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वेब सीरीज़ रिव्यू- सनफ्लावर

ज़ी5 पर एक नई वेब सीरीज़ रिलीज़ हुई है. सुनील ग्रोवर स्टारर इस सीरीज़ का नाम है ‘सनफ्लावर’. ‘क्वीन’ फेम विकास बहल ने इसे डायरेक्ट किया है. हमने ये सीरीज़ देख ली है. आगे हम इसी बारे में बात करेंगे कि नई-नवेली वेब सीरीज़ ‘सनफ्लावर’ कैसी है.

# शुरुआत करेंगे सीरीज़ की कहानी से

मुंबई में सनफ्लावर नाम की एक हाउज़िंग सोसाइटी है. इस सोसाइटी में एक मर्डर हो जाता है. मुंबई पुलिस के दो ऑफिसर्स दिगेंद्र और तांबे इस केस की छानबीन शुरू करते हैं. पहले तो पूरी सोसाइटी उनकी सस्पेक्ट होती है. मगर बीतते समय के साथ सबूत और बिहेवियर के आधार पर दो लोगों को प्राइम सस्पेक्ट माना जाता है. पहला है सोनू सिंह. एक कॉस्मेटिक कंपनी में सेल्स मैनेजर का काम करने वाला लड़का. और दूसरे सस्पेक्ट हैं यूनिवर्सिटी के लेक्चरर मिस्टर आहूजा. हरकत से पुलिस को ज़्यादा शक आहूजा पर है. मगर सभी सबूतों का इशारा सोनू की तरफ है. इस मर्डर केस को अंजाम तक पहुंचाने की कहानी है वेब सीरीज़ ‘सनफ्लावर’.

इस सीरीज़ की कहानी ठीक यहीं से शुरू होती है. मगर कहीं पहुंच नहीं पाती.
इस सीरीज़ की कहानी ठीक यहीं से शुरू होती है. मगर कहीं पहुंच नहीं पाती.

# कॉमिक एक्टर्स को सीरियस रोल्स में देखकर मज़ा आ जाएगा

‘सनफ्लावर’ में सोनू सिंह का रोल किया है सुनील ग्रोवर ने. सुनील को हम ढेरों कॉमिक कैरेक्टर्स में देख चुके हैं. मगर उन्हें प्रॉपर एक्टिंग करते देखना बड़ा मज़ेदार अनुभव है. सोनू के किरदार की खासियत ये है कि कभी-कभी आपको उसकी नीयत पर शक होगा. मगर कभी-कभी आप उसे देखकर तरस खा जाते हैं. इन दोनों मौकों पर सुनील कंट्रोल में नज़र आते हैं. सुनील की सबसे अच्छी बात ये है कि उन्होंने सोनू के कैरेक्टर को लाउड और उबाऊ नहीं होने दिया है. वो अंडरप्ले करते हैं. और यही चीज़ उनके कैरेक्टर की धार को बनाकर रखती है. दूसरे सस्पेक्ट यानी आहूजा के रोल में हैं मुकुल चड्ढा. ‘सत्याग्रह’ और ‘एक मैं और एक तू’ जैसी फिल्मों में काम कर चुके हैं. आहूजा का किरदार शॉर्ट टेंपर वाला है. उसे अपनी बीवी की हर छोटी बात पर गुस्सा आ जाता है. मगर वो बाहर वालों से आप-आप कहकर बात करता है. काफी-डबल फेस्ड है. मतलब वो एक तरह से शो का नेगेटिव लीड है. मुकुल को हमने आम तौर पर हंसते-खेलते किरदारों में देखा है. यहां उन्हें विलन टाइप रोल में देखा बढ़िया अनुभव है. दिगेंद्र और तांबे के रोल में हैं रणवीर शौरी और गिरिश कुलकर्णी. रणवीर के बारे में सबको पता है कि वो फाइन और सींसियर परफॉर्मर हैं. यहां भी वो अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप प्रदर्शन करते हैं. गिरिश कुलकर्णी को किसी भी रोल में देखने में मज़ा आता है. क्योंकि वो स्क्रीन पर बड़े अन-प्रेडिक्टेबल लगते हैं. इनके अलावा ‘सनफ्लावर’ में आशीष विद्यार्थी, राधा भट्ट और शोनाली नागरानी भी नज़र आती हैं.

मामले की तफ्तीश कर रहे मुंबई पुलिस के दो ऑफिसर्स दिगेंद्र और तांबे.
मामले की तफ्तीश कर रहे मुंबई पुलिस के दो ऑफिसर्स दिगेंद्र और तांबे.

# पब्लिक को पता है, मगर पुलिस को नहीं पता कि मर्डर किसने किया!

अगर आप ‘सनफ्लावर’ की बात करें, तो इस वेब सीरीज़ का बेसिक आइडिया सुनकर आपका इंट्रेस्ट जाएगा. क्योंकि इस सीरीज़ की शुरुआत उसी सीन से होती है, जिसके बारे में पूरी सीरीज़ है. यानी मर्डर सीन से. दिलचस्प ये लगता है कि शो देख रही पब्लिक को पता है कि असली खूनी कौन है. मगर इस मामले की छानबीन कर रही पुलिस बुरी तरह से कंफ्यूज़ है. सीरीज़ की शुरुआत में ये सारी बातें आपको इंट्रीगिंग लगती हैं. गुज़रती सीरीज़ के साथ इसके हास्य पुट में इज़ाफा होता चला जाता है. फिर भी ‘सनफ्लावर’ कॉमिक-थ्रिलर होने का सम्मान बचा लेती है. छोटे-छोटे कॉमिक सीन्स. बड़े लॉन्ग टर्म प्लैन के तहत गढ़े गए प्लॉट ट्विस्ट आपको बढ़िया थ्रिल भी देते हैं.

