहीं निकला. तालियां अंत तक बजती रही, जो लगभग किसी नाटक के खत्म होने के बाद के प्रोसीनियम का दृश्य था. पिंक को लेकर, लगभग हर रीव्यू आपसे फिल्म देखने को कहेगा, फिल्म की तारीफ करेगा. लेकिन फिर भी मैं यह बताने का जोखिम अपने ऊपर लेता हूं कि आपको पिंक क्यों नहीं देखनी चाहिए…शायद इसलिए भी कि ज़्यादातर लोग बता ही चुके हैं कि फिल्म क्यों देखनी चाहिए…

1. अगर आप अपने समाज को महान मानते हैं और इसकी परम्पराओं को अपनाए रहना चाहते हैं तो ये फिल्म न देखें. क्योंकि दरअसल हमने अपने समाज की परम्पराओं और मान्यताओं का सारा दकियानूसी बोझ महिलाओं पर डाल दिया है. ऐसे में यह फिल्म लगभग हर दृश्य में परम्पराओं को तोड़ती दिखेगी, ऐसे में आपके सामाजिक-सांस्कृतिक झंडों का रंग उतर सकता है, इसलिए ये फिल्म न देखें.

2. अगर आप अपने घर की लड़कियों को घर में ही रख कर, एक दिन सीधे उनका विवाह किसी अनजान आदमी से कर देने को अपने जीवन का उद्देश्य मानते हैं, तो भी पिंक न देखें. पिंक ऐसी तीन लड़कियों की कहानी है, जो अपना जीवन अपनी शर्तों पर जीते हुए परिवार की ज़िम्मेदारी भी उठाने की औकात रखती हैं. उनको शादी करने की कोई जल्दी नहीं है, उनको परिवार की सुरक्षा में रहने की कोई जल्दी नहीं है और तो और उनको रात को घर लौटने की भी कोई जल्दी नहीं है. उनको जल्दी है, तो बस अपने सपनों को पूरा करने की, जिसके लिए वो हर लड़ाई लड़ने को तैयार हो सकती हैं.

3. अगर आप पिता हैं और आपको लगता है कि आपकी बेटी को आदर्श बेटी के सैकड़ों साल पुराने मानकों के हिसाब से चलना चाहिए, छोटे कपड़े नहीं पहनने चाहिए, लड़कों से दोस्ती नहीं रखनी चाहिए और अपने ही शहर में पढ़ाई पूरी कर लेनी चाहिए; तो भी आप इस फिल्म को न देखें. ये फिल्म आपको तगड़ा झटका देगी, हो सकता है आपकी मान्यताएं और समझ पल भर में धराशायी हो जाए. ये भी हो सकता है कि अंत में आप शर्मिंदा हो जाएं और घर लौट कर अपनी बेटी से आंख ही न मिला सकें. ठीक वैसे ही जैसे मीनल का पिता अदालत से उठ कर बाहर चला जाता है.

4. अगर आप भाई हैं और अपनी बहन की सुरक्षा का ठेका आपने अपने कंधे पर लिया है. उस ठेके को निभाने के लिए आप उस पर बंदिशें लगाने के हिमायती हैं, तो भी इस फिल्म को न देखें. क्योंकि आप को फिर अहसास होगा कि हो सकता है कि आपकी बहन आपसे छुप कर बहुत कुछ ऐसा करती हो, जिसकी आज़ादी आपके रहते उसे नहीं मिल पाती है. हालांकि आप वही सब करते हैं, क्योंकि लड़के करते हैं…और जायज़ है. हो सकता है कि आपको समझ में आ जाए कि आपकी बहनों को आपकी ज़रूरत ही नहीं है और ऐसे में आपके अंदर का पुरुष बड़ा आहत हो सकता है. जवानी में दिल का दौरा अच्छी बात नहीं है. आपको ये भी समझ में आ सकता है कि जैसे आपके लिए दुनिया की बाकी लड़कियां हैं…वैसे ही दुनिया के बाकी पुरुषों के लिए आपकी बहनें हैं. फिर आप अपने आप को भी मुंह नहीं दिखा पाएंगे. इसलिए भाई भी इस फिल्म को देखने से परहेज करें.

5. अगर आप प्रेमी हैं और आपको लगता है कि आपकी गर्लफ्रैंड या प्रेमिका आप के बाप की जागीर हो गई है. आप तय करेंगे कि वह क्या पहनेगी, क्या खाएगी, कहां जाएगी, किस से मिलेगी, कैसे बोलेगी, कैसे रहेगी, किसके साथ रहेगी…तो भी आप यह फिल्म न देखें. ये फिल्म आपको अहसास करा देगी कि वह अकेली रह सकती है, दरअसल आप अकेले नहीं रह सकते. यह फिल्म आपको बताएगी कि पुरुष कितने कमज़ोर और डरपोक होते हैं. यह फिल्म आपको बताएगी कि आप प्रेमी नहीं होते, बचपन से एक चींटी भी न मार पाने की कुंठा प्रेमिका पर निकाल रहे होते हैं.

