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फिल्म रिव्यू: दी ज़ोया फैक्टर

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एक बहुत ही घिसी-पिटी लाइन है, जो कि यकीनन आपने भी सुनी ही होगी. कि भारत के दो प्रमुख धर्म हैं. क्रिकेट और सिनेमा. और इन दोनों का जब फ्यूजन होता है, तो अक्सर नतीजा अच्छा ही निकलता है. इसी कॉकटेल का डोज़ लेकर इस हफ्ते सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई सोनम कपूर की फिल्म ‘दी ज़ोया फैक्टर’. अनुजा चौहान की इसी नाम की किताब पर आधारित है. इसमें क्रिकेट और सिनेमा के साथ-साथ बॉलीवुड का ट्राइड एंड टेस्टेड फ़ॉर्मूला लव स्टोरी भी है. इतने सारे सेलिंग पॉइंट्स समेटे हुई फिल्म क्या कोई असर छोड़ पाती है? मोस्टली नहीं.

लक बाई चांस

‘ज़ोया’ और ‘लक’ दोनों की-वर्ड्स जिसमें थे, ऐसी एक फिल्म पहले भी आई थी. जिसका नाम ‘लक बाई चांस’ था और डायरेक्ट ज़ोया अख्तर ने किया था. उसका इस फिल्म से कोई लेना-देना नहीं है. बस ऐसे ही याद आया तो बोल दिया. वो एक पावरफुल फिल्म थी, ये वाली बिल्कुल नहीं है. कहानी है ज़ोया सोलंकी की, जो 25 जून 1983 के महान दिन पैदा हुई थी. वही दिन जब कपिल देव ने लॉर्ड्स पर वर्ल्ड कप उठाया था. तभी से ज़ोया के घरवाले उसे लकी चार्म मानते हैं. ये भी मानने लगते हैं कि अगर वो किसी क्रिकेट टीम के साथ नाश्ता कर ले तो उस टीम की जीत पक्की है.

ज़ोया खुद तो लकी चार्म है, लेकिन उसकी खुद की ज़िंदगी में गड़बड़ियां होती रहती हैं.

ज़ोया बड़ी होकर एक ऐड एजेंसी के लिए काम करती है. उसी सिलसिले में इंडियन क्रिकेट टीम से उसका वास्ता पड़ता है. एक दिन इत्तेफाक से वो टीम के साथ नाश्ता कर लेती है और उसी दिन लगातार हार रही टीम एक करिश्मे के तहत जीत भी जाती है. लगभग सभी प्लेयर्स को यकीन हो जाता है कि ज़ोया लकी चार्म है. वो देर रात को टीवी पर ऐड आते हैं न? हनुमान चालीसा यंत्र या अल्लाह ताबीज़ वाले! बस उन्हीं की तरह. सिर्फ एक आदमी ऐसा है जो इस बात को बकवास मानता है. जिसका सिर्फ कड़ी मेहनत में विश्वास है. टीम का कप्तान निखिल खोडा. वो समझता है कि किस्मत जैसी बातें खिलाड़ियों को काहिल बना देंगी. वो सिर्फ लक के भरोसे बैठने के आदी हो जाएंगे. एक समस्या ये भी है कि निखिल ज़ोया को टीम के लिए ख़तरनाक भी मानता है और उससे प्यार भी करने लगता है.

अब सवाल ये है कि ज़ोया का लक फैक्टर और निखिल के ‘मेहनत ही अंतिम हल है’ वाले सिद्धांत में से किसकी जीत होगी. ये जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी. हालांकि ऐसा कुछ है नहीं जिसे आपने अभी प्रेडिक्ट न कर लिया हो.

लकी चार्म नहीं, चार्मिंग दुलकर

फिल्म के फेवर में जो इकलौती बात है वो ज़ोया सोलंकी का लकी चार्म नहीं, बल्कि बेहद चार्मिंग दुलकर सलमान हैं. वो बहुत अच्छे लगते हैं परदे पर. कई बार उनका स्क्रीन प्रेजेंस भर कमज़ोर स्क्रिप्ट की भरपाई कर जाता है. वो तमाम अरसा कोशिश करते रहते हैं कि फिल्म संभल जाए. ‘कारवां’ के बाद ये उनकी एक और शानदार परफॉरमेंस है. उन्हें और हिंदी फ़िल्में करनी चाहिए.

