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सोन चिड़िया : मूवी रिव्यू

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‘सोनचिड़िया’ – जिसके ट्रेलर, जिसके प्रमोशन से अगर आप अंजान हैं तो ये नाम आपको किसी बाल फिल्म का लगेगा. लेकिन बात जस्ट अपोज़िट है. इतनी अपोज़िट कि फिल्म में कोई बाल कलाकार है ही नहीं.

नहीं रुकिए! हैं! तीन बाल कलाकार हैं!

  1. एक लड़की सोनचिड़िया जो चाइल्ड एब्यूज़ की शिकार है, और जिसका सर्वाइवल ही फिल्म की मुख्य थीम है.
  2. दूसरा एक लड़का जो अपने पास बंदूक रखता है, अपनी मां को मारने के वास्ते.
  3. तीसरी एक क़त्ल हो चुकी लड़की, जो गिल्ट बनकर डराने आती है.

ये है ‘सोनचिड़िया’ की डार्कनेस की इंतेहा. अगर किसी फिल्म का आगाज़ ही एक जानवर की सड़ रही लाश से होता हो, तो आपको अंदाज़ा लगाने में देर नहीं लगती कि फिल्म आगे कितनी डार्क, कितनी रॉ होने जा रही है.

मूवी को कितना रॉ, कितना ओरिजनल रखने का प्रयास किया गया था इसका अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि निर्देशक अभिषेक चौबे ने कलाकारों को पूरी शूटिंग के दौरान सिर्फ एक जोड़ी कपड़े मुहैया करवाए थे, और हर कलाकार को पूरी शूटिंग के दरमियान इन्हीं एक जोड़ी कपड़ों को यूज़ करना था. हर कलाकार को असली भारी-भारी बंदूकें पकड़ाई गईं थीं, जो हमेशा उनके साथ रहनी थीं. तब भी, जब वो शूटिंग नहीं कर रहे होते थे. सख्त हिदायत दी गई थी कि बातें भी चंबल की लोकल भाषा में करेंगे. और इसलिए ही ड्रेस से लेकर भाषा तक, सब कुछ बैंग ऑन टारगेट था. एक शादी के सीन में तो पूरा सत्तर का दशक, उस वक्त का पहनावा और उस जगह की बोली-तहजीब सब पर्दे पर गोया जस की तस उतर गई थी. यानी ये शब्दशः किसी दूसरे ही ‘देश’,’काल’ और ‘परिस्थिति’ की यात्रा करने सरीखा था.

कई जगह डायलॉग और कई जगह घटनाएं ब्लैक ह्यूमर का वायज़ बन रही थीं. आंचलिक भाषा में नॉर्मल डायलॉग भी कमाल लगते हैं. जैसे –

“सरकारी गोली से कोई कभऊं मरे है. इनके तो वादन से मरे हैं सब. बहनों, भाइयों…”

सोन चिड़िया के पोस्टर भी कम क्रिएटिव नहीं हैं. (तस्वीर: आईएमडीबी)
सोन चिड़िया के पोस्टर भी कम क्रिएटिव नहीं हैं. (तस्वीर: आईएमडीबी)

हालांकि फिल्म के एकाध ऐसे सीन भी मुझे याद आ रहे हैं जहां पर ह्यूमर क्रियेट करने के लिए रियलिज्म को ताक पर रखा गया लगता था. जैसे वो सीन जब पुलिस वाले डाकुओं को भी पुलिसवाला समझ लेते हैं. ये टिपिकल ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ टाइप डार्क ह्यूमर था, जो इस फिल्म में मिसफिट बैठता था.

कुछ फैक्ट्स भी अविश्वसनीय लगते हैं – जैसे सत्तर के दशक में सिलेंडर की गांव तक में उपलब्धता. ये सब चीज़ें बेशक बहुत कम हैं लेकिन जिस तरह झक्क सफ़ेद चादर में इक्का दुक्का दाग भी साफ़ दिखते हैं, वैसे ही परफेक्शन की हद तक साधी गई इस फिल्म में ऐसे एक दो सीन या इक्का-दुक्का फैक्ट्स भी चुभते हुए लगते हैं.

कहानी की बात करें तो मान सिंह (मनोज बाजपेयी) डाकुओं के एक गिरोह का मुखिया है. उसी गिरोह में दो और मुख्य किरदार हैं. लखना (सुशांत सिंह राजपूत) और वकील सिंह (रणवीर शौरी). इस गिरोह के पीछे हाथ धोकर पड़ा है पुलिस वाला वीरेंद्र सिंह गुज्जर (आशुतोष राणा). गुज्जर की इस गुट से एक निजी दुश्मनी भी है. कहानी में इन सब किरदारों के चलते जो ट्विस्ट एंड टर्न्स हैं सो तो हैं हीं, कुछ और भी आ जाते हैं. जब एक लड़की इंदुमती (भूमी पेडणेकर) इनके साथ हो लेती है. इंदुमती के साथ है एक और 12 साल की लड़की सोनचिड़िया जो चाइल्ड एब्यूज़ का शिकार है और जिसे इंदु अपनी छोटी बहन कहकर इंट्रोड्यूस करती है.

