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फिल्म रिव्यू- थार

बड़े मकबूल फिल्ममेकर हुए हैं सर्जियो लियोन. इटली से थे. उन्होंने क्लिंट ईस्टवुड को लेकर ‘डॉलर्स ट्रिलजी’ बनाई. सर्जियो ने बने-बनाए ढर्रे पर चलने की बजाय अपनी खुद की फिल्ममेकिंग स्टाइल इजाद की. वो इटैलियन समझ और तकनीक को हॉलीवुड फिल्मों में इस्तेमाल करते थे. उनकी फिल्में सुनसान इलाकों में घटती. हीरो घोड़े पर चलता था. नैतिकता की परवाह नहीं. खून-खराबा. बदला-पैसा. साथ में सोशल कमेंट्री. फिल्म समीक्षकों ने इस किस्म की फिल्मों को स्पैघेटी या वेस्टर्न स्पैघेटी बुलाना शुरू कर दिया. स्पैघेटी एक इटैलियन डिश होती है. आगे इस जॉनर में ढेरों फिल्में बनीं. रॉ इमोशन से लबरेज इन फिल्मों को पब्लिक खूब पसंद करती थी. सर्जियो लियोन की फिल्मों पर इस जल्बाज़ी और बेपरवाही में बात करने के लिए माफी के साथ मैं पॉइंट पर आना चाहता हूं.

पॉइंट ये है कि नेटफ्लिक्स पर एक फिल्म रिलीज़ हुई है जिसका नाम है ‘थार’. ये इंडिया में घटने वाली स्पैघेटी वेस्टर्न जॉनर की फिल्म सी लगती है. इस लाइन को लिखने से पहले सर्जियो लियोन और उनकी फिल्ममेकिंग का ज़िक्र ज़रूरी था. बहरहाल, ‘थार’ की कहानी 1980 के दशक में मुनाबो नाम के गांव में घटती है. सुनसान, शहर से दूर इस गांव में एक दिन दो घटनाएं होती हैं. सुवा नाम के आदमी की बर्बर हत्या हो जाती है. गांव के एक दूसरे घर में डकैती होती है और दो लोगों की हत्या कर दी जाती है. इन मामलों की जांच करते हैं इंस्पेक्टर सुरेखा सिंह और उनके मातहत भूरा. सुरेखा अपने करियर ग्राफ से बड़े नाखुश रहते हैं. पूरा जीवन इंस्पेक्टर बनकर ही निकाल दिया. कभी प्रमोशन नहीं ले पाए. दूसरी तरफ गांव में एक नया आदमी आया है. उसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता. उसके इर्द-गिर्द एक मिस्ट्री एलीमेंट है. वो शहर में अपने काम के लिए पढ़े-लिखे लोग ढूंढ रहा है. उसकी तलाश पूरी होती है पन्ना और उसके दो दोस्तों पर. बीतते समय के साथ गांव से लोग गायब होने लगते हैं. सुरेखा को उनके गायब होने के पीछे की वजह पता लगानी है. फिल्म ‘थार’ का ट्रेलर आप नीचे दिए लिंक पर देख सकते हैं-

इस फिल्म के मूड का अंदाज़ा इस सीन से लगाने की कोशिश करिए. जिस गांव से लोग गायब हो रहे हैं. डर का माहौल है. वहां का इंस्पेक्टर खुश है. क्योंकि उसे लंबे समय बाद नेताओं की सुरक्षा से इतर कुछ गंभीर पुलिसिया काम करने का मौका मिला है. उसे इसमें मज़ा आ रहा है. ‘थार’ अपने पहले सीन से थ्रिलर वाला माहौल बनाना शुरू करती है. हर सीन उस क्लॉस्ट्रोफोबिक माहौल में कुछ न कुछ जोड़ने की कोशिश करती है. आपको लगता है कि कुछ तो हो रहा है. और जो हो रहा है, वो आपको जानना है. ‘थार’ का फर्स्ट हाफ टाइट है. दिक्कत इसके आगे शुरू होती है.

फिल्म के एक सीन में अनिल कपूर और सतीष कौशिक.
फिल्म के एक सीन में अनिल कपूर और सतीष कौशिक.

जब इतने सारे बिल्ड-अप के बाद फिल्म खुलती है, तो निराशा होती है. क्योंकि इतना सारा मजमा एक पतले से डोर में बंधा हुआ था. ये सब क्यों हो रहा है, ये फिल्म के बताने से पहले आप प्रेडिक्ट कर चुके होते हैं. मगर आपको लगता है कि सिर्फ इतनी सी बात थोड़ी होगी. कुछ तो और होगा इस कहानी में. मगर ऐसा होता नहीं है. ये फिल्म बेसिक सी स्टोरीलाइन के इर्द-गिर्द एक टाइट थ्रिलर बुनने की कोशिश करती है. फिल्म का हर डिपार्टमेंट उसके लिए अपना जोर लगा देता है. मगर वो सब चीज़ें तब काम आएंगी, जब आपके पास कहने को कुछ ऐसा होगा, जो किसी ने पहले नहीं कहा. ‘थार’ में से वो चीज़ मिसिंग है.

