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मूवी रिव्यू: स्टूडेंट ऑफ द ईयर 2

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अरिंदम चौधरी करके एक मैनेजमेंट गुरु हुए. उनका कहना था कि हर दशक में दर्शकों को एक फ्रेश कॉलेज मूवी चाहिए होती है. जैसे ‘जो जीता वो ही सिकंदर’ थी. अपने तौर पर सब कैल्क्यूलेट करके उन्होंने भी ‘वैसी ही’ एक फिल्म बनाई, जिसके बारे में उनका कहना था कि उसे हिट होने से कोई नहीं रोक सकता. नाम भी कुछ ऐसा ही रखा, ‘रोक सको तो रोक लो’. फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर पानी तक नहीं मांगा. फ्रेश के नाम पर बासी माल खरीदने से ग्राहकों ने इंकार कर दिया. ये सब मैं क्यों बता रहा हूं? क्योंकि ऐसा ही बासी माल एक बार फिर सिनेमा के परदे पर आया है. फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार बैनर बड़ा है और हाइप ज़्यादा है. बाकी कॉन्टेंट के नाम पर शाहरुख की आखिरी फिल्म का टाइटल ही है बस. नाम है ‘स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर-2.’

इश्टोरी ऑफ द ईयर

कहानी के बारे में बस इतना ही कि एक मिडल क्लास लड़का है जो एक हाथ में गर्लफ्रेंड, एक हाथ में स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर की ट्रॉफी और बैकग्राउंड में बड़े स्कूल का सपना लेकर जी रहा है. दो लड़कियां हैं जिनमें से एक कभी घमंडी, कभी मज़लूम है, तो दूसरी सदा कन्फ्यूज़. जब हीरो को कुछ जीतना है तो ज़ाहिर है कोई हारने वाला भी चाहिए. वो भी है. जिसे और हीरो को साथ देखकर कई बार आपका मन चाहता है कि हीरो की जगह यही जीत जाए. बाकी प्रेडिक्टेबल स्टोरी लाइन बताकर हम आपका टाइम खराब नहीं करेंगे.

रोहन छोटे स्कूल से आया बड़ा स्टार है.
रोहन छोटे स्कूल से आया बड़ा स्टार है.

क्या सीखा?

फिल्म में हीरोइन एक जगह हीरो से कहती है, मुझे तुमसे ‘काइंड ऑफ’ प्यार हो गया है. यही फिल्म की सबसे ऑनेस्ट समरी है. ये भी फिल्म नहीं, ‘काइंड ऑफ’ फिल्म है. जो ढेर पूर्वाग्रहों और स्टीरियोटाइपिंग के पहाड़ तले आपका दिमाग क्रश करके रख देती है. जैसे, ये फिल्म न सिर्फ छोटे स्कूलों का मज़ाक उड़ाती है बल्कि पूरी बेशर्मी से उनके स्टूडेंट्स, टीचर्स, प्रिंसिपल्स सबको मूर्ख बताती है. करण जौहर-पुनीत मल्होत्रा के इस शाहकार की माने तो,

# बड़े स्कूल वाले कूल होते हैं, छोटे स्कूल वाले डफर.
# छोटे स्कूल वालों की हरकतें चीप होती हैं, वो इडियट होते हैं.
# सब अमीर लोग घमंडी होते हैं, जो गरीब को देखते ही ‘औकात-औकात’ बोलने लगते हैं.
# स्टूडेंट्स पर बनी फिल्म में स्टूडेंट लाइफ की सबसे ज़रूरी चीज़ का ज़िक्र तक ज़रूरी नहीं होता. पढ़ाई का.

और भी न जाने क्या-क्या!

नकली फिल्म

इस फिल्म में सब कुछ नकली है. इमोशंस से लेकर सेट्स और डिज़ाइनर कपड़ों तक सब. प्रिंसिपल, प्रिंसिपल कम डीजे वाले बाबू ज़्यादा लगते हैं. म्युज़िक के नाम पर ऐसा कुछ नहीं जिसे घर लेकर जाया जा सके. विशाल-शेखर का सबसे कमज़ोर अल्बम होगा ये. हीरो-हीरोइन बचपन से देहरादून-मसूरी रहते हैं, फिल्म के गाने में हीरो ‘लुधियाने का जट्ट’ और हीरोइन ‘दिल्ली की कुड़ी’ बन जाती है. आपका मन करता है ‘3 इडियट्स’ वाले प्रोफेसर की तरह पूछ ही लें कि ‘अरे कहना क्या चाहते हो?’ एक गाने में हॉलीवुड सुपरस्टार को बेतुके डांस स्टेप्स करते देख आप सर पीट लेते हैं.

कबड्डी का ट्रेनिंग सेशन महाभयंकर है.
कबड्डी का ट्रेनिंग सेशन महाभयंकर है.

एक्टिंग के फ्रंट पर भी कुछ ख़ास नहीं है. टाइगर श्रॉफ डांस, जिमनास्टिक, एक्शन, बॉडी शो वगैरह सब बढ़िया कर लेते हैं लेकिन जहां एक्सप्रेशंस देने की बात आई, वो एक्टिंग से बग़ावत कर देते हैं. अनन्या पांडे कुछेक सीन्स में सहज लगी हैं. तारा सुतारिया का किरदार लिखा ही इतने विचित्र ढंग से गया है कि उनके पास ज़्यादा करने के लिए कुछ है नहीं. इनफैक्ट एक्टर्स पर ज़्यादा क्रिटिकल होने की ज़रूरत नहीं है. स्क्रिप्ट ही इतनी लचर है कि कोई क्या ही कर लेता! गुल पनाग जैसी एक्ट्रेस एक वल्गर सीन में ज़ाया कर द गई है.

फिल्म में सब कुछ आउट ऑफ प्लेस है. कबड्डी की प्रिपरेशन ऐसे होती है, जैसे आर्मी की कमांडो ट्रेनिंग हो. एक रेस और एक कबड्डी जैसा टीम गेम जीतकर कोई स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर कैसे बनता है ये भगवान करण जौहर ही जाने. नेपोटिज्म की बहस में न भी घुसें तो भी इन बड़े डायरेक्टर-प्रड्यूसर्स से ये पूछा जाना चाहिए कि वो क्यों साल दर साल घिसी-पिटी फ़िल्में परोसते हैं. दुःख की बात ये कि ऐसी आर्टिफिशियल फ़िल्में अच्छे कंटेंट वाली छोटी फिल्मों का क़त्ल कर देती हैं. इनका बॉक्स ऑफिस कलेक्शन करोड़ों तक जाता है, उन्हें दर्शक तक नहीं मिलते. इस कुचक्र को तोड़ना दर्शकों के ही हाथ में हैं. हम तो बस अफ़सोस ही ज़ाहिर कर सकते हैं.

कई जगह फिल्म का विलेन हीरो से ज़्यादा हीरो लगने लगता है.
कई जगह फिल्म का विलेन हीरो से ज़्यादा हीरो लगने लगता है.

हमारा बस चले तो हम सिनेमा हॉल के बाहर एक आदमी खड़ा कर दें, जो लोगों से वही बात कहे जो किरण खेर ने ‘ओम शांति ओम’ के एक सीन में अर्जुन रामपाल से कही थी,

“अंदर मत जाना…”


वीडियो:

 

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10 नंबरी

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