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वेब सीरीज़ रिव्यू- तांडव

14 जनवरी की देर रात अली अब्बास ज़फर डायरेक्टेड वेब सीरीज़ तांडव एमेज़ॉन प्राइम वीडियो पर रिलीज़ हुई. इस सीरीज़ को लिखा है ‘आर्टिकल 15’ फेम गौरव सोलंकी ने. हमने रातों-रात मामला निपटा दिया. तांडव देखने के बाद हमें जो समझ आया, वो हम आपके साथ शेयर करने आए हैं.

क्या है तांडव की मोटा-मोटी कहानी?

ये सीरीज़ खुलती है ग्रेटर नोएडा से सटे एक गांव में किसानों के प्रदर्शन से. इसमें VNU कॉलेज के कुछ स्टुडेंट्स भी हिस्सा ले रहे हैं. यहां से दो लड़के गायब हो जाते हैं और एक को पुलिस उठा ले जाती है. काफी दिलचस्प शुरुआत लगती है. कई पॉलिटिकल पैरलेल्स बिल्ड होते हैं. मगर ये सीरीज़ रियलिटी को छेड़ने की बजाय फिक्शन से ही चिपकी रहना चाहती है. खैर, दूसरी तरफ पिछले तीन टर्म से देश के प्रधानमंत्री पद पर बैठे देवकी नंदन आम चुनावों के नतीजे का इंतज़ार कर रहे हैं. रुझानों के मुताबिक उनका पार्टी ऐतिहासिक जीत हासिल करने जा रही है. उनका बेटा है समर प्रताप सिंह. उसे भी प्रधानमंत्री बनना है. हमारे यहां बनने वाली वेब सीरीज़ के तमाम बापों की तरह यहां देवकी जी भी अपने बेटे को ‘अयोग्य’ समझते हैं. समर को ये बात खलती है. चुनावों में देवकी नंदन की पार्टी बड़ी जीत दर्ज करती है. उसी शाम वो अपने ऑफिस में डेड पाए जाते हैं.

देश के प्रधानमंत्री के रोल में देवकी नंदन, जो बेटे की बात को सुने बगैर झिड़क देते हैं.
देश के प्रधानमंत्री के रोल में देवकी नंदन, जो बेटे की बात को सुने बगैर झिड़क देते हैं.

कट टु कॉलेज पॉलिटिक्स. VNU स्टुडेंट शिवा शेखर की अगुवाई में कुछ लड़के अपने गिरफ्तार दोस्त को छुड़ाने जाते हैं. वहां उन्हें पुलिस पीट देती है. मगर रिहाई की लड़ाई जारी रहती है. देवकी की मौत की वजह हार्ट अटैक बताई जाती है मगर मामला उलझ जाता है. पता चलता है कि उनकी मौत जहर दिए जाने से हुई है. अब्बाजी के कत्ल का इल्ज़ाम घूम-फिरकर मियां पर ही आ जाता है. चाहत बहुतों की थी मगर इस मौके का फायदा उठाया देवकी की लॉन्ग टाइम असोशिएट और उनकी पार्टी की सीनियर लीडर अनुराधा किशोर ने. वो सियासी ट्रिक्स का इस्तेमाल कर समर की बजाय खुद देश की गद्दी पर काबिज हो जाती हैं. अब समर उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटाकर, वो कुर्सी वापस कैसे पाता है! ‘तांडव’ के पहले सीज़न के 9 एपिसोड की कहानी इतनी ही है. बीच में बहुत सारे सब-प्लॉट्स हैं. जिनमें आपको लव स्टोरी से लेकर कॉलेज पॉलिटिक्स, गद्दी की लालच, जाति का एंगल और ‘मसान’ से ऋचा चड्ढा वाला सेग्मेंट देखने को मिल जाता है. मगर सवाल ये है कि ‘तांडव’ कागज़ पर जितनी स्लीक पॉलिटिकल थ्रिलर लग रही थी, स्क्रीन पर वैसी लगती है? इसका जवाब होगा- नहीं.