पहला सस्पेक्ट- सोनू सिंह, जो कि एक कॉस्मेटिक कंपनी में काम करता है. और अपनी धुन में रहता है.
पहला सस्पेक्ट- सोनू सिंह, जो कि एक कॉस्मेटिक कंपनी में काम करता है. और अपनी धुन में रहता है.

‘सनफ्लावर’ की एक खास बात ये भी है कि वो जिस माहौल में घट रही है, इसका उसे इल्हाम है. जैसे आशीष विद्यार्थी के किरदार को ही ले लीजिए. आशीष ने सनफ्लावर हाउज़िंग सोसाइटी के बोर्ड मेंबर दिलीप अय्यर का रोल किया है. दिलीप इस सोसाइटी का चेयरमैन बनना चाहता है. क्योंकि उसे मॉडर्न होती दुनिया पसंद नहीं है. वो हिंदुस्तानी और हिंदू सभ्यता को बचाकर रखना चाहता है. इसलिए वो अपनी तमाम कोशिशों से बैचलर्स, होमोसेक्शुअल, मुसलमानों और डिवोर्सी लोगों को सोसाइटी में घर नहीं लेने देता. मुंबई में रहने वाले तमाम साथियों से घर किराए पर लेने या खरीदने की दुश्वारियां हम सब सुनते रहते हैं. साथ ही हमारे आस-पास दिलीप अय्यर टाइप लोगों की कमी नहीं है. इन मामलो में ‘सनफ्लावर’ बड़ी सधी हुई सी सीरीज़ लगती है.

दूसरा सस्पेक्ट- मिस्टर/डॉक्टर आहूजा. यूनिवर्सिटी में लेक्चरर हैं. और बड़े डबल फेस्ड इंसान हैं.
दूसरा सस्पेक्ट- मिस्टर/डॉक्टर आहूजा. यूनिवर्सिटी में लेक्चरर हैं. और बड़े डबल फेस्ड इंसान हैं.

# फिर दिक्कत कहां आ रही है?

‘सनफ्लावर’ पहले सीन में अपना सबसे बड़ा राज़ खोल देती है. मेकर्स का प्लान भी यही रहा होगा. क्योंकि असली कहानी इसके बाद शुरू होती है. मर्डर केस की तफ्तीश इस सीरीज़ का मेन प्लॉट है. मगर 8 एपिसोड लंबी ये सीरीज़ आपको बांधकर नहीं रख पाती है. वो इसलिए क्योंकि मेकर्स के पास आठ एपिसोड का कॉन्टेंट नहीं था. इस सीरीज़ को आराम से 4 एपिसोड में खत्म किया जा सकता था. मगर ये मामला इतना लंबा खिंच जाता है कि आप बोर होने लगते हैं.

‘सनफ्लावर’ की दूसरी बड़ी दिक्कत हैं इसके कैरेक्टर्स, जो कहीं सीरीज़ के काम नहीं आते. इस सीरीज़ में एक से बढ़कर एक कैरेक्टर्स हैं. सभी को बड़े अच्छे से परफॉर्म किया गया है. उन किरदारों में इतना पोटास था कि वो इस सीरीज़ को एंटरटेनिंग बना सकते थे. इन किरदारों को अकेले में देखना अच्छा लगता है. मगर एक टीम के तौर पर वो सीरीज़ को फायदा नहीं पहुंचा पाते.

‘सनफ्लावर’ बड़े प्रॉमिसिंग तरीके से शुरू होती है. मगर धीरे-धीरे उसका असर खत्म होने लगता है. क्योंकि सीरीज़ तीसरे-चौथे एपिसोड तक सीरीज़ झिलने लगती है. इसके प्लॉट ट्विस्ट बड़े मज़ेदार हैं. मगर बहुत देर से आते हैं. आखिरी एपिसोड में जो कुछ भी होता है अगर वो पहले होता, तो सीरीज़ का मज़ा बढ़ जाता है.

सनफ्लावर हाउसिंग सोसाइटी के बोर्ड मेंबर दिलीप अय्यर. ये हिदुस्तानी और हिंदू सभ्यता को बचाने में लगे हुए हैं. मगर उस फेर में अपनी बेटी को खो देने के कगार पर खड़े हैं.
सनफ्लावर हाउसिंग सोसाइटी के बोर्ड मेंबर दिलीप अय्यर. ये हिदुस्तानी और हिंदू सभ्यता को बचाने में लगे हुए हैं. मगर उस फेर में अपनी बेटी को खो देने के कगार पर खड़े हैं.

# ओवरऑल एक्सपीरियंस

कुल जमा बात ये है कि ‘सनफ्लावर’ बुरी सीरीज़ नहीं है. मगर ये एक अच्छी और ग्रिपिंग सीरीज़ भी नहीं बन पाती. अच्छे एक्टर्स की शानदार परफॉरमेंस से लैस ये सीरीज़ एक सुनहरा मौका गंवाती सी नज़र आती है. क्योंकि इसके सब्जेक्ट में बहुत पोटेंशियल था. जाते-जाते एक स्पॉयलर ले लीजिए- ‘सनफ्लावर’ इतनी अब्रप्ट्ली खत्म होती है. मानों, मेकर्स का ध्यान पहले सीज़न से ज़्यादा दूसरे सीज़न पर था.


 

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