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'वो चार लोग' जिन्हें सुशांत की मौत पर अपना घटियापन दिखाने का मौका मिल गया

सुशांत सिंह राजपूत नहीं रहे. 14 जून, 2020 की दोपहर, जिसने भी ये खबर सुनी वह कुछ पल के लिए सुन्न हो गया. 34 साल के एक नौजवान, जिंदादिल और जिज्ञासु इंसान के इस तरह जाने पर किसी को यकीन नहीं हो रहा था. एकबारगी तो ऐसा लगा कि शायद कोई फेक न्यूज हो. शायद गलती से कुछ गलत लिख दिया किसी ने. लेकिन खबर पक्की निकली. सोशल मीडिया अगर दुख नापने का पैमाना होता तो सुशांत की मौत ने उसे पैमाने को तोड़ दिया था. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जो कच्ची उम्र की इस मौत पर भी घटिया बातें लिख रहे थे. वो सुशांत के लिए भद्दे शब्दों का इस्तेमाल कर रहे थे. इसी तरह का ज़हर इरफान और ऋषि कपूर की मौत के बाद भी उगला गया था.

सुशांत के लिए लोग ‘एंटी हिंदू’, ‘लव जिहादी’ जैसी बातें लिख रहे थे. और इस तरह की बेहूदी बातों के लिए इनके पास ‘तर्क’ भी थे.

पहले उनके तर्क देख लेते हैं.

एंटी हिंदू क्यों?

2018 में आई थी फिल्म ‘पद्मावत’. इसकी शूटिंग शुरू हुई थी 2016 में. फिल्म को लेकर राजपूत करणी सेना ने काफी हंगामा किया था. शूटिंग के दौरान डायरेक्टर संजय लीला भंसाली को पीटा गया था. दीपिका पादुकोण की नाक काटने की धमकी दी गई थी. सुशांत हिंसा के विरोध और अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में खड़े हुए थे. उन्होंने अपने नाम से सरनेम यानी ‘राजपूत’ हटा दिया था.

लोगों की सुई तब से वहीं अटकी पड़ी है. लोग कह रहे हैं कि जिस आदमी को हिंदू होने पर शर्मिंदगी होती हो, उसके मरने पर कैसा शोक मनाना.

अरे भई, सुशांत ने तब हिंसा के खिलाफ आवाज़ उठाई थी, एक समुदाय विशेष की गुंडागर्दी के खिलाफ खड़े हुए थे. और कोई भी समझदार व्यक्ति यही करता है.

लेकिन लव जिहाद वाला तर्क सुनकर तो आपके आंसू ही आ जाएंगे.

फिल्म पीके में सुशांत ने पाकिस्तानी नागरिक सरफराज़ का किरदार निभाया था. सरफराज़ को दिल्ली की रहने वाली जगतजननी उर्फ जग्गू से प्यार हो जाता है. आखिर में दोनों मिल भी जाते हैं. वहीं केदारनाथ में सुशांत बने थे मंसूर खान. टूरिस्ट गाइड जिसे मंदाकिनी मिश्रा से प्यार हो जाता है. यानी दोनों ही फिल्मों में मुस्लिम बने सुशांत को हिंदू लड़की से प्यार हो जाता है. नफरत फैलाने वालों के शब्दों में कहें तो दोनों ही फिल्मों में सुशांत के किरदार ने हिंदू लड़की को ‘फंसाकर’ लव जिहाद को बढ़ावा दिया. इसलिए वो लव जिहादी थे.

नमूने देख लीजिए-

ये लोग बता रहे हैं कि कौन हिंदू है और कौन नहीं.
ये लोग बता रहे हैं कि कौन हिंदू है और कौन नहीं.

कुछ चाणक्य के दूर के रिश्तेदार भी आए

वहीं कुछ लोग सुसाइड को लेकर अपने दिमाग का कूड़ा सोशल मीडिया पर उगल रहे हैं. सुशांत को कायर बता रहे हैं, लिख रहे हैं कि वो फिल्मों में ज्ञान तो बड़ा देते थे. लेकिन असल ज़िंदगी में डरपोक निकले. इसलिए सुसाइड कर लिया. ये लोग सुशांत का समर्थन न करने की, उनके साथ खड़ा न होने जैसी बातें लिख रहे थे. एक महाशय तो सुसाइड को महापाप बताते हुए इसे चाणक्य से जोड़ गए. कहा कि चाणक्य ने कहा है कि सुसाइड करने वाले की अंतिम यात्रा में जाने पर सुसाइड का पाप लगता है. इसी तरह की और भी घटिया बातें. आत्महत्या से पहले सुशांत किस तकलीफ में रहे होंगे, इससे इन्हें कोई लेना-देना नहीं है. इन्हें सिर्फ कायरता का, शर्मिंदगी का सर्टिफिकेट बांटना था.

आत्महत्या पर जज करने वाले.
आत्महत्या पर जज करने वाले.

ये वो लोग हैं जिन्हें किसी भी बात को धार्मिक एंगल देने में अपना जीवन सार्थक लगता है. फिर चाहे कोई मर जाए या फिर कोई चुपचाप कहीं पड़ा हो. उसे गलत बताने के लिए, उसे किसी धर्म से जोड़कर उसके खिलाफ माहौल बनाने लगते हैं. इन लोगों ने ऐसा ही इरफान की मौत पर किया था, उनके बाद ऋषि कपूर की मौत पर भी ऐसी ही घटिया बातें की थीं.

अब सुशांत नहीं हैं. तो इन नेगेटिव बातों को छोड़ते हैं. उन्हें याद रखते है उस जुझारू लड़के के रूप में जो माही बनने के लिए बेहद हो गया. उन्हें याद रखते हैं उस सरफराज़ की तरह जो अपनी जग्गू से बात करने के लिए रोज़ पाकिस्तान हाई कमीशन में फोन लगाता था.


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