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फिल्म रिव्यू- सनी

एमेज़ॉन प्राइम वीडियो पर एक नई मलयाली फिल्म रिलीज़ हुई है. इसका नाम है ‘सनी’. ये सिंगल कैरेक्टर फिल्म है. यानी आपको एक से ज़्यादा आवाज़ें तो सुनाई देंगी. मगर दिखाई सिर्फ एक किरदार देता है. सनी की लाइफ बिल्कुल मेस्ड अप हो रखी है. सनी दुबई से लौटकर कोच्चि आता है. क्योंकि वहां उसके दोस्तों ने उसके साथ धोखा किया है. उसकी पर्सनल लाइफ की हालत और खराब है. जब वो दुबई से कोच्चि लौटता है, तब उसे एक बड़े होटल में क्वॉरंटीन होना पड़ता है. इस क्वॉरंटीन पीरियड में वो अपनी लाइफ और अकेलेपन से जूझ रहा है. उसे सुसाइडल थॉट्स आ रहे हैं. वो खुद की जान लेने की कोशिश कर रहा. उसे लगता है कि वो मरके वो सब कर पाएगा, जो वो ज़िंदा रहते न कर सका. एक होटल कमरे में सनी की इसी उधेड़बुन भरी ज़िंदगी की कहानी है ‘सनी’.

इट्स नॉट ऑलवेज़ सनी इन फिलाडेल्फिया

फिल्म में सनी नाम के इस शख्स का रोल किया है जयसूर्या ने. सनी दिल से म्यूज़िशियन है मगर दिमाग से इंसान. उसकी लाइफ के अनुभवों ने उसे कड़वा बना दिया है. अब वो दुनिया को उसी कड़वाहट के साथ देखता है. फिल्म में एक सीन है, जहां सनी के होटल कमरे में एक चींटी घुस आती है. जैसे सनी खुद एक कमरे में कैद होने को मजबूर है, उसी तरह वो उस चींटी को भी गिलास के नीचे कैद कर देता है. हालांकि फिल्म ये दिखाने की कोशिश करती है कि एक इंसान के तौर पर बदल रहा है. चीज़ों को पॉज़िटिवली लेने की कोशिश कर रहा है. मगर फिल्म जो दिखाना चाहती है, वो बात हम तक नहीं पहुंच पाती है. क्योंकि हम सब सनी को अपने-अपने तरीके से देख रहे हैं. आंक रहे हैं. समझने की कोशिश कर रहे हैं. रिलेट कर रहे हैं. मगर उसकी साइड पर खड़े नहीं पा रहे हैं. क्योंकि फिल्म उस चीज़ को उतनी मजबूती से कन्वे नहीं कर पा रही, जिससे सनी गुज़र रहा है.

फिल्म एक सीन में अपने क्वॉरंटीन के शुरुआती दिनों में बाथटब में बैठकर शराब पीता सनी.
फिल्म एक सीन में अपने क्वॉरंटीन के शुरुआती दिनों में बाथटब में बैठकर शराब पीता सनी.

सनी अपने क्वॉरंटीन पीरियड में जो कुछ भी करता है, वो बहुत रिलेटेबल है. हम सब लोग उस चीज़ से गुज़र चुके हैं. मगर ये फिल्म उसे बिल्कुल ऊपर-ऊपर से दिखाती है. इससे कैरेक्टर और फिल्म दोनों को ज़रूरी डेप्थ नहीं मिल पाती. सनी की लाइफ में जो कुछ भी चल रहा है, वो उसकी गलतियों की वजह से है. कुछ गलतियां वो स्वीकार करता है, तो कुछ उसे करनी पड़ती है. बावजूद इसके सनी ऐसा कैरेक्टर बन पाता, जिसकी जर्नी देखने में पब्लिक इनवेस्ट हो सके.

