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उस इंडियन डायरेक्टर की 5 बातें जिसने हॉलीवुड में फिल्म बनाकर ऑस्कर जीता

शेखर कपूर. फिल्म डायरेक्टर शेखर कपूर. बॉलीवुड में ‘मिस्टर इंडिया’ और ‘बैंडिट क्वीन’ जैसी फिल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं. बाकी काम हॉलीवुड में करते हैं. 6 दिसंबर को उनका बड्डे होता है. मैं स्टोरी करना तो उसी दिन चाहता था, लेकिन लेट हो गया. इसलिए एक दिन देर से उनकी जिंदगी के सबसे खास किस्से आपके सामने रख रहा हूं. वैसे भी शेखर का काम याद ही इसलिए किया जाता है कि समय में बंधा हुआ नहीं है. इसलिए उम्मीद करता हूं कि आप इस देरी को पचा लेंगे.

शेखर कपूर ने एक समय के बाद बॉलीवुड में फिल्में बनानी बंद कर दीं.
शेखर कपूर ने एक समय के बाद बॉलीवुड में फिल्में बनाना बंद कर दिया.

#1. लंदन में CA की नौकरी छोड़ फिल्मों में आए

22 साल की उम्र में शेखर कपूर ने लंदन में चार्टर्ड अकाउंटेंट की नौकरी करनी शुरू कर दी थी. लेकिन पता नहीं उन्हें क्या सूझा कि नौकरी वगैरह छोड़ फिल्म बिज़नेस में काम करने इंडिया आ गए. यहां आए तो उनके मामा देव आनंद एक फिल्म बना रहे थे. ‘इश्क इश्क इश्क’. फिल्म की हिरोइन थीं ज़ीनत अमान. अपनी इस फिल्म में देव साहब ने सब कुछ दांव पर लगा दिया था. जब शेखर आए तो फिल्म में उन्हें भी एक छोटा सा रोल दे दिया गया. फिल्म की शूटिंग नेपाल में हो रही थी. लोकेशन में बाज़ार से लेकर पहाड़ की चोटी तक शामिल थी.

फिल्म 'इश्क इश्क इश्क' के एक सीन में देव आनंद.
फिल्म ‘इश्क इश्क इश्क’ के एक सीन में देव आनंद.

शेखर जब पहले दिन के शूट पर पहुंचे तो उन्हें लोकेशन के साथ सबकुछ अच्छा लगने लगा. उन्हें अपनी नौकरी छोड़ने का जो अफसोस था वो भी जाता रहा. अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि वही वो लम्हा था, जिसमें उन्होंने तय कर लिया कि उन्हें फिल्म लाइन में ही रहना है. उसके बाद शेखर डायरेक्शन के साथ एक्टिंग भी करने लगे. वो अपनी तकरीबन हर फिल्म में छोटा बड़ा रोल कर ही लेते हैं.

#2. इनका भी पहला प्यार एकतरफा ही था

शेखर की शुरुआती पढ़ाई दिल्ली के मॉडर्न स्कूल में हुई थी. पहला प्यार भी यहीं हुआ था. पास के ही जीसस एंड मैरी स्कूल में शीला नाम की एक लड़की थी जिसपर शेखर का दिल आ गया था. शीला बस से स्कूल जाती थी और शेखर साइकल से. साइकिल और बस साथ-साथ चलतीं. फिर बस को स्कूल तक छोड़कर शेखर अपने स्कूल चले आते. एक दिन तय हुआ कि शीला को दिल की बात बता देंगे. नहा-धो तैयार होकर लड़की के घर पहुंच गए. बेल बजी और शीला की मम्मी ने दरवाजा खोला. आधा कॉन्फिडेंस तो वहीं ढीला हो गया. लेकिन लड़का कड़क था. डटा रहा. हिम्मत करके मां से शीला के बारे में पूछ लिया. शीला आंख मीचती हुई सामने अवतरित हुईं. शेखर ने दिल की बात कह दी. लेकिन लड़की तो हद से ज़्यादा चिल्ड आउट थी. जवाब दिया ‘आई लव एल्विस प्रेस्ले’. बेचारे शेखर की लव स्टोरी शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई.

एल्विस प्रेस्ले अपने समय के बहुत मशहूर रॉकस्टार थे.
एल्विस प्रेस्ले अपने समय के बहुत मशहूर रॉकस्टार थे.

#3. प्रोड्यूसर से बात करते करते स्क्रिप्ट बदल दी

शेखर किसी भी हाल में फिल्ममेकर बनना चाहते थे. उनके खास दोस्तों में शुमार शबाना आजमी और अरूणा देसाई ने भी उन्हें अपना सपना पूरा करने के लिए प्रेरित किया. ऐसे में गुरूदत्त के भाई उन्हें एक प्रोड्यूसर से मिलवाने ले गए. शेखर अपनी स्क्रिप्ट सुनाने लगे. वो स्क्रिप्ट फिल्म ‘बर्दाश्त’ की थी. उन्होंने तैयारी भी इसी की कर रखी थी. लेकिन कुछ ही मिनट में शेखर को ये एहसास हो गया कि प्रोड्यूसर को कहानी पसंद नहीं आ रही है.

इस फिल्म को फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला था.
शेखर कपूर की ‘मासूम’ को फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला था.

