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मूवी रिव्यू: द बिग बुल

डिज़्नी प्लस हॉटस्टार पर एक फिल्म आई है. ‘द बिग बुल’. फिल्म हर्षद मेहता की कहानी से प्रेरित है. उसपर आधारित नहीं. पिछले साल हर्षद की कहानी पर सीरीज़ भी आई थी. ‘स्कैम 1992’. ज़ाहिर है ‘द बिग बुल’ की तुलना उस सीरीज़ से होनी तय थी. लेकिन क्या ये फिल्म अपनी अप्रोच में वाकई एक नई कोशिश है या फिर ‘स्कैम’ वाली कतार में जाकर खड़ी हो गई.

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‘स्कैम 1992’ से लगातार तुलना होती रही है इस फिल्म की.

# The Big Bull की कहानी क्या है?

1980 के दशक का भारत. अर्थव्यवस्था घुट रही है. सरकार के पास पैसा नहीं. चुप-चाप देश के रिज़र्व का सोना बेचने की नौबत आ पड़ी है. ऐसे ही माहौल से निकलकर आता है कहानी का सेंट्रल कैरेक्टर. हेमंत शाह. एक गुज्जु भाई. अपनी मां और भाई विरेन के साथ बंबई की चॉल में रहता है. रहता चॉल में हैं, पर हेमंत के सपने बड़े हैं. अमीर बनना चाहता है. वो भी जल्दी. चार दोस्तों की महफ़िल में जहां पैसे की बात चली, हेमंत की आंखें चमक उठती हैं. वो पैर रगड़कर चलने में नहीं, बल्कि उड़ने में यकीन रखता है. जो करना है, जल्दी करो. वर्ना आपसे पहले कोई और कर डालेगा. कुछ ऐसी अप्रोच.

Hemant Shah
एक आम आदमी जो बहुत जल्दी अमीर बनना चाहता है.

जल्दी पैसा बनाने के चक्कर में हेमंत की एंट्री होती है स्टॉक मार्केट में. लेकिन भाईसाहब के सपने बड़े हैं. ज़्यादा दिन किसी और की नौकरी कर के खुश नहीं. इसलिए खुद मार्केट के पायदान चढ़ने लगते हैं. चढ़ते-चढ़ते मार्केट के सरताज बन जाते हैं. स्टॉक मार्केट के अमिताभ बच्चन. यानी बिग बुल. स्टॉक मार्केट की घंटी भी इनके हाथ उठने के इशारे से खुलती है. बचपन में साइंस ने पढ़ाया है ‘लॉ ऑफ ग्रैविटी’. जिसके तहत जो चीज़ ऊपर जाएगी, उसे निश्चित तौर पर नीचे भी आना पड़ेगा. हेमंत का तारा भी आसमान की बुलंदी छू रहा था. लेकिन क्या उसका सितारा नीचे आकर डूबता है या आसमान में सुसज्जित रह जाता है. आम आदमी के इसी ‘राइज़ एंड फॉल’ की कहानी का नाम है ‘द बिग बुल’.


# क्या अभिषेक भैया, पूरी फिल्म खा गए

इस फिल्म का हीरो और विलेन एक ही आदमी है. हेमंत शाह. गरीबी से उठा एक आदमी. जो सोसाइटी के एक पर्सेंट में शामिल होना चाहता है. पैसा बनाने की कोशिश में लग जाता है. फिल्म के इस हिस्से में आप खुद को हेमंत के लिए चीयर करते हुए पाएंगे. वो एक हीरो, जैसा प्रतीत होने लगेगा. लेकिन सिर्फ अमीर होने तक. अमीर होने के बाद ऐसा लगेगा कि अब तक स्क्रीन पर डेढ़ घंटे जिसे देखा, वो तो कोई और ही था. पहले ढीले-ढाले होकर चलने वाले इस हेमंत की सिर्फ चाल ही नहीं बदलती, बल्कि हर चीज़ में एक किस्म की अकड़ आ जाती है. वैसी अकड़ जो खुद के दम पर कुछ करने के बाद आती है. कि ये देखो, अपने बलबूते कुछ किया है. जनता अब तक जिस हेमंत को हीरो मान रही थी, अब उससे ही डर सा लगने लगता है. उसके गुस्से से. उसके सोने की रिम वाले चश्मे के कांच को भेदती नज़रों से.

Rich Hemant
गुरु जी, बाजे फाड़ दिए.

