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दी स्काई इज़ पिंक मूवी रिव्यू: जब ज़िंदगी हमें सबसे बड़ा 'स्पॉइलर' दे दे

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सिद्धार्थ ने दुनिया को चार सत्य दिए थे – दुःख हैं. दुःख के कारण हैं. दुःख के कारणों को हटाया जा सकता है और सुख दुःख के पार भी एक अवस्था है. इसके बाद सिद्धार्थ, सिद्धार्थ न रहे. वो बुद्ध हो गए थे.

इन्हीं चार सत्य में से पहले तीन को बड़े ही भावनात्मक रूप से दिखाती है ‘स्काई इज़ पिंक’. चौथे की खोज के लिए दर्शक आज़ाद हैं. फिल्म का नाम ‘स्काई इज़ पिंक’ है क्यूंकि ये बताती है कि हर एक का अपना-अपना आसमान होता है. और अगर आपका निजी आसमान गुलाबी है, तो किसी को हक़ नहीं उसकी आलोचना करने का. तर्कों के आधार पर उसे नीला सिद्ध करने का.

निरेन चौधरी और अदिति चौधरी के तीन बच्चे थे पहली लड़की कुछ महीनों में ही गुज़र गई. दूसरा लड़का और तीसरी लड़की. आयशा चौधरी. आयशा को 6 महीने की उम्र में बोन मैरो ट्रांसप्लांट से गुज़रना पड़ा. अगर नहीं गुज़रती तो अपनी बड़ी बहन की तरह गुज़र जाती. लेकिन इस दौरान हुई कीमोथैरेपी के साइड इफेक्ट्स के चलते 18 की उम्र में उसकी मौत हो गई. प्लमोनरी फिब्रोसिस. वो बीमारी जिसके चलते फेफड़े खराब होने लगते हैं और अंततः ये रोग जान ले लेता है.

18 साल की उम्र में गुज़र गई आयशा, उससे पहले क्या-क्या नहीं कर गई.
18 साल की उम्र में गुज़र गई आयशा, उससे पहले क्या-क्या नहीं कर गई.

लेकिन अपने इस छोटे से जीवन में भी वो बड़े-बड़े काम कर जाती है. इंक कॉन्फ्रेसेज़ और टेड टॉक में दिए उसके मोटिवेशनल स्पीचेज़ के वीडियोज़ आप यू ट्यूब में देख सकते हैं. मौत से ठीक एक दिन पहले यानी 23 जनवरी को उसकी एक किताब भी रिलीज़ होती है- माय लिटिल एपीफेनीज़.  आयशा आर्ट पर जाकर आप उसके बनाए खूबसूरत पेंटिंग्स भी देख सकते हैं.

तो इसी आयशा चौधरी और उसके परिवार की कहानी पर बेस्ड है फिल्म- ‘स्काई इज़ पिंक’. अब आप कहेंगे हमने तो पूरा मज़ा ही किरकिरा कर दिया. स्पॉइलर बता दिया.

तो मुझे कोसने से पहले सोचिए आयशा को तो अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा स्पॉइलर पता था. उसे अपनी मौत का पता था.

बहरहाल चिंता मत कीजिए ये सारी बातें न केवल आपको फिल्म का ट्रेलर देखकर पता चल जातीं हैं बल्कि फिल्म में भी शुरू के पहले पांच मिनटों में ही आपको बता दिया जाता है कि आयशा गुज़र चुकी है. साथ ही गूगल करने पर भी आपको आयशा की सारी स्टोरी मिल जाती है, जैसा आयशा फिल्म में एक जगह कहती भी है, ‘ गूगल कर लीजिये, लेकिन स्पेलिंग सही टाइप कीजिएगा.’