कैसी है एक्टर्स की परफॉरमेंस?

# ‘तांडव’ में देवकी नंदन का रोल किया है तिग्मांशु धूलिया ने. इसे देखकर बिल्कुल ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ वाले रामाधीर सिंह याद आते हैं. एक ऐसा किरदार जिसने जीवनभर के अच्छे-बुरे अनुभवों को सिर्फ सोखा नहीं, उससे सीखा भी. हालांकि तग्मांशु का रोल कम है. जितना है मजबूती से निभाया गया है.
# देवकी के बेटे समर प्रताप के रोल में हैं सैफ अली खान. ये एक पॉलिटिकल मास्टर माइंड कैरेक्टर है. ऐसे रोल्स सैफ ‘ओमकारा’ और ‘रेस’ जैसी फिल्मों में कर चुके हैं. मगर समर काफी वल्नरेबल है. डरा हुआ है. उसने जो किया है, अगर वो किसी को पता चल गया है, तो उसका पूरा पॉलिटिकल करियर खत्म हो जाएगा. मगर वो अपनी गद्दी पर अपना अधिकार पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है. सैफ अली खान ने पहले भी कर के दिखाया है कि वो ये सब कर सकते हैं.

देवकी नंदन के बाद उनके उत्तराधिकारी समर प्रताप सिंह, जिनका पीएम बनने का सपना राजनीति की भेंट चढ़ जाता है. ये किंग तो नहीं बन पाते पर किंग मेकर ज़रूर बन जाते हैं.
देवकी नंदन के बाद उनके उत्तराधिकारी समर प्रताप सिंह, जिनका पीएम बनने का सपना राजनीति की भेंट चढ़ जाता है. ये किंग तो नहीं बन पाते पर किंग मेकर ज़रूर बन जाते हैं.

# कुमुद मिश्रा ने देवकी नंदन के करीबी मित्र गोपाल दास का रोल किया है. जो उनकी मौत के तुरंत बाद देश का नया प्रधानमंत्री बनने की कवायद शुरू कर देता है. मगर समर ये मौका उनसे छीन लेता है.
# इस सीरीज़ ने जिस एक्टर को वाकई परफॉर्म करने का मौका दिया है, वो हैं सुनील ग्रोवर. तांडव में सुनील ने गुरपाल नाम का किरदार निभाया है, जो समर के लिए काम करता है. वो कम शब्दों में सटीक बात करता है. समर के लिए गलत काम करके उस पर पर्दा डालना उसकी नौकरी है. पिच परफेक्ट एक्सेंट के साथ सुनील ग्रोवर ने इस सीरियस कैरेक्टर को मज़ेदार बना दिया है.

समर प्रताप के राइट हैंड गुरपाल चौहान के रोल में सुनील ग्रोवर.
समर प्रताप के राइट हैंड गुरपाल चौहान के रोल में सुनील ग्रोवर.

# मोहम्मद ज़ीशान अयूब ने शिवा शेखर नाम के कॉलेज स्टुडेंट का रोल किया है, जिसे ‘रांझणा’ स्टाइल में कॉलेज पॉलिटिक्स से नेशनल पॉलिटिक्स में लाने की कोशिश की जाती है. ज़ीशान को देखकर लगता है, वो अपना ही कॉलेज वर्ज़न प्ले कर रहे हैं. बस इस वर्ज़न में कन्विक्शन ज़्यादा है.
# डिंपल कपाड़िया ने अनुराधा किशोर का रोल किया है. अनुराधा समर को ब्लैकमेल करके देश की प्रधानमंत्री बन जाती हैं. और फिर बड़ी लानत-मलामत के बाद उन्हें वो पद छोड़ना पड़ता है. ये एक एंबिशस महिला का रोल है मगर बड़ा सतही है. डिंपल को आप कुछ भी करने को देंगे, वो उसे एक बिलांग ऊपर ले जाकर छोड़ेंगी. यहां उनके पास स्क्रीनटाइम है मगर परफॉर्मेंस स्कोप बहुत कम है.