फिल्म में डाकुओं के मोराल अविश्वसनीयता की हद तक हाई हैं. ऐसे कि आप दुआ करने लगते हो कि काश हर कोई इन जैसा होता. फिल्म कहीं भी बुरे कर्मों को ग्लोरिफ़ाई नहीं करती, न ही जस्टिफाई करती है, न ही अपराधियों से कोई सांत्वना रखती है लेकिन फिर भी आप किसी भी किरदार से डूबकर घृणा नहीं कर पाते. हर किरदार का एक मानवीय पहलू है.

ये भले ही डाकुओं पर आधारित फिल्म हो लेकिन ये ‘शोले’ लीग की फिल्म नहीं है. ये ‘दी गुड दी बेड एंड दी अगली’ या ‘देयर विल बी ब्लड’ जैसी किसी अंग्रेजी फिल्म का ऑफिशियल-अनऑफिशियल रीमेक भी नहीं. ये खालिस भदेसी स्क्रिप्ट अपने क्राफ्ट में कुछ-कुछ ‘मदर इंडिया’, कुछ-कुछ ‘बैंडिट क्वीन’ और कुछ-कुछ ‘पान सिंह तोमर’ होते हुए भी अपने कहन में इस सबसे ही अलहदा है.

फिल्म में सभी कलाकार मंझे हुए हैं और सबने ही कमाल की एक्टिंग की है.
फिल्म में सभी कलाकार मंझे हुए हैं और सबने ही कमाल की एक्टिंग की है.

फिल्म में कलाकारों की एक्टिंग का स्तर बहुत ऊंचा है. सुशांत सिंह ने परफेक्ट एक्टिंग की है. शायद अपने करियर की बेस्ट.

भूमी पेडणेकर ने अपने रोल के लिए काफी मेहनत की है. घंटों धूप में बैठे रहना, भारी काम करना जिससे उनमें चंबल की किसी औरत का लुक आ पाए… ये सब उन्होंने किया है और ये सब किया हुआ उनके किरदार में सफलतापूर्वक झलकता है. मनोज बाजपेयी अपने नैतिक मूल्यों और अपने छोटे से रोल के चलते मान सिंह के किरदार में ‘गेम ऑफ़ थ्रॉन्स’ के नेड स्टार्क की याद दिलाते हैं. रणवीर शौरी और आशुतोष राणा ऐसी फिल्मों में चार चांद लगा देते हैं. ऐसा नहीं है कि उनके द्वारा निभाए गए किरदार को कोई नहीं निभा पाता लेकिन जब वो सिल्वर स्क्रीन पर होते हैं तो उनकी जगह किसी और एक्टर की कल्पना नहीं की जा सकती.

होने को इस फिल्म में एक बड़ी दिक्कत किरदारों का स्टीरियोटाइप होना भी है. उनका कोई ग्राफ नहीं है. वो केवल कहानी को फैसिलिटेट करते हुए लगते हैं.

फिल्म एक साथ कई सोशल मुद्दों को उठाती है. इन सोशल कॉज में अन्धविश्वास, जातिवाद, चाइल्ड एब्यूज़, महिला हित जैसे कितने ही मुद्दे शामिल हैं. फिल्म में ये सब सत्तर के दशक में हो रहा है. पर अफ़सोस कि ये आज भी उतना ही प्रासंगिक है. फिल्म की अच्छी बात ये है कि ये सोशल कॉज उठाते वक्त चिल्लाती नहीं. लेकिन बुरी बात ये है कि ये सारे मुद्दे सतह पर ही रह जाते हैं.

सोन चिड़िया जैसी फिल्मों की ख़ास बात ये होती है कि इनका फ्रेम दर फ्रेम ट्रीटमेंट लाजवाब होता है. मूवी मेकिंग के हर डिपार्टमेंट में खूब मेहनत की गई है और वो पर्दे पर दिखती भी है. लेकिन अंततः फिल्म अपने ओवर ऑल एक्सपीरियेंस में कहीं न कहीं मात खा जाती है. सोन चिड़िया नाम के बुके में एक से एक कमाल के फूल हैं, लेकिन गुलदस्ता इतना शानदार नहीं लगता. देख सकते हैं, एन्जॉय नहीं भी करेंगे तो भी कुछ सीखने को मिलेगा. इन्फेक्ट बहुत कुछ सीखने को मिलेगा.


वीडियो देखिए:

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