तो अव्वल तो ये कोई सस्पेंस, या थ्रिलर मूवी नहीं जिसकी कहानी पता चल जाने पर आपको दुःख हो क्योंकि जिस तरह की मूवी ये है उनमें महत्वपूर्ण होता है ट्रीटमेंट. और दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि ये स्टोरी आयशा चौधरी से ज़्यादा उनके माता-पिता की है. कैसे वो उससे पहले, उसके दौरान और उसके बाद परिस्थितियों से अपने को एडजस्ट करते हैं. हमने आपको बुद्ध के दो सत्य बताए हैं. दुःख और दुखों का कारण. लेकिन तीसरा सत्य जानने के लिए आपको मूवी देखनी पड़ेगी.

फिल्म में आयशा, जैसा कि वो खुद कहती है, विलेन के किरदार में हैं. दुःख ही तो विलेन होते हैं न? तो बस इसलिए ही. सही तो है. आपका अच्छा होना आपका विलेन होना हो जाता है, जब आप अपनी अच्छाइयों की एक खला, एक वॉयड क्रिएट करने वाले हों.

शोनाली बोस. मूवी की डायरेक्टर खुद भी इस दुःख से गुज़री हैं. और जैसा उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में बताया कि इस फिल्म के मनोविज्ञान को वो अच्छे से पोट्रेट कर पाईं क्योंकि कम उम्र में उनका लड़का गुज़र गया था. फिल्म में ‘मनोविज्ञान’ अगर मंच में है तो ‘दर्शन’ नेपथ्य में.

इसमें जीवन-मृत्यु के बारे में लंबे-लंबे डायलॉग्स नहीं हैं. क्यूंकि हाथ कंगन को आरसी क्या की तर्ज़ पर दुःख और पीड़ाएं प्रकट हैं. यूं इस फिल्म को देखना लड्डू के बारे में विस्तारपूर्वक जानना नहीं, उसे खा लेना, उसका आनंद ले लेने सरीखा है. दुखों का आनंद. लेकिन ये सैडिज़्म कतई नहीं. बड़ा पॉजिटिव ऑरा है इसमें दुखों का.

असां ते जोबन रुत्ते मरना… कहने वाले महबूब शायर शिवकुमार बटालवी के वाकई में जवानी में गुज़र जाने सरीखा पॉजिटिव. कर्ट कोबेन और 27 क्लब के सदस्यों की मृत्यु की तरह पॉजिटिव. जैसा ‘फाइट क्लब’ में टाइलर डर्डन का किरदार कहता है- On a long enough time line, the survival rate for everyone drops to zero वैसा. जैसे चौधरी फैमिली का आयशा के लिए ऑर्गनाइज़ की गई ‘इमरजेंसी हॉलिडे’.

Left to Right- बटालवी, कर्ट कोबेन और ओशो की किताब- मैं मृत्यु सिखाता हूं.
Left to Right- बटालवी, कर्ट कोबेन और ओशो की किताब- मैं मृत्यु सिखाता हूं.

मृत्यु किसी मूवी को डार्क बहुत डार्क बना देती है. लेकिन फिर कुछ ऐसी भी मूवीज़ हैं जो ओशो के ‘मैं मृत्यु सिखाता हूं’ वाले वन लाइनर को फ़ॉलो करती हैं. मृत्यु को सेलिब्रेट करना सिखाती हैं. ‘स्काई इज़ पिंक’ उसी लीग की मूवी है. ‘अक्टूबर’, ‘कल हो न हो’, ‘आनंद’ के लीग की.

फिल्म के डायलॉग्स में एक रियलिटी है, एक सच्चाई है. फिल्म में खासतौर पर वॉशरूम में प्रियंका चोपड़ा और फरहान अख्तर के बीच हो रही गर्मागर्म बहस को सुनियेगा, आप भी हतप्रभ होंगे कि इस तरह के डायलॉग्स कैसे लिखे गए होंगे. ये कट टू कट प्रश्नोत्तरी सरीखे नहीं. एक रियल लाइफ आर्ग्यूमेंट्स की तरह वीयर्ड हैं.