अनुराधा किशोर के रोल में डिंपल कपाड़िया. ये इस सीरीज़ के सबसे मजबूत और गेम चेंजर किरदार हो सकता था. मगर इसे बने-बनाए ढर्रे से बाहर नहीं निकलने दिया जाता.
अनुराधा किशोर के रोल में डिंपल कपाड़िया. ये इस सीरीज़ के सबसे मजबूत और गेम चेंजर किरदार हो सकता था. मगर इसे बने-बनाए ढर्रे से बाहर नहीं निकलने दिया जाता.

शानदार एक्टर्स को किसी प्रोजेक्ट से जोड़कर कैसे वेस्ट करना है, इसका ट्यूटोरियल आप तांडव से ले सकते हैं.

परफॉरमेंस वाइज़ दो और एक्टर्स हैं, जो इस सीरीज़ में चार चांद लगाते हैं. वो एक्टर्स हैं राजीव गुप्ता और मुकेश एस. भट्ट. राजीव ने इंस्पेक्टर नरेंद्र जाखड़ का रोल किया है. इन्हें हमने इससे पहले ‘मदारी’ और ‘हिंदी मीडियम’ जैसी फिल्मों में देखा है. तांडव के छठे एपिसोड में गुरपाल इंस्पेक्टर जाखड़ को मिलने के लिए बुलाता है. यहां पहुंचते ही नरेंद्र, गुरपाल से गाड़ी के पेपर और लाइसेंस दिखाने को कहता है. इस सीन में राजीव का काम देखकर मज़ा आ जाता है. सातवें एपिसोड में गुरपाल, उस अस्पताल के चपरासी छोटे लाल से मिलने जाता है, जहां देवकी की मौत हुई थी.  छोटे लाल का रोल किया है मुकेश एस. भट्ट ने. यहां गुरपाल से बात करने के बाद छोटे लाल कहता है-

”कितना प्यारा रिलेशनशिप हो गया है अपना कि आपके मांगने के पहले ही ले आया!”

मेरे लिए फिल्म में इन दोनों एक्टर्स का काम स्टैंड आउट करता है. मैं जब भी कभी ‘तांडव’ के बारे में सोचूंगा, मुझे ये सीन्स ज़रूर याद आएंगे.

इंस्पेक्टर नरेंद्र जाखड़ का रोल करने वाले राजीव गुप्ता. इनकी बात करने की एक टोन है, जिसे सुनते ही सीरियस बात भी कॉमेडी लगने लगती है.
इंस्पेक्टर नरेंद्र जाखड़ का रोल करने वाले राजीव गुप्ता. इनकी बात करने की एक टोन है, जिसे सुनते ही सीरियस बात भी कॉमेडी लगने लगती है.

दिक्कत कहां आ रही है?

‘तांडव’ के साथ सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि ये आपको एक से लेकर नौ एपिसोड के बीच कभी बांध नहीं पाती. ये सीरीज़ कभी बोरिंग या अझेल नहीं होती. मगर किसी तरह का थ्रिल या एक्साइटमेंट महसूस करवा पाने में भी ये नाकाम रहती है. फिल्म के अधिकतर कैरेक्टर्स की बैकस्टोरी नहीं बताई जाती. जो जैसा है, वो वैसा क्यों है? इन चीज़ों के ऊपर कोई बात नहीं होती. एक-दो कैरेक्टर्स के बारे में बिलकुल रनिंग कमेंट्री स्टाइल में बात होती है, जिससे कुछ साफ नहीं हो पाता. इस सीरीज़ के पात्र अलग-अलग भले आपको ठीक लग सकते हैं, मगर वो एक साथ आकर इस सीरीज़ की कोई मदद नहीं कर पाते. ये बड़े प्रोडक्शन लेवल पर बनी एक छिछली पॉलिटिकल थ्रिलर है, जिसे लगता है कि वो बहुत डीप है.