उन्हें डर हो गया कि ये फिल्म फाइनेंस करने से मना कर देगा और उनका सपना अधूरा रह जाएगा. उन्होंने फटाक से फिल्म की कहानी बदल दी और एक आदमी, औरत और नाजायज़ बच्चे का प्लॉट जोड़ दिया. ये सुनते ही प्रोड्यूसर की आंखे चमकने लगीं. उसे ये कहानी पसंद आ गई और वो फिल्म प्रोड्यूस करने के लिए तैयार हो गया. इसके बाद अफरा-तफरी में शेखर ने गुलज़ार के साथ मिलकर स्क्रिप्ट लिखी जिसपर ‘मासूम’ फिल्म बनी. 1983 में आई इस फिल्म को फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवॉर्ड फॉर बेस्ट मूवी का अवॉर्ड मिला.

#4. मिस्टर इंडिया बनाने के बाद फिल्में छोड़ने का मन बना लिया

शेखर की बनाई ‘मासूम’ हिट रही थी. अगली फिल्म ‘जोशीले’ कुछ खास नहीं चल पाई. अनिल कपूर और श्रीदेवी के साथ ‘मिस्टर इंडिया’ बनाई, जो बंपर हिट हो गई. मतलब फिल्मी करियर ठीक चल रहा था. खासकर ‘मिस्टर…’ के बाद. लेकिन शेखर थोड़े ऑफ थे और अभी भी अपनी करियर चॉइस को लेकर कंफर्म नहीं थे.

'मिस्टर इंडिया' के बाद शेखर की धाक इंडस्ट्री में बढ़ने लगी थी.
‘मिस्टर इंडिया’ के बाद शेखर की धाक इंडस्ट्री में बढ़ने लगी थी.

फिल्म हिट हुई और शेखर फिलीपिंस निकल गए. वहां जाकर स्कूबा डाइविंग इंस्ट्रक्टर बन गए. वहां से मन उचट गया तो इंग्लैंड पहुंच गए और एक शो होस्ट करना शुरू कर दिया. मन स्थिर नहीं हो पा रहा था. फिल्में साइन करते और बीच में छोड़ देते. इंडस्ट्री में इंप्रेशन भी खराब होने लगा था. एक और चीज़ थी. इन्हीं दिनों वो अपनी पत्नी से अलग भी हो रहे थे. लेकिन फिर एक वक्त के बाद मैच्योर हो गए और कदम टिकाना सीख गए. फिर बंबई लौटे और बनाई ‘बैंडिट क्वीन’. इस फिल्म ने उनका करियर और इंप्रेशन दोनों सुधार दिए.

#5. हिंदी में हिट होकर हिंदी फिल्में बनाना छोड़ दिया

जब शेखर अच्छा काम कर रहे थे तो काम तो बहुत मिल रहा था लेकिन आज़ादी और एकांत नहीं मिल पा रहा था. क्रिएटिविटी के लिए जो शांति चाहिए थी वो मिल नहीं पा रही थी. कोई फिल्म बनाने चलते तो उसमें लोग बहुत व्यवधान पैदा करते थे. हर दूसरी बात काट दी जाती. जबरदस्ती मसाला घुसेड़ दिया जाता. जब कुछ फिल्में हिट हो गई तो लोग काम के साथ सलाह भी बहुत देने लगे. इससे परेशान शेखर ने हिंदी फिल्में बनाना छोड़ दिया.

उन्होंने हॉलीवुड का रूख किया और कुछ कमाल की फिल्में बनाईं. वहां उन्होंने ब्रिटिश महारानी एलिज़ाबेथ-I पर एक फिक्शनल कहानी बुनी और दो भागों में फिल्म बना दी. नाम रखा ‘एलिज़ाबेथ’. इस फिल्म के पहले भाग को ऑस्कर्स में 7 और दूसरे को 2 नॉमिनेशन मिले. जिसमें से उन्होंने दो अवॉर्ड जीते. उसके अलावा उन्होंने ‘द फोर फेदर्स’, ‘न्यू यॉर्क- आई लव यू’ और ‘पैसेज’ जैसी फिल्में भी बनाई हैं. हिंदी फिल्मों में उनकी ‘पानी’ चर्चा का विषय बनी हुई है. ये फिल्म कुछ सालों बाद धरती पर पानी खत्म होने के मुद्दे पर आधारित है. देखने वाली बात ये है कि ये फिल्म बनती कब तक है. (ये क्यों लिखा, इसके लिए बोनस पॉइंट पढ़ें).

'एलिज़ाबेथ' बनाने के दौरान अपनी हिरोइन के साथ शेखर.
‘एलिज़ाबेथ’ बनाने के दौरान अपनी हिरोइन के साथ शेखर.

#6 (बोनस). शेखर के बारे में वैसे ये बात अब तक समझ ही गए होंगे आप. लेकिन इशारे कई बार समझ नहीं भी आते हैं. तो बात ये है कि शेखर अपने हिसाब से काम करते हैं. और उनका हिसाब ये है कि कोई हिसाब नहीं है. हम में से कोई नहीं जानता कि ‘पानी’ कब रिलीज़ होगी. क्योंकि खुद शेखर को भी मालूम नहीं है. शेखर कहते हैं कि फिल्में वो नहीं बनाते, वो अपने आप बनती हैं. जैसी फिल्म इंडस्ट्री है, (चाहे बॉलीवुड हो या हॉलीवुड) उसमें रहकर ये सोचना और इसी सोच पर चलने के लिए गज़ब की सनक चाहिए बॉस. और वो शेखर में है.


 

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