इसका क्रेडिट जाता है दो फ़ैक्टर्स को. पहला तो कूकी गुलाटी और अर्जुन धवन को. जिन्होंने फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी. फिल्म को ऐसे लिखा गया कि हेमंत की हर सिचुएशन और उन पर उसके रिएक्शन को सही फुटेज मिले. जनता को हेमंत की कहानी उसी के जरिए दिखाने में हड़बड़ी ना की जाए. दूसरा सबसे जरूरी और मजबूत फैक्टर हैं अभिषेक बच्चन. यानी फिल्म के हेमंत. हेमंत को सिर्फ पइसा बनाने से मतलब है. बीवी के लिए कमा रहा हूं. देश को अमीर बना रहा हूं. मिडल क्लास को मजबूत कर रहा हूं. ये सब उसके बहाने हैं. वो सिर्फ अपने लिए अमीर बनना चाहता है. ऐसा आदमी जिसकी आंखों से पैसे की बात सुनकर हवस टपकने लगती है . वो हर बात कहना जरूरी नहीं समझता. बस आंखें घूमती हैं और सामने वाले के साथ-साथ ऑडियंस भी इशारा समझ जाती है. अगर इस रोल के लिए अभिषेक को अवॉर्ड्स में नॉमिनेट किया जाता है, तो उनकी आंखों का भी अलग से नॉमिनेशन बनता है. ऐसा बाजा फाड़ काम किए हैं अभिषेक भैया.

Viren And Mother
सोहम शाह और सुप्रिया पाठक ने हेमंत के भाई और मां का किरदार निभाया है.

मुंबई के आराम नगर वाले दोस्त अक्सर एक लाइन यूज़ करते हैं. जब किसी एक्टर के काम की भयंकर तारीफ करनी हो. कि ब्रो, ये बंदा तो खा गया सबको. यही बात हम यहां अभिषेक के लिए कहेंगे. फिल्म में उनके अलावा इलियाना डी क्रूज़, सोहम शाह, निकिता दत्ता और सौरभ शुक्ला जैसे एक्टर्स मुख्य भूमिकाओं में हैं. फिर भी लाइमलाइट तो अभिषेक ही ले उड़े.


# एक कहानी है, जो सबको सुनानी है

अनपॉपुलर ओपिनियन, पर मैं कैरीमिनाटी का फैन नहीं. आज तक एक वीडियो पूरी नहीं देखी उनकी. अब इससे पहले आप कमेंट्स में ‘चल बे अपना काम कर ना चापली’ जैसी बातें कहें, हियर मी आउट. पिछले महीने ‘द बिग बुल’ का ट्रेलर आया था. उसमें एक गाना यूज़ किया गया. कैरीमिनाटी का. नाम था ‘यलगार’. हालांकि, फिल्म के लिए इसे रीक्रिएट किया गया था. ट्रेलर देखते वक्त ये मुझे बेहद बचकाना लगा. मतलब यार अभिषेक बच्चन फुल टशन में लेक्सस का सहारा लेकर खड़े हैं. और पीछे से आवाज़ आ रही है, ‘तो कैसे हैं आप लोग’. यही कहने का मन हुआ कि अच्छे नहीं हैं चचा.

Abhishek Leaning On Lexus
पिछली बार क्या बोला था? औकात.

खैर, अब फिल्म आई. यहां भी ‘यलगार’ को यूज़ किया गया. हेमंत के स्ट्रगल के दिनों को कैप्चर करने के लिए. ‘कैसे हैं आप लोग’ सुन फिर मेरा माथा ठनका. लेकिन कुछ देर बाद मैं खुद लूप में गुनगुना रहा था. ‘एक कहानी है जो सबको सुनानी है’. ये गाना कोई साहित्यिक उपलब्धि नहीं. लेकिन हां, कैची जरूर है. इतना कि जब से फिल्म देखी है, लगातार गुनगुना रहा हूं. दर्जनों बार मम्मी भी आकर पूछ चुकी हैं कि बेटा ऐसी कौन सी कहानी सुनाना चाहते हो.

Abhishek Bachchan 3
अभिषेक ही हैं पूरी फिल्म की हाइलाइट.

सौ बातों की एक बात. फिल्म के जिस भी एग्ज़ीक्यूटिव का इस गाने को फिल्म में शामिल करने का फ़ैसला था, आपको बढ़ाई, आपका एक्सपेरिमेंट सफल रहा.


# दी लल्लनटॉप टेक

दुख की बात है कि ये फिल्म ‘स्कैम’ से की गई तुलना से नहीं बच पाएगी. जबकि ये अपने पैरों पर खड़े होने में समर्थ है. ‘स्कैम’ के डायरेक्टर हंसल मेहता खुद कह चुके हैं कि हमारे पास हर्षद की कहानी बताने के लिए 10 घंटे थे. यहां कूकी के पास सिर्फ ढाई थे. बावजूद इसके, उन्होंने कहानी के साथ पूरा न्याय किया है. हां, सब कुछ दिखाने के चक्कर में ऐसा भी लगेगा कि कुछ चीज़ें दौड़ा दी गई. लेकिन इसमें सिनेमा के मीडियम का दोष है. जहां ना एपिसोड्स होते हैं, ना ही अगला सीज़न.

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फिल्म देख डालिए, रिग्रेट नहीं करेंगे.

आप चाहे प्रतीक गांधी के कितने भी बड़े फैन हों, ये फिल्म देख डालिए. अभिषेक निराश नहीं करेंगे. और प्रतीक भी बुरा नहीं मानेंगे.


वीडियो: ‘गॉडज़िला वर्सेज़ कॉन्ग’ की कहानी में कितना लॉजिक और फन है?

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