‘थार’ एक वॉयलेंट फिल्म है. मगर वो सिर्फ मानसिक हिंसा तक सीमित नहीं है. आपकी आंखों के सामने लिटरल खून-खराबा हो रहा है. वो बड़े वीभत्स तरीके से. मगर कभी ऐसा नहीं लगता कि फिल्म ओवर डू कर रही है. वॉयलेंस के अलावा फिल्म कास्ट सिस्टम, ड्रग्स और अकेलापन जैसे मसलों को छूकर निकलती है. अच्छी बात ये कि ये सारी चीज़ें कहानी में गूंथी हुई हैं. अलग से जोड़ी हुई नहीं लगती.

रहस्मयी आदमी के रोल में हर्षवर्धन कपूर.
रहस्मयी आदमी के रोल में हर्षवर्धन कपूर.

फिल्म का टेक्निकल विभाग डायरेक्टर राज सिंह चौधरी के विज़न को पर्दे पर उतारने के लिए एंड़ी-चोटी का दम लगाता है. फिल्म की सिनेमैटोग्रफी इसमें सबसे बड़ा रोल प्ले करती है. जब फिल्म शुरू होती है, तब आपको उस इलाके का बर्ड आई व्यू दिखाया जाता है. श्रेया दुबे का कैमरावर्क आपको उस जगह में एक किस्म के खालीपन का भाव महसूस करवाता है. वही चीज़ आपको वहां बसने वाले किरदारों में देखने को मिलती हैं. फिल्म में कई मौके ऐसे हैं, जहां कैमरा किरदारों के आंख पर टिक जाता है. किसी आंख में निराशा है, किसी में अफसोस, तो किसी में लालसा. फिल्म की शुरुआत में आने वाले गाने को फिल्म से अलग भी सुना जा सकता है. फिल्म में कई ज़रूरी सीन्स ऐसे हैं, जहां बैकग्राउंड स्कोर नहीं है. और वहां आपको उसकी कमी नहीं लगती.

फिल्म के एक सीन में फातिमा सना शेख. फातिमा ने फिल्म में पन्ना की पत्नी का रोल किया है. मगर वो फिल्म में सिर्फ प्रिटी फेस के तौर पर नहीं, एक ज़रूरी किरदार में नज़र आती हैं.
फिल्म के एक सीन में फातिमा सना शेख. फातिमा ने फिल्म में पन्ना की पत्नी का रोल किया है. मगर वो फिल्म में सिर्फ प्रिटी फेस के तौर पर नहीं, एक ज़रूरी किरदार में नज़र आती हैं.

फिल्म में अनिल कपूर ने सुरेखा सिंह का रोल किया है. साथ ही अनिल इस फिल्म के प्रोड्यूसर भी हैं. मगर आपको उस आदमी के भीतर अब भी अलग और अच्छा काम करने की भूख दिखती है. वो हर फ्रेम में आपको इंप्रेस करते हैं. सरप्राइज़ करते हैं. उनके सबॉर्डिनेट भूरा का रोल किया है सतीष कौशिक ने. सतीष और अनिल ने पहले भी साथ में काम किया है. उनकी वो केमिस्ट्री आपको इस फिल्म में भी देखने को मिलती है. हर्षवर्धन कपूर ने उस अनाम रहस्यमयी शख्स का रोल किया है, जो गांव में नया आया है. हर्षवर्धन फिल्म में अधिकतर मौकों पर ब्लैंक एक्सप्रेशन के साथ दिखाई देते हैं. ये उनके कैरेक्टर की सॉर्ट ऑफ डिमांड रहती है. हर्षवर्धन कपूर ने अपने करियर में जो भी काम किया है, वो रेगुलर सिनेमा नहीं है. वो कुछ अलग है. काम का चुनाव एक्टर्स के बारे में काफी कुछ बताता है . फातिमा सना ने शेख ने पन्ना की पत्नी का रोल किया है. उनका एक कैरेक्टर आर्क है, जो फिल्म के लिए पॉज़िटिव तरीके से काम करता है. मगर इस फिल्म की सबसे तगड़ी परफॉरमेंस है जीतेंद्र जोशी की. जीतेंद्र को पब्लिक ‘सेक्रेड गेम्स’ के काटेकर के तौर पर जानती है. सारी एक्टिंग एक तरफ और उस आदमी का राजस्थानी लहज़ा एक तरफ.

जीतेंद्र जोशी. लिमिटेड स्क्रीनटाइम में यादगार परफॉरमेंस.
जीतेंद्र जोशी. लिमिटेड स्क्रीनटाइम में यादगार परफॉरमेंस.

‘थार’ अपने किस्म की पहली फिल्म लगती है, जहां सबकुछ ऑन पॉइंट है. सिवाय मेन स्टोरीलाइन के. इतने सब के बावजूद फिल्म के पास कुछ अच्छा, अलग और नया करने का मौका था. मगर जनता को सबकुछ बोलकर बताने यानी स्पूनफीडिंग के चक्कर में वो चीज़ भी जाती रहती है. फिल्म में कुछ हिस्से हैं, जो फ्लैशबैक की मदद से बताए जाते हैं. उस फ्लैशबैक के बिना फिल्म थोड़ी और मजबूत लगती.


 

‘थार’ को आप नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम कर सकते हैं.


वीडियो देखें: फिल्म रिव्यू- हीरोपंती 2

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