6. अगर आप पति हैं, तो ये फिल्म न देखें…देखें तो पत्नी के साथ न देखें. ये फिल्म न केवल आपको अंदर तक सिहरा देगी, बल्कि हो सकता है कि पत्नी को भी गुलामी से निकाल दे. फिल्म पत्नी को बता देगी कि बिना मर्जी के पति भी उसके साथ सेक्स नहीं कर सकता. किया तो मामला अदालती किया जा सकता है…इसलिए पति भी ये फिल्म न देखें.

7. आप अगर पारम्परिक मां हैं, तो भी आपके लिए यह फिल्म नहीं है. ये फिल्म आपको गिल्ट दे देगी. ये गिल्ट कि आप खुद एक महिला होने के बाद भी कभी बेटी के साथ नहीं खड़ी हुई. इस कदर अकेला किया उसको कि उसको हमेशा बाहरी महिलाओं की मदद लेनी पड़ी. हो सकता है कि आप इतना आक्रोशित हो जाएं कि बुढ़ापे में आपका तलाक हो जाए. हालांकि ऐसा होने में कुछ गलत नहीं है…लेकिन क्या फिल्म बिना देखे आप इसकी कल्पना कर सकती हैं? क्या आप कल्पना कर सकती हैं कि आपकी बेटी पर कोई वेश्या होने का आरोप लगाए? इसी से तो आप उसे ‘बचपन से’ बचा रही थी न???

8. अगर आप एक महिला हैं और नौकरी सिर्फ इसलिए करती हैं कि घर चलाना है, तो भी इस फिल्म को न देखें. क्योंकि दरअसल इस फिल्म की महिलाओं के लिए अकेले रहना, अलग रहना या नौकरी करना सिर्फ आजीविका का मसला है ही नहीं…वह आत्म सम्मान का मसला है. हो सकता है कि नौकरी करने और पैसे कमाने के बाद भी आपको आज तक न पता हो कि इसका आत्म सम्मान से क्या रिश्ता है. हो सकता है कि आप अभी भी सुबह 5 बजे उठ कर नाश्ता और लंच बनाती हों, बच्चों को तैयार करती हों, पति के मोज़े ढूंढ कर देती हों और फिर दफ्तर जाती हों. हो सकता है कि दफ्तर से लौट कर भी आप खाना बनाती हों और बच्चों को पढ़ाती हों और सबसे आखिरी में सोती हों. कहीं आपके अंदर कुछ जाग गया और आपने पति से अगली शाम खाना बनाने को कह दिया, तो क्या आप ये आज़ादी अफोर्ड कर सकेंगी?

9. अगर आप अमिताभ बच्चन के फैन हैं और उनकी वजह से फिल्म देखने जा रहे हों, तो भी ये फिल्म न देखें. हालांकि हमेशा की तरह वो फिल्म में भले ही हावी होते दिखें, लेकिन ये फिल्म आपके समाज का आईना है. इसकी कहानी देखने जाएं, इस कहानी में लिखा गया आईना देखने जाएं. फिल्म की किरदारों जैसी हर लड़की को समझने और उसकी इज़्ज़त करने जाएं…आप तापसी पन्नू की आंखों में आक्रोश देखने जाएं…कीर्ति कुल्हारी का सधा हुआ अभिनय देखने जाएं और आंद्रिया तेरियांग की मासूमियत भरी सच्चाई देखने जाएं…अगर सिर्फ अमिताभ के फैन हैं, तो भी पिंक देखने न जाएं…अमिताभ इस कहानी के सूत्रधार हैं…कहानी किसी भी अमिताभ या कलाकार से बड़ी है.

10. अगर आप किसी महिला के लिए अपमान में वेश्या शब्द इस्तेमाल करते रहे हैं, तो भी इस फिल्म को देखने न जाएं…हो सकता है इस फिल्म के बाद आपको अपने आप से नफ़रत हो जाए और उसे ठीक करने के लिए आपको सलमान खान की कई घटिया फिल्में देखनी पड़ें और फिर भी चैन न पड़े.

11. अगर आप मनोरंजन के लिए सिनेमा देखते हैं, तो भी इस फिल्म को देखने न जाएं. थिएटर विशेषज्ञ डेविड मैमे ने कहा था, “आप जब किसी थिएटर में प्रवेश करते हैं, तो आप ये जानने जाते हैं कि आपके आस-पास की दुनिया में आखिर घट क्या रहा है…लेकिन बाहर आते वक्त अगर आप कुछ साथ नहीं लाते हैं, तो आप सिर्फ मनोरंजन के लिए अंदर गए थे…वह भी घटिया मनोरंजन” इसलिए अभी रुस्तम जैसी फिल्में लगी हैं, आप उन्हें देख कर अपनी मनोरंजन की भूख मिटा सकते हैं. न तो आपको पिंक की ज़रूरत है औऱ न ही पिंक को आपकी…

12. अगर आप सेक्शुअली सिक हैं और आपको ट्रेलर देख कर लग रहा है कि फिल्म में रेप का सीन होगा…बोल्ड सीन होंगे…तो भी ये फिल्म देखने न जाएं…फिल्म का नाम पिंक है…ये आपके अंग गुलाबी करने के लिए नहीं बनाई गई है बल्कि आपका चेहरा लज्जा से लाल करने के लिए बनाई गई है. बिना वजह आपको निराशा होगी और आप बाहर निकल कर इतना उदास हो सकते हैं कि कोई घटिया चुटकुला आपको हंसा न सके.

