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फिल्म रिव्यू: टर्मिनेटर - डार्क फेट

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‘टर्मिनेटर-डार्क फेट’. जगतप्रसिद्ध टर्मिनेटर सीरीज की छठी किश्त. इस सीरीज की पिछली दो फिल्मों ने, ‘टर्मिनेटर सैल्वेशन’ और ‘टर्मिनेटर जेनेसिस’ ने, दर्शकों को निराश ही किया था. क्या ये फिल्म, टर्मिनेटर की फ्रेंचाइज़ी में कुछ करंट दौड़ा पाएगी? आइए जानते हैं.

फिल्म की कहानी तीन लाइन में समेटी जा सकती है. एक लड़की है, जिसे मारने भविष्य से कोई आया है. और उसी भविष्य से कोई उसे बचाने भी आया है. वर्तमान समय में भी दो लोग हैं, जो उसे बचाना चाहते हैं. अब कौन कामयाब होता है, ये तो कोई बड़ा रहस्य नहीं होना चाहिए. कैसे होता है ये जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी. ये जानने के लिए भी कि उस लड़की में ऐसा क्या है जिसे ख़त्म करने के लिए भविष्य की जनता इतना ज़ोर लगा रही है.

दानी को मारने-बचाने की जंग लग रहे हैं दो दुनिया के लोग.
दानी को मारने-बचाने की जंग लग रहे हैं दो दुनिया के लोग.

फिल्म का सबसे सशक्त पहलू है इसका एक्शन. इस एक फ्रंट पर ये फिल्म आपके पैसे वसूल करवा देती है. एक्शन बेहद शार्प, इनोवेटिव और कुछ-कुछ जगह तो हैरतअंगेज़ है. ख़ास तौर से कार चेस वाले सीन. लहू की गर्दिश बढ़ा देने वाला फिल्मांकन है बॉस! हवाई जहाज़ वाले फाईट सीन्स भी ग़ज़ब के एंगेजिंग हैं. आप सांस थामे देखते रहते हो. क्लाइमेक्स तो और भी बढ़िया बन पड़ा है. कुल-मिलाकर एक साई-फाई फिल्म में जिस तरह के एक्शन की आपको उम्मीद होती है, वो सब मिलेगा आपको. वीएफएक्स शानदार हैं. होने ही थे. आखिर इतनी बड़ी फ्रेंचाइज़ी की फिल्म जो है.

एक्टिंग की बात की जाए तो फिल्म के चारों ही लीड किरदार अपीलिंग लगते हैं. लिंडा हैमिलटन ने पहली दो टर्मिनेटर फिल्मों वाला अपना रोल फिर से रिज्यूम किया है. और बेहतरीन ढंग से किया है. तमाम टर्मिनेटर्स के लिए नफरत से भरी और उनके खात्मे के लिए कसम खाई हुई सारा कॉनर उन्होंने अच्छे ढंग से निभाई है. नतालिया रेयस ने उस लड़की दानी का रोल किया है, जिसे बचाने के लिए सारी जद्दोजहद हो रही है. वो पहले खौफ और बाद में आत्मविश्वास को सही ढंग से पेश कर पाईं हैं. मेकेंजी डेविस ने ग्रेस नाम की रक्षक महिला का पार्ट प्ले किया है. वो एक ऐसी औरत है जो भविष्य से आई है. मेकेंजी इमोशनल सीन्स में थोड़ी कमज़ोर लगती है लेकिन एक्शन सीन्स ग़ज़ब के किए हैं उन्होंने.

लिंडा हैमिल्टन ने अपना पुराना रोल रिज्यूम किया है.
लिंडा हैमिल्टन ने अपना पुराना रोल रिज्यूम किया है.

अब रही बात स्टार अट्रैक्शन अर्नोल्ड श्वार्ज़नेगर की. उनमें आपको नया तो कुछ नहीं मिलता लेकिन वो निराश भी नहीं करते. इमोशनलेस चेहरे के साथ वो अपना काम बेहद सफाई से निभा जाते हैं. हां मारधाड़ वाले सीन्स में उनका जलवा अब भी कायम है.

फिल्म में कुछेक खामियां भी हैं. सबसे बड़ी खामी तो कहानी ही है जिसमें कोई नयापन नहीं. इस तरह की स्टोरी न जाने कितनी फिल्मों में देख चुकी है जनता. इसके अलावा कुछेक लॉजिक वाले भी इशू हैं. हम हमेशा हिंदी फिल्मों से शिकायत करते रहते हैं कि इनमें लॉजिक की कितनी कमी रहती है. ‘टर्मिनेटर-डार्क फेट’ में भी कई सीन ऐसे हैं जो तर्क की कसौटी पर खरे नहीं उतरते.

एक्शन उम्दा है, और वो ही इस फिल्म को कदरन बचाता है.
एक्शन उम्दा है, और वो ही इस फिल्म को कदरन बचाता है.

बहरहाल, टर्मिनेटर सीरीज काफी पुरानी है. इसकी पहली फिल्म 1984 में आई थी. और दूसरी 1991 में. इन दोनों फिल्मों के डायरेक्टर थे ‘टाइटैनिक’ वाले जेम्स कैमरून. और यही दो फ़िल्में इस सीरीज की सबसे शानदार फ़िल्में मानी जाती हैं. सिनेमा विशेषज्ञ एक सुर में कहते हैं कि जेम्स कैमरून के बाद इस सीरीज का ग्राफ गिरा ही है. अगली तीन फिल्मों के लिए हर बार नया डायरेक्टर लाया गया. इस बार भी ऐसा ही है. टिम मिलर पहली बार इस सीरीज की कोई फिल्म डायरेक्ट कर रहे हैं. उन्होंने इससे पहले एक और सुपरहीरो वाली फिल्म ‘डेडपूल’ डायरेक्ट की है. और इसी वजह से शायद उन्हें इस साई-फाई फिल्म के लिए फिट माना गया. उनका तजुर्बा कुछ हद तक तो फिल्म के काम आया ही है.

कुल मिलाकर बात ये कि ‘टर्मिनेटर-डार्क फेट’ इस सीरीज के दीवानों को खुश करने का माद्दा तो रखती है लेकिन आम दर्शक के लिए कुछ नया नहीं परोसती. हालांकि तूफानी एक्शन सीन्स के लिए एक बार तो देखी ही जा सकती है.


वीडियो – फिल्म रिव्यू: मेड इन चाइना

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