पैसा बोलता है, मेहनत का या झोल का है

सनी जब दुबई से लौटकर केरल पहुंचता है, तो वो एक फाइव स्टार होटल में ठहरता है. लॉकडाउन और पैंडेमिक की वजह से आर्थिक तंगी झेल रहे दोस्त के बेटे को लैपटॉप खरीदने की बात कहता है. जबकि उसके ऊपर लाखों का कर्जा है, जो वो चुकाने की हालत में नहीं है. फिल्म के एक सीन में उसका दोस्त पूछता है इस फाइनेंशियल क्राइसिस वाली सिचुएशन में वो इतनी रईसी से कैसे रह रहा है. इसके जवाब में सनी लाइफ को एंजॉय करना चाहिए टाइप कोई हल्की बात बोल देता. फिल्म आगे बढ़ती है. मगर एक दर्शक होने के नाते आपका दिमाग वहां अटक जाता है. आप सोचने लगते हैं कि सनी के पास ये पैसे कहां से आए. आपको लगता है, फिल्म में आगे इसका जवाब मिलेगा. मगर ऐसा नहीं होता.

मरने की तमाम नाकाम कोशिशों के बाद निराश होकर बैठा सनी. उसे लगता है कि उसके मर जाने से सबकुछ ठीक हो जाएगा.
मरने की तमाम नाकाम कोशिशों के बाद निराश होकर बैठा सनी. उसे लगता है कि उसके मर जाने से सबकुछ ठीक हो जाएगा.

फिल्म कम होटल और सरकार का प्रमोशन ज़्यादा

‘सनी’ बड़े आराम से शुरू होती है. वो अपनी बात कहने के लिए पूरा समय लेती है. मगर उसके पास थॉट्स और आइडियाज़ इतने लिमिटेड हैं कि उस पर डेढ़ घंटे की फिल्म बनानी मुश्किल है. जो कुछ भी हमें सनी के ट्रेलर में देखने को मिलता है, फिल्म में बस उन्हें एलाबरेट कर दिया गया है. कुछ भी जोड़-घटाव या सरप्राइज़ वाली बात नहीं है. फिल्म के शुरुआती कुछ सीन्स में ऐसा लगता है, मानों हम होटल का ऐड देख रहे हों. जब फिल्म शुरू हो जाती है, तो हमें ऐसा लगता है कि हम केरल सरकार का कोई प्रमोशनल इवेंट देख रहे हैं. फिल्म में एक पुलिसवाला बार-बार फोन करके सनी का हालचाल पूछता है. जब सनी उससे शराब मांगता है, तो वो पुलिसवाला उसकी मानसिक स्थिति को देखते हुए डॉक्टर असाइन कर देता है. ये चीज़ें इतने डेलिबरेट तरीके से होती हैं कि आप उसे नज़रअंदाज़ नहीं कर पाते.

अपने ऊपर वाले कमरे में क्वॉरंटीन हुई महिला से बात करने की कोशिश करता सनी.
पने ऊपर वाले कमरे में क्वॉरंटीन हुई महिला से बात करने की कोशिश करता सनी.

क्या हुआ तेरा वादा!

जब से पैंडेमिक और लॉकडाउन वाला मामला शुरू हुआ है. तब से इस विषय के इर्द-गिर्द इतनी फिल्में बन चुकी हैं कि ये एक नया जॉनर सा लगने लगा है. मगर इस जॉनर के तहत बनी बड़ी गिनी-चुनी फिल्में हैं, जो अपनी सार्थकता साबित कर पाती हैं. ‘सनी’ वैसी फिल्म नहीं है. क्योंकि ये अपने होने को जस्टिफाई नहीं कर पाती. ये कोई ऐसी चीज़ दिखाती या बताती नहीं है, जो इससे पहले बनी फिल्मों में न रही हों. तिस पर मलयालम सिनेमा ने जिस तरह का गोल्डन स्टैंडर्ड बना रखा है, ‘सनी’ उस कोशिश को भी कमतर साबित करती है.

‘सनी’ को आप एमेज़ॉन प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम कर सकते हैं.


वीडियो देखें: फिल्म रिव्यू- अनाबेल सेतुपति

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