लेकिन हमारे हिंदुस्तान में इन्हें डायलॉग्स नहीं कहते. हम लोग तो वन लाइनर्स को डायलॉग्स मानते हैं. तो अगर ऐसी उदास मूवी में डायलॉग्स अच्छे डालना चाहते हों तो उसके लिए एक नरेटर की ज़रूरत होती है. जो इसमें खुद आयशा बनी है. और अपनी कब्र से बड़े इंट्रेस्टिंग तरीके से सब कुछ बताती है.

दुःख के चार रंग.
दुःख के चार रंग.

अगर आपने फ़ॉल्ट इन अवर स्टार्स देखी है तो आपको ट्रेलर में कुछ सीन देखकर ये भी उसकी सरीखी लगेगी. लेकिन यकीन कीजिए ये उससे बिलकुल अलग है. कारण ये है इसके सुख दुःख से आप रिलेट कर पाते हैं. आप इसे देखते वक्त किसी अपने के गले लगने का एहसास किसी से बिछड़ने का एहसास, किसी के साथ रोने, किसी के साथ हंसने का एहसास रिकॉल कर पाते हैं. मेरे लिए यही एक फिल्म की सफलता का सबसे बड़ा मापदंड है.

ज़ायरा वसीम, प्रियंका चोपड़ा, फरहान अख्तर सभी को इस ब्रेव मूवी को चुनने के लिए साधुवाद. सभी का काम कमाल का है. अगर आप अत्यधिक संवेदनशील हैं तो नॉन लीनियर स्क्रिप्ट आपको बांधे रखती है, लेकिन आपको बोर करती है अगर आपमें पेशेंस नहीं है या अगर आप पिछले एक हफ्ते में सिर्फ 16 घंटे ही सोए हैं. स्क्रिप्ट की सबसे अच्छी बात है न्यूनतम क्रिएटिव लिबर्टी. सो मच सो कि किरदारों के नाम तक नहीं बदले गए हैं.

Left to Right- शोनाली बोस, प्रीतम, गुलज़ार
Left to Right- शोनाली बोस, प्रीतम, गुलज़ार

गुलज़ार के गीत पहले ही अरिजीत की आवाज़ पाकर हिट हो चुके हैं. अरिजीत अगर कूचें को कूंचे न कहते तो शायद इतनी कंट्रोवर्सी भी न होती, जितनी पिछले दिनों हुई. प्रीतम का संगीत ऐसा है जैसे आजकल गीत बन रहे हैं. यानी एवरेज. जान है फिल्म का बैकग्राउंड म्यूज़िक जो फिल्म शुरू होते ही एक ‘निर्मल वर्मा’ वाली भीनी-भीनी खूबसूरत उदासी का माहौल बना देता है. तब, जब बैकग्राउंड में कोई धुन बजाई नहीं गुनगुनाई जा रही होती है. उदास लोरी सरीखी कोई धुन.

और हां हममें से ज़्यादातर लोग फ़िल्म ख़त्म होने से पहले भागमभाग मचा देते हैं. इस फ़िल्म में ऐसा मत करिएगा. आपके तीन फ़ायदे होंगे. पहला कि आपको आयशा चौधरी और उनके परिवार की रियल तस्वीरें और वीडियो देखने को मिलेंगी. जिन तस्वीरों और वीडियोज़ को फ़िल्म में बतौर रेफरेंस लिया गया है उन्हें देखने का मौक़ा मत चूकिएगा. दूसरा फ़ायदा, आयशा चौधरी के भाई ने आयशा के लिए एक गाना बनाया था. यक़ीन मानिए अगर उसे सुनना शुरू किया तो आप पूरा सुनकर ही मानेंगे. बेहद मेलोडियस और मेलंक्लिक गाना. और इसे सुनना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि अभी ये गाना इंटरनेट पर नहीं आया. हमें तो नहीं मिला. और तीसरा फ़ायदा, तब तक ज़्यादातर पब्लिक निकल जाएगी. और आप जब ख़ाली हो चुके थिएटर से बाहर निकलेंगे, तो ख़ाली हाथ नहीं लौटेंगे.


वीडियो देखें:

जोकर: मूवी रिव्यू-

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