13. अगर आप युवक हैं या अधेड़ हैं या बूढ़े हैं…और आपकी महिलाओं को लेकर यही मानसिकता है कि उनको या तो घर में रहना चाहिए या फिर जीबी रोड पर…तो भी ये फिल्म देखने न जाएं. अगर आप किसी दिन मोहल्ले की किसी लड़की को थोड़ा तैयार हो कर कॉलेज जाते देख कर, उसके अफेयर की अफ़वाह उड़ाते हैं, तो भी ये फिल्म देखने न जाएं. अगर आपको लगता है कि महिलाएं आंगन की ज़ीनत हैं, उनको ज़ीनत अमान नहीं बनना चाहिए, तो भी ये फिल्म देखने न जाएं. अगर आप को लगता है कि लड़कियां घर से बाहर निकली, तो बिगड़ जाएंगी…तो भी ये फिल्म देखने न जाएं. इस फिल्म में आपको हर सीन में करारे चांटे लगेंगे, चांटे से वैसे भी मेल ईगो हर्ट हो जाता है. वो भी ऐसा चांटा जिसका अहसास आसानी से न जाए…इसलिए न जाएं…

14. अगर आप के मुताबिक लड़कियों को छोटे कपड़े नहीं पहनने चाहिए, देर रात घर नहीं लौटना चाहिए…लड़कों से दोस्ती-पार्टी वगैरह नहीं करनी चाहिए…लड़कियों को शराब और सिगरेट नहीं पीनी चाहिए (सेहत नहीं सभ्यता के लिहाज से)…लड़कियों को बहुत फ्रैंक नहीं होना चाहिए…और इन सब वजहों से उनसे छेड़खानी या बलात्कार हो सकता है, तो यकीन मानिए इस फिल्म को देख कर, आप खुद को बलात्कारी महसूस करेंगे. इसलिए ये फिल्म देखने बिल्कुल ही मत जाइए.

15. और अंत में उनके लिए, जो शादी तथाकथित संस्कारी लड़की से करना चाहते हैं लेकिन आधुनिक और बोल्ड लड़की उनके लिए ‘ऐश’ का सामान है. जो साथ में पार्टी कर लेने वाली, हंस कर बात करने वाली, नॉनवेज जोक्स शेयर करने वाली हर लड़की को सेक्स के लिए राज़ी मान लेते हैं. जिनके लिए हर ‘मॉड’ बस उनके साथ बिस्तर पर जाने को तैयार है…और जो ‘न’ शब्द नहीं सुन सकते…फिल्म के संवाद में ही कहूं तो गर्लफ्रैंड से…आधुनिक लड़की से…पत्नी से या वेश्या से भी…तो आप भी इस फिल्म को देखने मत जाइए…आपको न सुनने को मिलेगा और इतनी ज़ोर का न सुनने को मिलेगा कि आप बहरे भी हो सकते हैं. यक़ीन मानिए फिल्म आपके मानसिक अंधेपन का इलाज करते हुए, आपको बहरा भी कर सकती है. वैसे भी तुम लोग वही हो न, जो नहीं सुनने पर एसिड फेंक आते हैं…तो भाई तुम तो पब्लिक में न ही घूमो तो अच्छा है…जब ‘न’ सुन ही नहीं सकते तो फिल्म देखने क्यों जाओगे…

अंत में कीर्ति, तापसी तुम दोनों ने कमाल का अभिनय किया है. कुछ दृश्यों, जैसे कि किचन में रोने के, कीर्ति के अदालत में गवाही के, तापसी के अमिताभ को पार्क और बाल्कनी से देखने के सीन्स में तुम लोगों की प्रतिभा दिखती है. उम्मीद है कि तुम लोग असल ज़िंदगी में भी पिंक के संदेश को ले आओगी…बाकी निर्देशक को शुक्रिया, संवाद लेखक को सलाम…ये शुरुआत है…धीरे-धीरे और पिंक आएंगी, रिलीज़ होंगी…एक-दस-सौ…और कुछ बदलेगा…सिनेमा का मकसद भी तो यही है, थोड़ा-थोड़ा कर के पूरा बदल डालना…बाकी हां, जिनको मना किया है…उनको फिल्म नहीं देखनी चाहिए…उनका कुछ नहीं बदलेगा और ये पिंक जैसी फिल्म का ही नहीं, हर आज़ाद स्त्रीका अपमान है…

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