दुलकर इससे पहले हिंदी में इरफ़ान खान के साथ 'कारवां' में नज़र आए थे.
दुलकर इससे पहले हिंदी में इरफ़ान खान के साथ ‘कारवां’ में नज़र आए थे.

ज़ोया सोलंकी बनीं सोनम कपूर के बारे में कोई एक राय कायम करना मुश्किल है. किसी-किसी सीन में वो जान डाल देती हैं, तो कई जगह कतई इम्प्रेस नहीं कर पातीं. एक बेहद मशहूर इंग्लिश सीरीज़ है, ‘हाउस ऑफ़ कार्ड्स’. जिसमें लीड कैरक्टर फ्रैंक अंडरवुड, जिसे केविन स्पेसी ने निभाया था, बीच-बीच में अचानक से कैमरे में देखकर सीधे दर्शकों से बात करने लगता था. इस फिल्म में भी सोनम ऐसा ही कुछ करती दिखाई गई हैं. लेकिन ‘हाउस ऑफ़ कार्ड्स’ में जो चीज़ बहुत पावरफुल लगती थी, वो इसमें बहुत बचकानी लगती है. सोनम का डिक्शन भी मेहनत मांगता है. एक जगह वो गधे को घदा बोलती हैं और ये बड़ा अजीब लगता है.

नकली कमेंट्री

बाक़ी की कास्ट में इंडियन क्रिकेट टीम के सदस्य बने कलाकार ठीक-ठाक हैं. अंगद बेदी ने काम तो अच्छा किया लेकिन उनका किरदार बहुत ही बुरे ढंग से लिखा गया है. मनु ऋषि, संजय कपूर, सिकंदर खेर ठीक-ठाक हैं. फिल्म में कुछ चीज़ें बेहद नकली हैं. जैसे कि मैच की कमेंट्री. कमेंट्री में कॉमेडी भरने के चक्कर में बड़ा कंफ्यूज़िंग सा सीन क्रिएट हुआ है. स्टैंड अप कॉमेडी की टोन वाली कमेंट्री पूरे मैच को मज़ाकिया बना देती है और कभी भी क्रिकेट मैच की इंटेंस फीलिंग आती ही नहीं. दूसरी तरफ फिल्म के कुछेक अच्छे पंच कमेंट्री करने वालों के हिस्से ही आए हैं. ऐसे में आप तय नहीं कर पाते कि इस प्रयोग पर नाखुशी ज़ाहिर करें या ‘फिल्म है, चलता है’ की तर्ज पर हंस लें.

न जाने क्यों ये फिल्म अंधश्रद्धा वाली बात पर क्लियर स्टैंड लेने से बचती है.
न जाने क्यों ये फिल्म अंधश्रद्धा वाली बात पर क्लियर स्टैंड लेने से बचती है.

फिल्म की एक और बड़ी नाकामी ये है कि फिल्म अंधश्रद्धा वाले मसले को ठीक से छूती भी नहीं. ज़्यादातर वक्त किस्मत भरोसे बैठने की ही वकालत करती नज़र आती है और जब ‘किस्मत से मेहनत ज़्यादा अहम है’ ये साबित करने का वक्त आता है तो कमज़ोर पड़ जाती है.

डायरेक्टर अभिषेक शर्मा की पहली फिल्म थी, ‘तेरे बिन लादेन’. उसके बाद उन्होंने ‘ज़ोया…’ को मिलाकर चार और फ़िल्में डायरेक्ट की हैं. पर आज भी उनकी सबसे अच्छी फिल्म ‘तेरे बिन लादेन’ ही है. संगीत पक्ष कमज़ोर है. ‘शंकर-एहसान-लॉय’ का म्यूजिक कोई कनेक्शन नहीं पैदा कर पाता. बस एक गाना ‘लकी चार्म चाहिए’ थोड़ा-बहुत अटेंशन खींचता है. बाकी नो लक.

तो कहने की बात ये कि दुलकर सलमान के फैन हैं तो देख सकते हैं. वरना कुछ ख़ास तो है नहीं.


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