ये हैं मुकेश एस. भट्ट. इन्होंने फिल्म में अस्पताल के चपरासी छोटे लाल का रोल किया है. बहुत कम मौके होते हैं, जब एक-दो मिनट के रोल में भी आपको एक्टर्स का काम याद रह जाता है.
ये हैं मुकेश एस. भट्ट. इन्होंने फिल्म में अस्पताल के चपरासी छोटे लाल का रोल किया है. बहुत कम मौके होते हैं, जब एक-दो मिनट के रोल में भी आपको एक्टर्स का काम याद रह जाता है.

देखने लायक क्या है?

‘तांडव’ देखकर लगता है कि इंडिया के नेताओं के कपड़े भी मनीष मल्होत्रा डिज़ाइन करते हैं. क्योंकि सब लोग फुल जिट-जाट में दिख रहे हैं. वो सीरीज़ में दिखता अच्छा है मगर ऑथेंटिक नहीं लगता. एक ट्रिवियानुमा बात ये जान लीजिए कि सीरीज़ में समर प्रताप सिंह के घर वाले हिस्से को सैफ के खानदानी महल पटौदी पैलेस में शूट किया गया है. सीरीज़ के कुछ डायलॉग्स बड़े मारक हैं. समर, शिवा को अपनी पार्टी से चुनाव लड़ने का ऑफर देते वक्त कहता है-

”अब तुम्हें लगेगा कि मैं इस मौके का फायदा उठा रहा हूं, या मैंने तुम्हारी मदद अपने फायदे के लिए की. वो सब लगने दो!”

ये बिलकुल लॉजिकल और प्रैक्टिकल बात है. राइटर्स और फिल्ममेकर्स की नई पौध इसी तरह की सोच और समझ अपने काम में लेकर आती है. डायलॉग्स एकमात्र डिपार्टमेंट है, जहां ‘तांडव’ अपने लिए कुछ अंक बटोर पाती है.

छात्र नेता शिवा शेखर के रोल में मोहम्मद ज़ीशान अयूब. ये किरदार कई मायनों में कन्हैया कुमार से प्रेरित लगता है.
छात्र नेता शिवा शेखर के रोल में मोहम्मद ज़ीशान अयूब. ये किरदार कई मायनों में कन्हैया कुमार से प्रेरित लगता है.

इस सीरीज़ के लिए 2004 में आई फिल्म ‘युवा’ के गाने ‘धक्का लगा बुक्का’ को खुद ए.आर. रहमान ने रीमेक किया है. मगर उस गाने के इस सीरीज़ में होने या नहीं होने का कुछ खास फर्क नहीं पड़ता. क्योंकि वो कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाती. ‘एक था टाइगर’ फेम म्यूज़िशियन जुलियस पैकियम का बैकग्राउंड स्कोर हमें उस एक्साइटमेंट को फील करने को कहता है, जो सीरीज़ में कहीं पाई ही नहीं जाती.

ओवरऑल एक्सपीरियंस क्या है?

‘तांडव’ को पूरा देख चुकने के बाद ऐसा नहीं लगता कि कुछ ग्राउंड ब्रेकिंग या शानदार चीज़ देख ली. ना ये सीरीज़ हमें किसी चीज़ पर सोचने के लिए प्रेरित करती है, न ही अपनी किसी और बात को पूरी गंभीरता के साथ रख पाती है. एंटरटेनमेंट कोशेंट भी कुछ खास नहीं है. इसलिए इसके होने का मकसद समझ नहीं आता. अगर कुछ परफॉरमेंसेज़ को छोड़ दें, तो ऐसी कोई चीज़ नहीं है, जिसे आप याद रख पाएं. कुल मिलाकर तांडव एक बड़े मौके को बर्बाद करती हुई सी लगती है.

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